थाईलैंड में 22 मई 2014 की शाम अचानक से एक सन्नाटा पसरा था. फिर उस सन्नाटे को एक आवाज़ ने चीर दिया. आवाज़ टीवी स्क्रीन से आ रही थी. आवाज़ की एक आकृति भी थी. स्क्रीन पर सितारों से सजी सेना की वर्दी पहना एक जनरल दिख रहा था.
उसने कहा,
थाईलैंड में तख़्तापलट से सत्ता हथियाने वाले पीएम को कोर्ट ने सस्पेंड क्यों किया?
प्रयुत चान-ओचा की पूरी कहानी क्या है?


राजधानी बैंकॉक और देश के बाकी हिस्सों में काफ़ी हिंसा हो रही है. इससे जान-माल का काफ़ी नुकसान हुआ है. हम नहीं चाहते कि और नुकसान हो. इसलिए, हमने शासन की बागडोर अपने हाथों में लेने का फ़ैसला किया है.
टीवी पर ये ऐलान करने वाले जनरल का नाम था, प्रयुत चान-ओचा. उनके ऐलान का मतलब साफ़ था. सेना ने लोकतांत्रिक सरकार का तख़्तापलट कर दिया है. अब सरकार सेना चलाएगी. थाईलैंड में सेना का शासन होगा. वैसे थाईलैंड में सैन्य तख़्तापलट या सैन्य शासन की कोई नई बात नहीं है. 1932 के बाद से थाईलैंड में 12 बार तख़्तापलट हो चुके हैं.
12वें तख़्तापलट के सूत्रधार प्रयुत चान-ओचा ने बाद में प्रधानमंत्री का पद हथिया लिया. आठ सालों तक साम दाम दंड भेद की नीति अपनाई. विरोधियों को दबाकर रखा. ऐसा माना जा रहा था कि ओचा अजेय हो चुके हैं. उन्हें कुर्सी से हटाया नहीं जा सकता.
कट टू 2022.
24 अगस्त को थाईलैंड की सर्वोच्च अदालत ने प्रयुत चान-ओचा की अजेयता पर विराम लगा दिया. अदालत ने ओचा को उनके पद से निलंबित कर दिया है.
आज हम जानेंगे,
प्रयुत चान-ओचा की पूरी कहानी क्या है?
मई 2014 में सेना ने तख़्तापलट क्यों किया था?
और, सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री ओचा को पद से निलंबित क्यों कर दिया है?
पहले बैकग्राउंड समझ लेते हैं.
थाईलैंड दक्षिणपूर्वी एशिया में बसा एक देश है. म्यांमार, वियतनाम और मलेशिया से घिरे इस देश की आबादी लगभग 7 करोड़ है. थाईलैंड दो लफ़्ज़ों से मिलकर बना है, थाई और लैंड, थाई ज़बान में ‘थाई’ शब्द का अर्थ होता है, आज़ाद. और थाईलैंड का मतलब आज़ाद लोगों का मुल्क.
हममें से कइयों को थाइलैंड के नाम से केवल मसाज पार्लर याद आते हैं. लेकिन थाईलैंड में कई सुंदर पर्यटन स्थल हैं. वहां के साफ़ पानी वाले बीच जैसे काटा बीच, पटोंग बीच, करोन बीच. फी-फी आइलैंड हो या जेम्स बांड द्वीप. ये सुंदरता विदेशी पर्यटकों को अपनी तरफ़ आकर्षित करती है.
इसी सुंदर देश के एक छोटे से प्रांत नखोन रैचिस्मा के एक सैन्य परिवार में 21 मार्च 1954 में एक बच्चे का जन्म हुआ. उसका नाम रखा गया प्रायुत चान-ओचा. ओचा की शुरुआती पढ़ाई गांव में हुई. आगे की पढ़ाई के लिए आर्मी स्कूल भेज दिया गया. फिर उसका दाखिला रॉयल मिलिटरी एकेडमी में हो गया. ओचा का परिवार थाईलैंड के शाही परिवार का समर्थक था. मिलिटरी एकेडमी से निकलने के बाद ओचा को क़्वीन गार्ड रेजिमेंट में काम करने का मौका मिला. उन्होंने मौका हाथ से जाने नहीं दिया. धीरे-धीरे ओचा शाही परिवार के करीब आते गए. उनका आत्मविश्वास तब और बढ़ गया, जब उन्हें रेजिमेंट के कमांडर के तौर पर नियुक्त किया गया. अक्टूबर 2003 में ओचा रॉयल गार्ड में कमांडर बन गए.

महीना अक्टूबर का ही था लेकिन साल बदल चुका था. 2006 आ चुका था. उस साल देश में बड़ा राजनैतिक उठापटक हुआ. सेना ने लोकतांत्रिक सरकार का तख़्तापलट कर दिया. उस तख्तापलट में ओचा ने सेना प्रमुख जनरल अनफोंग फाओचिंडा का समर्थन किया. इससे जनरल साहब खुश हो गए. उन्होंने ओचा को प्रोमोट कर दिया.
धीरे-धीरे ओचा जनरल अनुफोंग का विश्वास जीत रहे थे, एक दिन ओचा ने जनरल से मिलिटरी लीडर्स का गुट बनाने का सुझाव दिया. उनका मानना था कि इसके जरिए देश का शासन आसानी से चलाया जा सकता है. जनरल को आईडिया पसंद आया. उन्होंने हां कर दी. फिर ईस्टर्न टाईगर्स नाम से मिलटरी लीडर्स का एक गुट बना. ओचा के कामों की वजह से अक्टूबर 2009 में उन्हें थाई सेना का उप-प्रमुख नियुक्त कर दिया गया. 25 सितंबर 2010 को ओचा कमांडर-इन-चीफ बन गए. 2011 से 2014 के बीच का वक्त ओचा के लिए अहम था. ओचा पहले सेना के सत्ता में दखल नहीं देने के हिमायती थे, लेकिन बाद में उनके विचार बदल गए.
2014 में देश में यिंगलक शिनावात्रा की सरकार थी. देश में कुछ वक्त से राजनितिक संकट चल रहा था, विपक्षी दल और सरकार के बीच बड़ी तकरार थी. विपक्ष पर आरोप था कि उनकी वजह से सरकार काम नहीं कर पा रही है, जिसके कारण देश का माहौल ख़राब है. समय के साथ ये संकट गहराता गया. मई महीने की 22 तारीख को ओचा ने पूरे देश में नाकाबंदी कर दी. मार्शल लॉ लगा दिया. और टीवी पर आकर निज़ाम बदलने का ऐलान कर दिया.
ओचा के संबोधन के बाद मिलिटरी की तरफ़ से कुछ दिशा-निर्देश जारी हुए. इसमें क्या-क्या कहा गया?
- एक मिलिटरी हुंटा बनाई जा रही है. नेशनल काउंसिल फ़ॉर पीस एंड ऑर्डर (NCPO). अंतरिम प्रधानमंत्री और उनकी पूरी कैबिनेट सेना को रिपोर्ट करेगी.
- विधायिका और कार्यपालिक NCPO के लीडर के आदेश के अनुसार काम करेगी. न्यायपालिका हुंटा के निर्देश के अनुसार चलेगी.
- 2007 के संविधान को बर्ख़ास्त किया जा रहा है. बस राजा वाला चैप्टर बरकरार रहेगा. यानी, राजशाही सलामत रहेगी.
- पांच से अधिक लोग एक साथ इकट्ठा हो नहीं सकते हैं.
- पूरे देश में कर्फ़्यू रहेगा. इसका विरोध करने वालों को बख़्शा नहीं जाएगा.
मिलिटरी हुंटा ने अपनी अलग संसद बनाई. इसपर पूरी तरह से सेना का क़ब्ज़ा था. देश किस दिशा में जा रहा था, किसी को इसका पता नहीं था, पूरे 3 महीने बाद 21 अगस्त को ओचा ने खुद को थाईलैंड का प्रधानमंत्री घोषित कर दिया. बागडोर संभालने के बाद ओचा ने एक अंतरिम संविधान बनाया, इस नए सविंधान ने सैन्य सरकार को बेहिसाब शक्ति दे दी.
2014 में तख़्तापलट करते हुए थाइलैंड की सेना ने एक वादा किया था. कहा था कि अबकी बार ऐसा सिस्टम बनाएंगे कि दोबारा तख़्तापलट की ज़रूरत ही नहीं रहेगी. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. इन सबके चलते ओचा की देश में छवि ख़राब हुई. अब इसकी भरपाई करनी भी ज़रूरी थी. क्योंकि वक्त-वक्त में देश में बगावत के सुर सुनाई दे रहे थे. ओचा ने इसके लिए एक तिकड़म आजमाई. उन्होंने अपनी छवि सुधारने के लिए कई प्लान बनाए. एक गाना लिखा. "रिटर्न हैप्पीनेस टू थाईलैंड". इस गाने की लाइंस में ‘हम वही करेंगे जो हमने वादा किया था’ , बस थोड़ा और वक्त दे दो, टाइप की बातें थी.
माने गाने का मफूम तो आप समझ ही रहे होंगे. टिपिकल नेता के भाषण वाली बातें एक गाने में पिरो दीं गई थी. गाना रिलीज़ हुआ. रेडियो और टीवी स्टेशनों पर इसका ख़ूब प्रचार-प्रसार हुआ. ओचा गाने तक नहीं रुके. उन्होंने अपने ऊपर एक किताब भी छपवाई. उसका भी प्रचार करवाया. किताब में ओचा की सॉफ्ट इमेज बनाने की कोशिश की गई थी. किताब का टाइटल दिया गया था, His name is Tu. तू, सोचा का निकनेम है.
इसके साथ ओचा ने टीवी पर एक वीकली शो भी शुरू किया. इस शो में ओचा अपनी सैन्य सरकार के कामों की वाहवाही किया करते थे. ख़ुद ही अपनी पीठ थपथपाते थे. कुछ समय तो ओचा अपनी इमेज बिल्डिंग में लगे रहे. लेकिन बीच में कुछ वक्त के लिए उनका बर्ताव बदलने लगा. वो मीडिया से कट हो गए. जब कभी मीडिया से बात करते तो सलीके से पेश नहीं आते, उनसे बदतमीजी करते. लेकिन देश में चुनाव करीब थे. ओचा ये भांप गए कि उनका रवैया उन्हें डुबा सकता है. साल 2019 के चुनाव करीब आते-आते ओचा फिर अपनी इमेज बिल्डिंग में लग गए. उनकी टीम ने इस बार सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया. वो पार्क में जाकर लोगों के साथ मिलने जुलने लगे. उनके साथ गाना गाते, उनकी टीम इन वीडियोज़ को सोशल मीडिया में वायरल करवाती.
2019 में पलांग प्रचारत पार्टी ने ओचा को पीएम पद के लिए अपना दावेदार घोषित किया. 5 जून 2019 को ओचा देश के पीएम चुन लिए गए. हालांकि इस चुनाव पर कई तरह के सवाल उठे. मसलन ये चुनाव सही ढंग से नहीं करवाए गए. इसमें फर्जीवाड़ा हुआ है. चुनाव में सेना का दखल था. इसलिए फिर से चुनाव करवाए जाएं. लेकिन सत्ता का नशा जब सवार होता है तो नज़रें विरोध की चिनगारी नहीं देख पाती. इसके बाद भी देश में कई बार उन्हें हटाने के लिए विरोध प्रदर्शन हुए हैं. लेकिन उन्हें दबा दिया जाता. अब जाकर थाईलैंड की अदालत ने उन्हें पद से हटाने की बात कही है. अदालत ने ऐसा क्यों कहा? इसके पीछे की वजह क्या थी? ये भी जानेंगे लेकिन उससे पहले एक बार जल्दी से समझ लेते हैं थाईलैंड में तख्तापलट का इतिहास कैसा रहा है? और ओचा ने 2014 में कैसे तख्तापलट किया था?
थाईलैंड में पहले मोनार्की यानी राजशाही वाला सिस्टम था. माय वर्ड इज़ द लॉ. राजा निरंकुश था. ख़ुद को देवता का अवतार मानता था. इसके ख़िलाफ़ नाराज़गी बढ़ी. 1932 में इस सिस्टम के ख़िलाफ़ विद्रोह कामयाब रहा. इसके बाद थाइलैंड में आई, संवैधानिक राजशाही. माने सत्ता चलाने का काम संसद का होगा और राजा होंगे इस सत्ता के सांकेतिक मुखिया. ये सिस्टम थाईलैंड में लम्बे अरसे चला. अब तक थाईलैंड में कुल 19 बार तख़्तापलट की कोशिश हो चुकी है. इनमें से कुछ सफल रहे और कुछ नाकाम.
साल 2001 के बाद से थाईलैंड में हुए चुनावों में टकसिन चिनावाट और उनके करीबियों का दबदबा रहा. टकसिन 2006 तक प्रधानमंत्री रहे. 2006 के तख्तापलट में ओचा ने उस समय के सेना प्रमुख जनरल अनुफोंग फाओचिंडा का समर्थन किया था.
लेकिन राजनैतिक समीकरण की बात करें तो 2011 से 2014 तक प्रधानमंत्री का पद टकसिन चिनावाट की बहन यिंगलक चिनावाट के पास रहा. अब भी थाईलैंड में उनके समर्थकों की बड़ी संख्या है लेकिन ओचा की वजह से वे दबे छिपे रहते हैं.
फिर आया साल 2014, इस साल ओचा ने तख्तापलट किया. 2014 में तख़्तापलट करते हुए ओचा ने जनता से कहा था कि अब आगे तख़्तापलट की ज़रूरत नहीं होगी. देश में फ्री इलेक्शन करवाए जाएंगे. फिर सैन्य हुकूमत ने नया संविधान लाने की बात कही. इसपर जनमत-संग्रह हुआ. जनता ने नए संविधान को मंज़ूरी दे दी. संविधान तो बना लेकिन लोगों के अधिकारों की बुनियाद पर नहीं, बल्कि सत्ता में बैठे लोगों की सहूलियत की बुनियाद पर.

ये तो रही बात तख्तापलट की. लेकिन आज हम इसकी चर्चा क्यों कर रहे हैं?
दरअसल थाईलैंड की संवैधानिक अदालत ने प्रधानमंत्री प्रयुत चान-ओचा को पद से हटने के लिए कहा है. विपक्ष ने प्रधानमंत्री ओचा के कार्यकाल का मुद्दा उठाया था. विपक्ष ने कहा था कि ओचा अपना 8 साल का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं. इसलिए उन्हें पद छोड़कर नए चुनाव का ऐलान करना चाहिए. जब ओचा ने पद नहीं छोड़ा तो मामला संवैधानिक अदालत में एक पिटीशन की शक्ल में पहुंचा. इस पर कई दिन से सुनवाई चल भी रही थी.
ओचा के विरोधियों का तर्क है कि ओचा का कार्यकाल तब शुरू हुआ जब उन्होंने मई 2014 के तख्तापलट किया और अगस्त में खुद को पीएम घोषित किया. वहीं उनके समर्थकों का कहना है कि ओचा का कार्यकाल 2017 में संविधान लागू होने के बाद शुरू हुआ. इसी को लेकर बहस चल रही थी. और, अब कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुना दिया है. ओचा के कार्यकाल पर अंतिम फ़ैसला आना अभी बाकी है. उसमें समय लगेगा. लेकिन, फिलहाल उन्हें पद से हटना पड़ेगा. उनकी जगह पर डिप्टी पीएम एक्टिंग प्राइम मिनिस्टर के तौर पर काम करेंगे.
थाईलैंड में अगले साल मई में आम चुनाव होने वाले हैं. संभावना जताई जा रही है कि ये चुनाव पहले ही करवाया जा सकता है. अब ओचा के राजनैतिक कैरियर का पूरा दारोमदार संवैधानिक अदालत के अंतिम फ़ैसले पर टिक गया है. आगे क्या होता है, ये देखने वाली बात होगी.
थाईलैंड के चैप्टर को यहीं पर विराम देते हैं. अब चलते हैं सूडान. सूडान में अमेरिकी राजदूत की वापसी हुई. पूरे 25 साल बाद. ये इस बात का संकेत है कि अमेरिका ने सूडान के प्रति थोड़ी नरमी इख्तियार की है. साथ ही इसे दोनों देश के बीच सुधरते रिश्तों की पहली पहल मान सकते हैं.विस्तार से पूरी बात समझेंगे. लेकिन पहले थोड़ा इतिहास समझते हैं.
साल 1881 में ऑटोमन और मिस्र साझा रूप से यहां शासन चला रहे थे. लेकिन दोनों में तालमेल की कमी से सत्ता संभालने में दिक्कत हो रही थी. इसलिए, मिस्र ने ऑटोमन्स को दरकिनार कर हाथ मिलाया ब्रिटिश हुकूमत से. 1899 से 1955 तक दोनों ने साझा शासन चलाया. 1956 में सूडान आज़ाद हो गया. सूडान जैसे-तैसे आज़ाद हुआ था. मुल्क अभी अपने पैरों में खड़ा भी नहीं हुआ था कि 2 साल के बाद उसे तख्तापलट का सामना करना पड़ा. जनरल इब्राहिम ने सरकार के ख़िलाफ़ बगावत का ऐलान कर दिया. धीरे-धीरे मुल्क की हालत ख़राब होने लगी. साल 1962 में सूडान के दक्षिणी हिस्से से सिविल वॉर की शुरुआत हुई. इस सिविल वॉर की आग ने आहिस्ते से पूरे मुल्क को अपनी आगोश में ले लिया. जनरल इब्राहिम के मिलिटरी शासन से सूडान के लोग परेशान थे.
फिर मुल्क में आई क्रांति साल 1964 में. इसके बाद सूडान में इस्लामिक नेतृत्व वाली सरकार की स्थापना हुई. इसे सूडान में "अक्टूबर क्रांति" के नाम से जाना गया. लेकिन ये सरकार पूरी तरह से इस्लामिक नेतृत्व वाली नहीं थी. सूडान में सत्ता का असल इस्लामीकरण हुआ जाफ़र निमेरी के टर्न में. 1983 में उन्होंने सूडान में शरिया कानून नाफ़िस कर दिया. लेकिन कुछ दिन के बाद सत्ता में उनकी भी हालत खराब हो गई. फिर साल 1993 में जनरल उमर अल-बशीर को राष्ट्रपति नियुक्त किया गया.
बशीर ने सूडान की सत्ता कुछ वक्त अच्छे ढंग से संभाली. लेकिन फिर बशीर विदेशी मीडिया की सुर्खी बनने लगा. सबसे पहला मौका आया जब ईजिप्ट के तत्कालीन राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने उनपर हत्या का आरोप लगाया. होस्नी मुबारक की छवि विश्व भर में एक लिबरल नेता के रूप में थी. इस घटना से सूडान समेत बशीर की किरकिरी हो गई. 1993 ही वो साल था जब अमेरिका ने सूडान को ‘स्टेट स्पॉन्सर टेररिज्म’ की लिस्ट में डाल दिया और उसपर कई प्रतिबंध लगा दिए.
1998 में अमेरिका ने सूडान पर आरोप लगाया कि वो रसायनिक हथियार बनाने में मुबतिला है. सूडान ने इन आरोपों से इंकार किया. लेकिन अमेरिका कहां सुनने वाला था. अमेरिका ने सूडान के एक दवा बनाने वाली कंपनी के प्लांट पर मिसाइल हमला कर दिया. दोनों देश के बीच इस घटना के बाद तल्खी और बढ़ गई. बशीर के वक्त ही सूडान और अमेरिका के रिश्ते सबसे ज़्यादा बिगड़े. बशीर के दौर में ही अमेरिका ने सूडान को ‘स्टेट स्पॉन्सर टेररिज्म’ की लिस्ट में रखा था. 2020 में अमेरिका ने सूडान को लिस्ट से निकाल दिया. अब सूडान में अमेरिकी राजदूत की वापसी से रिश्तों में सुधार की उम्मीद जगी है.
चीन में भयंकर पावर कट से लोग बेहाल, दुनिया पर क्या असर?






















