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बॉर्डर पर भारत की नई 'प्रलय'! 'रॉकेट फोर्स' का वो प्लान जो चीन और पाकिस्तान की नींद उड़ा रहा है

प्रलय' भारत की पहली ऐसी टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल है जिसे विशेष रूप से पारंपरिक (Conventional) युद्ध के लिए बनाया गया है. 'Pralay' की असली ताकत इसकी तकनीक में छिपी है. यह एक 'क्वासी-बैलिस्टिक' मिसाइल है. सरल भाषा में कहें तो यह हवा में उड़ते समय अपना रास्ता बदल सकती है.

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भारत की नई प्रलय मिसाइल और रॉकेट फोर्स (फोटो- पीटीआई)

भारत सरकार ने चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर 'प्रलय' मिसाइलों की पहली रेजिमेंट की तैनाती को हरी झंडी दे दी है. यह कोई साधारण मिसाइल की खबर नहीं है. यह कहानी है भारत की बदलती युद्ध रणनीति की. यह कहानी है उस 'रॉकेट फोर्स' की जो भविष्य के युद्धों में भारत का सबसे घातक हथियार बनने वाली है. अगले आधे घंटे में आप समझेंगे कि क्यों 'प्रलय' का नाम सुनते ही दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम पसीने छोड़ने लगते हैं.

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कल्पना कीजिए कि युद्ध का मैदान है और दुश्मन ने एक अभेद्य दीवार खड़ी कर दी है जिसे पार करना मुश्किल है. लेकिन तभी आसमान से एक ऐसी चीज आती है जो अपनी मर्जी से रास्ता बदलती है और सीधे दुश्मन के कमांड सेंटर को तबाह कर देती है. यही 'प्रलय' है.

यह मिसाइल भारत की उस नई सोच का हिस्सा है जिसे हम 'रॉकेट फोर्स' कह रहे हैं. अब तक हमारे पास तोपखाना (Artillery) था जो कम दूरी तक वार करता था और फिर सीधे बड़ी बैलिस्टिक मिसाइलें थीं जो हजारों किलोमीटर दूर परमाणु हमला करने के लिए थीं. इन दोनों के बीच जो खाली जगह थी उसे भरने के लिए 'प्रलय' आई है.

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इस लेख में हम न केवल 'प्रलय' की मारक क्षमता की बात करेंगे बल्कि यह भी समझेंगे कि रॉकेट फोर्स बनाने के पीछे का असली मास्टरप्लान क्या है. क्या यह चीन की पीएलए रॉकेट फोर्स का जवाब है. और क्या इस एक फैसले से एशिया के शक्ति संतुलन में कोई बड़ा बदलाव आने वाला है. चलिए शुरू करते हैं इस महा-विश्लेषण को जिसे पढ़कर आपको लगेगा कि अब रक्षा के इस मुद्दे पर आपको कहीं और सर्च करने की जरूरत नहीं है.

क्या है प्रलय मिसाइल और इसकी खूबियां क्या हैं

'प्रलय' भारत की पहली ऐसी टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल है जिसे विशेष रूप से पारंपरिक (Conventional) युद्ध के लिए बनाया गया है. रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी डीआरडीओ ने इसे विकसित किया है. इसकी सबसे बड़ी खूबी इसकी मारक क्षमता है जो 150 से 500 किलोमीटर के बीच है. लेकिन बात सिर्फ दूरी की नहीं है. 'प्रलय' की असली ताकत इसकी तकनीक में छिपी है. यह एक 'क्वासी-बैलिस्टिक' मिसाइल है. सरल भाषा में कहें तो यह हवा में उड़ते समय अपना रास्ता बदल सकती है.

साधारण बैलिस्टिक मिसाइलें एक तय रास्ते पर चलती हैं जिसे दुश्मन के रडार पकड़ लेते हैं और इंटरसेप्टर मिसाइल से उसे मार गिराते हैं. लेकिन 'प्रलय' अपनी उड़ान के आखिरी चरण में अपनी दिशा और ऊंचाई बदलकर दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को पूरी तरह चकमा दे देती है. इसकी रफ्तार और सटीकता इसे दुनिया की सबसे घातक मिसाइलों की श्रेणी में खड़ा करती है. इसे मोबाइल लॉन्चर से कहीं भी ले जाया जा सकता है और मिनटों में फायर किया जा सकता है.

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क्यों जरूरी है भारत के लिए एक अलग 'रॉकेट फोर्स'

रॉकेट फोर्स का विचार कोई नया नहीं है लेकिन इसे जमीन पर उतारना अब भारत की मजबूरी और जरूरत दोनों बन गया है. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के युद्ध अब जमीन पर कब्जे से ज्यादा दुश्मन की सप्लाई लाइन और संचार व्यवस्था को तबाह करने पर केंद्रित होंगे.

अभी तक भारत की मिसाइलें या तो सेना (Army) के पास थीं या वायुसेना (Air Force) के पास. रॉकेट फोर्स बनने से इन सभी मिसाइलों का नियंत्रण एक ही कमांड के पास होगा जिससे युद्ध के समय फैसले लेने में देरी नहीं होगी.

चीन के पास पहले से ही एक विशाल 'पीएलए रॉकेट फोर्स' (PLARF) है जो उसके पूरे सैन्य ढांचे की रीढ़ है. चीन ने लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक अपनी मिसाइलें तैनात कर रखी हैं. भारत की रॉकेट फोर्स न केवल चीन को बराबरी का जवाब देगी बल्कि पाकिस्तान की छोटी दूरी की मिसाइलों के खतरे को भी खत्म करेगी. यह फोर्स भारत के 'थिएटर कमांड' मॉडल की ओर बढ़ने का पहला बड़ा कदम है जहां तीनों सेनाएं मिलकर काम करेंगी.

प्रलय की तैनाती: चीन और पाकिस्तान के लिए क्या हैं संकेत

रक्षा मंत्रालय ने प्रलय की पहली रेजिमेंट को चीन की सीमा (LAC) और पाकिस्तान की सीमा (LOC) पर तैनात करने का फैसला किया है. यह एक बहुत बड़ा रणनीतिक मैसेज है. चीन के साथ चल रहे सीमा विवाद के बीच प्रलय की तैनाती यह बताती है कि भारत अब केवल डिफेंसिव मोड में नहीं रहेगा. अगर चीन ने कोई हिमाकत की तो भारत उसके एयरफील्ड्स, फ्यूल डंप्स और रसद के ठिकानों को 500 किलोमीटर की गहराई तक जाकर तबाह करने में सक्षम है.

पाकिस्तान के लिए यह और भी बड़ी चिंता की बात है. पाकिस्तान अक्सर अपनी 'नसर' (Nasr) जैसी टैक्टिकल मिसाइलों की धमकी देता रहता है. प्रलय के आने के बाद पाकिस्तान का यह तथाकथित फायदा खत्म हो जाएगा. प्रलय इतनी सटीक है कि यह दुश्मन के बंकरों को भी उखाड़ सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह मिसाइल भारत की 'कोल्ड स्टार्ट' डॉक्ट्रिन को और ज्यादा ताकतवर बना देगी.

रशियन इस्कंदर से कितनी बेहतर है प्रलय

दुनिया भर में रूस की 'इस्कंदर' मिसाइल को टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइलों का गोल्ड स्टैंडर्ड माना जाता है. भारत की प्रलय मिसाइल की तुलना अक्सर इसी से की जाती है. प्रलय में ठोस ईंधन (Solid Propellant) का इस्तेमाल होता है जिससे इसे स्टोर करना और ट्रांसपोर्ट करना बहुत आसान है. यह मिसाइल 350 से 700 किलोग्राम तक का वॉरहेड ले जा सकती है.

जेन'स डिफेंस वीकली (Jane’s Defence Weekly) के मुताबिक प्रलय की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह इंटरसेप्टर मिसाइलों के खिलाफ 'काउंटर-मेजर' तकनीक से लैस है. इसका मतलब है कि अगर दुश्मन इसे मारने के लिए कोई मिसाइल छोड़ता है तो प्रलय उसे पहचान कर अपना रास्ता बदल लेगी. यह क्षमता इसे चीन की डीएफ-12 (DF-12) मिसाइल के समकक्ष और कई मामलों में उससे बेहतर बनाती है.

अर्थव्यवस्था और रक्षा उद्योग: मेड इन इंडिया की जीत

प्रलय मिसाइल का उत्पादन पूरी तरह भारत में हो रहा है. यह 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान की एक बड़ी जीत है. इससे न केवल भारत की विदेशी मिसाइलों पर निर्भरता कम होगी बल्कि रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा देश के अंदर ही रहेगा. जब भारत अपनी खुद की रॉकेट फोर्स बनाएगा तो इसमें हजारों करोड़ों रुपये का निवेश होगा जिससे देश की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री को बूस्ट मिलेगा.

इसमें लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स जैसी निजी कंपनियों की भी भूमिका बढ़ेगी. विशेषज्ञों का अनुमान है कि रॉकेट फोर्स के गठन से अगले पांच साल में रक्षा क्षेत्र में कम से कम 50,000 नई नौकरियां और स्वरोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं. यह भारत को ग्लोबल डिफेंस एक्सपोर्ट मार्केट में भी एक बड़े खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगा.

परमाणु युद्ध का खतरा और प्रलय का 'पारंपरिक' प्रहार

रक्षा गलियारों में एक बड़ा सवाल हमेशा रहता है कि क्या हर मिसाइल हमला परमाणु युद्ध की ओर ले जाएगा. यहीं पर 'प्रलय' अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक भूमिका निभाती है. भारत की 'नो फर्स्ट यूज' (No First Use) पॉलिसी बहुत स्पष्ट है, हम पहले परमाणु हमला नहीं करेंगे. लेकिन दुश्मन की हिमाकत का जवाब देने के लिए हमारे पास कुछ ऐसा होना चाहिए जो परमाणु न होते हुए भी परमाणु जैसा विनाश कर सके.

प्रलय एक 'कन्वेंशनल' यानी पारंपरिक मिसाइल है. इसका मतलब यह है कि अगर युद्ध की स्थिति बनती है, तो भारत दुनिया को यह बता सकता है कि हम केवल अपनी जमीन की रक्षा के लिए पारंपरिक हथियारों का इस्तेमाल कर रहे हैं. 

यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में बनाए रखता है और साथ ही दुश्मन के महत्वपूर्ण ठिकानों जैसे कमांड सेंटर, एयरबेस और रडार स्टेशनों को मटियामेट कर देता है. यह मिसाइल परमाणु युद्ध की 'दहलीज' को ऊंचा करती है, यानी छोटे-मोटे विवाद को सीधे एटमी जंग में बदलने से रोकती है.

थिएटर कमांड और रॉकेट फोर्स: भविष्य की 'एकीकृत' जंग

भारतीय सेना इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े बदलाव से गुजर रही है जिसे 'थिएटर कमांड' कहा जा रहा है. इसमें थल सेना, वायु सेना और नौसेना के संसाधनों को एक ही छत के नीचे लाया जा रहा है. रॉकेट फोर्स इस नए ढांचे की रीढ़ की हड्डी (Backbone) साबित होगी. अभी तक लंबी दूरी के हमलों के लिए वायु सेना के महंगे लड़ाकू विमानों जैसे राफेल या सुखोई पर निर्भर रहना पड़ता था.

एक लड़ाकू विमान को दुश्मन की सीमा में भेजना न केवल जोखिम भरा होता है, बल्कि एक विमान की कीमत और उसे उड़ाने का खर्च करोड़ों में आता है. रॉकेट फोर्स इस बोझ को कम करेगी. जिन ठिकानों को 'प्रलय' जैसी सस्ती और सटीक मिसाइल से तबाह किया जा सकता है, वहां पायलटों की जान जोखिम में डालने की जरूरत नहीं होगी. यह फोर्स एक 'साइलेंट किलर' की तरह काम करेगी जिसे एयरफोर्स और आर्मी दोनों अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल कर सकेंगे.

क्वासी-बैलिस्टिक तकनीक: रडार के लिए एक चलती-फिरती पहेली

आम पाठक के मन में सवाल उठता है कि ये 'क्वासी-बैलिस्टिक' क्या बला है. इसे एक सरल देसी उदाहरण से समझते हैं. मान लीजिए आपने एक पत्थर आसमान की तरफ फेंका, तो उसका गिरना तय है और उसका रास्ता भी बदला नहीं जा सकता. दुश्मन का कंप्यूटर तुरंत भांप लेगा कि पत्थर कहाँ गिरेगा. लेकिन अगर उस पत्थर में छोटे-छोटे पंख और इंजन लगा दिए जाएं जो गिरने से ठीक पहले अपना रास्ता बदल लें, तो उसे पकड़ना नामुमकिन हो जाएगा.

प्रलय ठीक यही करती है. यह एक साधारण मिसाइल और एक आधुनिक ड्रोन का हाइब्रिड (मिश्रण) है. जब यह अपनी उड़ान के आखिरी चरण में होती है, तो यह अपनी ऊंचाई और दिशा इस तरह बदलती है कि दुश्मन के महंगे से महंगे एयर डिफेंस सिस्टम (जैसे चीन का S-400 कॉपीकैट वर्जन) भी इसे ट्रैक नहीं कर पाते. रडार के स्क्रीन पर यह एक ऐसी पहेली की तरह आती है जो दिखने के बावजूद पकड़ी नहीं जा सकती.

बजट का गणित: टैक्सपेयर्स के पैसे का 'स्मार्ट' इस्तेमाल

मिडिल क्लास और टैक्स देने वाले नागरिकों के लिए यह जानना जरूरी है कि रॉकेट फोर्स बनाना केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक आर्थिक रूप से समझदारी भरा फैसला भी है. एक आधुनिक लड़ाकू विमान की कीमत हजारों करोड़ होती है और उसके रखरखाव पर हर साल करोड़ों खर्च होते हैं. अगर युद्ध में एक विमान गिरता है, तो वह देश के लिए एक बड़ी आर्थिक और सामरिक क्षति होती है.

इसके मुकाबले एक 'प्रलय' मिसाइल की लागत बहुत कम है. यह 'यूज़ एंड थ्रो' हथियार है. यानी एक बार फायर हुई तो अपना काम करके ही दम लेगी. दुश्मन के अरबों रुपये के रडार और बेस को तबाह करने के लिए कुछ करोड़ की मिसाइल दागना एक बहुत ही 'कॉस्ट-इफेक्टिव' सौदा है. यह रणनीति सुनिश्चित करती है कि रक्षा बजट का इस्तेमाल इस तरह हो कि कम खर्च में दुश्मन को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाया जा सके.

भविष्य की तस्वीर: 2030 तक कैसी होगी भारत की रॉकेट फोर्स

आने वाले समय में हम देखेंगे कि भारत की रॉकेट फोर्स में केवल प्रलय ही नहीं बल्कि ब्रह्मोस, पिनाका रॉकेट सिस्टम और निर्भय जैसी क्रूज मिसाइलें भी शामिल होंगी. 2030 तक भारत एक ऐसी एकीकृत कमांड बनाने का लक्ष्य रख सकता है जो पलक झपकते ही दुश्मन की पूरी युद्ध मशीनरी को ठप कर सके. यह फोर्स केवल जमीन से जमीन पर वार करने तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि इसमें साइबर और स्पेस वॉरफेयर के अंग भी जुड़ेंगे.

भविष्य में प्रलय के और भी उन्नत वर्जन देखने को मिल सकते हैं जिनकी रेंज 800 किलोमीटर तक हो सकती है. इसके अलावा इन्हें जहाजों और शायद भविष्य में लड़ाकू विमानों से भी छोड़ने की तकनीक पर काम हो सकता है. भारत की यह तैयारी किसी देश पर हमला करने के लिए नहीं बल्कि 'डेटरेंस' यानी दुश्मन को हमले से डराने के लिए है.

प्रलय मिसाइल और आम आदमी: आपको क्या जानना चाहिए

बहुत से लोग सोचते हैं कि मिसाइल और रॉकेट फोर्स की खबरों का आम आदमी की जिंदगी से क्या लेना-देना. असल में इसका बहुत गहरा संबंध है. एक सुरक्षित देश ही आर्थिक प्रगति कर सकता है. जब सीमाएं सुरक्षित होती हैं तो विदेशी निवेश आता है, शेयर बाजार स्थिर रहता है और व्यापार बढ़ता है. प्रलय जैसी मिसाइलें सुनिश्चित करती हैं कि भारत की विकास यात्रा में कोई दुश्मन रोड़ा न अटका सके.

इसके अलावा इस मिसाइल के विकास में जो तकनीक इस्तेमाल हुई है उसका फायदा बाद में सिविलियन सेक्टर को भी मिलता है. जैसे रडार तकनीक का उपयोग मौसम विज्ञान में होता है और मजबूत अलॉय मेटल्स का उपयोग मेडिकल उपकरणों में. इसलिए प्रलय केवल एक हथियार नहीं है, यह भारत की बढ़ती वैज्ञानिक और औद्योगिक शक्ति का प्रतीक है.

दुनियाभर में क्या है हलचल

भारत द्वारा रॉकेट फोर्स बनाने के कदम को वैश्विक शक्तियां बहुत गौर से देख रही हैं. अमेरिका और रूस जैसे देश जानते हैं कि भारत अब अपनी सैन्य रणनीति को आधुनिक बना रहा है. द लांसेट (The Lancet) के अनुसार कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे दक्षिण एशिया में एक नई 'हथियारों की होड़' (Arms Race) शुरू हो सकती है. भारत का ट्रैक रिकॉर्ड हमेशा से जिम्मेदार रहा है और उसने कभी भी पहले हमला न करने की नीति का पालन किया है.

चीन ने इस पर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा है लेकिन उसके सरकारी मीडिया की टिप्पणियां बताती हैं कि वे भारत के इस कदम को एक चुनौती के रूप में देख रहे हैं. वहीं जापान और वियतनाम जैसे देश जो चीन की आक्रामकता से परेशान हैं, वे भारत के इस कदम का स्वागत कर सकते हैं क्योंकि इससे क्षेत्र में शक्ति का संतुलन बना रहेगा.

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भारत की सुरक्षा का नया अध्याय

प्रलय मिसाइल और रॉकेट फोर्स का गठन भारत के सैन्य इतिहास में एक मील का पत्थर है. यह मिसाइल केवल बारूद और लोहे का टुकड़ा नहीं है बल्कि यह नए भारत के संकल्प का प्रतीक है. यह बताता है कि हम शांति के पुजारी तो हैं लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं. प्रलय की दहाड़ चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर एक ऐसी सुरक्षा दीवार खड़ी करेगी जिसे पार करना किसी भी दुश्मन के लिए नामुमकिन होगा.

आने वाले वर्षों में हमें इस फोर्स की और भी रेजिमेंट देखने को मिलेंगी और शायद तब तक भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए पूरी तरह आत्मनिर्भर हो चुका होगा. यह आर्टिकल हमें यह समझाता है कि तकनीक और रणनीति जब साथ मिलते हैं तो देश कितना सुरक्षित हो जाता है. उम्मीद है कि अब आपको प्रलय और रॉकेट फोर्स के बारे में हर बारीक जानकारी मिल गई होगी.

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