ये साल 1958 की बात है. लाहौर के घरों में एक नई-नई क़व्वाली बज रही है,
मशहूर क़व्वाल अज़ीज़ मियां की कहानी, जो अंगूर को 'शराब की गोलियां' बताते थे
इस कहानी में संगीत है. शराब है. अदावत है. अल्लाह से कुछ तीखे सवाल हैं और एक तरह का झगड़ा है. पान है. दो लीवर हैं जो आहिस्ता-आहिस्ता खराब हो रहे हैं और कभी भी दम तोड़ सकते हैं. शराब में डूबे दीवानों की भीड़ है. हुकूमत का खौफ है और एक बेखौफ क़व्वाल है. ये कहानी है अब्दुल अज़ीज़ उर्फ़ अज़ीज़ मियां की.


मेरा कोई नहीं है तेरे सिवा
मैं बन के सवाली आया हूं
मैं झोली खाली आया हूं...
ये क़व्वाली अभी कुछ दिनों पहले ही रिलीज हुई है. इसे गाया है मशहूर साबरी ब्रदर्स ने. हर कोई उनका दीवाना हो चुका है. लेकिन 16 साल का एक लड़का दूसरे कामों में मसरूफ़ है. लड़ाई-झगड़े और शरारतें. पिता सोचते मेरे अब्दुल अज़ीज़ का ना जाने क्या होगा. छुटपन में ही शराब पीने लगा. पिता को लगा कि इसका अब कुछ नहीं हो सकता. लेकिन नियति ने कुछ और ही सोच रखा था. अब्दुल सिर्फ नशे के लिए शराब के पास नहीं गया था. उसे तो संवाद करना था. कुछ सवाल पूछने थे. झगड़ा करना था. इश्क करना था. इसी इश्क ने एक रोज़ उससे एक क़व्वाली लिखवाई और फिर सब कुछ बदल गया. सिर्फ कुछ साल बाद 1973 में लाहौर के हर घर में अब्दुल अज़ीज़ की गाई क़व्वाली बज रही थी और वो दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा क़व्वाल बनने जा रहा था. ये क़व्वाली थी,
जमीं भी गुलाबी
समां भी गुलाबी
फ़िज़ा भी गुलाबी
हवा भी गुलाबी
आज मौसम बड़ा गुलाबी है
आज पीने में क्या खराबी है
मैं शराबी...
इस कहानी में संगीत है. शराब है. अदावत है. अल्लाह से कुछ तीखे सवाल हैं और एक तरह का झगड़ा है. पान है. दो लीवर हैं जो आहिस्ता-आहिस्ता खराब हो रहे हैं और कभी भी दम तोड़ सकते हैं. शराब में डूबे दीवानों की भीड़ है. हुकूमत का खौफ है और एक बेखौफ क़व्वाल है. ये कहानी है अब्दुल अज़ीज़ उर्फ़ अज़ीज़ मियां की.
दक्षिण एशिया में क़व्वाली आई फारस और तुर्की के सूफी भक्ति संगीत से. 12वीं सदी के बाद जब यह संगीत दक्षिण एशिया की शास्त्रीय संगीत परंपराओं और यहां के भक्ति संगीत से मिला, तब इसे क़व्वाली कहा जाने लगा. दक्षिण एशिया में आकर यह संगीत धीरे-धीरे सूफी संतों और उनकी दरगाहों से जुड़ गया. इन दरगाहों पर अलग-अलग धर्मों के लोग आकर इसे सुनते थे और आज भी यह बदस्तूर जारी है.
हालांकि सूफी संतों और इस्लाम की कट्टर धारा के बीच हमेशा मतभेद रहे. सूफी संत कठोर धार्मिक नियमों से ज्यादा आध्यात्मिक अनुभव और प्रेम को तरजीह देते थे. सूफी कविताओं और क़व्वालियों में अक्सर यह बताया गया है कि ईश्वर के प्रेम में डूबने का अनुभव ऐसा होता है जैसे कोई व्यक्ति नशे में हो यानी वह अपनी सीमाओं और सामाजिक बंधनों को भूलकर पूरी तरह ईश्वर के प्रेम में खो जाता है. क़व्वाली भी इसी विचार को अपनाती है, जहां शराब का जिक्र एक प्रतीक यानी मेटाफर के रूप में किया जाता- 'ईश्वर से मोहब्बत का नशा.'
1970 के दशक में पाकिस्तान में क़व्वाली की लोकप्रियता कमर्शियल म्यूजिक का रूप ले रही थी. उन दिनों में दो नाम खासे पॉपुलर थे- साबरी ब्रदर्स और अज़ीज़ मियां. साबरी ब्रदर्स पहले ही काफी फेमस थे. लेकिन अगला दौर था अज़ीज़ मियां का.
अज़ीज़ मियां का जन्म 17 अप्रैल 1942 को मेरठ में हुआ. 1947 में तक़सीम के बाद वो अपने परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए और लाहौर में बस गए. 10 साल की उम्र में उन्होंने लाहौर के दाता गंज बख़्श स्कूल में हारमोनियम सीखना शुरू किया और 16 साल तक रियाज़ करते रहे. 1963 में उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी, लाहौर से उर्दू, अरबी और फ़ारसी की पढ़ाई की और अंग्रेजी में एमए किया. लेकिन पिता चाहते थे कि उनका बेटा क़व्वाल बने.
क़व्वाली दरगाहों पर गाया जाने वाला आम-जनमानस का संगीत था. एक आदमी गाता और पीछे-पीछे कोरस में लोग उसे दोहराते. सीखने-समझने के लिए अज़ीज़ मियां को इससे अच्छी जगह क्या मिलती. 60 के दशक के आखिर तक अज़ीज़ मियां ज़्यादातर पारंपरिक क़व्वालियां ही गाते थे, जो पंजाबी और फ़ारसी में होती थीं. लेकिन जब उन्होंने रेडियो पर साबरी ब्रदर्स को उर्दू में क़व्वाली गाते सुना और देखा कि लोग उन्हें खूब पसंद कर रहे हैं तो वो बेचैन हो गए. उन्हें लगा कि अब पारंपरिक क़व्वालियों से काम नहीं चलेगा. कुछ छोटे-मोटे उर्दू शायरों ने उन्हें क़व्वाली के बोल और शेर भेजे. लेकिन अज़ीज़ मियां को मजा नहीं आया.
फिर अज़ीज़ मियां ने उन शायरों से बात की जो तब साबरी ब्रदर्स के लिए उर्दू में क़व्वाली लिख रहे थे. लेकिन भला वो शायर किसी नए क़व्वाल को भाव क्यों ही देते. उन्होंने अज़ीज़ मियां को सीरियसली नहीं लिया. 1970 में ऐसी ही एक शाम को अज़ीज़ मियां ने उसी दरगाह पर बैठे-बैठे एक क़व्वाली लिखी. उनकी ये खास बात थी कि वो अक्सर अपने शेर खुद लिखते थे. फिर आया 1973 का साल. उनकी क़व्वाली 'मैं शराबी' रिलीज हुई और बंपर हिट हुई.
लोगों को अज़ीज़ मियां की खुदरंग तबीयत और बिल्कुल नया अंदाज़ पसंद आने लगा. उनकी बात सुनी जाने लगी. वो जो कहना चाहते थे लोग उससे असहमत होकर भी उसे पसंद कर रहे थे.धीरे-धीरे अज़ीज़ मियां दक्षिण एशिया के जाने-माने क़व्वालों में गिने जाने लगे. करीब दस साल बाद, उसी दरगाह पर अपनी लिखी हुई क़व्वाली गाते समय उन्होंने ये किस्सा सुनाया. उन्होंने कहा, 'वो शाम ऐसी ही थी. मैं दाता दरबार में बैठा अल्लाह से बातें कर रहा था और अपने लिए दुआ मांग रहा था. तभी अचानक मुझ पर शब्दों की बारिश होने लगी. मैं भूल गया कि मैं क्या दुआ कर रहा था और वहीं बैठकर उन लिखने लगा.'
एक तरफ साबरी ब्रदर्स थे जिनका संगीत सुरों से सजा हुआ था. तो वहीं दूसरी तरफ अज़ीज़ मियां थे जो बेसुरे थे. खांटी थे. रॉ थे. उनकी क़व्वाली में गायन से ज्यादा संवाद होता था. कभी सामने बैठे लोगों से तो कभी सीधे खुदा से.
ऐ अल्लाह वो कौन हैं जिन्हें तौबा की मिल गई फ़ुर्सत
हमें गुनाह भी करने को ज़िंदगी कम
हम पैदा हुए अज़ान हुई
जब मरे हुई नमाज़
इतनी कि देर का तू हिसाब लेता है...
वो सीधे अल्लाह से सवाल करते थे. और सवाल करते-करते कभी-कभी झल्ला जाते थे. ऐसा राग मुक्त गायन. सुनकर लगता था कि मानो वो गद्य गा रहे हैं या पद्य पढ़ रहे हैं. सुर, लय, ताल से मुक्त अज़ीज़ मियां अल्लाह तक अपनी आवाज़ पहुंचाने के लिए गाते-गाते खड़े हो जाते. क़व्वाली के बीच में ही पान खा लेते. खांसने लगते और देर तक खांसते. खखारते और फिर गाने लगते. उनकी तक़रार यानी क़व्वाली में बार-बार रिपीट की जाने वाली लाइन कई-कई बार दोहराई जाती. सुनने वाले कहते हैं कि वो एक लाइन को बार-बार इसलिए दोहराते थे ताकि हर सुनने वाला अपना-अपना मतलब खोज ले. हुलिया ऐसा कि पहली बार में देखकर लोग डर जाते. पसीने से लथपथ विशालकाय देह और उतना ही बड़ा चेहरा. बेतरतीब बाल. सुर्ख लाल होंठ और मुंह में अंधकार.
कभी कहा ना किसी से तेरे फ़साने को
ना जाने कैसे खबर हो गई ज़माने को
अज़ीज़ मियां आमतौर पर अपनी क़व्वाली बहुत धीमी गति से शुरू करते थे. धीरे-धीरे कॉन्सर्ट 'क़व्वाली पार्टी' में बदल जाता था और फिर आता था घंटों चलने वाला एक 'कोरस'. इसके बाद अचानक वो बहुत तेज रफ्तार में बहस जैसे लगने वाले शेर पढ़ने लगते.
दबा के चल दिए क़ब्र में सब दुआ न सलाम
ज़रा सी देर में क्या हो गया ज़माने को
अज़ीज़ मियां शराब भी बहुत पीते थे और खुलकर शराब की तारीफ भी करते थे. उनके कॉन्सर्ट में लोग अक्सर शराब पीकर झगड़ पड़ते और बवाल कर देते. सुनने वाले अपना आपा खो बैठते. ये भी कह सकते हैं कि अज़ीज़ मियां जानबूझकर सुनने वालों को उस हालत में लेकर जाते थे. 1975 में कराची में हुए उनके एक ऐसे ही कॉन्सर्ट की समीक्षा करते हुए Dawn Magazine के एक पत्रकार ने उन्हें 'नीत्शे जैसा क़व्वाल' कहा था. फ्रेडरिक विल्हेल्म नीत्शे एक जर्मन दार्शनिक, कवि और सांस्कृतिक आलोचक थे. वो पश्चिमी परंपराओं, धर्म और दर्शन की परंपरागत नींवों को चुनौती देते थे. यही वजह थी कि लोग अज़ीज़ मियां को आइकनोक्लास्ट क़व्वाल कहते थे. आइकनोक्लास्ट यानी परंपराओं को तोड़ने वाला. अज़ीज़ मियां ने भी परंपरागत तरीके को तोड़ा और क़व्वाली का एक बिल्कुल नया चेहरा गढ़ा.
जैसे एक कॉन्सर्ट में वो कहते हैं-
"शकस्त हाल है, दुनिया के भी सताए हैं,
तेरे सवाल का या रब जवाब देते हैं
बरोज़-ए-हश्र है इतनी भी जल्दबाज़ी क्या
ज़रा शराब तो पी लें, हिसाब देते हैं"
वो कहते थे कि "कयामत के रोज अगर अल्लाह ने मुझसे पूछा कि तुमने शराब क्यों पी तो मैं कह दूंगा कि लोगों ने अंगूर खाए. वो शराब की गोलियां खाते थे, हम सागर से पीते थे."
70 के दशक में अज़ीज़ मियां और साबरी ब्रदर्स के बीच तगड़ी अदावत चली. इसे उस दौर का 'डिस कल्चर' भी कह सकते हैं. 1975 में जब हिंदुस्तान सलीम-जावेद का करिश्मा देख रहा था तब पाकिस्तान में अज़ीज़ मियां की 'तेरी सूरत' और साबरी ब्रदर्स की 'भर दे झोली' क़व्वाली गूंज रही थी. अज़ीज़ मियां और साबरी ब्रदर्स दोनों को उस दौर की सरकार से काफी सपोर्ट मिला. पाकिस्तान में उस वक्त जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार थी. सरकारी चैनल और रेडियो को साफ निर्देश था कि क़व्वाली को नियमित रूप से प्रसारित किया जाए.
साबरी ब्रदर्स को अज़ीज़ मियां की क़व्वालियों में शराब की खुलकर तारीफ करना पसंद नहीं था. हालांकि उनके कार्यक्रमों में भी लोग शराब पीते थे. लेकिन साबरी ब्रदर्स मानते थे कि अज़ीज़ मियां जल्दी मशहूर होने के लिए इस तरह की क़व्वाली का इस्तेमाल कर रहे हैं. 1976 की शुरुआत में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने अज़ीज़ मियां को इस्लामाबाद बुलाया. उनका कार्यक्रम सुना और उनके साथ बैठकर शराब भी पी. उसी साल एक कॉन्सर्ट में अज़ीज़ मियां ने साबरी ब्रदर्स को लेकर कहा कि वो बहुत पारंपरिक हैं. इस पर नाराज़ होकर साबरी ब्रदर्स ने एक क़व्वाली गाई- 'ओ शराबी छोड़ दे पीना'. जवाब में अज़ीज़ मियां ने भी क़व्वाली रिकॉर्ड की- 'हाय कमबख़्त तू ने पी ही नहीं', जिसमें उन्होंने कहा कि जो लोग खुद शराब नहीं पीते, वे नशे के spiritual experience को समझ ही नहीं सकते. दूसरों को उपदेश देने वाले लोग अक्सर पाखंडी और झूठे होते हैं.
फिर आया साल 1977. पाकिस्तान में मुसलमानों के लिए शराब पर बैन लगा दिया गया. यही वो साल था जब पाकिस्तान में जनरल जिया-उल-हक की सैन्य सरकार आई. वही हुआ जो मिलिट्री हुकूमत में होता है. अज़ीज़ मियां के कॉन्सर्ट्स पर छापे पड़ने लगे. वो अक्सर अपने प्रोग्राम्स में 'मैं शराबी' गाते और मजाक में कहते- 'अगर पुलिस आई तो मुझे गिरफ्तार करेगी, आपको नहीं.'
सैन्य सरकार में बंदिशें थीं. नियम कानून बेहद सख्त थे. वो भी पाकिस्तान जैसे मुल्क में. 1980 का दशक आते-आते क़व्वाली का स्वर्णिम युग खत्म हो गया. अब अज़ीज़ मियां को पहले की तरह कॉन्सर्ट करने और नए एल्बम रिकॉर्ड करने के मौके नहीं मिल रहे थे. निराशा और अकेलेपन ने उन्हें घेर लिया. उनकी शराब पीने की आदत और बिगड़ गई.
80 के दशक के जाते-जाते सीन में आए नुसरत फतेह अली खान और सीन ही चेंज कर दिया. उन्होंने क़व्वाली की इंडस्ट्री को ही पूरी तरह बदल दिया. नुसरत की क़व्वाली में सुर थे. सरगम थी. क्लासिकल टच था. लोगों को वो खूब पसंद आए. आज भी बड़ी संख्या में लोग क़व्वाली के लिए सबसे पहले नुसरत को प्ले करते हैं.
हो भी नहीं और, हर जा हो
तुम एक गोरख धंधा हो
लेकिन अज़ीज़ मियां की तरह नुसरत को भी शराब की लत थी और 1997 में लिवर फेल होने से उनकी मौत हो गई. 1994 में साबरी ब्रदर्स के गुलाम फरीद भी चल बसे. 90 के दशक में अज़ीज़ मियां कॉन्सर्ट करते रहे लेकिन अब लोकप्रियता पहले जैसी नहीं थी. न भीड़ वैसी थी और ना ही सुनने वालों की दीवानगी. अज़ीज़ मियां भी उस समय तक काफी थक चुके थे और अक्सर बीमार रहते थे. उनका लिवर खराब हो रहा था. फिर भी साल 2000 में वो ईरान में एक कॉन्सर्ट करने के लिए राजी हो गए. लेकिन बीच में ही उनकी तबीयत बहुत बिगड़ गई और वहीं ईरान में उनकी मौत हो गई. उस वक्त अज़ीज़ मियां की उम्र सिर्फ 56 साल थी.
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