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कनाडा में ट्रक ड्राइवर्स प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं?

कनाडा में ट्रक ड्राइवर्स के प्रोटेस्ट के बीच PM Justin Trudeau को कहां ले जाया गया?

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कनाडा में ट्रक ड्राइवर्स के प्रोटेस्ट के बीच PM Justin Trudeau को कहां ले जाया गया?(फोटो - AP)
पिछले एक हफ़्ते से कनाडा में एक काफ़िला चल रहा है. हज़ारों ट्रक ड्राइवर्स और आम नागरिकों का. इसे नाम दिया गया है, फ़्रीडम कॉन्वॉय. यानी आज़ादी का काफ़िला. अब ये छोटे शहरों से निकलकर राजधानी ओटावा में दाख़िल हो चुका है. लोगों ने प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के घर को घेर लिया है. वे अपनी मांगें पूरी होने तक वहीं बने रहने का दावा कर रहे हैं. इस नाराज़गी के बीच प्रधानमंत्री ट्रूडो और उनके परिवार को निकालकर सीक्रेट लोकेशन पर ले जाया गया है. कनाडा के ट्रक ड्राइवर्स सरकार से गुस्सा क्यों हैं? उनकी मांगें क्या हैं? उनके प्रोटेस्ट से कनाडा और अमेरिका पर क्या असर पड़ेगा? और, पूरे मसले में भारतीय मूल के लोगों की क्या भूमिका है? तारीख़, 15 जनवरी 2022. कनाडा सरकार एक नियम लेकर आई. इसमें कहा गया कि कनाडा की सीमा में घुस रहे ट्रक ड्राइवर्स को वैक्सीनेशन का सबूत दिखाना होगा. अगर सबूत नहीं दिखाया तो 14 दिनों के लिए क़्वारंटीन में रहना होगा. इस ऐलान के एक हफ़्ते बाद अमेरिका ने भी यही नियम लागू कर दिया. कनाडा की दक्षिणी सीमा अमेरिका से लगती है. दोनों देशों के बीच अच्छा-खासा व्यापार होता है. इस आयात-निर्यात का बड़ा हिस्सा सड़क मार्ग से होकर गुज़रता है. इस सप्लाई चेन को बरकरार रखने में ट्रक ड्राइवर्स की बड़ी भूमिका है. यूरोप और नॉर्थ अमेरिका के कई देशों में वैक्सीन मेनडेट को लेकर प्रोटेस्ट चल रहे हैं. कुछ लोग इसे व्यक्तिगत आज़ादी पर हमले की तरह देखते हैं. उनका कहना है कि कोई सरकार उनके ऊपर कोई कानून थोप नहीं सकती. इसको लेकर कई जगहों पर दंगे भी हुए हैं. कनाडा में ट्रक ड्राइवर्स के एक धड़े ने यही राह चुनी. उन्होंने भी वैक्सीन मेनडेट का विरोध किया. उनका कहना है कि कनाडा में 90 प्रतिशत से अधिक ट्रक ड्राइवर्स को वैक्सीन लग चुकी है. ट्रक ड्राइवर अपना अधिकतर समय अपनी गाड़ी के भीतर अकेले बिताते हैं. उनका बाहरी दुनिया से संपर्क नहीं के बराबर होता है. अभी तक सरकार ने ट्रक ड्राइवर्स को इस नियम से अलग रखा था. ये छूट आगे भी ज़ारी रहनी चाहिए थी. इस पर सरकार क्या कहती है? ट्रक ड्राइवर्स की एक मांग ये भी थी कि सरकार उनसे बात करे. उनकी मांगों पर विचार करे. लेकिन प्रधानमंत्री ट्रूडो ने इस पर ध्यान नहीं दिया. उन्होंने अपने संबोधन में ये कहा कि प्रोटेस्ट करने वाले साइंस, सरकार और समाज के विरोधी हैं. वे अपने साथ-साथ लोगों की जान भी ख़तरे में डाल रहे हैं. कनाडा सरकार अपने रुख पर कायम रही है. उसने वैक्सीन मेनडेट को लेकर पीछे हटने से मना कर दिया है. इसी को लेकर ट्रक ड्राइवर्स ने प्रोटेस्ट शुरू किया. कनाडा के अलग-अलग हिस्सों से लोग अपने ट्रकों के साथ राजधानी ओटावा की तरफ़ बढ़ने लगे. धीरे-धीरे उन्हें कट्टर दक्षिणपंथियों ने भी जॉइन कर लिया. कनाडा में 77 फ़ीसदी व्यस्क आबादी को कोरोना वैक्सीन के दोनों टीके लग चुके हैं. पांच साल से ऊपर के 88 फीसदी लोगों को वैक्सीन की कम से कम एक डोज लगाई जा चुकी है. विपक्ष का ये कहना है कि सरकार अपनी कुर्सी बचाने के लिए वैक्सीनेशन को अनिवार्य बना रही है और लोगों की आज़ादी छीन रही है. 29 जनवरी को फ़्रीडम रैली राजधानी तक पहुंच गई. प्रदर्शनकारियों ने संसद और दूसरी ऐतिहासिक इमारतों के बाहर डेरा डाल दिया है. उनका कहना है कि वे तब तक अपनी जगह से नहीं हिलेंगे, जब तक कि कोरोना से जुड़े प्रतिबंध हटा नहीं लिए जाते. फ़्रीडम रैली को कनाडा की विपक्षी कंज़र्वेटिव पार्टी का सपोर्ट तो मिला ही है, उन्हें बाहर से भी समर्थन मिल रहा है. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक रैली में कहा कि हम उन ट्रक ड्राइवर्स के साथ हैं. इससे पहले ट्रंप के बेटे ने भी फ़्रीडम रैली को समर्थन दिया था. डोनाल्ड ट्रंप जूनियर ने अमेरिका में भी ऐसी ही रैली की अपील की. ट्रंप और उनके बेटे के अलावा टेस्ला के फ़ाउंडर इलॉन मस्क ने भीर फ़्रीडम रैली को सपोर्ट किया. मस्क वैक्सीन मेनडेट और कोविड प्रोटोकॉल्स के ख़िलाफ़ बयान देते रहे हैं. कनाडा में चल रहे प्रोटेस्ट का असर भारत में भी देखने को मिला. प्रोटेस्ट के बीच भारत में ट्विटर पर हैशटेग कर्मा स्ट्राइक्स ट्रेंड होने लगा. ऐसा क्यों हुआ? 2016 की एक गणना के अनुसार, कनाडा में काम करने वाले लगभग 18 प्रतिशत ट्रक ड्राइवर्स साउथ एशिया मूल के है. इनमें भी बड़ी संख्या भारतीय मूल के लोगों की है. जब भारत में किसान आंदोलन शुरू हुए थे, उस दौरान जस्टिन ट्रूडो ने किसानों के समर्थन में बयान दिया था. उन्होंने कहा था कि शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट किसानों का बुनियादी अधिकार है. उस समय भारत सरकार ने ट्रूडो के बयान की आलोचना की थी. अब जबकि कनाडा के भीतर ट्रक ड्राइवर्स रैली कर रहे हैं, तब लोग उनके पुराने बयान को निकाल कर शेयर कर रहे हैं. लोग सवाल उठा रहे हैं कि दूसरों के आंतरिक मामले में टांग अड़ाने वाले ट्रूडो अब छिप क्यों गए? अब वो ख़ुद ट्रक ड्राइवर्स से बात क्यों नहीं कर रहे? पीसफ़ुल प्रोटेस्ट को समर्थन क्यों नहीं दे रहे? जैसा कि हमने बताया, ट्रूडो और उनकी फ़ैमिली को सुरक्षित जगह पर ले जाया गया है. अभी ये नहीं पता कि वो राजधानी में ही हैं या किसी और स्थान पर. अभी तक फ़्रीडम रैली में कोई हिंसा नहीं हुई है. लेकिन पुलिस का कहना है कि माहौल कभी भी बिगड़ सकता है. पुलिस ने सांसदों को अपना घर बंद रखने के लिए कहा है. राजधानी के लोगों को भी एहतियात बरतने की सलाह दी गई है. फ़्रीडम रैली के बीच नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी (NDP) के सांसद जगमीत सिंह का नाम भी चर्चा में है. जगमीत ने भी किसान आंदोलन का समर्थन किया था. उन्होंने जस्टिन ट्रूडो पर ऐसा करने के लिए दबाव भी बनाया था. कनाडा में चल रहे हालिया प्रोटेस्ट में शामिल लोगों को जगमीत सिंह ने कनाडा का दुश्मन बता दिया. इसको लेकर उनकी भी सख़्त आलोचना हो रही है. फ़्रीडम रैली में भारतीय मूल के लोगों की कितनी भूमिका है? इस रैली में शामिल भारतीय ट्रक ड्राइवर्स की संख्या बहुत कम है. दक्षिण एशियाई ट्रक संगठनों का दावा है कि उनके 98 फीसदी से अधिक ड्राइवर्स फ़ुली वैक्सीनेटेड हैं. उनका ये भी कहना है कि उन्हें किसी ने रैली में शामिल होने के लिए नहीं बुलाया. भारतीय लोग के जितने भी लोग प्रोटेस्ट में हिस्सा ले रहे हैं, वे आम वजहों से इकट्ठा हुए हैं. बहुत सारे प्रदर्शनकारी 31 जनवरी की शाम तक वापस लौट जाएंगे. लेकिन एक बड़ा धड़ा मांगें पूरी होने तक प्रोटेस्ट करने की फ़िराक़ में है. ये सच है कि अभी तक रैली में कोई हिंसा नहीं हुई है, लेकिन शांति कब तक बनी रहेगी, ये कहना मुश्किल है. इस आशंका के पीछे कई वजहें हैं, पहली वजह है, आंदोलन की हाईजैकिंग. फ़्रीडम रैली क्रॉस-बॉर्डर ट्रक ड्राइवर्स की मांग को लेकर शुरू हुई थी. लेकिन बाद में इसे दक्षिणपंथी संगठनों ने हाईजैक कर लिया. वे अब पूरे कनाडा से कोविड प्रोटोकॉल्स हटाने की मांग कर रहे हैं. कई प्रोटेस्टर्स अपनी तख़्तियों पर प्रधानमंत्री ट्रूडो के लिए भद्दी गालियां लिखकर लाए हैं. वे ट्रूडो से कुर्सी छोड़ने के लिए कह रहे हैं. दूसरी वजह हिंसा की अपील से जुड़ी है. फ़्रीडम रैली के राजधानी पहुंचने के बाद से ऑनलाइन ग्रुप्स में हिंसा के लिए लोगों को उकसाया जा रहा है. सोशल मीडिया पर 06 जनवरी को दोहराने की बात कही जा रही है. इसका आशय जनवरी 2021 में अमेरिका में कैपिटल हिल दंगे से है. जब भीड़ ने अमेरिका की संसद में घुसकर आगजनी और हिंसा की थी. रैली को लीड कर रहे कई लोगों पर हिंसा फैलाने और नफ़रती बयान देने के आरोप लगे हैं. प्रोटेस्ट के पीछे एक ग्रुप का नाम चर्चा में है. कनाडा यूनिटी. इस संगठन के फ़ाउंडर जेम्स बॉडर ने ट्रूडो को गिरफ़्तार करने और उनके ऊपर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की मांग करते रहे हैं. 30 जनवरी को कुछ प्रदर्शनकारी ओटावा में अज्ञात सैनिक के स्मारक पर चढ़ गए. उन्होंने स्मारक को बिगाड़ने की कोशिश भी की. कुछ दूसरी ऐतिहासिक इमारतों को भी नुकसान पहुंचाया गया है. फ़्रीडम रैली के नाम पर भारी-भरकम चंदा भी इकट्ठा हो गया है. रिपोर्ट्स के अनुसार, अभी तक लगभग 50 करोड़ रुपये ज़मा हो चुके हैं. ओटावा पुलिस इन सभी मामलों की जांच कर रही है. इस फ़्रीडम रैली का क्या असर पडे़गा? जानकारों का मानना है कि सबसे ज़्यादा परेशानी राजधानी में होने वाली है. सरकार वैक्सीन मेनडेट से पीछे नहीं हटने वाली है और प्रोटेस्टर्स अपनी मांग से. इसको लेकर टकराव की होने की आशंका है. कनाडा की अधिकांश आबादी बुनियादी चीज़ों की सप्लाई के लिए ट्रक ड्राइवर्स पर निर्भर है. फ़्रीडम रैली में हिस्सा लेने वाले ड्राइवर्स की संख्या कम है और उनके काम पर नहीं लौटने से बहुत अधिक फ़र्क़ नहीं पडे़गा. लेकिन अगर उन्होंने रास्तों को ब्लॉक किया तो सप्लाई चेन ठप पड़ जाएगी. कनाडा के कई इलाके भयानक सर्दी का सामना कर रहे हैं. इस वजह से पहले से ही सप्लाई की समस्या आ रही है. अगर ये ब्लॉकेड लंबे समय तक चला तो महंगाई बढ़ेगी और इसका असर आम जन-जीवन पर पडे़गा. एक और बात ये कही जा रही है कि वैक्सीन मेनडेट सिर्फ़ ट्रक ड्राइवर्स का मसला नहीं है. लोग कोविड प्रोटोकॉल्स से थक चुके हैं. वे नॉर्मल जीवन बिताना चाहते हैं. इसलिए, फ़्रीडम रैली में सिर्फ़ ट्रक ड्राइवर शामिल नहीं हुए हैं. उनमें से कई आम नौकरियां करने वाले या रिटायर्ड लोग भी हैं. जानकारों का कहना है कि अगर सरकार ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं सुना या कोई रास्ता नहीं निकाला तो इस प्रोटेस्ट का दायरा और बढ़ सकता है.

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