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नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के चुनावी प्रचार को क्यों नहीं बैन किया गया?

इनको बैन करने के वो कारण जो बाकियों को बैन किए जाने के कारण से कहीं बड़े हैं.

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तीन राज्यों में कांग्रेस से बदला लेती दिख रही है बीजेपी.

# 1 - आज़म खान 

# बयान- उसकी असलियत समझने में आपको 17 साल लगे. मैं 17 दिन में पहचान गया कि इनके ** का ****** खाकी रंग का है. # रिज़ल्ट- 72 घंटों का बैन.

# 2 - योगी आदित्यनाथ 

# बयान- अगर कांग्रेस-बीएसपी-एसपी को 'अली' पर विश्वास है तो हमें भी बजरंगबली पर विश्वास है. गठबंधन वाले मान चुके हैं कि बजरंगबली के अनुयायी उन्हें बदर्शत नहीं करेंगे, इसलिए वह अली-अली चिल्लाकर हरा वायरस फिर से भेजना चाहते हैं. लेकिन हरे वायरस की चपेट में पश्चिम को लाने की आवश्यकता नहीं है. पूरब से हम पहले ही हरे वायरस का सफाया कर चुके हैं. # रिज़ल्ट- 72 घंटों का बैन.

# 3 - मायावती 

# बयान- मुस्लिम समुदाय के लोग अपना वोट बंटने ना दें और सिर्फ महागठबंधन के लिए वोट दें.  # रिज़ल्ट- 48 घंटों का बैन.

# 4 - मेनका गांधी

# बयान- मैं जीत रही हूं. लोगों की मदद और प्यार से मैं जीत रही हूं. लेकिन अगर मेरी जीत मुसलमानों के बिना होगी, तो मुझे बहुत अच्छा नहीं लगेगा. क्योंकि इतना मैं बता देती हूं कि दिल खट्टा हो जाता है. फिर जब मुसलमान आता है काम के लिए तो मैं सोचती हूं कि रहने दो, क्या फ़र्क पड़ता है. # रिज़ल्ट- 48 घंटों का बैन.
आपने ये चार बयान और इनके कॉन्सक्वेनसेज़ पढ़ लिए अब दो और बयान और उनके कॉन्सक्वेनसेज़ भी पढ़ लीजिए -

# 5 - राहुल गांधी

# बयान - अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया है कि चौकीदार चोर है. # रिज़ल्ट -  .......

# 6 - नरेंद्र मोदी

# बयान - मैं फर्स्ट टाइम वोटर्स से कहना चाहता हूं, क्या आपका पहला वोट पाकिस्तान के बालाकोट में एयर स्ट्राइक करने वाले वीर जवानों के नाम समर्पित हो सकता है क्या? आपका पहला वोट पुलवामा में जो वीर शहीद हुए उन वीर शहीदों के नाम आपका वोट समर्पित हो सकता है क्या? # रिज़ल्ट -  .......
तो दोस्तों हमारी लिस्ट में लास्ट के 2 नेता अगर बाकी (लिस्ट के ऊपर के 4 नेताओं) के बराबर का भी कद रखते तो भी इनके बयान इतने बुरे तो हैं हीं कि इनके साथ भी वही या वैसा ही कुछ किया जाना चाहिए था जो चुनाव आयोग ने बाकियों के साथ किया. लेकिन रुकिए एक कंडीशन और लगाते हैं. वो कंडीशन जो स्पाइडर मैन के ऊपर उसके दादा ने लगाई थी-
ग्रेट पावर कम्स विद ग्रेटर रिस्पांसिबिलिटी.
यानी -
बड़ी ताकत, और भी बड़ी ज़िम्मेदारियों के साथ आया करती हैं.
तो अकेली इस एक कंडीशन के हिसाब से क्या दोनों पर ज़्यादा बड़ा फैसला नहीं लिया जाना चाहिए था? क्यूंकि इनका कद भी उतना ही बड़ा है. इनकी ज़िम्मेदारियां भी इतनी ही बड़ी हैं. लेकिन शायद चुनाव आयोग ने इनकी ज़िम्मेदारियों को देखा नहीं सिर्फ इनकी ताकत देखी. 'सदा तुमने ऐब देखा, हुनर क्यों न देखा' की तर्ज़ पर. यूं उनपर बड़ा तो छोड़ो समान या कम इंटेसिटी का फैसला भी नहीं लिया गया. अब बोलें तो बोलें क्या करें तो करें क्या? [इति]
वीडियो देखें:

लातूर के बस स्टैंड पर पायल बेचने वाली महिला से लल्लनटॉप बातचीत-

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