आजतक की एक रिपोर्ट के मुताबिक घटना 15 नवंबर की है. राष्ट्रपति भवन में तैनात सुरक्षा कर्मियों को सूचना मिली कि गेट नंबर-35 से एक कार में सवार एक लड़का और लड़की परिसर में घुस रहे हैं. इसके तुरंत बाद वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोक लिया. पूछताछ के बाद दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक लड़का नशे में था. वह दिल्ली के संगम विहार का रहने वाला है, जबकि उसके साथ मौजूद लड़की उसकी दोस्त थी.
इस घटना के बाद राष्ट्रपति भवन की सुरक्षा को लेकर कई तरह के सवाल दिमाग में घूमने लगते हैं, जैसे - राष्ट्रपति और राष्ट्रपति भवन की सुरक्षा कितनी पुख्ता होती है और किस एजेंसी को इसकी जिम्मेदारी दी गई है? आइए विस्तार से जानते हैं इन सवालों के जवाब.
राष्ट्रपति भवन की सुरक्षा किसके पास है?
जब भी राष्ट्रपति किसी कार्यक्रम में जाते हैं, तो उनके आसपास कई सारे बॉडीगार्ड मौजूद होते हैं. लेकिन ये क़ाफ़िला आख़िर होता किन लोगों का है? दरअसल, इस क़ाफ़िले में जो गार्ड होते हैं, उन्हें प्रेसीडेंट्स बॉडीगार्ड्स (पीबीजी) और हिंदी में 'राष्ट्रपति के अंगरक्षक' कहा जाता है. यह भारतीय सेना की घुड़सवार रेजीमेंट का हिस्सा होते हैं. यह रेजीमेंट सेना की सर्वोच्च यूनिट होती है और इसका सबसे अहम काम राष्ट्रपति की सुरक्षा करना होता है.पीबीजी में शामिल जवान राष्ट्रपति भवन में स्थायी तौर पर तैनात रहते हैं. भवन के अंदर राष्ट्रपति के सबसे नजदीकी सुरक्षा घेरे की जिम्मेदारी इन्हीं के पास रहती है. पीबीजी का हर एक सदस्य ट्रेन्ड लड़ाका, टैंक चलाने वाला फौजी होता है. इनका कमांडिंग ऑफिसर हमेशा ब्रिगेडियर या कर्नल रैंक का अधिकारी होता है. उसके नीचे मेजर, कैप्टन, रिसाल्दार और दाफादार होते हैं. सिपाहियों की रैंक 'नायक' या 'सवार' की होती है.
राष्ट्रपि भवन (फोटो : इंडिया टुडे)
वॉरेन हेस्टिंग्स ने पीबीजी का गठन किया था
भारत के राष्ट्रपति की सुरक्षा में तैनात यह पीबीजी यूनिट उस समय तैयार की गई थी, जब भारत आई ईस्ट इंडिया कंपनी में यूरोपीय सैनिकों को 'पैदल दस्ते' की तरह भर्ती किया गया था. यह बात 1773 की है, उस समय वॉरेन हेस्टिंग्स भारत के गर्वनर जनरल थे. हेस्टिंग्स के निर्देश पर ही इसका गठन किया गया था. तब मुगल हाउस से 50 ट्रूप्स को इसके लिए चुना गया था. पीबीजी में तैनाती के लिए सैनिकों की लंबाई काफी मायने रखती है. अगर उनकी लंबाई छह फीट नहीं है, तो उन्हें मंजूरी नहीं मिलती. स्वतंत्रता से पहले यह योग्यता छह फीट तीन इंच थी.पीबीजी में सिर्फ जाट, सिख और राजपूत ही क्यों?
पीबीजी में राजपूत, सिख और जाट जाति समूहों से आने वाले जवानों को तरजीह दी जाती है. इसे लेकर कई बार विवाद भी हो चुका है. कई बार अदालतों में याचिकायें भी लगाई जा चुकी हैं. साल 2013 में भारतीय सेना ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि राष्ट्रपति की सुरक्षा की कुछ विशेष आवश्यकताओं के चलते राजपूत, जाट और सिख जाति समूहों से आने वाले जवानों को ही पीबीजी में भर्ती किया जाता है.इसके बाद साल 2019 में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर केंद्र सरकार से जवाब मांगा था. तब केंद्र ने कहा था,
"राष्ट्रपति के अंगरक्षकों की अलग से भर्ती की प्रक्रिया नहीं होती है. आर्मी से ही लोगों को उनके कार्य के अनुसार टुकड़ियों को बांटा जाता है और उनको नियुक्ति दी जाती है. ऐसे में राष्ट्रपति के अंगरक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया में जातिवाद का आरोप पूरी तरह से गलत है."












