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लॉरेंस-अनमोल के आगे क्यों बेबस है मुंबई पुलिस? गृह मंत्रालय के उस आदेश का कनेक्शन समझिए

बाबा सिद्दीकी की हत्या से लेकर सलमान खान और रोहित शेट्टी से जुड़े फायरिंग मामलों तक, लॉरेंस बिश्नोई गैंग का नाम सामने आता रहा है. लेकिन मुंबई पुलिस उनकी कस्टडी नहीं ले पा रही.

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लॉरेन्स (बाएं) साबरमती जेल में और अनमोल बिश्नोई (दाएं) तिहाड़ जेल में बंद है. (फोटो- India Today)

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  • मुंबई पुलिस ने टाइगर श्रॉफ के वाहन पर हुई गोलीबारी से जुड़ी जांच में बताया कि लॉरेंस बिश्नोई और उसके भाई अनमोल की कस्टडी लेना गृह मंत्रालय के आदेशों के कारण फिलहाल संभव नहीं है।
  • लॉरेंस और अनमोल बिश्नोई के जेल में बंद होने के बावजूद गृह मंत्रालय ने अगस्त 2023 से जेल से उन्हें बाहर निकालने पर रोक लगाने वाले आदेश लागू किए हैं, जिससे उनकी गिरफ्तारी और कस्टडी में लेने में बाधा आ रही है।
  • इन आदेशों के कारण मुंबई पुलिस को दोनों भाइयों से प्रभावी पूछताछ करने के लिए अदालत से अनुमति लेने की आवश्यकता होती है, और टाइगर श्रॉफ फायरिंग कांड में यदि दोनों का कनेक्शन साबित होता है तो भविष्य में उनकी गिरफ्तारी की प्रक्रिया पर असर पड़ेगा।

पहले बाबा सिद्दिकी की हत्या. फिर सलमान खान पर हमला. उसके बाद रोहित शेट्टी पर फायरिंग. और अब टाइगर श्रॉफ की गाड़ी पर गोली चलवाने के बाद भी मुंबई की पुलिस न तो लॉरेंस बिश्नोई से कोई पूछताछ कर पा रही है और न ही उसके भाई अनमोल बिश्नोई से. और वो भी तब जब लॉरेंस गुजरात की साबरमती जेल में बंद है और अनमोल दिल्ली की तिहाड़ जेल में. इसके बावजूद मुंबई की पुलिस इन दोनों ही भाइयों को उनकी जेलों से निकालकर मुंबई नहीं ला पा रही है. इसकी वजह गृह मंत्रालय का एक आदेश है, जो दोनों गैंगस्टर के जेल में होने के बावजूद मुंबई पुलिस के हाथ से उन्हें लगातार बचाता जा रहा है. 

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बाबा सिद्दीकी की हत्या हुई तो नाम आया लॉरेंस गैंग का. सलमान खान के घर फायरिंग हुई तब भी नाम आया लॉरेंस गैंग का. रोहित शेट्टी पर फायरिंग हुई तब भी और अब जब टाइगर श्रॉफ पर गोली चली तब भी हमले के पीछे लॉरेंस बिश्नोई का ही कनेक्शन बताया जा रहा है. ये सारे हमले मुंबई में हुए हैं और मुकदमा भी मुंबई में ही चल रहा है. लेकिन किसी भी केस में मुंबई की पुलिस न तो लॉरेंस बिश्नोई को मुंबई बुला पाई है और न ही उसके भाई अनमोल को, जो पूरे गैंग का सरगना है.

गृह मंत्रालय का आदेश क्या है?

इसके पीछे गृह मंत्रालय का वो आदेश है, जो हर हमले के बाद भी लॉरेंस को जेल से बाहर निकलने से रोक देता है. इसकी शुरुआत अगस्त 2023 से होती है. तब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लॉरेंस बिश्नोई को जेल से बाहर ले जाने पर रोक लगाने का आदेश जारी किया था. ये आदेश उस समय लागू क्रिमिनल प्रोसीजर कोड यानी CrPC की धारा 268 के तहत दिया गया था.

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अगस्त 2024 में इस आदेश को एक साल के लिए बढ़ाया गया. इसके बाद भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS लागू हुई, जिसने CrPC की जगह ली. लॉरेंस को जेल से बाहर ले जाने पर रोक का आदेश BNSS की धारा 303 के तहत आगे भी बढ़ाया जाता रहा. इसके बाद नवंबर 2025 में अमेरिका से डिपोर्ट होकर भारत लाए गए अनमोल बिश्नोई के लिए भी गृह मंत्रालय ने इसी तरह का आदेश जारी किया. 5 दिसंबर 2025 को अनमोल को लेकर ये आदेश जारी हुआ.

यानी दोनों भाइयों के मामले में अलग-अलग आदेश हैं, लेकिन इनका असर एक जैसा है. जब तक ये आदेश लागू हैं, तब तक किसी अदालत का ऐसा आदेश भी, जिसमें उन्हें पेश करने के लिए कहा गया हो, उन्हें जेल से बाहर लाने की अनुमति नहीं देता. यही वजह है कि मुंबई पुलिस के लिए सिर्फ ‘प्रोडक्शन वारंट’ हासिल कर लेना काफी नहीं है.

अब सवाल कि आखिर BNSS की धारा 303 है क्या?

इस धारा के तहत केंद्र या राज्य सरकार किसी कैदी को उस जेल से बाहर ले जाने पर रोक लगा सकती है, जिसमें वह बंद है. ये रोक एक सामान्य आदेश या किसी खास व्यक्ति के लिए जारी आदेश के जरिए लगाई जा सकती है. लेकिन सरकार ऐसा मनमाने तरीके से नहीं कर सकती. कानून में इसके लिए कुछ आधार बताए गए हैं.

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पहला, उस अपराध की प्रकृति जिसके लिए व्यक्ति जेल में बंद है.

दूसरा, कैदी को जेल से बाहर ले जाने पर सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) बिगड़ने की आशंका.

और तीसरा, व्यापक जनहित.

ऐसे आदेश के पीछे सुरक्षा संबंधी चिंताएं हो सकती हैं. मसलन, किसी कैदी को जेल से बाहर ले जाने पर उसके फरार होने की आशंका हो, उसकी जान को खतरा हो या उसे बाहर ले जाने से कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा होने की संभावना हो.

लेकिन इस व्यवस्था का एक दूसरा पहलू भी है.

जांच एजेंसियों का कहना है कि अगर किसी आरोपी से जेल के भीतर ही पूछताछ करनी पड़े तो जांच की प्रक्रिया सीमित हो सकती है. पूछताछ के लिए अधिकारियों की संख्या और समय पर पाबंदी हो सकती है. दूसरे आरोपियों को साथ लाकर पूछताछ करना भी मुश्किल हो सकता है. यानी एक तरफ सुरक्षा का सवाल है. दूसरी तरफ जांच को प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाने की चुनौती. इस पूरे मामले को समझने के लिए बाबा सिद्दीकी की हत्या की जांच सबसे अहम उदाहरण है. 

बाबा सिद्दीकी केस

बाबा सिद्दीकी की पत्नी ने 3 जुलाई 2026 को अदालत में अर्जी दाखिल की. उन्होंने मांग की थी कि मुंबई पुलिस को अनमोल बिश्नोई की कस्टडी लेने का निर्देश दिया जाए. उन्होंने पुलिस पर सुस्ती बरतने का आरोप लगाया. इसके बाद 10 जुलाई को Maharashtra Control of Organised Crime Act यानी मकोका कोर्ट ने अनमोल को पेश न कर पाने के मामले में मुंबई पुलिस पर सवाल उठाए. अदालत ने जांच अधिकारी को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया और पूछा कि अनमोल को कस्टडी में लेने में नाकाम रहने पर उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए. इसके जवाब में मुंबई पुलिस ने गृह मंत्रालय के आदेश का हवाला दिया.

पुलिस ने कहा कि इस आदेश के कारण अनमोल की फिजिकल कस्टडी हासिल करने पर कानूनी रोक है. पुलिस ने यह भी कहा कि प्रभावी जांच के लिए अनमोल की फिजिकल कस्टडी जरूरी है और उसके बिना जांच एजेंसी को आगे की तफ्तीश में दिक्कत हो रही है. इसके बाद जुलाई में दिल्ली की विशेष NIA अदालत ने अनमोल को मुंबई पुलिस के सामने पेश करने से जुड़ा प्रोडक्शन वारंट खारिज कर दिया. अदालत ने इसके पीछे गृह मंत्रालय के आदेश का हवाला दिया.

यानी मुंबई पुलिस ने अदालत में खुद कहा कि अनमोल की फिजिकल कस्टडी के बिना जांच प्रभावित हो रही है, लेकिन गृह मंत्रालय के आदेश के कारण पुलिस उसे जेल से बाहर नहीं ला पा रही है.

अब यहां एक और सवाल उठता है. 

अगर लॉरेंस साबरमती जेल में और अनमोल तिहाड़ जेल में बंद हैं तो क्या मुंबई पुलिस उनसे वहीं जाकर पूछताछ नहीं कर सकती? जवाब है, कर सकती है. गृह मंत्रालय के आदेश लागू रहने तक जांच एजेंसी को जेल के भीतर पूछताछ करने के लिए अदालत की अनुमति लेनी पड़ती है. लेकिन जेल के भीतर पूछताछ और किसी आरोपी को अपनी कस्टडी में लेकर पूछताछ करने में अंतर होता है.

कस्टडी में लेकर पूछताछ करने के दौरान पुलिस आरोपी से लंबे समय तक पूछताछ कर सकती है. जरूरत के मुताबिक अलग-अलग सबूतों और दूसरे आरोपियों के सामने रखकर सवाल कर सकती है. जबकि जेल के भीतर पूछताछ में समय और दूसरे आरोपियों की मौजूदगी जैसी कुछ प्रैक्ट‍िकल ल‍िम‍िटेशन हो सकती हैं. इसी वजह से मुंबई पुलिस का कहना है कि उसे अनमोल की फिजिकल कस्टडी की जरूरत है.

हालांकि, इसका मतलब ये नहीं है कि दोनों भाइयों के खिलाफ जांच के सभी रास्ते बंद हैं. पुलिस दूसरे आरोपियों से पूछताछ कर सकती है. डिजिटल और फॉरेंसिक सबूत जुटा सकती है और कानून के दायरे में रहते हुए जेल में पूछताछ की अनुमति मांग सकती है.

तो क्या सरकार किसी कैदी को हमेशा जेल के भीतर ही रख सकती है? 

ऐसा नहीं है कि इस तरह के आदेश को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती. अतीत में भी सरकारों ने संवेदनशील मामलों में आरोपियों को जेल से बाहर ले जाने पर रोक लगाने के लिए इसी तरह के प्रावधानों का इस्तेमाल किया है. मई 2013 में महाराष्ट्र सरकार ने 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के आरोपी जुबिउद्दीन अंसारी उर्फ अबू जुंदाल को अदालत में पेश करने पर रोक लगाने के लिए CrPC की धारा 268 के तहत आदेश जारी किया था.

अबू जुंदाल ने बॉम्बे हाई कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी. उसने दलील दी कि अदालत में उपस्थित रहना और निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार उसके लिए जरूरी है. हालांकि, अदालत ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया और उसे जेल से वीडियो लिंक के जरिए सुनवाई में शामिल होने की अनुमति दी.

दूसरी तरफ, अदालतें कुछ मामलों में ऐसे आदेशों को रद्द भी कर चुकी हैं, जब उन्हें लगा कि कैदी को जेल से बाहर न ले जाने के लिए दिए गए कारण पर्याप्त नहीं थे.

अब लौटते हैं उस सवाल पर, जिससे ये पूरी कहानी शुरू हुई थी.

टाइगर श्रॉफ से जुड़े फायरिंग मामले में जांच एजेंसियां इस बात की पड़ताल कर रही हैं कि क्या इसके पीछे लॉरेंस बिश्नोई गैंग का हाथ है. हमले की जिम्मेदारी लेने का दावा करने वाली पोस्ट में भी गैंग का नाम सामने आया है. लेकिन अभी तक लॉरेंस और अनमोल को इस मामले में आरोपी नहीं बनाया गया है.  

अगर जांच में दोनों भाइयों के खिलाफ पर्याप्त सबूत सामने आते हैं और पुलिस उनसे पूछताछ करना चाहती है तो गृह मंत्रालय के मौजूदा आदेश उसके सामने बड़ी कानूनी बाधा बन सकते हैं. क्योंकि आदेश लागू रहने तक पुलिस उन्हें सीधे साबरमती या तिहाड़ जेल से निकालकर मुंबई नहीं ला सकती. उसे जेल के भीतर पूछताछ के लिए अदालत की अनुमति लेनी होगी या आदेश में बदलाव के लिए कोई कानूनी रास्ता अपनाना होगा.

इस मामले ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है. जब किसी गैंग के खिलाफ अलग-अलग राज्यों में गंभीर आपराधिक मामलों की जांच चल रही हो तो सुरक्षा के लिए बनाए गए ऐसे आदेश और प्रभावी पुलिस जांच के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?

प्रियंका चतुर्वेदी ने उठाए सवाल

शिवसेना (UBT) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने पूछा कि गुजरात की साबरमती जेल में बंद होने के बावजूद लॉरेंस बिश्नोई गैंग का प्रभाव बाहर कैसे बना हुआ है और मुंबई पुलिस सलमान खान के घर के बाहर फायरिंग की घटना के बाद से ही लॉरेंस से पूछताछ क्यों नहीं कर पाई?

फिलहाल, इस पूरे मामले की सबसे अहम बात यही है कि लॉरेंस और अनमोल का जेल में होना, मुंबई पुलिस के लिए उनकी कस्टडी हासिल करने की गारंटी नहीं है. गृह मंत्रालय के आदेश और BNSS की धारा 303 के चलते उन्हें जेल से बाहर लाना मुश्किल हो रहा है.

अगर टाइगर श्रॉफ फायरिंग केस में इस गैंग का हाथ होने की पुष्टि होती है तो ये देखना होगा कि इस बार मुंबई पुलिस दोनों गैंगस्टर ब्रदर्स को बाहर ला पाती है या नहीं.

वीडियो: सीने और हाथ पर चोट, टाइगर श्रॉफ पर फायरिंग करने वालों की तस्वीर वायरल, चश्मदीदों ने क्या बताया?

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