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लखीमपुर खीरी केस की SIT रिपोर्ट में क्या आरोप लगे?

SIT रिपोर्ट में अजय मिश्रा के बेटे पर क्या गंभीर आरोप लगाए गए?

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SIT रिपोर्ट में अजय मिश्रा के बेटे पर क्या गंभीर आरोप लगाए गए?
इस साल 3 अक्टूबर के रोज़ लखीमपुर खीरी में जो हुआ, और जो आपको बताया गया उसे लेकर लगातार खुलासे हो रहे हैं. जितनी स्पष्टता से ये कहा गया किसानों ने पीट पीटकर केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे के समर्थकों को मार डाला, उतनी स्पष्टता अजय मिश्रा टेनी की गाड़ी से कुचलकर मारे गए किसानों को लेकर नहीं बरती गई. वीडियो पर वीडियो वायरल होते रहे, लेकिन जैसे सरकार ने अपनी ही किसी अदालत में तय कर दिया था कि गाड़ी चढ़ना महज़ एक हादसा था. इस बात को लेकर खूब दबाव बनाया गया कि पत्रकार रमन कश्यप की हत्या भी किसानों ने ही की. ये वो बातें हैं जो आपको बताई गईं. लेकिन योगी सरकार देश की सबसे बड़ी अदालत को जो बता रही है और उसकी अपनी पुलिस अदालत में जो कह रही है, क्या वो बातें आप तक पहुंचीं? हम बताते हैं. सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील हरीष साल्वे कह चुके हैं कि पत्रकार रमन कश्यप की मृत्यु भी गाड़ी से कुचले जाने से ही हुई थी. और अब मामले की जांच के लिए बने यूपी पुलिस के विशेष जांच दल SIT ने एक अदालत के जज को लिखकर दिया है कि किसानों की हत्या एक सोची समझी साज़िश के तहत की गई थी. इसीलिए इस मामले में मुख्य आरोपी और केंद्रीय गृहराज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे मोनू मिश्रा पर हत्या की कोशिश और जानबूझकर क्षति पहुंचाने की धाराएं जोड़ देनी चाहिए. तो आज दिन की बड़ी खबर के पहले हिस्से में हम लखीमपुर खीरी मामले में सच और उसके बयान के बीच अब तक चले आ रहे फर्क पर बात करेंगे. आप जानते ही हैं कि लखीमपुर खीरी मामले में चार किसानों और एक पत्रकार को महिंद्रा थार नाम की गाड़ी से कुचलने और गोली चलाने के मुख्य आरोपी आशीष मिश्रा उर्फ मोनू मिश्रा को यूपी पुलिस कितनी मान मनुव्वल के बाद गिरफ्तार कर पाई थी. भैया टीवी पर आ रहे हैं. भैया बाइट दे रहे हैं. लेकिन जब तक देश की सबसे बड़ी अदालत ने दखल नहीं दिया, तब तक भैया को पुलिस हाथ नहीं लगा पाई. बार बार सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो योगी सरकार द्वारा की जा रही कार्रवाई से संतुष्ट नहीं है. लेकिन जिस योगी सरकार की गाड़ियां तेज़ रफ्तार में चलकर पलट जाया करती थीं वो इस मामले में रेंगती रहीं. एक और गाड़ी थी, जो धीमे थी और अब भी धीमे ही रेंग रही है. किसानों के साथ-साथ विपक्ष ने मोदी मंत्रिमंडल में गृहराज्य मंत्री टेनी का इस्तीफा मांगा. लेकिन मंत्री जी कार्यक्रम पर कार्यक्रम करते रहे. हर बात का एक ही जवाब था - जांच चल रही है. उसी में सामने आएगा कि गलती किसकी थी. और तब कार्रवाई होगी. इस तर्क से सामने अब ताज़ा जानकारी को रखते हैं. 13 दिसंबर को SIT ने लखीमपुर खीरी की चीफ ज्यूडिशियल मैजिस्ट्रेट अदालत में एक आवेदन दिया. ये आवेदन आज देश के सभी बड़े अखबारों में चस्पा है. इसके मुताबिक 4 किसानों और एक पत्रकार की जान लापरवाही में हुए एक हादसे में नहीं गई थी. SIT के चीफ इंवेस्टिगेटर इंस्पेक्टर विद्याराम दिवाकर ने आवेदन में लिखा है,
''अब तक की विवेचना व संकलित साक्ष्यों से यह प्रमाणित हुआ कि उपरोक्त अभियुक्तगणों द्वारा उक्त आपराधिक कृत्य को लापरवाही एवं उपेक्षा से नहीं, बल्कि जानबूझकर पूर्व से सुनियोजित योजना के अनुसार जान से मारने की नीयत से करित किया है, जिससे पांच लोगों की मृत्यु हो गई है और कई गंभीर रूप से घायल हुए हैं एवं कई मजरूबों के फ्रैक्चर होना पाया गया.''
इन बातों के आधार पर SIT ने सभी आरोपियों पर हत्या के प्रयास की धाराएं लगाने की सिफारिश की है. SIT इस मामले में आर्म्स एक्ट की धाराएं भी लगवाना चाहती है. ये धाराएं पहले से लगाई गई धाराओं के अतिरिक्त होंगी. हम आपको बता दें - इस मामले में पहले से हत्या और आपराधिक साज़िश की धाराएं लगी हुई हैं. एसआईटी इस मामले में से 304 A हटवाना चाहती है. अंग्रेज़ी में इसे कहते हैं डेथ बाय नेगलिजेंस. माने लापरवाही से किसी की मौत का कारण बनना. साथ ही रैश ड्राइविंग में लगने वाली धारा 279 को भी हटवाना चाहती है. इतनी बातों से साफ है कि SIT को ये कतई नहीं लगता कि ये मामला लापरवाही से गाड़ी चलाने का है. एसआईटी कह रही है कि ये एक साज़िश के तहत हुई हत्याएं थीं. SIT के पत्र पर न्यायालय को फैसला लेना है. आज आरोपियों की पेशी भी हुई. इससे पहले गृहराज्य मंत्री टेनी आपने बेटे से मिलने भी गए. हमने आपको बताया कि यूपी पुलिस अदालतों को क्या बता रही है. अब इससे बरअक्स आप उन बातों को रखिए, जो हादसे के तुरंत बाद आपसे कही गईं. ये सोचने वाली बात है कि अगर यूपी पुलिस को ही लगता है कि ये सब एक साज़िश के तहत हुआ था, तब गृहराज्य मंत्री टेनी का पद पर रहना कितना जायज़ है. यहां ये बात साफ होनी चाहिए कि भले लखीमपुर खीरी कांड से पहले किसानों को धमकी देते मंत्रीजी का बयान भी वायरल हुआ था. लेकिन अब तक किसी कड़ी ने इन हत्याओं को गृहराज्यमंत्री से नहीं जोड़ा है. न ही किसी पिता को उसके बेटे की हर करतूत के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है. लेकिन हमारे देश में रसूख और सत्ता के सामने सिस्टम जिस तरह नतमस्तक हो जाता है, उसमें ये उम्मीद कैसे की जा सकती है कि एक राज्य की पुलिस देश के गृहराज्यमंत्री के बेटे के खिलाफ पूरी निष्पक्षता से कार्रवाई कर सकती है वो भी तब, जब उसपर ऐसे आरोप लगे हों, जिनमें सख्त से सख्त सज़ा के प्रावधान हैं. एक आदर्श स्थिति यही होगी कि यूपी पुलिस की कार्रवाई पर कोई असर न पड़े चाहे सामने मंत्री हो या मुख्यमंत्री. लेकिन आप और हम खूब जानते हैं कि हमारे देश में स्थितियां कितनी आदर्श हैं. और इसीलिए ये भी ज़रूरी है कि तीन भाजपा कार्यकर्ताओं के हत्यारों की भी पहचान हो और उन्हें सख्त से सख्त सज़ा मिले, ताकि कोई ये न सोच ले कि न्याय भीड़ की मर्ज़ी से होगा, अदालत की नहीं.

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