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बिना सैलरी डिजिटल मजदूर! फेसबुक-इंस्टा की फैक्ट्री में रोज डाटा बनाते हैं आप, एल्गोरिदम बना नया ठेकेदार

पूरी दुनिया ही एक फैक्ट्री है और आपका स्मार्टफोन आपका हाजिरी कार्ड. आप रील स्क्रॉल कर रहे हैं, किसी पोस्ट पर कमेंट कर रहे हैं या बस अपना लोकेशन ऑन रखकर सड़क पर चल रहे हैं तो आप असल में किसी कंपनी के लिए 'वैल्यू' जेनरेट कर रहे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि इस काम के बदले आपको सैलरी नहीं मिलती.

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एल्गोरिदम बना ठेकेदार, यूजर बना मजदूर! सोशल मीडिया की असली सच्चाई

आज 1 मई है. लेबर डे यानी मजदूर दिवस. जब हम मजदूर शब्द सुनते हैं, तो दिमाग में अक्सर एक तस्वीर उभरती है. सिर पर तगाड़ी रखे एक शख्स, फटे हुए कपड़े, पसीने से तर-बतर बदन और हाथ में फावड़ा. लेकिन 2026 की हकीकत इससे बहुत अलग हो चुकी है. आज का मजदूर सिर्फ वो नहीं है जो तपती धूप में ईंटें ढो रहा है.

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आज का मजदूर वो भी है जो एयरकंडीशन्ड कमरे में बैठकर 18 घंटे कंटेंट बना रहा है, वो भी है जो 10 मिनट में आपके घर ग्रोसरी पहुंचाने के लिए ट्रैफिक में जान जोखिम में डाल रहा है, और वो भी है जो बिना एक पैसा मिले फेसबुक-इंस्टाग्राम के लिए डेटा पैदा कर रहा है.

हम एक ऐसी दुनिया में पहुंच गए हैं जहां फैक्ट्री की दीवारें गिर चुकी हैं. अब पूरी दुनिया ही एक फैक्ट्री है और आपका स्मार्टफोन आपका हाजिरी कार्ड है. आप रील स्क्रॉल कर रहे हैं, किसी पोस्ट पर कमेंट कर रहे हैं या बस अपना लोकेशन ऑन रखकर सड़क पर चल रहे हैं, आप असल में किसी कंपनी के लिए 'वैल्यू' जेनरेट कर रहे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि इस काम के बदले आपको सैलरी नहीं मिलती, बल्कि 'डोपामाइन' का एक छोटा सा शॉट मिलता है. इसे ही समाजशास्त्री अब 'डिजिटल लेबर' या 'अदृश्य मजदूरी' कह रहे हैं.

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इस मेगा एक्सप्लेनर में हम समझेंगे कि कैसे हम अपनी मर्जी से इस अदृश्य फैक्ट्री के मजदूर बन गए हैं. हम गिग इकॉनमी के उन पेच को खोलेंगे जिसने युवाओं को 'आजादी' का सपना दिखाकर 'एल्गोरिदम' का गुलाम बना दिया है. क्या 2026 का भारत एक ऐसे संकट की ओर बढ़ रहा है जहां इंसान सिर्फ एक डेटा पॉइंट बनकर रह जाएगा. चलिए, इस पूरे खेल की परत-दर-परत पड़ताल करते हैं.

2026 में मजदूरी की नई परिभाषा: जब हाथ नहीं, डेटा काम करने लगा

मजदूरी का मतलब हमेशा से रहा है कि आप अपना समय और शारीरिक या मानसिक श्रम किसी और को देते हैं और बदले में पैसा लेते हैं. लेकिन इंटरनेट के दौर में यह परिभाषा पूरी तरह पलट गई है. अब आप 'यूजर' कहलाते हैं, लेकिन असल में आप एक वर्कर हैं. जब आप किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फ्री में अकाउंट बनाते हैं, तो आप वहां ग्राहक नहीं होते, बल्कि आप वहां का प्रोडक्ट होते हैं. आपकी हर एक्टिविटी, आपकी पसंद-नापसंद, यहां तक कि आप किसी फोटो पर कितनी देर रुककर उसे देख रहे हैं, यह सब एक डेटा है.

यह डेटा बड़ी कंपनियों के लिए सोने की खान जैसा है. इस डेटा को बेचकर अरबों डॉलर कमाए जाते हैं. नीति आयोग की ‘स्ट्रैटजी फॉर न्यू इंडिया’ रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में इंटरनेट यूजर्स की संख्या जिस तेजी से बढ़ी है, उसने दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों को भारत को एक 'डेटा मैन्युफैक्चरिंग हब' की तरह देखने पर मजबूर कर दिया है. हम दिन भर जो 'इंगेजमेंट' करते हैं, वो असल में बिना पैसे वाली मजदूरी है. हम कंटेंट प्रोड्यूस कर रहे हैं और कंपनियां उसे मॉनेटाइज कर रही हैं.

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एल्गोरिदम: वो नया ठेकेदार जो सोता नहीं है

पुराने जमाने में एक ठेकेदार होता था जो मजदूरों पर नजर रखता था. वो डांटता था, काम जल्दी करने का दबाव बनाता था. आज वो ठेकेदार एक सॉफ्टवेयर कोड में बदल गया है, जिसे हम 'एल्गोरिदम' कहते हैं. जोमैटो का डिलीवरी पार्टनर हो या उबर का ड्राइवर, उनका कोई बॉस नहीं है, लेकिन उनके सिर पर एल्गोरिदम की तलवार लटकी रहती है. अगर रेटिंग 4.5 से नीचे गई, तो काम मिलना बंद. अगर खाना पहुंचाने में 2 मिनट की देरी हुई, तो पेनल्टी.

यह नया ठेकेदार बहुत बेरहम है क्योंकि इसके अंदर इंसानियत नहीं है. यह सिर्फ एफिशिएंसी (कार्यक्षमता) समझता है. एल्गोरिदम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वो आपको ज्यादा से ज्यादा काम करने के लिए उकसाता रहे. इसे 'गेमिफिकेशन' कहते हैं. आपको लगता है कि आप एक गेम खेल रहे हैं, अगले लेवल पर पहुंचना है, ज्यादा पॉइंट्स कमाने हैं, लेकिन असल में आप अपनी सेहत और सुकून की बलि देकर उस कंपनी का मुनाफा बढ़ा रहे होते हैं. इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन की ‘वर्ल्ड इम्पलॉयमेंट एंड सोशल आउटलुक 2024’ रिपोर्ट में भी इस समस्या की गंभीरता का ज़िक्र किया गया है. 

गिग इकॉनमी: आजादी या एक नया जाल?

गिग इकॉनमी को शुरू में एक ऐसी क्रांति के रूप में पेश किया गया था जो आपको 'अपना बॉस खुद बनने' का मौका देगी. भारत जैसे देश में जहां बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा है, वहां गिग वर्क (जैसे डिलीवरी, राइड शेयरिंग, फ्रीलांसिंग) एक वरदान बनकर आया. वर्ल्ड बैंक की ‘इम्पलॉयमेंट ट्रेंड इंडिया’ रिपोर्ट के अनुसार, भारत की वर्कफोर्स का एक बड़ा हिस्सा अब गिग इकॉनमी में शिफ्ट हो रहा है. लेकिन 2026 तक आते-आते इस चमक के पीछे का अंधेरा साफ दिखने लगा है.

इन मजदूरों के पास न तो हेल्थ इंश्योरेंस है, न पेंशन और न ही नौकरी की सुरक्षा. एक आम मिडिल क्लास युवा जो अपनी बाइक लेकर सड़क पर निकलता है, वो सिर्फ एक डिलीवरी बॉय नहीं है, वो जोखिम का सबसे बड़ा खिलाड़ी है. उसे हर पल ये डर रहता है कि अगर एक्सीडेंट हो गया या तबीयत खराब हो गई, तो उस दिन घर में चूल्हा कैसे जलेगा. कंपनियां इन्हें 'पार्टनर' कहती हैं ताकि उन्हें कानूनी तौर पर कर्मचारी न मानना पड़े और उन्हें वो फायदे न देने पड़ें जो एक रेगुलर वर्कर को मिलते हैं.

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भारत में गिग इकॉनमी का बढ़ता दायरा (फोटो- ANI)

इन्फ्लुएंसर कल्चर: व्यूज की भूख और मानसिक थकान

जब हम डिजिटल मजदूर की बात करते हैं, तो अक्सर इन्फ्लुएंसर्स को भूल जाते हैं. हमें लगता है कि उनकी लाइफ बड़ी ग्लैमरस है, वो सिर्फ फोटो खिंचवाते हैं और पैसे कमाते हैं. लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी अलग है. 2026 में कंटेंट क्रिएशन एक ऐसी फैक्ट्री बन गया है जो कभी बंद नहीं होती. एक क्रिएटर को डर रहता है कि अगर उसने दो दिन रील नहीं डाली, तो इंस्टाग्राम का एल्गोरिदम उसे 'डेड' कर देगा. उसे भुला दिया जाएगा.

यह डर उन्हें 18-18 घंटे काम करने पर मजबूर करता है. व्यूज, लाइक्स और कमेंट्स की ये दौड़ असल में एक डिजिटल कोल्हू है जिसमें क्रिएटर पिस रहा है. लैंसेट (Lancet) की ‘इम्पैक्ट ऑफ सोशल मीडिया ऑन मेंटल हेल्थ एंड लेबर प्रोडक्टीविटी’ स्टडी बताती है कि डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स में एंग्जायटी, डिप्रेशन और बर्नआउट के मामले पिछले तीन सालों में 40% बढ़े हैं. वे ऐसी ऑडियंस को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं जो कभी संतुष्ट नहीं होती. यह भी एक तरह की मजदूरी है जहां आपकी क्रिएटिविटी को डेटा के तराजू पर तौला जा रहा है.

भारत का नजरिया: क्या हमारा कानून इन मजदूरों को पहचानता है?

भारत में लेबर लॉ (श्रम कानून) काफी पुराने थे, जिनमें हाल के वर्षों में बदलाव की कोशिश की गई है. सोशल सिक्योरिटी कोड 2020 में गिग वर्कर्स को शामिल करने की बात कही गई थी, लेकिन जमीन पर इसका असर अभी भी सीमित है. राजस्थान जैसे राज्यों ने गिग वर्कर्स के लिए अलग से कानून बनाने की पहल की है, जो एक स्वागत योग्य कदम है.

सरकार के सामने चुनौती यह है कि अगर वो नियमों को बहुत सख्त करती है, तो ये कंपनियां अपना इन्वेस्टमेंट कम कर सकती हैं, जिससे रोजगार पर असर पड़ेगा. वहीं अगर ढील दी जाती है, तो लाखों युवाओं का शोषण जारी रहेगा. यह एक ऐसा 'डेडलॉक' है जिसे सुलझाने के लिए एक बहुत ही बैलेंस्ड पॉलिसी की जरूरत है. मध्यवर्गीय परिवारों के लिए यह सीधा मुद्दा है क्योंकि उनके बच्चे ही अक्सर इन प्लेटफॉर्म्स पर काम की तलाश में जाते हैं.

मनोवैज्ञानिक पहलू: हमने गुलामी को स्वीकार क्यों कर लिया?

सवाल उठता है कि हम जानते हुए भी इस जाल में क्यों फंसते जा रहे हैं? इसका जवाब है 'कन्वीनियंस' (सुविधा) और 'कंपलशन' (मजबूरी). एक यूजर के तौर पर हमें 10 मिनट में सामान चाहिए, चाहे उसे लाने वाला कोई भी जोखिम उठाए. एक वर्कर के तौर पर हमें तुरंत पैसा चाहिए क्योंकि हमारे पास और कोई विकल्प नहीं है.

WHO की ‘टीन, स्क्रीन एंड मेंटल हेल्थ’ स्टडी के मुताबिक मनोवैज्ञानिक इसे 'डिजिटल कंडीशनिंग' कहते हैं. जैसे लैब में चूहे को एक बटन दबाने पर खाना मिलता है, वैसे ही हमें एक नोटिफिकेशन आने पर खुशी मिलती है. एल्गोरिदम ने हमारी साइकोलॉजी को हैक कर लिया है. हम अपनी मर्जी से डेटा के उस खेत में मजदूरी कर रहे हैं जहां फसल किसी और की कट रही है. हम 'मजदूर' होकर भी खुद को 'नेटिज़न' समझकर खुश हैं.

इकोनॉमिक इम्पैक्ट: जीडीपी में इजाफा, मगर जेब खाली

आरबीआई (RBI) की कई रिपोर्ट्स में इस बात का जिक्र है कि सर्विस सेक्टर का विस्तार हो रहा है, लेकिन 'क्वालिटी ऑफ एंप्लॉयमेंट' एक चिंता का विषय है. डिजिटल मजदूरी से जो पैसा पैदा हो रहा है, उसका बड़ा हिस्सा देश से बाहर उन टेक जायंट्स के पास जा रहा है जिनके सर्वर अमेरिका या चीन में हैं.

भारत एक डेटा-रिच देश तो बन गया है, लेकिन क्या हम डेटा-वाइज (डेटा के मामले में समझदार) बन पाए हैं? डिजिटल मजदूर जो वैल्यू क्रिएट कर रहा है, उसका लाभ उसे सीधे तौर पर नहीं मिल रहा. यदि हम आने वाले 10 सालों की बात करें, तो अगर ये मजदूर संगठित नहीं हुए, तो इकॉनमी में एक बड़ा गैप पैदा हो जाएगा. अमीर और अमीर होता जाएगा क्योंकि उसके पास डेटा के मालिकाना हक हैं, और आम आदमी सिर्फ एक 'रेंटेड लेबर' बनकर रह जाएगा.

भविष्य का मंजर: जब AI बन जाएगा आपका सुपरवाइजर

2026 तो सिर्फ शुरुआत है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ‘द फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट 2026’ में आशंका जताई गई है कि आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इस डिजिटल फैक्ट्री का सुपरवाइजर बन जाएगा. अभी तो इंसान एल्गोरिदम लिख रहे हैं, तब AI खुद तय करेगा कि किस मजदूर को कितना काम देना है और किसकी छुट्टी करनी है. यह स्थिति और भी डरावनी हो सकती है क्योंकि AI के पास कोई नैतिक कंपास (Moral Compass) नहीं होता.

लेकिन हर अंधेरी सुरंग के अंत में एक रोशनी होती है. दुनिया भर में अब 'डेटा डिग्निटी' (डेटा का सम्मान) और 'यूनियनाइजेशन ऑफ गिग वर्कर्स' की बात हो रही है. यूरोप के कई देशों ने कंपनियों को मजबूर किया है कि वे अपने ऐप-आधारित वर्कर को कर्मचारी का दर्जा दें. भारत में भी अब धीरे-धीरे 'इंडियन गिग वर्कर्स फ्रंट' जैसे संगठन अपनी आवाज उठा रहे हैं.

इस अदृश्य फैक्ट्री से निकलने का रास्ता क्या है?

हम पूरी तरह तकनीक को नहीं छोड़ सकते, लेकिन हम इसके इस्तेमाल के तरीके को बदल सकते हैं. यहां कुछ व्यावहारिक सुझाव हैं जो एक आम आदमी और समाज के तौर पर हम अपना सकते हैं:

1. डेटा अवेयरनेस: समझें कि आपकी प्राइवेसी ही आपकी सबसे बड़ी कमाई है. ऐप सेटिंग्स में जाकर बेवजह के डेटा एक्सेस को बंद करें.

2. डिजिटल डिटॉक्स: हफ्ते में कम से कम एक दिन 'नो डिजिटल लेबर डे' मनाएं. कोई रील नहीं, कोई कमेंट नहीं, कोई इंगेजमेंट नहीं.

3. गिग वर्कर्स का सम्मान: एक समाज के तौर पर हमें डिलीवरी पार्टनर्स के प्रति अपनी सोच बदलनी होगी. उन्हें 'रेटिंग' के चश्मे से नहीं, एक इंसान के तौर पर देखना होगा.

4. कानूनी मांग: सरकार पर दबाव बनाया जाना चाहिए कि सोशल सिक्योरिटी का लाभ हर उस व्यक्ति को मिले जो किसी भी रूप में डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए काम कर रहा है.

5. स्किल्स का अपग्रेडेशन: केवल 'मजदूरी' पर निर्भर न रहें, बल्कि उन स्किल्स को सीखें जो AI और एल्गोरिदम को कंट्रोल कर सकें.

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आजाद होने का वक्त आ गया है

मजदूर दिवस पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम केवल मशीनों के पुर्जे बनकर नहीं रहेंगे. तकनीक हमारी सेवा के लिए होनी चाहिए, न कि हमें अपनी सेवा में लगाने के लिए. डिजिटल दुनिया की यह फैक्ट्री अदृश्य जरूर है, लेकिन इसके घाव गहरे हैं.

2026 का भारत तभी आत्मनिर्भर बनेगा जब उसका डिजिटल मजदूर भी सुरक्षित, सम्मानित और जागरूक होगा. याद रखिए, जिस स्मार्टफोन को आप चला रहे हैं, कहीं वो आपको तो नहीं चला रहा? अगली बार जब आप किसी ऐप पर 'एग्री' (Agree) बटन दबाएं, तो सोचिएगा कि आप किसी सुविधा के लिए साइन कर रहे हैं या किसी नई तरह की गुलामी के लिए. 

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