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'काउंटिंग में राज्य के कर्मचारी भी होंगे', ECI के भरोसे पर सुप्रीम कोर्ट ने TMC की याचिका निपटा दी

Supreme Court TMC Hearing: TMC की तरफ से पेश सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी थी कि राज्य सरकार के कर्मचारियों को काउंटिंग सुपरवाइजर के रूप में ना रखने से संविधान के आर्टिकल 324 का उल्लंघन होता है.

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TMC ने चुनाव आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. (PTI)

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के लिए 4 मई को होने वाली मतगणना को लेकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. सुनवाई के दौरान भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने कोर्ट को काउंटिंग में राज्य सरकार के कर्मचारियों की तैनाती का भरोसा दिया. इसके बाद कोर्ट ने याचिका पर कोई आदेश नहीं दिया और चुनावी प्रोसेस में दखल देने से इनकार कर दिया. इस याचिका में पार्टी ने ECI के 'केवल' केंद्र सरकार के कर्मचारियों को काउंटिंग सुपरवाइजर के तौर पर नियुक्त करने के फैसले पर चुनौती दी थी.

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TMC ने अपनी याचिका में कहा था कि चुनाव आयोग के फैसले से राज्य सरकार के कर्मचारियों को नजरअंदाज किया जा रहा है, जो संविधान के आर्टिकल 324 का उल्लंघन है. शनिवार, 2 मई को जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जॉयमाल्या बागची की स्पेशल बेंच ने इस मामले की सुनवाई हुई.

लीगल वेबसाइट बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, ECI की तरफ से पेश सीनियर वकील दामा शेषाद्री नायडू ने कहा कि 4 मई को होने वाली मतगणना में राज्य सरकार के कर्मचारी भी मौजूद होंगे. नायडू ने यह भी साफ किया कि चुनाव आयोग अपने सर्कुलर का पालन करेगा और राज्य सरकार के कर्मचारियों को भी काउंटिंग प्रोसेस में शामिल किया जाएगा. नायडू ने कहा,

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"हम कह रहे हैं कि राज्य सरकार का नॉमिनी वहां होगा. इन सबसे पहले भी इसका पालन किया जाएगा."

इस पर जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जॉयमाल्या बागची ने कहा कि चुनाव आयोग ने यह सुनिश्चित किया है कि उनका सर्कुलर पूरी तरह से लागू किया जाएगा, इसलिए इस मामले में कोई और आदेश देने की जरूरत नहीं है. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा,

"याचिका (SLP) में किसी और आदेश की जरूरत नहीं है. हम मिस्टर नायडू की बात रिकॉर्ड करते हैं कि ECI के सर्कुलर का पूरी तरह से पालन किया जाए."

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सुनवाई के दौरान TMC की तरफ से पेश सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी थी कि राज्य सरकार के कर्मचारियों को काउंटिंग सुपरवाइजर के रूप में ना रखने से संविधान के आर्टिकल 324 का उल्लंघन होता है. कपिल सिब्बल ने दलील दी,

"यह सर्कुलर DEO को जारी किया गया है और हमें 29 अप्रैल को पता चला. इसके उलट, पहले से नोटिस दिया गया है. उनका कहना है कि उन्हें डर है कि हरेक बूथ में दिक्कत होगी. एक सेंट्रल गवर्नमेंट नॉमिनी है और अब वे एक और चाहते हैं. सर्कुलर में कहा गया है कि स्टेट गवर्नमेंट नॉमिनी की जरूरत है लेकिन वे उसे अपॉइंट नहीं करते हैं. आर्टिकल 324 इस बारे में नहीं है कि आप जो चाहें और जैसा चाहें करें. कृपया सर्कुलर खुद देखें. यह चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर के कार्यालय से जारी किया गया है. इसमें कहा गया है कि अलग-अलग जगहों से गड़बड़ी वगैरह को लेकर डर है. वे एक और सेंट्रल गवर्नमेंट नॉमिनी चाहते हैं. क्या यह राज्य पर उंगली नहीं उठा रहा है?"

इसके जवाब में जस्टिस बागची ने कहा कि सभी दलों के चुनाव एजेंटों की मौजूदगी में मतगणना होगी. उन्होंने कहा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सुपरवाइजर केंद्र सरकार के कर्मचारी हैं या राज्य सरकार के. उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग का यह फैसला सही है और इसमें कोई गलती नहीं है. लीगल वेबसाइट लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस बागची ने कहा,

"यह ऑप्शन खुला है कि काउंटिंग सुपरवाइजर और काउंटिंग असिस्टेंट केंद्र सरकार के हो सकते हैं या राज्य सरकार के. इसलिए जब यह ऑप्शन खुला है तो हम यह नहीं कह सकते कि नोटिफिकेशन नियमों के खिलाफ है. वे (चुनाव आयोग) यह भी कह सकते हैं कि वे दोनों केंद्र के हो सकते हैं. अगर उन्होंने ऐसा कहा भी होता तो हम उन्हें गलत नहीं ठहरा सकते थे. क्योंकि नियम कहते हैं कि या तो केंद्र सरकार या राज्य सरकार के अधिकारियों को नियुक्त किया जा सकता है."

चुनाव आयोग के वकील नायडू ने भरोसा दिया कि चुनाव आयोग अपने सर्कुलर का पालन करेगा. उन्होंने यह भी कहा कि रिटर्निंग ऑफिसर के पास अफसरों को चुनने का अधिकार है. नायडू ने कहा,

"रिटर्निंग ऑफिसर के पास बहुत ज्यादा अधिकार होते हैं, जो राज्य सरकार का कर्मचारी होता है. अगर वे लेबल लगाना चाहते हैं, तो वह अफसरों को चुनता है. ये गलत आशंकाएं हैं."

उन्होंने TMC की आशंका को गलत ठहराया और यह भी बताया कि मतगणना के CCTV फुटेज को 45 दिनों तक संरक्षित रखा जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट ने आखिर में इस मामले को निपटा दिया और कहा कि चुनाव आयोग के वकील की दलील को रिकॉर्ड किया गया है. इससे पहले कलकत्ता हाई कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस की याचिका को खारिज कर दिया था. इसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

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