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एक मीटिंग ने 60 लाख लोगों की जान ले ली

जर्मनी के Wannsee Conference की कहानी पूरी दुनिया के लिए सबक है.

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जर्मनी के Wannsee Conference की कहानी पूरी दुनिया के लिए सबक है.
प्रख्यात इतिहासकार मार्क रोजमैन ने अपनी किताब ‘द वान्ज़ी कॉन्फ़्रेंस एंड द फ़ाइनल सॉल्यूशन: अ रिकंसिडरेशन’ में लिखा है,
वान्ज़ी कॉन्फ़्रेंस के बाद सामूहिक हत्या की नीति संस्थागत नरसंहार में बदल गई.
20 जनवरी 2022 को वान्ज़ी कॉन्फ़्रेंस के 80 बरस पूरे हो गए.  80 बरस पहले क्या हुआ था? बर्लिन के पास झील के किनारे बने एक आलीशान बंगले में जर्मनी के 15 सबसे ताक़तवर लोग जमा हुए थे. वे तत्कालीन जर्मन सरकार के नीति-निर्माता थे. उन्होंने उस रोज जो नीति बनाई, वो आगे चलकर लाखों लोगों की हत्या की बुनियाद बनी. इस संस्थागत नरसंहार को इतिहास में होलोकॉस्ट के नाम से जाना गया. वान्ज़ी कॉन्फ़्रेंस की पूरी कहानी क्या है? इस कॉन्फ़्रेंस के पहले और बाद में क्या हुआ था? और, ये कॉन्फ़्रेंस पूरी दुनिया के लिए सबक क्यों है? वान्ज़ी बर्लिन के दक्षिण में बसा एक छोटा-सा एक शहर है. लेक वान्ज़ी के किनारे पर. सुकून हासिल करने के लिए मुफ़ीद जगह. 19वीं सदी की शुरुआत में बस्ती रईसों की रिहाइश से गुलज़ार होने लगी. ये लोग अमीर होने के साथ-साथ बुद्धिजीवी भी थे. यहां रहने के लिए पैसों के साथ-साथ विद्वता को भी एक पैमाने की तरह देखा गया. 20वीं सदी में इस पैमाने में थोड़ी सी ढील दी जाने लगी. अर्स्ट मारिए की पत्नी सर्कस में काम करती थी. मारिए बहुत पढ़े-लिखे नहीं भी  थे. लेकिन उनके पास इफ़रात पैसा था. उन्होंने टूथपेस्ट और फ़ार्मा बिजनेस में ये कमाई की थी. पैसे की वजह से उन्हें वान्ज़ी में आसानी से एंट्री मिल गई. 1914 में उनकी हवेली बनकर तैयार हो गई. ये पूरी तरह से इटैलियन शैली में बनाई गई थी. कुछ समय बाद अर्स्ट मारिए को बिजनेस में भारी नुकसान हुआ. वो कानूनी पचड़े में फंस गए थे. पहले विश्वयुद्ध के बाद उन्हें अपनी हवेली बेचनी पड़ी. इसे एक दूसरे उद्योगपति फ़्रेडरिख मीनू ने खरीद लिया. फ़्रेडरिख मीनू सिटी ऑफ़ बर्लिन के बोर्ड में थे. उनकी कमिटी तेल और गैस के कारोबार में थी. मीनू ने वहां कुछ घोटाला किया. वो पकड़े गए. 1941 में उन्हें पांच साल जेल की सज़ा सुनाई गई. जेल के अंदर से ही उन्होंने वान्ज़ी वाली हवेली एक नाज़ी संस्था को बेच दी. ये संस्था रेनहार्ड हेडरिख ने बनाई थी. हेडरिख़ हिटलर की पैरामिलिटरी फ़ोर्स एसएस के टॉप के अफ़सरों में से एक था. वान्ज़ी की वो हवेली अब नाज़ी पार्टी के नियंत्रण में आ चुकी थी. इसे सीक्रेट सर्विस के आरामगाह में बदल दिया गया. हवेली में खाने-पीने की बेहतरीन व्यवस्था थी. सीक्रेट सर्विस के अफ़सर यहां आराम के कुछ पल बिताने या कोई ख़ास प्लान डिस्कस करने आया करते थे. वान्ज़ी से बर्लिन पास ही था. इस वजह से वे हमेशा हिटलर के करीब भी रहते थे. फिर आया साल 1942 का. हिटलर की सेना यूरोप में लगातार आगे बढ़ रही थी. वो हर दिन नए इलाकों को जीत रहा था. इस जीत के साथ-साथ उसके नियंत्रण में आने वाले यहूदियों की संख्या बढ़ने लगी थी. एक तरफ़ युद्ध और दूसरी तरफ़ कथित नस्लीय शुद्धिकरण की योजना, दोनों को एक साथ अंज़ाम देना मुश्किल हो रहा था. इसका हल निकालना ज़रूरी था. इसी के लिए 20 जनवरी को वान्ज़ी में एक कॉन्फ़्रेंस बुलाई गई. उसी हवेली में, जहां सीक्रेट सर्विस के अधिकारी आराम फरमाने आते थे. इस कॉन्फ़्रेंस में 15 लोगों को बुलाया गया था. इसमें हेडरिख़ के अलावा एडोल्फ़ आइख़मैन भी शामिल हुआ था. जिसे बाद में इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद ने अर्जेंटीना से किडनैप किया था. आइख़मैन पर इज़रायल में मुकदमा चला. फिर उसे फांसी की सज़ा दी गई. और, उसकी राख को समंदर में फेंक दिया गया. आज बस इतना याद रखिए कि आइख़मैन को ट्रांसपोर्ट एक्सपर्ट के तौर पर वहां बुलाया गया था. वो इकलौता गवाह था, जिससे वान्ज़ी कॉन्फ़्रेंस को लेकर पूछताछ हुई. उसने ट्रायल के दौरान थोड़ी बहुत जानकारी दी भी थी. बाकी सबूत नाज़ियों ने गायब कर दिए थे. वान्ज़ी में आख़िर हुआ क्या? उस रोज की मीटिंग 90 मिनट तक चली. इसमें यहूदी समस्या का अंतिम समाधान खोजा जाना था. यहूदियों और गैर-आर्यन नस्ल के लोगों को घेट्टो में बहुत पहले से रखा जा रहा था. कई जगहों पर उनका सामूहिक नरसंहार भी हो रहा था. लेकिन नाज़ी जिस तेज़ी से इस काम को अंज़ाम देना चाहते थे, उसमें बाधा आ रही थी. हिटलर चाहता था कि सरकार की सभी एजेंसियां मिलकर इसका रास्ता तलाशें. उनके बीच नरसंहार को लेकर तालमेल बिठाना ज़रूरी था. मीटिंग में हेडरिख़ ने सबसे पहले यहूदियों को लेकर जर्मनी की पॉलिसी की चर्चा की. फिर उसने बताया कि यहूदियों को एक जगह से दूसरी जगह शिफ़्ट करने में ज़्यादा खर्च आ रहा है. उसकी नज़र में अस्थायी समाधान था. उसने वहां मौजूद माननीयों से आसान, सस्ता और परमानेंट रास्ता सुझाने के लिए कहा. फ़ाइनल प्लान के तहत, यहूदियों से मज़दूरी करवाई जानी थी. जो काम करने में सक्षम नहीं थे या जिनकी उम्र हो चुकी थी, उन्हें स्पेशल ट्रीटमेंट देने पर सहमति बनी. नाजी ‘स्पेशल ट्रीटमेंट’ शब्द का इस्तेमाल हत्या के रुपक के तौर पर करते थे. मीटिंग में नरसंहार के कुछ सस्ते उपाय भी सुझाए गए थे. हालांकि, इस पर बात आगे नहीं बढ़ पाई. वान्ज़ी कॉन्फ़्रेंस में आए 15 लोगों में से कई नेता भी थे. उनमें से कुछ डॉक्टर्स थे. आधे से अधिक लोगों ने सबसे बेहतरीन तालीम हासिल की थी. वे हर मामले में सभ्य व्यक्तित्व की मिसाल थे. लेकिन उनकी आंखों पर नस्लीय अहंकार की पट्टी बंधी थी. जिसके आगे वे कुछ भी देखना नहीं चाहते थे. एडोल्फ़ आइख़मैन ने ट्रायल के दौरान एक क़िस्सा सुनाया था. उसने बताया था कि वान्ज़ी कॉन्फ़्रेंस के बीच में ब्रेक के दौरान लोग नरसंहार को लेकर सहज थे. वो छाती चौड़ी कर यहूदियों के मारने के तरीकों पर चर्चा करते थे. उन्हें इसमें कुछ भी ग़लत नहीं दिखता था. आइख़मैन ने कहा कि अगर सरकार के इतने ताक़तवर लोग यहूदी नरसंहार को सही ठहरा रहें हो, तो मैं उन पर शक कैसे कर सकता था. मुझे सब सही लगा. मैं तो बस एक मामूली स्टाफ़ था. जिसने अपने आकाओं के हुक्म का पालन किया. उस ट्रायल के दौरान न्यू यॉर्कर मैगज़ीन के लिए रिपोर्टिंग कर रहीं हना आरेन्ट बाद में एक थ्योरी दी. इस बारे में हम एक बार पहले भी बता चुके हैं. आज फिर से याद दिला देते हैं. हना आरेन्ट ख़ुद एक होलोकॉस्ट सर्वाइवर थीं. आइख़मैन के तर्कों को सुनने के बाद उन्होंने ‘द बनालिटी ऑफ़ एविल’ यानी बुराई की तुच्छता की थ्योरी दी. आरेन्ट ने कहा था कि बुरे से बुरा अपराध उस समय तुच्छ हो जाता है, जब वो कल्पनातीत और क्रमिक चरित्र धारण कर लेता है. मतलब ये कि जब आम लोग किसी बड़े अपराध में हिस्सा लेते हैं या उसे नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ जाते हैं या फिर उसे सही ठहराते हैं, तब बड़े से बड़ा अपराध तुच्छ हो जाता है. उसकी तासीर ठंडी पड़ जाती है. उनका मानना था कि सबसे बुरे अपराधी साइकोपैथ या सैडिस्ट नहीं होते. वे हमारी और आपकी तरह के सामान्य लोग होते हैं. उन्हें ये गुमान होता है कि वे जो कर रहे हैं, वो बिलकुल सही है. हिटलर ने लोगों की सोच को उसी दिशा में मोड़ा. वो कामयाब रहा. लाखों जर्मन नागरिकों ने हिटलर के कुकृत्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. जो सीधे तौर पर शामिल नहीं हुए, वे मौन समर्थन देते रहे. जो ये दोनों काम नहीं कर रहे थे, वे हिटलर पर लग रहे आरोपों को झूठा मानते रहे. हिटलर की कामयाबी की एक वजह ये भी रही. वान्ज़ी कॉन्फ़्रेंस के बाद क्या हुआ? कॉन्फ़्रेंस से पहले तक सिर्फ़ एक कंसंट्रेशन कैंप काम कर रहा था. कॉन्फ़्रेंस के बाद पांच और बड़े कैंप बनाए गए. इनमें ट्रेबलिंका, सोबिबोर, ऑश्विज़, मेदनेक और बेल्ज़ेक शामिल थे. इसके अलावा भी कई कैंप जर्मनी के नियंत्रण वाले इलाकों में स्थापित किए गए. सिस्टमैटिक तरीके से यहूदियों और दूसरी कथित अशुद्ध नस्ल के लोगों को ट्रेनों में भरकर इन कैंपों में भेजा जाने लगा. ट्रेन से उतरने के बाद छंटनी होती थी. काम के लोगों को ज़िंदा रहने दिया जाता. बाकी को गैस चैंबर में भेज दिया जाता था. मरने के लिए. जिन्हें ज़िंदा रखा जाता था, उनसे भारी-भरकम काम करवाए जाते थे. या, फिर मेडिकल एक्सपेरिमेंट्स में गिनी पिग की तरह उनका इस्तेमाल किया जाता. जैसे कि ऑश्विज़ में जोसेफ़ मेंगेले नाम का एक डॉक्टर था. वो जुड़वां बच्चों पर हिंसक प्रयोग करता था. वान्ज़ी में कुल एक करोड़ दस लाख यहूदियों को मारने की योजना बनी थी. लेकिन ये प्लान पूरी तरह से सफ़ल नहीं हो पाया. शुरुआती बढ़त के बाद हिटलर को कई मोर्चों पर हार मिलने लगी. मसलन, सोवियत संघ ने स्टालिनग्राड की लड़ाई में हिटलर की सेना को ध्वस्त कर दिया था. ब्रिटेन भी उठ खड़ा हुआ था. पर्ल हार्बर पर हमले के बाद अमेरिका भी युद्ध में शामिल हो चुका था. इस वजह से हिटलर को बहुत से मोर्चों से वापस लौटना पड़ा. इसके अलावा, बहुत सारे यहूदी भागकर सुरक्षित जगहों पर आ गए थे. इन्हीं में से एक राफ़ेल लिमकिन भी थे. लिमकिन साल 1900 में पोलैंड में पैदा हुए. पेशे से वकील थे. धर्म से यहूदी. उन्हें हिटलर के मंसूबों की भनक बहुत पहले लग गई थी. जब हिटलर पोलैंड पर हमला करने का प्लान बना रहा था, उन्होंने अपने घरवालों को समझाया कि अब देश छोड़ने का वक़्त आ गया है. वे नहीं माने. नतीजा, परिवार के 49 लोग होलोकॉस्ट का शिकार बने. लिमकिन किसी तरह जान बचाकर अमेरिका आ गए. बाद में उन्हीं के प्रयासों से यूनाइटेड नेशंस में 'Genocide Convention' लागू हुआ. दिसंबर 1948 में. इस कन्वेंशन का 'आर्टिकल II' नरसंहार की परिभाषा बताता है. वान्ज़ी कॉन्फ़्रेंस की कहानी हमारे लिए एक सबक क्यों है? वान्ज़ी में कोई बड़ा प्लान नहीं बना. इस कॉन्फ़्रेंस को किसी भी तरह से ऐतिहासिक नहीं कहा जा सकता. यहां नरसंहार को लेकर कोई अभूतपूर्व विचार नहीं पेश किए गए. फिर भी इसे होलोकॉस्ट का सबसे अहम पड़ाव माना जाता है. ऐसा क्यों? दरअसल, जर्मनी में यहूदियों को लेकर नफ़रत पहले विश्वयुद्ध के बाद से ही पनपने लगी थी. उन्हें जर्मनी की हार के लिए ज़िम्मेदार साबित करने की कोशिश की गई. फिर उन्हें कम्युनिस्टों का समर्थक बताया जाने लगा. हिटलर ने इसी नफ़रत को एक दिशा दी थी. इसी की बदौलत वो सत्ता में भी आया. सत्ता में आने के बाद यहूदियों पर अत्याचार शुरू हुए. उनके साथ लूटपाट होने लगी. उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाने लगा. उनकी नागरिकता, उनके अधिकार, उनके घर छीने जाने लगे. नाज़ी बस मज़े के लिए यहूदियों की हत्या भी करने लगे. उन्हें कानून का कोई डर नहीं था. क्योंकि सरकार इस कुकृत्य को मौन समर्थन दे रही थी. वान्ज़ी कॉन्फ़्रेंस ने बस इतना किया कि अलग-अलग चल रहे यहूदी विरोधी अभियान को एक सांचे में ढाल दिया. आगे की कहानी आधुनिक इतिहास के सबसे वीभत्स अध्यायों में से एक है. जब सरकारी तंत्र नफ़रत और हिंसा पर आंख मूंद ले या उसको लेकर मौन सहमति जताए, तब वान्ज़ी कॉन्फ़्रेंस का ज़िक्र ज़रूरी हो जाता है. दुनिया को इतिहास से सबक सीखते रहना चाहिए. ताकि उसे दोहराए जाने से बचा जा सके.

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