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उस पूर्व क्रिकेटर और नेता की कहानी, जिसकी भ्रष्टाचार से लड़ाई ने उसे BJP से बाहर करवा दिया

कभी आडवाणी, जोशी के करीबी नेताओं में थे.

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बीजेपी की टिकट पर सांसद बने कीर्ति आजाद फिलहाल पार्टी से बाहर हैं.
1985 से 1990 के बीच बिहार में सीएम ताश के पत्तों की तरफ फेंटे जा रहे थे. 1989 में नंबर लगा स्वतंत्रता सेनानी और 6 बार से भागलपुर से सांसद भागवत झा आजाद का. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस पर मुहर लगाई. राजीव ने आजाद से कहा - आप मेरे नाना के वक्त के हैं. स्वतंत्रता सेनानी रहे. आपने देश की सेवा की, कांग्रेस की सेवा की. आपकी भागलपुर सीट ऐसे खाली नहीं हो सकती. आप जाकर बिहार देखिए और अपनी सीट पर अपने बेटे को लड़वा दीजिए. मैं उसे कैबिनेट में ले लूंगा. राजनीति सिखाऊंगा. वो आपकी राजनीतिक विरासत को भी संभालेगा. इस पर आजाद बोले -
बहुत धन्यवाद राजीव बाबू, आपने मेरे बेटे के बारे में सोचा. मगर जब तक मैं जिंदा हूं या जब तक राजनीति नहीं छोड़ देता. तब तक मेरा बेटा या परिवार का कोई राजनीति में नहीं आएगा.
भागवत झा आजाद 1989 में बिहार के सीएम बने.
भागवत झा आजाद 1989 में बिहार के सीएम बने.
आजकल नेताओं का पुत्र मोह, परिवारवाद देखकर ये अचरज भरा लगता है. चौंकाने वाला. मगर पहले के नेता ऐसे ही होते थे. वो मूल्यों पर जीते थे. ऐसे ही एक थे भागवत झा आजाद. अब सवाल उठता है कि उनका ये बेटा कौन था जो तब सांसद बनने से चूक गया. जवाब है - कीर्ति आजाद. वो कीर्ति आजाद जो इंटरनैशनल क्रिकेटर रहे. 1983 की विश्व विजेता टीम का हिस्सा रहे. बीजेपी के टिकट पर तीन बार दरभंगा से सांसद रहे. मगर फिलहाल बीजेपी ने उनको बाहर का रास्ता दिखा रखा है. वजह है केंद्र सरकार में नंबर दो दिखने वाले अरुण जेटली से उनका पंगा. वो डीडीसीए में भ्रष्टाचार को लेकर लंबे समय से जेटली को घेरते रहे हैं. ये विरोध बढ़ा और पब्लिक के बीच आया तो उन्हें उस पार्टी से निकाल दिया गया जिससे वो 1990-91 के दौर से जुड़े हुए हैं. उनकी गिनती इस वक्त बीजेपी के सबसे बड़े बागी नेताओं में होती है. तो ये बागी तेवर क्यों और कैसे आए. कैसे वो राजनीति में आए. बीजेपी से जुड़े. आगे क्या करने वाले हैं. ऐसे हर सवाल का जवाब जानने के लिए हमने कीर्ति आजाद से बात की. आप भी इस बातचीत से जुड़े अंश पढ़ें-
परिवार का बैकग्राउंड कांग्रेस का था, फिर कांग्रेस में एंट्री कैसे?
कीर्ति आजाद बताते हैं - ये 1988-89 की बात है. मैं बैंकॉक गया था. वहां मेरे एक मित्र थे जोकि आडवाणी जी के परिवार के करीबी थे. उन्होंने मेरी मुलाकात आडवाणी जी के बेटे और बेटी से करवाने की बात कही. बताया कि वो दोनों मेरे जूनियर हैं मॉडर्न स्कूल के. तो मैंने कहा क्यों नहीं मिलेंगे. मैं भी एक राजनीतिक परिवार से आता हूं. फिर मेरे जूनियर भी हैं वो लोग. इसके बाद हम मिले. फिर हमारी मुलाकात आडवाणी जी से हुई. मैं उनके विचारों से प्रभावित हुआ. आडवाणी जी की पत्नी कमला जी मेरी मां समान थीं. मुझे अकसर घर पर खाने के लिए बुलाती थीं. अपने हाथ से बनाकर खिलाती थीं. इस तरह मैं इस परिवार से काफी घुल मिल गया. फिर कुछ दिन बाद बीजेपी से जुड़ गया.
कीर्ति आजाद 1993 में पहली बार विधायक बने.
कीर्ति आजाद 1993 में पहली बार विधायक बने.

अब बीजेपी से जुड़ गए. पर असली जुड़ना तो तब माना जाता है जब आदमी कहीं से चुनाव लड़े. मैदान में उतरे. जनता के बीच जाए. तो ये वाला नंबर आजाद का लगा 1993 में. इस साल 1952 के बाद दूसरी बार दिल्ली विधानसभा के चुनाव हो रहे थे. ऐसा हुआ था राज्य पुनर्गठन आयोग के फैसले के कारण, जिसके तहत 1956 में दिल्ली पार्ट-सी स्टेट नहीं रह गया था. वो एक यूनियन टेरिटरी थी और उस पर सीधा राष्ट्रपति का राज था. पर 1991 में संविधान में 69वें संशोधन से दिल्ली में फिर विधानसभा चुनाव का रास्ता साफ हो गया. इसी चुनाव में पहली बार लड़ने का मौका मिला आजाद को. दिल्ली की गोल मार्केट सीट से. पर इसके टिकट मिलने की कहानी भी दिलचस्प है. आजाद बताते हैं -
वो दौर राम मंदिर आंदोलन का था. लोगों को बीजेपी से जोड़ा जा रहा था. उस वक्त आडवाणी जी अपने शीर्ष पर थे. अटल जी के सामने तो हम लोग ज्यादा बोलते भी नहीं थे. मैंने कई बार अपने पिता और अटल जी को संसद में बहस करते सुना था. जोशी जी का मुझे काफी मार्गदर्शन मिलता था. उस वक्त कुल मिलाकर 5-6 ही लोग थे जो अलग-अलग जाकर पार्टी का प्रचार करते थे. अटल, आडवाणी, जोशी, उमा भारती, शत्रुघ्न सिन्हा वगैरह. तो मैं उस वक्त अकसर आडवाणी जी के घर जाता था. ऐसे ही बातचीत में एक बार ये हुआ कि मैं विधानसभा चुनाव क्यों न लड़ जाऊं. मैंने इस पर आडवाणी जी से सहयोग मांगा. फिर टिकट हो भी गया.
ये बीजेपी की तिकड़ी है. लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी.
ये बीजेपी की तिकड़ी है. लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी.

टिकट मिली तो आजाद चूके नहीं. पहली ही बारी में मैदान मार दिया. वैसे भी इस चुनाव में बीजेपी की लहर दिखी थी. दिल्ली की 70 सीटों में से 49 बीजेपी के हाथ आईं थीं. कांग्रेस को महज 14 सीटें मिली थीं. मदन लाल खुराना सीएम बने थे. आजाद इस चुनाव में 3803 वोटों से जीते थे. ये रहा था रिजल्ट -
कीर्ति आजाद, बीजेपी - 18,935 वोट
बृज मोहन भामा, कांग्रेस - 15,132 वोट
पर पहली जीत के बाद अगले ही चुनाव में आजाद को हार का सामना करना पड़ा. इस बार मगर उनकी हार के मायने दूसरे थे. उनके खिलाफ शीला दीक्षित मैदान में उतरी थीं. कीर्ति बताते हैं कि कांग्रेस ने पूरा जोर लगा दिया था उन्हें हराने में. कांग्रेस के बड़े नेता शीला को लड़वाने मैदान में आए हुए थे. ये चुनाव वो 5667 वोटों से हार गए. ये रहा था वोटों का गणित -
शीला दीक्षित, कांग्रेस - 24,881 वोट
कीर्ति आजाद, बीजेपी - 19,214 वोट
चुनाव हारे थे तो कीर्ति एक बार फिर अपने पहले प्यार माने क्रिकेट की तरफ लौटे. कमेंटेटर बन गए. शारजाह में कमेंटरी की. 1999 में इंग्लैंड में हुए वर्ल्डकप को कवर किया. बीच-बीच में वो अपने चुनावी क्षेत्र गोल मार्केट में भी सक्रिय रहते.
वापसी के साथ प्रमोशन का वक्त
फिर आया 1999 का लोकसभा चुनाव. ये आजाद के प्रमोशन का टाइम था. माने अब वो विधानसभा नहीं, लोकसभा चुनाव लड़ने जा रहे थे. ये उनकी घर वापसी का टाइम था. बिहार वापस जाने का टाइम, जहां की माटी के लाल हैं वो. अब आप समझेंगे जहां वो जन्में, वहां से टिकट मिला होगा तो जवाब है नहीं. जन्मे तो वो 1959 में भागलपुर में पड़ने वाले गोड्डा जिले के कसवा गांव (अब ये गांव और गोड्डा जिला झारखंड में हैं) में थे, मगर बीजेपी ने उनको चुनावी मैदान में उतारा था बिहार की एक महत्वपूर्ण सीट दरभंगा से. दरभंगा पहले कांग्रेस तो बाद में आरजेडी का अभेद किला बन गया था. स्थानीय पत्रकारों के मुताबिक इस सीट की एक खास बात ये है कि यहां या तो मुस्लिम चुनाव जीतता है या कोई ब्राह्मण. कारण हैं समीकरण, जिन पर यही दोनों निर्णायक भूमिका निभाते हैं. तो बीजेपी को यहां जीत के लिए जरूरत थी एक ब्राह्मण कैंडिडेट की. मैथिल ब्राह्मण की. तो यहां फिट बैठे कीर्ति आजाद. और आजाद ने बीजेपी का वनवास इस सीट पर खत्म कर दिया. ये रहा था रिजल्ट -
कीर्ति आजाद, बीजेपी - 3,95,549 वोट
मो. अली अशरफ फातमी, आरजेडी - 3,40,001 वोट
आजाद की जीत के पीछे दो और फैक्टर थे- 
# पहला उनके पिता भागवत झा आजाद जो बिहार के पूर्व सीएम थे और दरभंगा के लोग उन्हें अच्छे से जानते-पहचानते थे. सो आजाद को उनकी पिता की साफ क्षवि और लोकप्रियता का भी फायदा मिला, भले ही वो कांग्रेस नहीं, बीजेपी से लड़ रहे थे.
कीर्ति दरभंगा से पहली बार 1999 में सांसद बने.
कीर्ति दरभंगा से पहली बार 1999 में सांसद बने.

दूसरा फैक्टर था कि दरभंगा कीर्ति आजाद की ससुराल थी. उनकी पत्नी पूनम आजाद दरभंगा की ही रहने वाली थीं. फिर मिथिला के लिए तो प्रचलित है कि यहां दामादों की बड़ी खातिरदारी होती है. माता सीता यहीं की थीं तो यहां हर दामाद को लोग राम ही मान के चलते हैं. सो कीर्ति दरभंगा के लिए राम की तरह ही थे, सो उनका राजतिलक तो होना ही था.
इस जीत के बाद केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी. पांच साल तक रही, मगर कीर्ति आजाद को कोई मंत्रालय नहीं मिला. इसकी वजह वो बताते हैं कि वो उस वक्त नए थे. पहली बार लोकसभा गए थे. इसीलिए वो मंत्री नहीं बनाए गए. वो ये भी बोले कि हालांकि आजकल तो लोग पहली-पहली बार जीत के भी मंत्री बन गए हैं. चुनाव हारकर भी मंत्री बन गए हैं. लोकसभा से ज्यादा मंत्री राज्यसभा वाले हैं.
हालांकि दामाद जी को ससुराल से 2004 में तगड़ा झटका लगा. जैसे देश में इंडिया शाइनिंग का जहाज डूबा, वैसे ही आजाद की कश्ती भी दरभंगा में डूब गई. उनके पीछे भी वही पनौती लगी रही जो यहां के सभी ब्राह्मण सांसदों के साथ थी. दोबारा चुनाव न जीत पाने की. उन्हें हराया तीन बार के सांसद मो. अली अशरफ फातमी ने. वही अली जिन्हें पिछले चुनाव में आजाद ने हराया था. मगर इस बार वोटों का अंतर भी 1,43,463 वोटों का हो गया था.
कीर्ति को 2004 के चुनाव में हालांकि हार का सामना करना पड़ा.
कीर्ति को 2004 के चुनाव में हालांकि हार का सामना करना पड़ा.

कीर्ति आजाद बताते हैं कि जब मैं 1999 में चुनाव जीता तो मेरे लिए यहां काम करना एकदम नया अनुभव था. वो शहर में ही पले-बढ़े थे. गांव के तौर-तरीके उन्हें ज्यादा मालूम नहीं थे. फिर बिहार तो और भी पिछड़ा हुआ था. नीतीश कुमार भले आ गए थे, मगर यहां की हालत कुछ नहीं बदली थी. गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार का बोलबाला था. सो उन्हें यहां की चीजें समझने में थोड़ा वक्त लगा. मगर 2004 की हार के बाद तक वो पक चुके थे. उन्होंने अब अपने पिता से मिले राजनीतिक सीखों और ज्ञान का इस्तेमाल शुरू किया. तिकड़म लगानी शुरू की. समीकरण साधने शुरू किए. इसका नतीजा ये हुआ कि 2009 में बीजेपी तो केंद्र में हारी. आडवाणी पीएम इन वेटिंग बने रहे. मगर आजाद का वेट खत्म हो गया. वो दोबारा सांसद बन गए. ससुराल ने एक बार फि उन्हें सिर आंखों पर बैठाया. हालांकि मुकाबला कड़ा रहा. आजाद 46,453 वोटों से चुनाव जीते. ये रहा था रिजल्ट -
कीर्ति आजाद, बीजेपी - 2,39,268 वोट
मो. अली अशरफ फातमी, आरजेडी - 1,92,815 वोट
फिर 2014 में आजाद ने उस भ्रम या कहें उस श्राप को भी तोड़ दिया कि ब्राह्मण कैंडिडेट दरभंगा से लगातार दो बार नहीं जीत सकता. उन्होंने एक बार फिर अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी मो. अली अशरफ फातमी को पटखनी दी. 35,043 वोटों के अंतर से हराया. इस बार मामला त्रिकोणीय भी था. माने जेडीयू कैंडिडेट संजय कुमार झा (एक और मैथिल ब्राह्मण) भी मैदान में थे, मगर मोदी लहर में आजाद की हर-हर गंगे हो गई. रिजल्ट ये रहा था -
कीर्ति आजाद, बीजेपी - 3,14,933 वोट
मो. अली अशरफ फातमी, आरजेडी - 2,79,906 वोट
संजय कुमार झा, जेडीयू - 1,04,494 वोट
बिहार की दरभंगा सीट से कुल मिलाकर कीर्ति आजाद तीन बार सांसद बन चुके थे. उनके पिता बिहार के पूर्व सीएम थे. फिर भी वो बिहार की पॉलिटिक्स में एक सांसद या कहें एक स्टार प्रचारक से ज्यादा की भूमिका में नहीं आ पाए. इसकी वजह या इसका जिम्मेदार आजाद बताते हैं बिहार के डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी को. आजाद कहते हैं -
 मोदी ने कभी किसी बीजेपी नेता को बिहार में पनपने ही नहीं दिया. लोग अपने क्षेत्र में रहकर काम करते थे, मगर मोदी पटना में ही ठहरा रहता था. जैसे वो हर किसी को दबाता रहा, वैसा ही उसने मेरे साथ किया. फिर उसको अरुण जेटली जैसे गुरू भी केंद्र में मिल गए थे सो उसने मुझसे और खुन्नस खानी शुरू कर दी.
वित्तमंत्री अरुण जेटली
वित्तमंत्री अरुण जेटली

अरूण जेटली से क्या पंगा?
अब अरुण जेटली की बात आ ही गई है तो जेटली और आजाद के बीच विवाद की भी बात कर लेते हैं. उस विवाद की बात जिसके कारण कीर्ति आजाद को बीजेपी से बाहर निकाल दिया गया. उस बीजेपी से, जिससे वो 90-91 के दौर से जुड़े हुए थे. कीर्ति से जब हमने अरुण जेटली से उनके विवाद के बारे में पूछा कि आपका जेटली से विवाद कब शुरू हुआ. तो वो छूट बोले -
जब से जेटली ने पैसा खाना शुरू कर दिया डीडीसीए में.
बोले - हमीं लोगों ने इनको समर्थन देकर 1999 में डीडीसीए का अध्यक्ष बनवाया. मगर फिर ये वहां पैसे खाने लगे तो हमने विरोध शुरू कर दिया. कुल मिलाकर देखा जाए तो जेटली और आजाद के बीच विवाद डीडीसीए यानि दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट असोसिएशन में भ्रष्टाचार को लेकर है. ये विवाद है क्या इसे भी समझ लीजिए. आजाद बताते हैं -
हर साल बीसीसीआई की तरफ से डीडीसीए को 40 करोड़ रुपये मिलते थे. जेटली एंड कंपनी इसका दुरुपयोग करती थी. फिर बोर्ड को बता देते थे कि पैसा खर्च हो गया है. इस तरह से 10 साल तक इन लोगों के हाथ बोर्ड के करीब 400 करोड़ रुपये आए. इन लोगों ने स्टेडियम बनवाने का काम एक कंपनी को दिया. उस कंपनी ने पहली बार कहा था कि हम 24 करोड़ में बनाएंगे. फिर उस कंपनी ने कहा- हम 58 करोड़ में इसे बनाएंगे. 2008 में उस कंपनी ने बना-वनाकर किसी तरह स्टेडियम इनको सौंप दिया. फिर इन लोगों ने उसी स्टेडियम में मरम्मत की बात कहकर इतने ही करोड़ इसमें और खर्च करने की बात कही. मेरे समझ नहीं आता कि नए बने स्टेडियम में मरम्मत कैसी? इन्होंने बाथरूम बनवाए 5 करोड़ के. एक टेंट वाले को एक काम के दिए 25 लाख, उसी काम के लिए इन्होंने एक टेंट वाले को दिए 1 करोड़ 25 लाख. ना कभी इन्होंने कभी टेंडर फ्लोट किए न नेचर ऑफ वर्क बताया. जबकि नॉर्म्स ये हैं कि 50 हजार के ऊपर के काम के लिए टेंडर होना चाहिए. इन्होंने 9 फर्जी कंपनियां बना दीं, जिनके एड्रेस गलत थे. इन्हीं कंपनियों को काम दिए गए. करोड़ों रुपये लुटाए गए.
डीडीसीए में भ्रष्टाचार ही जेटली और आजाद के बीच विवाद की वजह है.
डीडीसीए में भ्रष्टाचार ही जेटली और आजाद के बीच विवाद की वजह है.

ये सारे आरोप कीर्ति आजाद ने 20 दिसंबर 2015 को भी लगाए थे. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके. इसी के कुछ दिन बाद उनकी पार्टी से विदाई का रास्ता साफ हुआ. कहा जाता है कि इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को न करने के लिए उन्हें अमित शाह ने कहा था, मगर आजाद नहीं माने. उनका कहना था कि वो तो पीएम मोदी के बताए रास्ते पर चल रहे हैं. भ्रष्टाचार के विरोध में आवाज उठा रहे हैं. इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में हालांकि आजाद ने जेटली का नाम नहीं लिया. मगर अगले दिन ही जब उनको पता चला कि जेटली आम आदमी पार्टी के नेताओं पर मानहानि का मुकदमा दर्ज कर रहे हैं तो उन्होंने जेटली को सीधा चेतावनी दे डाली. बोले - मेरे खिलाफ भी मुकदमा दर्ज करवाओ. वो इसलिए क्योंकि आप ने जो आरोप जेटली के ऊपर लगाए थे, वे वही थे जो आजाद कह रहे थे. कहा जाता है कि अरविंद केजरीवाल को इस संबंध में सारे कागजात भी उन्होंने ही उपलब्ध करवाए थे.
आजाद कहते हैं मैं इतने साल से सांसद हूं, क्रिकेटर रहा. मगर मेरे पास एक इंच जमीन नहीं है दिल्ली में. कोई एक पैसे की हेराफेरी का आरोप नहीं लगा सकता है. घर के बंटवारे में मुझे हमारा पटना स्थित खानदानी घर मिल गया था. उससे किराया आता है और खर्चा चल जाता है. दरभंगा में भी मैंने कभी कोई कमीशनबाजी या किसी गलत काम की कोशिश नहीं की. तभी घड़ल्ले से कह पाता हूं -
अरुण जेटली चोर है.
वो बोले- अगर चिदंबरम पर केस हो सकता है. अगर लालू यादव पर केस हो सकता है तो जेटली पर केस क्यों नहीं हो सकता है? क्यों जांच नहीं हो सकती?
दिसंबर 2015 को आजाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर किया था जेटली पर अप्रत्यक्ष हमला.
दिसंबर 2015 को आजाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर किया था जेटली पर अप्रत्यक्ष हमला.

नई बीजेपी और पुरानी बीजेपी में अंतर?
कीर्ति आजाद बताते हैं पहले के नेताओं मसलन अटल, आडवाणी, जोशी. इन लोगों ने पार्टी को खड़ा किया था. पार्टी के लिए जीवन लगाया था. संघर्ष किया था. ये लोग हर वक्त पार्टी के काम से ही देश भर के चक्कर लगाया करते थे. मगर चाहे जितना भी व्य्सत हों, कार्यकर्ताओं से मिलते जरूर थे. कहीं से भी कोई कार्यकर्ता आए, चाहे उससे 2 मिनट के लिए ही मिलें. मिलते जरूर थे. सबकी बात सुनते थे. अब की तरह नहीं कि टाइम ही नहीं मिल रहा है. बोले - आज सभी सत्ता का सुख भोगने में लग गए हैं. सबसे बड़ी कमी वो बोले संवाद की ही है. कोई किसी की बात सुनने को तैयार नहीं है. सारे निर्णय कुछ खास जगहों पर ही हो जाते हैं. कहीं कोई चर्चा तक नहीं होती. पहले ऐसा नहीं होता था. मोदी राज में सब गड़बड़ हो गया है.
कीर्ति के परिवार के आगे आजाद कैसे जुड़ा?
बात 1942 की है. भारत छोड़ो आंदोलन से पहले की. अंग्रेजों को पता चला कि कुछ बड़ा आंदोलन होने वाला है. सो वो तैयारी में जुट गए. भारी मात्रा में बंदूकें, गोला-बारूद ट्रेन से इधर-उधर ले जाया जाने लगा. इन हथियारों की ये खेप गुजरनी थी भागलपुर से. यहीं के बाशिंदे थे कीर्ति के पिता भागवत झा आजाद. उनको भी अपने सूत्रों से इस बात की खबर लग गई. तो इन्होंने 300-400 लोग इकट्ठा किए और भागलपुर के सुल्तानगंज स्टेशन पहुंच गए. स्टेशन पर ट्रैक पर ये लोग खड़े हो गए. भोंपू लगाया और भाषण देने लगे. इसके बारे में लोगों को बताने लगे. इतने में अंग्रेज अफसर वहां पहुंच गए. इन पर गोलियां चला दीं. एक गोली लगी भागवत के आगे खड़े सुजीत मंडल के. सीधा सिर पर. सुजीत ने मौके पर ही दम तोड़ दिया. दूसरी गोली लगी भागवत के पांव पर. भागवत लड़खड़ा कर गिरे सीधा ट्रैक के ऊपर. बेहोश हो गए. लोग वहां से तितर-बितर हो गए. घंटे-दो घंटे बाद उनके साथी वहां पहुंचे तो उन्हें लगा कि भागवत मर गए. लेकिन थोड़ा हिलाने पर उन्हें होश आ गया. साथी चिल्लाए- भागवत तो आजाद हो गयो... भागवत तो आजाद हो गयो...
जवाहरलाल नेहरू ने लगाई थी आजाद के नाम पर मुहर.
जवाहरलाल नेहरू ने लगाई थी आजाद के नाम पर मुहर.

और इस तरह उनके नाम भागवत झा के आगे आजाद लग गया. इस नाम पर आखिरी ठप्पा लगाया जवाहर लाल नेहरू ने. कांग्रेस ने एक मीटिंग बुलाई थी. प्रोविंशियल सेक्रेटीज की. इसमें भागवत झा ने अपना नाम लिखकर भेजा भागवत झा आजाद. तो जब वो नेहरू से मिलने पहुंचे तो कांग्रेस की लिस्ट में नाम भागवत झा लिखा था. नेहरू बोले- आप तो भागवत झा आजाद हैं. इस पर भागवत ने अपने इस आजाद नाम की कहानी उन्हें सुनाई. नेहरू इस कहानी को सुनकर खुश होकर बोले -
ओके, आई एंडोर्स योर नेम एज आजाद.
क्रिकेट में क्या है सबसे यादगार?
कीर्ति आजाद नेता तो बाद में बने, पहले तो वो क्रिकेटर थे. वो भी कोई छोटे-मोटे नहीं. उन्होंने टीम इंडिया के लिए खेला था. वो उस टीम का भी हिस्सा रहे थे जिसने 1983 में पहली बार भारत को वर्ल्डकप जितवाया था. कीर्ति कहते हैं कि उनके क्रिकेट करियर का सबसे यादगार पल यही वर्ल्डकप जीतना था. बोले - मुझे याद है जब कपिल देव ने वो कप हाथ में उठाया था. शरीर में करंट दौड़ गया था. रौंगटे खड़े हो गए थे. वो फीलिंग बयां नहीं की जा सकती.
1983 विश्वकप टीम का हिस्सा थे कीर्ति आजाद.
1983 विश्वकप टीम का हिस्सा थे कीर्ति आजाद.

इसके अलावा उनके लिए सबसे यादगार मैच है 1983 वर्ल्डकप के तुरंत बाद खेला गया भारत का पहले डे-नाइट वनडे मैच. मैच भी था पाकिस्तान के खिलाफ. इसमें पहले खेलते हुए पाकिस्तान ने 50 ओवरों में 197 रन बनाए थे तीन विकेट खोकर. ये तीनों विकेट कीर्ति ने ही चटकाए थे. जवाब में उतरी भारतीय टीम का टॉप ऑर्डर ताश के पत्तों की तरह बिखर गया था. 71 रन पर 5 विकेट गिर चुके थे जब कीर्ति क्रीज पर आए. मैच लगभग हारा हुआ लग रहा था. मगर फिर कीर्ति वहां झंडा गाड़कर खड़े हो गए. 71 रन बना डाले थे. इस इनिंग में उन्होंने 7 छक्के लगाए. इसमें भी 3 छक्के तो लगातार मारे थे. जलालुद्दीन की गेंद पर. मैच एकदम सांस रोक देने वाला था. भारत ने इसे आखिरी ओवर की आखिरी गेंद पर जीता था वो भी एक विकेट से. आखिरी बॉल पर जहीर अब्बास की गेंद पर चौका मारकर आजाद ने ये मैच भारत की झोली में डाला था.
आगे क्या करने वाले हैं कीर्ति आजाद?
कीर्ति इस पर कुछ साफ-साफ तो नहीं बोलते. वो बोले- मैं एक भारतीय हूं. सनातन धर्म में विश्वास करता हूं. विश्वास करता हूं अपनी कुलदेवी महामाया पर. मुझे भरोसा है कि सब ठीक होगा. जहां माहामाया ले जाएंगी, वहां जाएंगे. हालांकि वो एक और बात बोले - रहूंगा किसी राष्ट्रीय पार्टी में ही.
पत्नी पूनम और पीएम मोदी के साथ कीर्ति आजाद.
पत्नी पूनम और पीएम मोदी के साथ कीर्ति आजाद.

ये लाइन अपने आप में काफी है. राष्ट्रीय पार्टी का मतलब साफ तौर पर दो ही पार्टी हैं - कांग्रेस या बीजेपी. अब बीजेपी में तो उनकी दाल गलती नहीं दिख रही है. उन्हें सस्पेंड हुए दो साल से ज्यादा हो गए हैं, मगर फिलहाल उन्हें मनाने की कोई कोशिश होती नहीं दिख रही है. वो भी अभी इंतजार मोड में दिख रहे हैं. हालांकि उनकी पत्नी पूनम आजाद कांग्रेस में पहुंच चुकी हैं. इससे भी संभावनाएं बढ़ती हैं कि उनकी अपने पिता के घर वापसी हो सकती है. दरभंगा के स्थानीय पत्रकार भी इस बात की संभावना जताते हैं कि आजाद कांग्रेस में जा सकते हैं. ये कांग्रेस के लिए भी फायदे का सौदा साबित हो सकता है. वो इसलिए क्योंकि वहां उनके पास अब कोई कायदे का ब्राह्मण कैंडिडेट नहीं है. ऐसे में कांग्रेस वाया आजाद अपना खोया हुआ गढ़ भी वापस पा सकती है और आजाद भी उस कांग्रेस पहुंच जाएंगे जहां के उनके पिता सिकंदर थे. स्थानीय पत्रकार कहते हैं ऐसी स्थिति में बीजेपी के लिए बेहतर होगा कि वो ये सीट जेडीयू को सौंप दे. क्योंकि उसके पास संजय कुमार झा जैसा एक ब्राह्मण कैंडिडेट है जो आजाद को चुनौती दे सकते हैं.


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