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राजस्थान का वो विधायक जिसने दोनों ही बड़ी पार्टियों के समीकरण गड़बड़ा दिए हैं

हनुमान बेनीवाल निर्दलीय विधायक हैं. किसी ज़माने बीजेपी में हुआ करते थे. 2011 में बीजेपी से निकाल दिए गए, उसके बाद से तीसरा मोर्चा बनाने में जुटे हुए हैं.

2008. हनुमान बेनीवाल राजस्थान की खींवसर सीट से चुनाव जीत गए थे. मगर उनकी पार्टी बीजेपी 200 सीटों वाली विधानसभा में महज 78 सीटों पर सिमट गई थी. यूं तो चुनाव से पहले ही बीजेपी में पर्याप्त खेमेबाजी थी, लेकिन चुनाव में मिली हार ने इसे और मजबूती के साथ सतह पर लाकर पसार दिया. उस समय प्रदेश बीजेपी में दो बड़े धड़े हुआ करते थे. पहले धड़े की कमान वसुंधरा राजे के हाथ में थी और दूसरे धड़े का नेतृत्व कर रहे थे घनश्याम तिवाड़ी, जसवंत सिंह, गुलाबचंद कटारिया जैसे नेता.

हनुमान बेनीवाल हालांकि दोनों में से किसी भी खेमे के झंडाबदार नहीं बने, लेकिन विधायक बनने के बाद से ही उनके वसुंधरा राजे के साथ संबंध खास अच्छे नहीं रहे. दोनों के बीच दूरी की एक वजह युनूस खान भी हुआ करते थे. युनूस 2003 से 08 के बीच राजे सरकार में मंत्री हुआ करते थे. 2008 के विधानसभा चुनाव में वो नागौर की डीडवाना सीट से चुनाव हार गए. इसके बावजूद संगठन में उनका रौला जस का तस कायम रहा. हनुमान बेनीवाल और युनूस खान एक ही जिले से आते थे. दोनों की अदावत तब से थी जब बेनीवाल बीजेपी में नहीं हुआ करते थे. युनूस खान वसुंधरा के खास सिपहसालार माने जाते हैं. युनूस के विरोध में खड़े बेनीवाल खुद-ब-खुद वसुंधरा के खिलाफ खड़े हो गए. तकरीबन 3 साल चली यह खींचतान 2011 के आखिर में आते-आते निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई.

2 दिसंबर 2011. महाराजा कॉलेज का नया छात्रसंघ चुना जा चुका था. नए चुने गए पदाधिकारियों ने अपने स्टूडेंट यूनियन ऑफिस के उद्घाटन के लिए उस नेता को बुलावा भेजा, जिसने इसी स्टूडेंट यूनियन ऑफिस से सियासत का पहला डग भरा था. 17 साल के बाद हनुमान बेनीवाल एक बार फिर से अपने कॉलेज में थे. उन्होंने एक बार फिर से छात्रनेता के अंदाज में भाषण देना शुरू किया.

अगले दिन हनुमान बेनीवाल अखबार के पहले पन्ने पर थे. इन खबरों के मुताबिक हनुमान बेनीवाल ने महाराजा कॉलेज में दिए गए भाषण में वसुंधरा राजे को भ्रष्टाचार की देवी कहा. इसके अलावा उन्होंने राजेंद्र राठौड़ और लालकृष्ण आडवाणी के बारे में भी तल्ख जबान का इस्तेमाल किया था. वैसे तो बेनीवाल 2010 से ही बागी तेवर अपनाए हुए थे, लेकिन इस बार वो सीमा लांघ गए थे. जिसके बाद उन्हें पार्टी में रखना बीजेपी के लिए शर्म का बायस बन जाता.

बीजेपी से हुए बाहर

इस बयान के चार दिन बाद उन्हें पार्टी की तरफ से कारण बताओ नोटिस थमा दिया गया. इसके सात दिन बाद उनकी बीजेपी से विदाई हो गई. 17 साल पहले जिस महाराजा कॉलेज से उन्होंने अपना सियासी सफर शुरू किया था, वही महाराजा कॉलेज उनके इस सफर में आने वाले सबसे बड़े घुमाव का गवाह बन रहा था. यहां से आगे का सफर उन्हें अकेले तय करना था.

बीजेपी से बाहर निकलने के बाद हनुमान बेनीवाल ने अपने विधानसभा क्षेत्र पर फोकस करना शुरू किया. वो ज्यादा से ज्यादा आदमियों से मिलते, उनकी समस्या सुनते और उसे दूर करने की कोशिश करते. अपने जनसंपर्क अभियानों के दम पर उन्होंने जनता के अंदर यह भरोसा पैदा कर दिया कि वो हर आदमी की पहुंच में हैं. इसका नतीजा यह हुआ कि 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जबरदस्त लहर में भी वो 24,000 के बड़े अंतर से चुनाव जीतने में कामयाब रहे.

लोगों के बीच जाकर उनकी समस्या सुनने और मदद करने का ही नतीजा रहा कि हनुमान को मोदी लहर में भी जबरदस्त जीत मिली.
लोगों के बीच जाकर उनकी समस्या सुनने और मदद करने का ही नतीजा रहा कि हनुमान को मोदी लहर में भी जबरदस्त जीत मिली.

एक अपराधी की फरारी पर विधानसभा में बवाल

3 सितंबर 2015. अपनी एक पेशी पर डीडवाना कोर्ट आया कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल सिंह नाटकीय तौर पर जेल से फरार हो गया. वही आनंदपाल जो जीवन राम गोदारा के कत्ल का मुख्य आरोपी था. आनंदपाल की फरारी की वजह से जाट समुदाय गुस्से से भरा हुआ था. 2006 से बेनीवाल जीवन राम गोदारा को न्याय दिलवाने के आंदोलन से जुड़े हुए थे. ऐसे में उन्होंने विधानसभा के भीतर इस मुद्दे को बड़े जोर-शोर के साथ उठाया.

इस दौरान विधानसभा में वसुंधरा सरकार में पीडब्लूडी और ट्रांसपोर्ट मंत्री यूनुस खान और हनुमान बेनीवाल बहुत ही असंसदीय लहजे में एक-दूसरे से भिड़ गए. इस वाकये को विधानसभा के रिकॉर्ड से मिटा दिया गया, लेकिन सदन से बाहर आकर दोनों ने जो बयान दिए वो आज भी दर्ज हैं.

दरअसल हनुमान बेनीवाल लगातार यह आरोप लगा रहे थे कि राज्य सरकार के कैबिनेट मंत्री यूनुस खान और आनंदपाल के बीच में सांठ-गांठ है और उन्हीं के इशारे पर आनंदपाल को फरार करवाया गया है. इस वजह से दोनों के बीच की तल्खी और ज्यादा बढ़ गई. इस बीच यूनुस खान ने विधानसभा में बयान दिया कि वाहन के रजिस्ट्रेशन के समय इस बात की जानकारी नहीं होती है कि किस आदमी पर कितने मुकदमे चल रहे हैं. जिन लोगों पर 18-18 मुकदमे चल रहे हैं. ऐसे लोग भी इस सदन में बैठे हुए हैं. यूनुस खां का इशारा बेनीवाल की तरफ था और इस बात से बेनीवाल तैश में आ गए. जवाब में उन्होंने यूनुस खान को थप्पड़ दिखा दिया. यूनुस खान भी कहां पीछे रहने वाले थे. उन्होंने बेनीवाल की तरफ जूते का इशारा कर दिया. इसके बाद शोर-शराबे के चलते सदन की कार्यवाही एक दिन के लिए स्थगित कर दी गई.

यूनुस ने अपने एक बयान में कहा था कि कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल और हनुमान बेनिवाल में कोई अंतर नहीं है.
यूनुस ने अपने एक बयान में कहा था कि कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल सिंह और हनुमान बेनिवाल में कोई अंतर नहीं है.

मदन राठौड़ और जीवन राम गोदारा का कत्ल जाट और राजपूत समाज के लिए अस्मिता का सवाल बना हुआ है. गैंगस्टर आनंदपाल सिंह राजपूत युवाओं के बीच इसलिए हीरो बनकर उभरा क्योंकि उसने मदन राठौड़ की हत्या का बदला लिया था. जाट युवाओं के बीच हनुमान बेनीवाल इसलिए हीरो हैं क्योंकि वो अकेले आदमी थे जो जीवन राम के हत्यारे आनंदपाल सिंह के खिलाफ खड़े थे.

हर किसी के पास है हनुमान का नंबर

नागौर में एक नेता हुए हैं नाथूराम मिर्धा. कुचेरा के रहने वाले मिर्धा 1957 में पहली बार नागौर के विधायक बने थे. 1971 से 1996 में अपनी मौत तक वो लगातार नागौर से सांसद रहे. इलाके के लोग आज भी उन्हें नाथू बाबा के नाम से याद करते हैं. उनके बारे में एक किवदंती है कि अगर गरीब से गरीब किसान एक पोस्टकार्ड पर अपनी समस्या लिखकर उनके पते पर भेज देता था तो वो समस्या हल हो जाती थी. जनता से अपने जुड़ाव की वजह के चलते वो अपनी मौत के दो दशक बाद भी जनता में उतने ही लोकप्रिय हैं. 2009 में जब नाथूराम मिर्धा की पोती डॉ. ज्योति मिर्धा नागौर से लोकसभा का चुनाव जीतने आई थीं तो उन्होंने नारा दिया, “बाबा की पोती, नागौर की ज्योति.” ज्योति मिर्धा भले ही नाथूराम मिर्धा की सियासी वारिस हों, लेकिन बेनीवाल नाथूराम मिर्धा की राजनीतिक परम्परा से आने वाले राजनेता हैं.

नागौर में हनुमान बेनीवाल का घर स्टेडियम के एकदम सामने है. जब कभी भी यहां पर फ़ौज की भर्ती दौड़ होती है तो वो गांव से आए प्रतिभागियों के लिए अपना घर खोल देते हैं. इलाके के हर आदमी के पास उनका नंबर है. वो खुद अपना फोन उठाते हैं. अगर नहीं उठा पाते तो पलटकर फोन करते हैं. आपको पुलिस वाले ने रोक रखा है, पटवारी बदमाशी कर रहा है, तहसील में कोई काम नहीं मिल रहा, बिजली-पानी का कनेक्शन नहीं मिल रहा, लोग बिना झिझक उन्हें फोन करते हैं और काम हो जाता है.

जनता से उनका कनेक्ट कमाल का है. बेनीवाल आपका नाम याद रखते हैं. हर बार मिलने पर आपका हाल-चाल पूछते हैं. वो देहात से आने वाले नौजवान में यह भरोसा पैदा करने में कामयाब हुए हैं कि अगर कोई दिक्कत आती है तो वो अकेला नहीं है. वो जोशीले भाषण देते हैं. बीजेपी और कांग्रेस को खुलकर लताड़ते हैं. उनके भाषणों का यह अंदाज ख़ास तौर पर पसंद किया जाता है. लोगों के दिमाग में उनकी छवि “खुलकर बोलने वाला नेता” की है.

खुलकर बोलने वाले नेता की छवि और लोगों से उनका कनेक्ट उनकी लोकप्रियता का अहम कारण है.
खुलकर बोलने वाले नेता की छवि और लोगों से उनका कनेक्ट उनकी लोकप्रियता का अहम कारण है.

तीसरे मोर्चे की तैयारी

हनुमान बेनीवाल सोशल मीडिया का बखूबी इस्तेमाल करने वाले नेता हैं. उनके फेसबुक पेज पर करीब सवा दो लाख लाइक हैं. वो अपने पेज पर अपनी जिंदगी का सारा लेखा-जोखा डालते हैं. विधानसभा में उनके द्वारा पूछा गया हर एक सवाल और उसका जवाब आप यहां से हासिल कर सकते हैं. 2013 से 2018 के बीच सबसे ज्यादा सवाल पूछने का रिकॉर्ड भी उन्हीं के खाते में दर्ज है.

हनुमान बेनीवाल, मीणा समुदाय से आने वाले कद्दावर नेता डॉ. किरोड़ी लाल मीणा के साथ मिलकर राजस्थान में तीसरा मोर्चा बनाने में जुटे थे लेकिन मीणा ने बीजेपी जॉइन कर ली. हनुमान ने जयपुर रैली में भारतीय लोकतांत्रिक पार्टी नाम से पार्टी बना ली है. सपा और घनश्याम तिवाड़ी की भारत वाहिनी पार्टी के साथ गठबंन की घोषणा कर दी है. पॉलिटिकल पंडितों की माने तो जाट जैसी बड़ी जाति के वोटों में सेंध लगने से दोनों बड़ी पार्टियों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.


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