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उस गायक की कहानी जिसके गाने समाधि को खूबसूरत बनाते हैं और संभोग को भी

एडेल (स्कायफॉल, 2013, ऑस्कर) का 2009-10 में किसी से प्रेम था. किससे? उन्होंने कभी नहीं बताया. वे शादी करना चाहती थीं. लेकिन उसने किसी और से कर ली. टूटा दिल लिए उन्होंने पहले तो गुस्से में रोलिंग इन द डीप गाया. जो दुख का कम ख़ून में आनंदमय दाब भरने वाला ज्यादा था जिस पर पैर पटककर थिरकने का मन ज्यादा करता. फिर अपने एल्बम ’21’ का ही अन्य गाना समवन लाइक यूउन्होंने लिखा व गाया.

इसके बोल थे..
I heard that you’re settled down
That you found a girl and you’re married now.
I heard that your dreams came true.
Guess she gave you things I didn’t give to you.

Old friend, why are you so shy?
Ain’t like you to hold back or hide from the light.

Never mind, I’ll find someone like you
I wish nothing but the best for you too..

एडेल ने अपने ब्रेकअप के दर्द को करोड़ों कमाने और दर्जनों मुल्कों में चार्टबस्टर बनाने का जरिया बनाया. लेकिन उन्हें वाकई पूर्व-प्रेमी को अंतिम जवाब ही देना था तो मेहदी हसन का गाया मुहब्बत करने वाले..भेजतीं. प्रेम की इस स्थिति पर इससे निष्कपट और सिविलाइज़्ड गीत नहीं.

मुहब्बत करने वाले कम न होंगे
तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे,
ज़माने भर के ग़म या इक तेरा ग़म
ये ग़म होगा तो कितने ग़म न होंगे

इससे टिकाऊ विकल्प नहीं. हफ़ीज़ होशियारपुरी की लिखी इन पंक्तियों को मेहदी जैसे गाते हैं हम समझदार और निरुत्तर हो जाते हैं. बोलने को कुछ नहीं बचता. प्रेम, उसकी चरम स्थिति, उसके टूटने और पुनर्वास की चुनौतियों पर थैरेपी लेनी हो तो मेहदी हसन साब के गाए गाने हैं. वरना टेलर स्विफ्ट ने तो कह दिया है वी आर नेवर एवर गेटिंग बैक टुगेदर.

पता है कि नई पीढ़ी को प्यार और जीवन पर अपना दर्शन टेलर स्विफ्ट या बियॉन्से या जस्टिन बीबर या पश्चिमी कलावंतों की एक लंबी कतार में मिलता है. शायरी, ग़ज़ल, नज़्म से उबासी आती है. लेकिन मेहदी हसन कूल थे. एक तो उन्होंने इतने भारी क्लासिकल को बिलकुल हल्का कर दिया. सुनते वक्त एफर्ट लगाने की कोशिश नहीं होती थी. दूसरा, वे उन गीतकारों, ग़ज़लकारों की रचनाएं लाते जिन्होंने इतनी लोकप्रियता न पाई थी और अपने गाने के तरीके से उस चीज को डीप बना देते. इतने ईज़ी लेकिन इतने डीप गाने आपको नहीं मिलेंगे.

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ,
कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत (प्रेम का गर्व) का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

ये ग़ज़ल एक फिल्म के लिए कंपोज की गई थी लेकिन मेहदी हसन साहब ने ऐसे गाया कि सिंगल के तौर पर बहुत फेमस होती चली गई. इतनी कि 13 जून 2012 को कराची के आगा खान अस्पताल में फेफड़े की बीमारी से जब उनका इंतकाल हुआ तो यही उनकी प्रतिनिधि बनकर गूंज रही थी. लोगों की जुबां पर, समाचार चैनलों पर. आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ.आप ला दो यूट्यूब में 70-70, 80-80 करोड़ व्यूज़ पाने वाले पॉप आर्टिस्टों या बंदा-बूंदा मारना ए ता दस वाले रैपर्स की हैट के नीचे से निकालकर कुछ कुछ ऐसा 2016 में!! नहीं ला पाओगे. यहां सिर्फ डीजे वाले बाबू बच गए हैं सॉलिड कृतियों को आग देने और ‘गाना’ बजाने को.

इस गीत को या मेहदी हसन साहब के गाए गानों को अनेक मौकों, वर्षों, दृश्यों में अप्लाई कर सकते हैं और अफेक्ट जादू भरा होगा. जैसे रंजिश.. को ही लें. इम्तियाज अली की फिल्म तमाशा के उस दृश्य को लें जिसमें रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण एक बार में फिर मिले हैं. प्रेम नहीं आ रहा.

रणबीर का पात्र वेद सुन्न हो चुका है तनावों और कनफ्यूजन से. लेकिन तारा उसे चाहती है. वह जा रहा है और कसकर बांह पकड़ते हुए तारा कहती है मैं सब ठीक कर दूंगी. लेकिन वो हाथ छटककर जाने को है कि वो सीने से लगाकर हाथों की कुंडी बांध देती है. जो-जो वैवाहिक जीवन में और अन्यथा प्रेम की इस व्याकुलता को समझ पा रहा है, वह भीतर तक तृप्ति वाले आनंद से जरूर बेचैन हुआ होगा.

पल भर ठहर जाओ
दिल ये संभल जाए
कैसे तुम्हे रोका करूं..

इरशाद कामिल के लिखे, रहमान के बनाए और अल्का याज्ञ्निक-अरिजित सिंह के गाए इस गीत में चुंबकीय आकर्षण है. मार्मिक. इसके बाद मेहदी हसन साहब का गाया रंजिश.. सुनें. ये इसी दृश्य के संवाद को आगे बढ़ा देगा. फूट-फूट कर रोने और गले पड़ने का झंझावात, गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड के प्यार का द्व्ंद्व, रूठने-मनाने, चुनौतियों के पलों औऱ विरह के दौरान प्रेम के अनुभव को ये हजार गुना बढ़ा सकता है.

हरिपुर, पाकिस्तान के क़तील शिफ़ाई का लिखा एक गीत मेरा पसंदीदा है. आप कूल डूड्‌स का भी हो जाएगा. अगर आपको प्रेम है, या लव तो होगा ही, चाहे इनफैचुएशन वाला है या ‘अभी कनफ्यूज हैं’ वाला ही सही है.. क़तील साहब की लाइनों को मेहदी हसन ने शहद कर दिया है. दिमाग को खुशी और ठंडक वाला मीठा डंक लगता है. इसे दो बरस बाद सुनें या 20 बरस बाद. ये थर्मामीटर देख लेगा कि आपकी देह में अब भी प्रेम बचा है कि नहीं?

प्यार भरे दो शर्मीले नैन
जिनसे मिला मेरे दिल को चैन
कोई जाने ना क्यों मुझ से शरमाए
कैसे मुझे तड़पाए
प्यार भरे दो शर्मीले नैन…

दिल ये कहे गीत मैं तेरे गाऊं
तू ही सुने और मैं गाता जाऊं
तू जो रहे साथ मेरे, दुनिया को ठुकराऊं
तेरा दिल बहलाऊं

हालांकि ये बहुत ही सरल गीत है लेकिन इससे भी सरल लेकिन स्मार्ट वाला कुछ चाहिए तो ये सुनें..

तन्हा तन्हा मत सोचा कर
मर जाएगा मत सोचा कर,
प्यार घड़ी भर का ही बहुत है
झूठा सच्चा मत सोचा कर

इसे फ़रहत शहज़ाद ने लिखा था जो कराची में पढ़े और अमेरिका में रहते हैं.

एक और पेशकश है मेहदी हसन साहब की जो जरूर सुनी जानी चाहिए..

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार (नए बसंत की खुशबू) चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले
क़फ़स (जेल) उदास है यारो सबा (मंद हवा) से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा (ख़ुदा के लिए) आज ज़िक्र-ए-यार चले

इसे फैज़ अहमद फैज़ ने लिखा था. फैज़ साहब समेत बहुत से थे जिन्हें हसन साहब ने अपनी आवाज से इतना लोकप्रिय किया.

मेहदी हसन साहब आखिर अपने गाने के तरीके के साथ करना क्या चाह रहे थे? या उनका खुद को ब्रीफ क्या था इसे उन्हीं के शब्दों में दो बातों से जानने की कोशिश कर सकते हैं.

1. खरा सुर लगाने के लिए बहुत सांस की जरूरत होती है, और गाने की जान सांस ही है. सांस न हो तो गाना पूरा नहीं हो सकता. सांस पूरी न हो तो सुर पूरा नहीं होता. सुर ईश्वर है. तो ये सांस की ताकत है पूरी.

2. मजा तभी है जब स्केल और राग में ही बढ़ा जाए और अगर मैं इसमें तीर-कौमा और हजारों चीजें लगा दूं तो इसका मतलब मेरे में मटीरियल कम है. इन्हीं सुरों को फैलाना है. कि घंटे, दो घंटे आदमी गाए.

आमतौर पर लगता है कि सारी रोचक बातें तो हैवी मेटल गिटार वाले छप्पन छुरों के जीवन में ही होती होंगी, ये पेटी-ढोलक लेकर रिरियाने वाले कुर्ता-पायजामा टाइप्स उस्ताद जी तो बड़े बोरिंग होते हैं. लेकिन आइकॉनिक मेहदी हसन साहब के मामले में तो कम से कम आप गलत ही हैं. नहीं हैं? हो जाए फिर? तो लीजिए..

ग़ुलामी फिल्म का गाना याद है मेरे पी को पवन किस दिशा ले गई.. बार-बार सुना जा सकने वाला, जिसमें बालक रंजीत (धर्मेंद्र) ट्रेन से जा रहा है और उसकी प्रेमिका बालिका मोरां (रीना रॉय) उसे रवाना कर रही है. स्टेशन का नाम है झूंझनू. राजस्थान का शेखावाटी इलाका. इसी झूंझनू तहसील (अब जिला) के लूणा (मतलब नमक) गांव में जुलाई 1927 को मेहदिए का जन्म हुआ. मेहदी हसन. ये लूणा उसी मंडावा रियासत में आता था जहां हाल ही में आमिर स्टारर पीके, सलमान की बजरंगी भाईजान और आगामी मिर्जेया की शूटिंग हुई है.

ठिकानों और राजदरबारों के लिए गाने वाली वे अपने परिवार की 16वीं पुश्त थे. जयपुर के महाराजा मान सिंह के यहां उनके दादा ईमाम खान कलावंत थे. उनके समय से बड़ौदा, इंदौर, नेपाल व अन्य दरबारों से गायन के बुलावे आने लगे. राजा साहब को पहले मंजूर न था लेकिन ईमाम साहब ने राज़ी किया और जाने लगे.

मेहदी छह साल की उम्र में पिता अजीम खां से दादरा, ठुमरी, ख़याल सीखने लगे. आठ की उम्र में बड़ौदा के महाराजा के सामने उनकी पहली प्रस्तुति हुई. करीब 40 मिनट उन्होंने ख़याल बसंत पंचम का गाया था. उस दिन उन्हें भी बड़ौदा दरबार का गवैया माना गया. सोने के कड़े पहनाए गए. खुद मेहदी हसन ने कहा था कि आठ की उम्र थी लेकिन जेहनी तौर पर लोग उन्हें सुनकर लोग 35-40 बरस का महसूस करते थे.

बचपन से ही वे गंभीर किस्म के थे. खेलते-कूदते नहीं थे. 10 बरस की उम्र में भी उनका एक लंगोटिया यार 55 बरस का था. खां साब ममू खां. दूसरा 50 साल का मास्टर अब्दुल रहमान, ट्रम्पेट बजाते थे. तीसरे संगी 35-40 बरस के थे. ये उनके दोस्त थे और हर वक्त साथ रहते थे. साथ रियाज और परफॉर्म करते थे.

बुजुर्गों ने गाने की बुनियाद के तौर पर वर्जिश भी शुरू से ही चालू करवा दी. जब वे 6-7 साल के थे. दौड़ना, दंड-बैठक करना, अखाड़े जाना. जब उनके बुजुर्गों से पूछा गया कि ये क्यों करवा रहे हो? इसे पहलवान बनाना है? तो कहने लगे, ‘गवैया भी पहलवान ही होता है. बगैर पहलवानी के गाना नहीं आता. क्योंकि सांस का काम है गाना. सांस सही होगी तो गाना आएगा.’

शुरू में मेहदी 500 बैठकें, 500 दंड, 1 मील दौड़ करते थे. बंटवारे के बाद पाकिस्तान गए तो 2000 बैठकें, 1500 दंड और 4 मील की दौड़ करते थे. शाम को 4 से 7 बजे के बीच अखाड़े में 7-8 आदमियों के साथ ज़ोर करते थे. नए पहलवानों से भी. उनके काका इस्माईल खां लाठी लेकर खड़े होते थे. कहते थे तुम्हे इसे थकाना है, और खुद नहीं थकना. और मेहदी 5 या ज्यादा से ज्यादा 10 मिनट में उसे थका देते थे. उसके थकते या गिरते ही एक और नया पहलवान अखाड़े में उतार दिया जाता था. मेहदी को सांस लेने का कोई मौका नहीं दिया जाता था. इस तरह 7 पहलवान आते. आठवें नंबर पर उनके बड़े भाई आते. तब तक मेहदी थक चुके होते थे. उनके चचा गांव के मैदान में दौड़ाते थे. जहां से दौड़ना शुरू करते थे उसके एक मील बाद पहुंचकर 100 बैठकें लगाते फिर दूसरा राउंड शुरू करते, फिर 100 बैठकें, फिर तीसरा राउंड और 100 बैठकें.

मेहदी हसन ने खुद कहा कि वे एक सांस में बाल्टी में 6 सेर दूध पीते थे. दिन में 3 पाव सेर घी, आधा सेर- 3 पाव गोश्त, दो मुट्‌ठी बादाम की गिरी खाते थे.

जब वे 20 के हुए तो बंटवारा सामने था. वे एक परफॉर्मेंस के लिए चीचावतनी, लाहौर गए हुए थे. अपनी फूफी के वहां रुके थे. हालात बदले. उनके सामने ही पाकिस्तान बनने लगा. वे वहीं रुके. वहां उनके पिता भी पहुंचे. नई शुरुआत करनी थी. वहां कोई राजा-महाराजा या उनका दरबार न था. रोजगार के लिए कुछ करना था. 1948 का वक्त था. उनके पिता अज़ीम खां ने लकड़ियों की टाल खोलने का इरादा किया. मेहदी हसन याद करते थे कि उनके वालिद के पास 10,000 रुपए बचे थे, उसे निवेश करने का तय किया.

लेकिन मेहदी ने मना कर दिया. बोले, राजे-रजवाड़ों के यहां उस्ताद रहे, सम्मान पाया और अब अजीम खां टाल वाले कहलाएं ये उन्हें गवारा नहीं. मेहदी ने कहा, मुझे कुछ पैसे दें, मैं कारोबार करूंगा. पिता ने गंभीरता से नहीं लिया और दस रुपए दिए. उस दौर में सवा रुपए सेर घी आता था. मेहदी दस रुपए लेकर शहर गए. चीचावतनी. पुरानी चीचावतनी में उन्हें कच्ची मिट्टी की बनी एक दुकान अलॉट हुई थी. उसे खोला. रियासतों में गाते-रहते हुए गाड़ियों के पुर्जों और बनावट का ज्ञान हो गया था. दस रुपए में प्लास, केंची, हवा भरने का पंप, स्क्रू कसने वाला, पुराने टायर वगैरह खऱीदे. साइकिल वर्कशॉप खोली. दो-तीन दिन में कमाई होने लगी. रोज 13 से 16 रुपए की कमाई होती थी. रोज वे अब्बा को पांच रुपए देते थे. बोले, ‘अब लकड़ी तो नहीं बेचेंगे? और वो 10,000 रुपए वापस ले लीजिए.’ उनके वालिद खुशी से रोने लगे.

मेहदी के मुताबिक, डेढ़ साल में उस 10 रुपए की दुकान को उन्होंने 38,000 हजार की वैल्यू वाली बना दिया.

फिर दुकान बड़े भाई को दे एक डीजल मोटर कंपनी में काम करने लगे. छह महीने में उन्होंने फर्ग्युसन ट्रैक्टर, डीजल इंजन सुधारने में डिप्लोमा ले लिया. रियासत बहावलपुर में अलग-अलग जगहों पर इंजन फिटिंग करने लगे. उसके 2000-2500 रुपए लेते थे. मेहदी कहते थे कि बहावलपुर और करीब के इलाके में उनके फिट किए 300 के करीब इंजन होंगे.

अपना खर्चा निकालकर वे महीने के 5000-6000 बचा लेते थे. फिर वहां से बाकी मिस्त्रियों को काम सौंप हफ्ता-दस दिन के लिए संगीत में फिर जीवन टटोलने लाहौर जाने लगे.

उनका रूटीन तब भी वही था. सुबह 3 बजे उठते थे. सुबह की नमाज से पहले दो-ढाई घंटे गा लेते थे. फिर वर्जिश.

लाहौर में एक दोस्त बने. उनके यहां रुकते थे. रियाज करते थे. उन्हें सुनने के लिए बैठक भरी होती थी. फिर खेती करने लगे. फिर नीचा नगर (1946) में काम करने वाले और इल्ज़ाम (1953) डायरेक्ट करने वाले रफीक अनवर ने अपने भांजे की शादी में लाहौर में बिना साज़ उन्हें गाते हुए सुना. रफीक ने मेहदी को 1000 रुपए दिए और कहा कि वे उनकी अगली फिल्म में गाएंगे. इसके बाद मेहदी ने खेती छोड़ दी. उन्हें अपनी फील्ड मिल गई. 1956 में उनकी पहली फिल्म शिकार आई. बाद में उन्होंने 325 से ज्यादा फिल्मों में गाया.

संगीत और रोजगार के साथ घरेलू जीवन भी उत्साह भरा था. शादी के समय उनकी पत्नी की उम्र करीब 11 बरस थी. मेहदी हसन साहब के 14 बच्चे हुए. 5 बेटी, 9 बेटे. बंटवारे के बाद वे पाकिस्तान के जरूर हो गए लेकिन हिंदुस्तान उनसे नहीं गया था. वे वहां भी शेखावाटी बोली ही बोलते थे. लंबे समय बाद जब 1977 में सरकारी इवेंट में परफॉर्म करने जयपुर आए तो लूणा गांव गए. बताया जाता है कि गांव की ओर जाते हुए उन्होंने गाड़ी रुकवा दी. किनारे एक टीले पर छोटा मंदिर था और वहां रेत में वे लोटपोट हो पलटियां खाने लगे, रोने लगे. वहां छप्पन भोग छोड़ झूंझनू के एक इलाके में अपनी दूर की बहन के घर गए और वहां लहसुन-लाल मिर्च की चटनी बाजरी की रोटी के साथ लगाकर खाई.

लाल मिर्च की चटनी, बाजरी की रोटी के अलावा उनके गाए केसरिया बालमको सुने बगैर बात पूरी नहीं हो सकती. प्रस्तुत है:

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