स्त्रोत- कल्याण नीतिसार अंक
देवताओं के ट्रबलशूटर ने ऐसा क्या सुना कि हो गए संन्यासी?
उनने कसम खाई थी किसी को छूंछे हाथ न लौटाएंगे. यही कसम गले पड़ गई.
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Source- Epified
सगरवंश के एक राजा थे. नाम था विश्वसह. उनके बेटे थे खट्वांग. बहुते रिलिजियस किस्म के. खट्वांग के फेवरेट भगवान उत्तमश्लोक थे. प्रजा की सेवा में जुटे रहिते. धन-दौलत, लक्जरी का लोभ नहीं था और न ही बीवी-बच्चों का. महाराज थे बहुत हेल्पिंग नेचर के. जोई उनके पास मदद को आए उसको तारने की कसम खाई थी. खट्वांग फैंटम थे. इंसान तो इंसान, देवताओं की भी मदद करते थे वो भी राक्षसों से. हार से पिनपिनाए राक्षस इतने थेथड़ थे कि बार-बार हारने के बाद भी मुंह उठा के लड़ने चले आते थे. देवता सिर्फ कहने के लिए जबराट थे. जब भी राक्षसों की टोली धावा बोलती, खट्वांग-खट्वांग करते चले आते और छुप जाते खट्वांग के पीछे. बेचारे महाराज, बुरे फंसे थे दूसरों की मदद करने की कसम ले कर. लड़ना पड़ता चाहते-न चाहते हुए भी. एक बार का हुआ कि महाराज आ रहे थे राक्षसों की ऐसी-तैसी कर के. उनके इस काम से भगवान इतने इंप्रेस हुए कि खट्वांग को वरदान मांगने बोले. भगवान लोग का उस टाइम फेवरेट टाइमपास हुआ करता था ये. राक्षसों को भी रैंडम वरदान दे दिया करते थे. खट्वांग लगे हिसाब-किताब करने. सोचे लंबा खटना है तब तो ये हीरोगिरी ठीक है. लाइफ में थ्रिल रहेगा. लेकिन मेरा नाम यमराज की लिस्ट में दो-चार लोगों के बाद है तब सोचना पड़ेगा कुछ. पता नहीं एक बार राम नाम सत्त हुआ तो ये चोला माटी का मिले या नहीं. भवसागर इसी शरीर में पार कर लेता तो अच्छा होता. देवताओं का कुछ भरोसा नहीं. राक्षसों से तो निपट नहीं सकते, हमको का वरदान देंगें. दिमाग का ताला खोला और बोला, अइसा है माई-बाप पहले इ बताओ कि हम अपना कितना बड्डे मना सकेंगे. जवाब आता है, बड्डे वड्डे छोड़ो, बस दो पल है तुमरे पास. इतना सुनना था कि सब कुछ छोड़-छाड़ के निकल लिए भारतवर्ष में और जपने लगे भगवान की माला. जुट गए परलोक सुधारने में. इधर की सुध-बुध भूले. इत्ता मन लगा लिए कि आत्मा ने शरीर को कब टाटा बोला पता नहीं चला. खट्वांग स्मार्ट थे. बी लाइक खट्वांग.
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