फ्रांस के मल्टीरोल फाइटर जेट विमान दसॉ रफाल (Dassault Rafale) को पिछले एक दशक में कई देशों ने खरीदा. हर बार सवाल उठा. किसे सस्ता मिला. किसे महंगा. और भारत की डील पर तो राजनीति भी खूब हुई.
Rafale के लिए क्या भारत ने इंडोनेशिया और मिस्र के मुकाबले ज्यादा कीमत चुकाई?
Dassault Rafale Fighter Jet: भारत को फ्रांस से 36 रफाल फाइटर जेट मिल चुके हैं. 114 रफाल जेट के खरीद की मंजूरी मिल चुकी है. रफाल के नौसेना वर्जन रफाल-M के खरीदने की भी बात हो रही है. मगर इन सबके बीच खबरें ऐसी भी आ रही हैं कि इस लड़ाकू विमान को खरीदने वाले दूसरे देशों जैसे कि इंडोनेशिया और मिस्र के मुकाबले भारत ज्यादा रकम चुका रहा है.


लेकिन अक्सर तुलना केवल कुल रकम देखकर की जाती है. जबकि रक्षा सौदे प्याज की तरह होते हैं. परत दर परत, अलग तथ्य- अलग कहानी. बेस विमान की अलग खूबियां. उसमें लगने वाले हथियारों की अलग खूबियां. ट्रेनिंग अलग- मेंटेनेंस अलग. और ऊपर से महंगाई का असर अलग.
इस लेख में हम रफाल खरीदने वाले चार देशों पर फोकस करेंगे. ये चार देश हैं भारत, कतर, मिस्र और इंडोनेशिया.
आगे बढ़ने से पहले हम ये साफ कर दें कि इस लेख के लिए डेटा लिया गया है आधिकारिक घोषणाओं, संसद में दिए गए बयानों, रक्षा मंत्रालय की प्रेस रिलीज, विमान कंपनी Dassault Aviation की वार्षिक रिपोर्ट और अंतरराष्ट्रीय एजेंसी Reuters की रिपोर्टिंग से. मतलब कुछ भी अंदाजा या तुक्केबाजी नहीं है.
ऐसे सौदों का समर्थन में अक्सर डील के समय की कीमत बनाम मौजूदा महंगाई दर का मुद्दा उठाया जाता रहा है. लिहाजा हमने तुलना के लिए पुराने सौदों को यूरोजोन की औसत महंगाई दर के आधार पर 2025 की महंगाई दर पर समायोजित किया है. महंगाई का डेटा निकालने के लिए हमने यूरोस्टेट HICP इंडेक्स से मदद ली है.
जब इतनी गहराई में जा ही रहे हैं तो लगे हाथों ये भी बता दें कि कीमत की गणना एक यूरो को 90 रुपये के बराबर मानकर की गई है.

तो चलिए शुरू करते हैं असली कहानी. क्या भारत को रफाल महंगा पड़ा है?
दो तरह की कीमतों का फंडाइस बात की गहराई में उतरने से पहले समझते हैं कि फ्लाई अवे कॉस्ट क्या होती है.
रक्षा सौदों में दो तरह की कीमत होती है. पहली, फ्लाई अवे कॉस्ट. यानी सिर्फ विमान-विमान की कीमत. बिना किसी हथियार (मिसाइल, गाइडेड बॉम्ब वगैरह), बिना लंबी मेंटेनेंस और बिना किसी अतिरिक्त पैकेज के.
दूसरी, कुल पैकेज कीमत. जिसमें मिसाइल, स्पेयर पार्ट, सिम्युलेटर, ट्रेनिंग, पांच से दस साल का सपोर्ट शामिल होता है. इस तरह की डील में कभी कभी स्थानीय उद्योग में निवेश भी शामिल होता है.
यही फर्क अक्सर महंगे-सस्ते को लेकर भ्रम पैदा करता है.
36 रफाल विमान और बड़ा विवादरफाल शब्द 2019 के लोकसभा चुनाव में एक बड़ा कीवर्ड था. जब इसकी कीमतों का मुद्दा बनाते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मोदी सरकार को घेरने की भरपूर कोशिश की थी. इन आरोपों के बैकग्राउंड में था सितंबर 2016 में भारत और फ्रांस के बीच हुआ, 36 रफाल फाइटर जेट्स का समझौता. भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय ने 23 सितंबर 2016 को जो प्रेस रिलीज निकाली, उसमें इस सौदे की पुष्टि की गई.
बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट में इस डील की कुल कीमत 7.87 अरब यूरो बताई गई. रुपये में ये कीमत उस समय यह करीब 59 हजार करोड़ रुपये बैठी थी.
इस रकम में क्या शामिल था5 फरवरी 2018 को रफाल सौदे पर राज्यसभा में तीखी बहस हुई. रफाल की कीमतों को लेकर कई सारे सवाल दागे गए. दावा किया गया कि एक रफाल विमान की कीमत लगभग 91 मिलियन यूरो यानी 819 करोड़ रुपये बताई गई. चर्चा का जवाब देते हुए उस वक्त की रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने गोपनीयता का हवाला देते हुए, कीमतों का ब्यौरा देने से इंकार कर दिया था. मगर ये जरूर बताया कि ये पूरी डील फ्रांस की सरकार और भारत सरकार के बीच सीधी हुई.
तत्कालीन रक्षामंत्री ने राज्यसभा को बताया कि सभी 36 रफाल फाइटर जेट फ्रांस में बनाए जाएंगे. और तैयार हालत में भारत को सौंपे जाएंगे. साथ ही विमानों में मेटेओर और स्कैल्प जैसी उन्नत मिसाइल, स्पेयर पार्ट, पायलट और सपोर्ट स्टाफ की ट्रेनिंग, भारतीय परिस्थितियों के हिसाब से विशेष सुधार और पांच साल का सपोर्ट भी शामिल था.

यूरोस्टेट HICP डेटा के मुताबिक 2016 से 2025 तक यूरोजोन में लगभग 21 प्रतिशत महंगाई हुई. उस हिसाब से 7.87 अरब यूरो को 2025 स्तर पर लाएं तो यह लगभग 9.5 से 9.6 अरब यूरो बैठता है. यानी करीब 85500 से 86400 करोड़ रुपये.
इस हिसाब से प्रति विमान कुल पैकेज कीमत 2025 के हिसाब से लगभग 265 से 270 मिलियन यूरो बैठती है. यानी करीब 2385 से 2430 करोड़ रुपये.
इसमें अगर फ्लाई अवे कीमत और महंगाई को जोड़ दिया जाए तो लागत बैठती है, करीब 110 मिलियन यूरो. यानी लगभग 990 करोड़ रुपये.
आगे बढ़ने से पहले बता दें कि भारत सरकार ने फ्रांस से 114 अतिरिक्त रफाल फाइटर जेट्स की खरीद को भी मंजूरी दे दी है. सवाल इस रफाल 2.0 डील पर भी उठ रहे हैं. क्या हैं वो सवाल और उनके जवाब जानने के लिए आप हमारी दूसरी रिपोर्ट पढ़ सकते हैं. शीर्षक है- राफेल घाटे का सौदा, अरबों देकर भी फ्रांस के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा, सरकार क्या मानती है? आपको बस लिंक पर क्लिक करना है.
हां तो अब मुद्दे पर वापस लौटते हैं और बात करते हैं कतर के रफाल डील की.
कतर: छोटी संख्या, भारी पैकेजजिस समय भारत ने फ्रांस से 36 रफाल की डील की. उससे एक साल पहले ही यानी 2015 में खाड़ी देश कतर ने भी फ्रांस को 24 रफाल फाइटर जेट्स का ऑर्डर किया था. फ्रेंच प्रेसीडेंशियल ऑफिस ने इस डील का बाकायदा ऐलान किया था.
4 मई 2015 को समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट में इस डील की कुल कीमत करीब 6.3 अरब यूरो बताई गई. भारतीय मुद्रा में बात करें तो करीब 56700 करोड़ रुपये.
कतर की डील और महंगाई…यूरोस्टेट HICP डेटा के मुताबिक 2015 से 2025 तक के बीच लगभग 25 प्रतिशत महंगाई में वृद्धि को मान लेते हैं. इस हिसाब से 6.3 अरब यूरो आज के लगभग 7.8 से 8 अरब यूरो के बराबर बैठता है. यानी करीब 70200 से 72000 करोड़ रुपये.
प्रति विमान लागत की बात करें तो लगभग 320 से 325 मिलियन यूरो. यानी करीब 2880 से 2925 करोड़ रुपये.
फ्रेंच सीनेट रक्षा समिति की 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक फ्लाई अवे कीमत उस समय लगभग 90 से 100 मिलियन यूरो के बीच थी. यानी करीब 810 करोड़ रुपये से लेकर 900 करोड़ रुपये के बीच.
आंकड़े देखकर साफ है कि कतर की प्रति विमान 320 से 325 मिलियन यूरो की कीमत भारत के 265 से 270 मिलियन यूरो की लागत से कहीं ज्यादा है. यानी कम से कम कतर के मुकाबले तो भारत ने अच्छा मोलभाव कर लिया.

फ्रांस के सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक मिस्र ने भी कतर के साथ ही 2015 में 24 रफाल खरीदे थे. ये दोनों देशों के बीच हुए रफाल डील की पहली कड़ी थी. समाचार एजेंसी रॉयटर्स की 16 फरवरी 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक 2015 के फ्रांस-मिस्र रफाल डील की कुल कीमत लगभग 5.2 अरब यूरो थी. भारतीय मुद्रा में करीब 46800 करोड़ रुपये.
मिस्र की पहली डील और महंगाई…भारत और कतर वाले फॉर्मूले के हिसाब से ही महंगाई जोड़कर कतर की पहली डील आज की तारीख में करीब 6.5 अरब यूरो की पड़ती है. यानी करीब 58500 करोड़ रुपये.
प्रति विमान लागत बैठती है लगभग 260 से 270 मिलियन यूरो. यानी करीब 2340 से 2430 करोड़ रुपये.
मिस्र की दूसरी डील 2021फ्रांस के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक 2021 में मिस्र ने 30 और रफाल खरीदे. 3 मई 2021 को छपी रॉयटर्स की रिपोर्ट में इसकी कीमत 3.75 से 4.5 अरब यूरो के बीच बताई गई. यानी भारतीय मुद्रा में 33750 से 40500 करोड़ रुपये.
इसमें 2021 से 2025 तक लगभग 15 प्रतिशत महंगाई जोड़ें. तो कुल कीमत 4.3 से 4.9 अरब यूरो, यानी 38700 से 44100 करोड़ रुपये बैठती है.
प्रति विमान लागत हुई 145 से 170 मिलियन यूरो. यानी लगभग 1305 से 1530 करोड़ रुपये.
यहां फर्क दिखता है. दूसरी डील सस्ती है. मुमकिन है कि कुछ इंफ्रास्ट्रक्चर पहले से मौजूद था. और हथियार पैकेज अलग था.
इंडोनेशिया: हाल की बड़ी खरीदइंडोनेशिया ने साल 2022 में 42 रफाल का अनुबंध किया. इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय ने इस डील को लेकर बड़े विस्तार से जानकारी दी. इस डील का उल्लेख Dassault Aviation की 2022 की वार्षिक रिपोर्ट में भी मिलता है.
रॉयटर्स और इंडोनेशिया की लोकल मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस डील की कुल कीमत लगभग 8.1 अरब यूरो थी. यानी करीब 72900 करोड़ रुपये.
अब इसमें 2022 से 2025 तक लगभग 10 प्रतिशत महंगाई जोड़ें. तो आज की तारीख में ये कीमत बैठती है करीब 8.9 अरब यूरो के आसपास. यानी करीब 80100 करोड़ रुपये.
प्रति विमान लागत की बात करें तो लगभग 210 से 220 मिलियन यूरो. यानी 1890 से 1980 करोड़ रुपये
जबकि फ्लाई अवे कीमत इस समय 100 से 110 मिलियन यूरो मानी जाती है. यानी करीब 900 से 990 करोड़ रुपये.

अगर 2025 के मूल्य और 1 यूरो बराबर 90 रुपये के हिसाब से तुलना करें तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है.
- कतर: लगभग 2900 करोड़ रुपये प्रति विमान
- भारत: लगभग 2400 करोड़ रुपये प्रति विमान
- मिस्र पहली डील: लगभग 2400 करोड़ रुपये प्रति विमान
- इंडोनेशिया: लगभग 1950 करोड़ रुपये प्रति विमान
- मिस्र दूसरी डील: लगभग 1400 से 1500 करोड़ रुपये प्रति विमान
फ्लाई अवे कॉस्ट लगभग सभी देशों में 900 से 1000 करोड़ रुपये प्रति विमान के बीच बैठती है.
तो क्या भारत को महंगा मिलासोशल मीडिया और वॉट्स ऐप यूनिवर्सिटी चाहे जो कहे. मगर आंकड़े कहते हैं कि नहीं. भारत का सौदा सबसे महंगा नहीं है. सबसे महंगी डील कतर को मिली. जबकि भारत और मिस्र पहली डील लगभग बराबर स्तर पर है. हां, इंडोनेशिया और मिस्र दूसरी डील अपेक्षाकृत सस्ती जरूर रही.
भारत की बेस एयरक्राफ्ट कीमत उस समय के अंतरराष्ट्रीय मानक के भीतर थी. फर्क पड़ा उन्नत हथियार पैकेज और लंबी अवधि के सपोर्ट कॉन्ट्रैक्ट के चलते.
भारत ने मेटेओर मिसाइल, स्कैल्प क्रूज मिसाइल और भारतीय जरूरतों के हिसाब से विशेष सुधार को डील में शामिल किया. इससे कुल पैकेज की लागत बढ़ गई. नतीजा, डील महंगी दिखने लगी.
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रफाल सौदे के असली सबकरक्षा सौदे को केवल कुल रकम से नहीं समझा जा सकता. इसमें तीन चीजें साथ देखनी होती हैं.
- पहला: फ्लाई अवे कॉस्ट.
- दूसरा: पैकेज संरचना.
- तीसरा: समय और महंगाई.
जब इन तीनों को साथ रखते हैं तो तस्वीर साफ होती है. भारत ने दुनिया में सबसे महंगा रफाल नहीं खरीदा. बल्कि एक ऐसा पैकेज चुना, जिसमें एडवांस हथियार और लंबी अवधि का सपोर्ट शामिल था.
इसलिए सवाल यह नहीं कि महंगा या सस्ता. सवाल यह है कि पैसे के बदले क्या मिला. वो कहते हैं ना वैल्यू फॉर मनी मिली या नहीं. और रक्षा सौदों में असली तुलना वहीं से शुरू होती है.
वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: भारत की रफाल डील से चीन-पाकिस्तान को बड़ा मेसेज?












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