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रफाल खरीद पर मुहर तो लग गई, मगर डील साइन होने में लगेगा एक साल! जानिए कब मिलेगा पहला फाइटर जेट

Rafale Fighter Jets Deal: जब भी भारत किसी देश से फाइटर जेट खरीदने की खबर आती है, तो लोगों को लगता है कि बस डील साइन हुई और विमान आ गए. लेकिन असल में Indian defence procurement process कई चरणों से गुजरती है, जिसमें RFI, RFP, ट्रायल, कीमत पर बातचीत, CCS मंजूरी और फिर निर्माण और डिलीवरी शामिल होते हैं.

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 Indian defence procurement process
किसी डिफेंल डील के साइन होने की प्रक्रिया बड़ी लंबी है. (तस्वीर- पीटीआई)
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दिग्विजय सिंह
16 फ़रवरी 2026 (अपडेटेड: 16 फ़रवरी 2026, 06:55 PM IST)
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जब भी खबर आती है कि भारत फलां देश से फाइटर जेट खरीदेगा, तो आम लोगों को लगता है कि बस पैसा दिया और जहाज आ गए. लेकिन असल प्रक्रिया लंबी और कई चरणों में बंटी होती है. इसे ऐसे समझिए जैसे घर बनाना. जमीन खरीदना एक कदम है. नक्शा पास कराना अलग. ठेकेदार चुनना अलग. फिर निर्माण. फिर हैंडओवर.

फाइटर जेट खरीद में भी यही होता है.

पहला चरण: जरूरत की पहचान

सबसे पहले सेना या वायुसेना या नौसेना अपनी जरूरत बताती है. इसे सर्विस क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट कहा जाता है. आसान भाषा में समझें तो वायुसेना बताती है कि उसे कैसा जहाज चाहिए. उस फाइटर जेट की रेंज कितनी होनी चाहिए. कितनी स्पीड हो तो ठीक रहेगा. कितने और किस-किस तरह के हथियार ले जा सकने क्षमता होनी चाहिए. किस तरह के रनवे या कैरियर पर उतर सके.

यह प्रक्रिया सालों ले सकती है.

दूसरा चरण: आरएफआई और आरएफपी

फिर रक्षा मंत्रालय कंपनियों या देशों से जानकारी मांगता है. इसे आरएफआई यानी रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन कहते हैं.

जब तस्वीर साफ हो जाती है तो आरएफपी यानी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी होता है. इसमें इंटरेस्टेड आपूर्तिकर्ता से पूछा जाता है कि आपकी कीमत क्या है. टेक्नोलॉजी क्या है. कितनी डिलीवरी टाइमलाइन है.

तीसरा चरण: ट्रायल और मूल्यांकन

फाइटर जेट को भारत में उड़ाकर देखा जाता है. गर्मी में, बहुत ज्यादा ऊंचाई पर, समुद्र के पास और रेगिस्तान के ऊपर.

मिसाल के तौरपर जब Rafale और अन्य जेट्स का ट्रायल हुआ था तो उन्हें अलग-अलग परिस्थितियों में परखा गया था. इस चरण में तकनीकी टीम रिपोर्ट बनाती है.

चौथा चरण: कीमत और बातचीत

यहीं सबसे ज्यादा समय लगता है. उस फाइटर जेट की कितनी कीमत है. इंटरनेशनल मार्केट के अनुरूप है या नहीं. क्या उसमें हथियार शामिल हैं. क्या स्पेयर पार्ट मिलेंगे. टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा या नहीं. ऑफसेट क्या होगा. यानी कंपनी भारत में कितना निवेश करेगी.

यहीं कई डील अटक जाती हैं.

पांचवां चरण: कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की मंजूरी

आखिरी राजनीतिक मंजूरी यहीं से मिलती है. इसके बाद कॉन्ट्रैक्ट साइन होता है.

छठवां चरण: निर्माण और डिलीवरी

कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के बाद भी विमान तुरंत नहीं आते. निर्माण लाइन में जगह लगती है. ट्रेनिंग शुरू होती है. पायलट और ग्राउंड स्टाफ तैयार होते हैं.

2016 में भारत और फ्रांस के बीच 36 रफाल का समझौता हुआ था. भारत सरकार की आधिकारी जानकारी के मुताबिक पहला विमान 2019 में मिला और अंतिम 2022 में.

यानी साइन से लेकर पूरी डिलीवरी में लगभग 5 से 6 साल लग सकते हैं.

अब 114 फाइटर जेट की बात

डिफेंस मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक एयरफोर्स के लिए 114 मल्टी रोल फाइटर जेट की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है. लेकिन कॉन्ट्रैक्ट साइन होने में 6 महीने से लेकर एक साल तक का समय लग सकता है.

ऊपर लिखी गई बातों को हम इस इंंफोग्राफिक्स के जरिए भी समझ सकते हैं.

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डिफेंस डील की लंबी प्रक्रिया

इसका मतलब साफ है. ऐलान और डिलीवरी के बीच लंबा अंतर सामान्य बात है.

अब दूसरी बड़ी तस्वीर: हथियारों का बदलता नक्शा

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (Stockholm International Peace Research Institute) यानी SIPRI हर साल वैश्विक हथियार व्यापार पर रिपोर्ट जारी करता है.

उनकी ट्रेंड इंडिकेटर वैल्यू रिपोर्ट बताती है कि 2010 से 2024 के बीच भारत का सबसे बड़ा सप्लायर रूस रहा. लेकिन हिस्सेदारी घटती गई.

आंकड़े क्या कहते हैं

SIPRI फैक्टशीट 2024 के अनुसार, 2010-14 के बीच भारत के कुल हथियार आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत थी. 2015-19 में यह घटकर लगभग 56 प्रतिशत हुई. 2020-24 में यह और गिरकर करीब 36 प्रतिशत रह गई.

वहीं फ्रांस की हिस्सेदारी इसी अवधि में बढ़ी और 2020-24 में लगभग 33 प्रतिशत तक पहुंच गई. अमेरिका और इजरायल की हिस्सेदारी 5 से 15 प्रतिशत के बीच उतार-चढ़ाव करती रही.

इसे आसान भाषा में समझते हैं. पहले भारत हर 10 में से 7 बड़े हथियार रूस से लेता था. अब हर 10 में से लगभग 3 से 4 ही रूस से आते हैं. 

यानी रूस पर निर्भरता कम हुई है. जबकि फ्रांस अब लगभग बराबरी पर है.

किस देश से क्या लेते हैं

अब जरा एक नजर इस बात पर डाल लेते हैं कि भारत किस देश से कितना हथियार लेता है.

रूस: रूस हमारा सबसे पुराने आर्म्स सप्लायर्स में शामिल रहा है. भारत अपनी तीनों सेनाओं के लिए कई अहम और जरूरी हथियार रूस से लेता है.

जिसमें मुख्य रूप से Su-30MKI फाइटर जेट, S-400 एयर डिफेंस सिस्टम और T-90 टैंक शामिल है.

इसके अलावा दोनों देश साथ मिलकर ब्रह्मोस हाइपरसोनिक मिसाइल का उत्पादन भी करते हैं.

फ्रांस: आज के दौर में फ्रांस तेजी से भारत का मुख्य रक्षा सहयोगी बनकर उभरा है. फ्रांस से हम फिलहाल जो अहम हथियार खरीद रहे हैं, उनमें Rafale फाइटर जेट और स्कॉर्पीन पनडुब्बी प्रोजेक्ट शामिल हैं.

अमेरिका: बुश से लेकर ओबामा और बाइडेन से लेकर ट्रंप तक, भारत यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका (USA) से भी हथियारों की खरीद करता रहा है.

फिलहाल भारत जिन अमेरिकी सैन्य साजो-सामान की खरीद कर रहा है, उसमें P-8I समुद्री निगरानी विमान, Apache हेलिकॉप्टर और Chinook हेलिकॉप्टर शामिल हैं.

इजरायल: करगिल की लड़ाई से लेकर ऑपरेशन सिंदूर तक, इजरायली साजो सामान ने भारतीय सेनाओं का जमकर साथ दिया है. इजरायल से रक्षा तकनीकी के क्षेत्र में भी काफी सौदे होते हैं.

जिन प्रमुख इजरायली हथियारों की खरीद भारत करता है, उनमें ड्रोन, मिसाइल सिस्टम और रडार शामिल हैं. आगे बढ़ने से पहले ये बता दें कि यह सूची SIPRI डेटाबेस और भारत सरकार की रक्षा खरीद सूचनाओं पर आधारित है.

रूस से दूरी क्यों बढ़ी

आम भारतीय जनमानस में ये भावना है कि रूस ने हर मुश्किल वक्त में भारत का साथ दिया है. 1971 की जंग इसके उदाहरण के तौरपर देखी जाती है. अगर ऐसा है तो फिर सवाल उठता है कि आखिर रूस से हथियार खरीदना हम कम क्यों करते जा रहे हैं.

इसके एक नहीं बल्कि कई जवाब हैं. आइये एक-एक करके सभी जवाबों से रूबरू होते हैं.

  1. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद सप्लाई चेन दबाव
  2. स्पेयर पार्ट में देरी
  3. भारत की नीति. एक देश पर ज्यादा निर्भर नहीं रहना
फ्रांस से क्यों बढ़ी हथियारों की खरीद

हाल के वर्षों में भारत और फ्रांस तेजी से रक्षा सहयोग के क्षेत्र में एक-दूसरे के नजदीक आए हैं. दोनों देशों का बढ़ता रक्षा व्यापार इसकी मिसाल है.

अब सवाल उठता है कि आखिर इस नजदीकी के पीछे की वजह क्या है? इस सवाल के भी एक से ज्यादा जवाब हैं, मिसाल के तौर पर,

  1. टेक्नोलॉजी ट्रांसफर
  2. ऑफसेट निवेश
  3. राजनीतिक रूप से स्थिर साझेदारी
  4. इंडो-पैसिफिक में सहयोग
अमेरिका और इजरायल क्यों अहम

वक्त-बेवक्त अमेरिकी सरकारों की नीतियों में बदलाव के बावजूद भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक रिश्ते मजबूत हुए हैं. खासकर समुद्री निगरानी और हेलिकॉप्टर के क्षेत्र में.

वहीं इजरायल तेज डिलीवरी और हाई-टेक सिस्टम के लिए जाना जाता है.

ये भी पढ़ें: राफेल घाटे का सौदा, अरबों देकर भी फ्रांस के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा, सरकार क्या मानती है?

चीन और पाकिस्तान का असर

चीन तेजी से अपनी नौसेना और एयरफोर्स मजबूत कर रहा है. वहीं पाकिस्तान भी चीन से JF-17 और अन्य सिस्टम लेता रहता है.

इस क्षेत्रीय संतुलन ने भारत को अपनी खरीद नीति में विविधता लाने के लिए मजबूर किया है.

पिछले कुछ सालों की कहानी

SIPRI के आंकड़े बताते हैं कि 2013-14 तक जहां रूस हमे सबसे ज्यादा हथियार आपूर्ति करता था. वो आंकड़ा 2024 आते-आते काफी कम हो गया है. इसे हम चार्ट के जरिए भी समझ सकते हैं.

अवधिरूसफ्रांसअमेरिकाइजरायल
2010-1470%5%8%6%
2015-1956%14%12%10%
2020-2436%33%10%7%

स्रोत. SIPRI Arms Transfers Database 

इस बीच भारत और फ्रांस के कुछ डिफेंस पोर्टल्स पर जो 31 अतिरिक्त रफाल-एम की खबर आई थी. रक्षा मंत्रालय के सूत्र फिलहाल उसे पूरी तरह गलत बता रहे हैं. हां, 114 फाइटर जेट की प्रक्रिया जरूर चल रही है. लेकिन साइन होने में वक्त लगेगा. 

बड़ी तस्वीर यह है कि भारत की रक्षा खरीद अब मल्टीपोलर हो चुकी है. रूस अब भी अहम है. लेकिन फ्रांस तेजी से आगे आया है. अमेरिका और इजरायल विशेष क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हैं.

यह बदलाव सिर्फ हथियारों का नहीं है. यह विदेश नीति, रणनीति और क्षेत्रीय संतुलन का संकेत है. और सबसे अहम बात. किसी भी फाइटर जेट की खबर सुनते समय याद रखिए. ऐलान और आसमान में उड़ान के बीच कई सालों की दूरी होती है. 

वीडियो: राफेल फाइटर जेट्स के खिलाफ चीन अब ये साज़िश रच रहा है

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