The Lallantop

नागालैंड में तख्तापलट हो गया है, आपको पता चला?

बिना विपक्ष वाली विधानसभा में लाचार मुख्यमंत्री की कहानी.

Advertisement
post-main-image
अमित शाह के साथ नागालैंड के सीएम टी आर ज़ीलियांग. (फोटोःपीटीआई)
नागालैंड में चल रहा पॉलिटिकल ड्रामा आखिर अपने क्लाइमैक्स की ओर बढ़ने लगा है. मुख्यमंत्री शुरहोजिली लाइजितसू ने लाख कोशिश की फ्लोर टेस्ट टालने की, लेकिन वो 19 जुलाई को होकर रहा. उनके पास एक ही रास्ता बचा था कि वो विधानसभा के विशेष सत्र में आएं ही नहीं. उन्होंने वही किया. इसके बाद टी आर ज़ीलियांग 5 महीने के अंदर दोबारा नागालैंड के मुख्यमंत्री बन गए.
लेकिन ये नौबत कैसे आई कि 60 सीटों वाली विधानसभा में 45 विधायकों वाली पार्टी से आने वाला एक मुख्यमंत्री फ्लोर टेस्ट के वक्त इतना लाचार हो जाता है? वो भी एक ऐसी विधानसभा में, जहां विपक्ष है ही नहीं.
 

 

फ्लोर टेस्ट जान लीजिए

मुख्यमंत्री बनने के लिए आपको विधानसभा में साबित करना होता है कि 50% से ज़्यादा विधायक आपको अपना नेता मानते हैं. इसको फ्लोर टेस्ट कहा जाता है. विधानसभा की कार्यवाही में इसकी मांग की जा सकती है. इसे विश्वास मत या मोशन ऑफ कॉन्फिडेंस कहा जाता है. मुख्यमंत्री रहते हुए अगर आप फ्लोर टेस्ट नहीं जीत पाते, तो आपकी कुर्सी चली जाती है.
 
शुरहोजिली लाइजितसू (फोटोःपीटीआई)
शुरहोजिली लाइजितसू (फोटोःपीटीआई)

 

हालिया ड्रामे की जड़ में दो कानून हैं

#1. 1963 में नागालैंड असम से अलग होकर देश का 16वां राज्य बना. राज्य बनाते वक्त देश के संविधान में आर्टिकल 371 A जोड़ा गया. इसमें ये छूट दी गई कि भारत की संसद का कोई ऐसा कानून जो ‘नागा परंपराओं’ के खिलाफ जाता हो, बिना नागालैंड की विधानसभा की मर्ज़ी (बिना संकल्प पारित हुए) के नागालैंड में लागू नहीं होता. ये नियम सिविल और क्रिमिनल दोनों तरह के मसलों से जुड़े हो सकते हैं.
#2. फिर आया 1993. इस साल संविधान में आर्टिकल 243 - T जोड़ा गया. इसके मुताबिक देश भर के म्यूनिसिपल काउंसिल (नागरिक निकाय) के लिए होने वाले चुनावों में औरतों के लिए 33% आरक्षण होगा. इस से गड़बड़ हो गई. काहे कि नागालैंड में वैसे तो मातृसत्ता की परंपरा है, जेंडर जस्टिस को लेकर भी माहौल बाकी देश की बनिस्बत बेहतर है, लेकिन यहां के मर्द औरतों को राजनीति में पसंद नहीं करते. तो 243 T उनके गले नहीं उतरा.

फिर शुरू हुई भसड़

2012 में यहां की विधानसभा ने एक प्रस्ताव पारित कर दिया कि भैया, हम तो औरतों को 33 फीसदी आरक्षण नहीं मिलने देंगे. लेकिन नागालैंड में नागा मदर्स असोसिएशन (NMA) नाम की संस्था ने इस थेथरई के खिलाफ आवाज़ उठाई. वो मामला गुआहाटी हाई कोर्ट ले गए. वहां बात नहीं बनी, तो सुप्रीम कोर्ट तक गए. 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नागालैंड में लोकल बॉडी के लिए होने वाले चुनाव 243 -T के तहत हो सकते हैं.
 
Untitled-design-32_050217-101601

 
अब सरकार को मजबूरी में 2012 वाला अपना रेज़ोल्यूशन वापस ले लिया. टीआर ज़ीलियांग ने कहना शुरू किया कि महिलाओं को आरक्षण देना नागा परंपराओं का उल्लंघन नहीं है क्योंकि म्यूनिसिपल काउंसिल की अवधारणा (कंसेप्ट) ही नई है. फरवरी 2017 में चुनाव करवाना तय हो गया. इससे नागा जनजातियों की पैरेंट बॉडी नागा होहो को जम के मिर्ची लग गई. टेंशन बढ़ने लगा. धमकी दी गई कि चुनाव हुए तो नागालैंड बंद कर देंगे.
नागालैंड में चर्च का बड़ा प्रभाव है. 30 जनवरी, 2017 को नगालैंड बैपटिस्ट काउंसिल ने नागालैंड सरकार और ज्वाइंट कोऑर्डिनेशन कमेटी के बीच सहमति बनाई. इसमें तय किया गया कि जनजातीय परिषदें अपना विरोध-प्रदर्शन बंद कर देंगी और सरकार भी चुनावों को दो महीनों के लिए टाल देगी. एक फ़रवरी को चुनाव विरोधी ज्वाइंट कोऑर्डिनेशन कमेटी (जेसीसी) ने नागालैंड बंद का निर्णय वापस ले लिया. लेकिन 31 जनवरी को नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) सरकार, जिसमें बीजेपी भी शामिल है, ने चुनाव रोकने के फैसले को वापस ले लिया. और समझौते को नजरअंदाज़ कर दिया. इससे वहां उपद्रव शुरू हो गया. कई इलाके बंद हो गए. कर्फ्यू जैसे हालात बन गए. इस हिंसा में लोग मारे गए.
 
nagaland-2_ie-archive_050217-103731-600x334

 

अब 'सरकार' डरने लगी

अब नागालैंड के विधायकों को लगने लगा कि सरकार के निर्णय के साथ खड़े दिखने का खामियाज़ा उन्हें अपना वोट बेस खोकर भुगतना पड़ेगा. तो फरवरी 2017 के दूसरे हफ्ते में एनपीएफ के 40 विधायकों ने एनपीएफ के अध्यक्ष शुरहोजिली को एक चिट्ठी लिख कर ज़ीलियांग को हटाने की मांग कर दी. कहा कि ज़ीलियांग हिंसा से निपटने में नाकामयाब रहे हैं.
कहा गया कि एक साल पहले पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते पार्टी से निकाले गए तीन बार के सीएम और नागालैंड के इकलौते सांसद नेफ्यू रियो को पार्टी में वापस लेकर ज़ीलियांग की कुर्सी दे दी जाए. मज़े की बात ये थी कि ज़ीलियांग को कुर्सी तभी मिली थी जब रियो ने छोड़ी थी. 2014 में रियो सांसदी का चुनाव जीतकर दिल्ली चले गए थे. जाते हुए अपनी जगह ज़ीलियांग को बैठा कर गए थे.
 
नेफ्यू रियो
नेफ्यू रियो

 
ज़ीलियांग से इस्तीफा ले लिया गया. लेकिन रियो दिल्ली में ही रहे. 22 फरवरी को नागालैंड के 11 वें सीएम बने एनपीएफ के अध्यक्ष शुरहोजिली लाइजितसू.

लेकिन ज़ीलियांग शांत नहीं बैठे, बदला लिया

ज़ीलियांग ने जबरन हुए इस्तीफे को पचाया नहीं. वो लाइजजितसू की कुर्सी को लात मारने का मौका तलाशते रहे. जैसे ही उनका 'कैलकुलेशन' फिट बैठा, उन्होंने 8 जुलाई को नागालैंड के गवर्नर पीबी आचार्य को एक चिट्ठी लिख कर कह दिया कि शुरहोजिली से ज़्यादा विधायकों का समर्थन उनके पास है.
गवर्नर ने लाइजितसू से फ्लोर टेस्ट करा लेने को कहा. साथ में ये भी जोड़ा कि उन्हें विश्वास है कि ज़ीलियांग के पास ही ज़्यादा विधायक हैं. लाइजितसू समझ गए थे कि ज़ीलियांग ने फ्लोर टेस्ट की बात उठाई ही इसलिए है कि उन्हें अपनी जीत पर ज़रा भी शुबहा नहीं. तो वो अपनी कुर्सी बचाने के लिए फ्लोर टेस्ट के खिलाफ गुवाहाटी हाई कोर्ट से स्टे ले आए. लेकिन 18 जुलाई, 2017 को कोर्ट ने कहा कि आपके पास विधायक हैं तो फ्लोर टेस्ट में उसे साबित भी कर दें.
 
नागालैंड गवर्नर पी बी आचार्य
नागालैंड गवर्नर पी बी आचार्य

 
तो 19 जुलाई को फ्लोर टेस्ट कराना तय किया गया. ज़ीलियांग अपने साथ 43 'बाग़ी' विधायकों को लेकर पहुंचे. इसी से तय हो गया कि बागी अगर कोई है तो वो लाइजितसू खुद हैं. क्योंकि उनकी पूरी की पूरी फौज ही दूसरे खेमे में चली गई थी. वो विधानसभा नहीं आए. इसलिए फ्लोर टेस्ट नहीं हो पाया और स्पीकर ने सदन अनिश्चिकाल के लिए स्थगित कर दिया.
लेकिन सब-कुछ इतना अनिश्चित भी नहीं था. फ्लोर टेस्ट का नहीं होना ही असल फ्लोर टेस्ट था. 43 विधायकों के साथ ज़ीलियांग की जीत तय थी. इसके अलावा उन्हें 4 भाजपा विधायकों से भी समर्थन मिला हुआ था. तो फ्लोर टेस्ट से पहले ही ज़ीलियांग का मुख्यमंत्री बनना तय हो गया था.
 
टी आर ज़ीलियांग (दाएं) को शपथ दिलाते नागालैंड के गवर्नर पीबी आचार्य (फोटोःएएनआई)
टी आर ज़ीलियांग (दाएं) को शपथ दिलाते नागालैंड के गवर्नर पीबी आचार्य (फोटोःएएनआई)

 
पूरा पूर्वोत्तर सीसमिक ज़ोन 5 में आता है. माने भूकंप के वक्त वहां ज़मीन बहुत ज़ोर से हिल सकती है. असल ज़मीन को हिले अभी कुछ वक्त बीत गया है. लेकिन राजनीति की ज़मीन के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता. वो पिछले कुछ महीनों से लगातार हिल रही है. बस एक फर्क आया है. 'भूकंप' का केंद्र अरुणाचल की जगह नागालैंड हो गया है.
 


ये भी पढ़ेंः

इस प्रदेश में सीएम हिंसा न रोक पाए, विधायक अब सीएम बदल देना चाहते हैं

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement

इस राज्य में औरतों की चलती है, लेकिन पॉलिटिक्स में नहीं

इन्हें औरतों के आरक्षण से दिक्कत है, सरकार को धमकी दी है

Advertisement
Advertisement