किसी चिंपैंजी की क्रेनियल कैपेसिटी या दिमागी क्षमता कुछ 400 क्यूबिक सेंटीमीटर या सीसी होती है. वहीं हम इंसानों के लिए यह क्षमता करीब चार गुना ज्यादा, 1400 सीसी होती है. 8 हजार करोड़ न्यूरॉन्स से ज्यादा वाला इंसानी दिमाग जो आज भी वैज्ञानिकों के लिए पहेली बना हुआ है. ये कैसे काम करता है, वो पहेली तो है ही. पर ये क्या-क्या काम करता है या कहें करवाता है, ये भी एक मसला है. कभी हजारों इंसानों ने मिलकर पिरामिड बनाए. कभी मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसी सभ्यताएं बसाईं.
महाकुंभ: मकरसंक्रांति पर पहला शाही स्नान, मगर इन अखाड़ों का इतिहास क्या है?
Mahakumbh 2025: कुंभ में आकर्षण के सबसे बड़े केंद्र अखाड़े होते हैं, सबसे ज्यादा चहल-पहल और रौनक मेले में अखाड़ा मार्ग पर होती है. इस बार Prayagraj में लगे महाकुंभ में सभी अखाड़े पहुंच चुके हैं.


सवाल ये कि बाकी जानवरों से इतर, इंसान इतना बेहतरीन तालमेल कैसे रखते हैं. हम कैसे बिना किसी को जाने पहचाने उससे जुड़ पाते हैं. कैसे 20 करोड़ लोग, एक दूसरे को बिना जाने नदियों के संगम पर इकट्ठा होते हैं. जवाब मिलता है साझा विश्वास और मान्यताओं से. विश्वास ये कि देवताओं ने समुद्र मंथन किया, अमृत निकला. जिसे लेकर देवताओं और असुरों में छीना झपटी हुई. कुछ बूंदे धरती पर गिरीं और उन्हीं जगहों पर कुंभ का आयोजन होता है. मान्यताओं के मुताबिक, ये चार जगहें, हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन हैं. इन्हीं में से एक प्रयाग में इस साल कुंभ फिर से लगने वाला है. यूं तो माघ मेला हर साल लगता है, लेकिन 12 साल में लगने वाले कुंभ का ये बरस खास बताया जा रहा है.

144 सालों बाद बनने वाले कुछ खास तिथियों की वजह से. ये है दुनिया का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण जमावड़ा. दस-बीस लाख नहीं, करोड़ों लोग एक जगह पर इकट्ठा होंगे. साल 2019 की बात करें, तो कुछ 20 करोड़ से भी ज्यादा लोगों ने इस जमावड़े में हिस्सा लिया था. इस साल के लिए इससे दोगुने का अनुमान है. कुंभ में आकर्षण के सबसे बड़े केंद्र अखाड़े होते हैं, सबसे ज्यादा चहल-पहल और रौनक मेले में अखाड़ा मार्ग पर होती है. सबसे ज्यादा VIP मूवमेंट भी यहीं होता है. अखाड़ों से जुड़ी लाखों करोड़ों लोगों की श्रद्धा है, साथ ही इनका अपना रहस्य और तिलिस्म भी. तो समझते हैं कि ये अखाड़े कब और कैसे बने? मठों और अखाड़ों में क्या फर्क है? इनमें शामिल होने के लिए क्या करना पड़ता है? संन्यासियों और वैरागियों में क्या फर्क है?

इस साल प्रयाग में लगने वाला कुंभ खास है. क्योंकि यह 12 महाकुंभों के बाद आने वाला है. यानी 144 साल बाद. इसे पूर्ण महाकुंभ कहा जाता है. कुंभ आयोजन में बड़ी भागीदारी 13 अखाड़ों की रहती है. इनमें से कुछ बड़े अखाड़े हैं. जिनसे हजारों की संख्या में साधु जुड़े हैं. वहीं कुछ छोटे हैं. कुछ शैव परंपरा के हैं, तो कुछ वैष्णव.
अखाड़ेजेम्स जी गॉचफेल्ड, इलस्ट्रेटेड इंसाइक्लोपीडिया ऑफ हिंदुइज्म में जिक्र करते हैं,
अखाड़ा शब्द का मतलब कुश्ती अखाड़े से जुड़ा है. जो 1980 के दशक में बंदूकों के बढ़ने के बाद चलन से कुछ बाहर हो गए. यानी अखाड़े महज कुश्ती से दूर होते गए. पहले ये अखाड़े योद्धा संन्यासियों का केंद्र हुआ करते थे जो कि रजवाड़ों और उनके दरबार से करीबी रखते थे. हालांकि अब हिंदुओं के समूहों के तौर पर, यह कुंभ मेले के आयोजन में अहम भूमिका निभाते हैं. सभी 13 अखाड़े कुंभ में जमा होते हैं. ये मिलकर अखाड़ा परिषद बनाते हैं जो कुंभ में इकट्ठा होते हैं. कुंभ में स्नान और नागा साधुओं के दर्शन के लिए दुनियाभर से लोग आते हैं.
अब अखाड़ा परिषद की बात करें, तो इसमें 26 सदस्य होते हैं. यानी 13 अखाड़ों में से 2-2 प्रतिनिधि. इसमें एक अध्यक्ष भी चुने जाते हैं और एक महामंत्री भी. वहीं अखाड़ों का प्रतिनिधि आचार्य करते हैं. इन 13 अखाड़ों में से सात अखाड़े शैव परंपरा या शिव के अराधक. जैसे जूना,महानिर्वाणी, निरंजनी वगैरा. तीन अखाड़े वैष्णव परंपरा के निर्वाणी, निर्मोही और दिगंबर. दो उदासीन और एक निर्मल. इनके अपने नियम कायदे हैं. अपनी परंपराएं हैं. और अपना इतिहास भी है. आपसी मतभेद भी हैं. और इससे जुड़े विवाद भी हैं. इसके अलावा नागा साधुओं का भी अपना रक्तरंजित इतिहास रहा है. लड़ाइयां रही हैं. लेकिन अखाड़ों के जिक्र के साथ कई नाम भी आने वाले हैं. जैसे मढ़ी, मठ, दशनामी, वगैरह. इसलिए अपनी सुविधा के लिए मामला शुरुआत से समझते हैं.
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषदशैव अखाड़े - ( दशनामी या संन्यासी) महानिर्वाणी, जूना, निरंजनी, आवाह्न, अटल, आनंद, अग्नि
वैष्णव अखाड़े- (बैरागी) निर्मोही, निर्वाणी, दिगंबर
सिख-शैव अखाड़े- बड़ा उदासीन, नया उदासीन, निर्मल अखाड़ा
अखाड़ेअखाड़ों का इतिहास आदि शंकराचार्य से जुड़ा बताया जाता है जो शुरुआत में उनके बनाए चार धार्मिक केंद्रों से जुड़े थे. पर सवाल ये कि देशभर में अलग-अलग जगह बिखरे साधु-संन्यासियों को एक छतरी में कैसे लाया गया. इसे समझने के लिए पहले दशनामी परंपरा को समझते हैं. यदुनाथ सरकार की किताब, अ हिस्ट्री ऑफ दशनामी नागा संन्यासी के मुताबिक, यह कहना ज्यादा सही होगा कि शंकराचार्य दशनामी परंपरा की प्रेरणा थे. इन्होंने अपने अनुयायियों के साथ मिलकर, बिखरे हुए सन्यासियों के समूहों को एक किया जो कि वैदिक काल से जाने जाते रहे हैं. फिर इन्हें एक केंद्रीय व्यवस्था के भीतर लाया गया.
अलग-अलग संन्यासियों को समूहों में व्यवस्थित करने का काम किया गया. वहीं संन्यास की परंपरा आज से नहीं है. मोह माया छोड़कर भ्रमण करने वाले साधुओं का जिक्र वेदों में भी मिलता है. लेकिन तब इनके समूहों में कोई नियम नहीं होते थे. ऐसे में किसी सिस्टम या अनुशासन की कमी के चलते बदलाव जरूरी थे. शुरुआती बदलाव जैन और बौद्ध में आए. जैसा कि फ्रेंच स्कॉलर डे ला वेले जिक्र करते हैं.
ईसा से कुछ 8वीं-6वीं सदी पहले, कई धर्म गुरुओं ने भ्रमण और घुमंतू जीवन को नियमित करने के प्रयास किए. ये गुरु नैतिक और बौद्धिक होते थे. मोक्ष के रास्ते पर चलते थे. ये सभाएं आयोजित करने में निपुण थे.
वेले आगे इन धर्म गुरुओं के कामों का जिक्र भी करते हैं. इनका एक काम था कि ये संयासियों को जीवन के नियमों के मुताबिक समूहों में बांटें. इनकी प्रथाओं जैसे तपस्या और योग को आध्यात्मिक मायने दें. माने एक सन्यासी जो अब तक स्वयं के मुताबिक चलता था, उसे एक संगठित निकाय का सदस्य बनना पड़ता. साथ ही उसे संगठन के नियमों के मुताबिक खुद को ढालना पड़ता. यहां ला वेले - महावीर और बुद्ध के संदर्भ में बात कर रहे थे कि कैसे महावीर और बुद्ध ने जैन और बौद्ध धर्म में कुछ नियम बनाए, जिन्हें उनके अनुयायी मानते और उनके मुताबिक चलते. पर ऐसा ही कुछ आदि शंकराचार्य ने भी किया. शैव के अद्वैत की दस शाखाओं को उन्होंने संगठित किया. जिन्हें दशनामी यानी दस नामों से भी जाना जाता है. यही आगे जाकर अखाड़ों से जुड़े. ये उन दस नामों के ऊपर हैं जिनकी दीक्षा सन्यासी ग्रहण करते. मसलन: पुरी (शहर), भारती (सीखने वाला) , वन, अरण्य (जंगल), पर्वत, सागर, तीर्थ, गिरि, आश्रम और सरस्वती.
बकौल यदुनाथ, सभी इस परंपरा को नहीं मानते. जैसे कि आदि शंकराचार्य के चार प्रत्यक्ष अनुयायी, जिन्हें उन्होंने चार मठों पर नियुक्त किया. ये कुछ इस प्रकार थे.
दक्षिण- हस्त मलक नाम से प्रसिद्ध पृथ्वीधर आचार्य के अंतर्गत श्रृंगेरी मठ. इससे दशनामी की पुरी, भारती और सरस्वती शाखाएं जुड़ी रही हैं. यानी दीक्षा के बाद गोस्वामियों को यह नाम दिए जाते.
पूर्व- जगन्नाथ पुरी का गोवर्धन मठ. जिसका जिम्मा मिला पद्मपद आचार्य. इन्हें सनंदन की संज्ञा भी गई. वहीं इस मठ से बन और अरण्य शाखाएं जुड़ी रही हैं.
उत्तर- ज्योतिर्मठ, हिमालय की गोद में मौजूद बद्री-केदारनाथ. ये रहा गिरी या त्रोतक आचार्य की छाया में. और गिरी, प्रभात और सागर शाखाएं इससे जुड़ी रही हैं.
पश्चिम- शारदा मठ, द्वारका. स्वरूप आचार्य की देखरेख में. तीर्थ और आश्रम शाखाएं इस मठ के जिम्मे थीं.

समय के साथ दशनामी के चार मठों ने कुछ नियमावली भी बनाई जिनकी संख्या 52 है. मोटा-माटी इसका मतलब आरंभ केंद्र से है. वहीं एक मठ केवल एक मढ़ी से जुड़े संन्यासियों को ले सकता है. जबकि सभी 52 या इससे कम अखाड़ों के सदस्य बन सकते हैं. मूलतौर पर 52 मढ़ियां कुछ ऐसे बंटी थीं, गिरी में 27, पुरी में 16, भारती में 4, वन में 4.
इन दस नामों में से तीर्थ, आश्रम, सरस्वती और आधे भारती को दंडी संन्यासी भी कहा जाता है. दंडी संन्यासियों का नाम उस डंडे या छड़ी से आता है जो इन्हें तपस्वी दीक्षा के तौर पर दी जाती है. इसे वो जीवन भर तपस्वी संयम के प्रतीक के तौर पर रखते हैं. इसकी पवित्रता का खास ध्यान रखा जाता है. ये हमेशा जमीन से ऊपर रखा जाता है. दशनामी शाखाओं में दंडी उनमें से हैं, जो ब्राह्मणों को दीक्षित करते हैं. वहीं बाकी बचे छह और आधे समूह खुद को गोसाईं कह सकते हैं.
दशनामी साधुओं की परंपराएंजैसा कि व्यास लिखते हैं, जीवन के तीन पड़ावों- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, या वनप्रस्थ में से कोई भी मनुष्य अगर दुनियावी इच्छाओं से मन हटा ले तो उसे भ्रमण करने वाले योगी की शरण ले लेनी चाहिए. A History Of Dasnami Naga Sanyasis के मुताबिक, शुरुआत ऐसे होती है. जब कोई शख्स संन्यास आश्रम में जाने का मन बना लेता है. तब वह संन्यासी बनने के पीछे का कारण किसी संन्यासी संस्थान के मुखिया या आचार्य को बताता है. परीक्षा के बाद योग्य होने की अनुमति उसे दे दी जाती है. फिर उसे कई अनुष्ठानों से होकर गुजरना पड़ता है. सबसे पहले शरीर को पवित्र करने के लिए चार तपों को किया जाता है. फिर वह संकल्प करते हैं. उसी दिन वह स्नान करते हैं. संध्या प्रार्थना करके भगवान की आराधना करते हैं. फिर किसी नदी या जलाशय में जाकर श्राद्ध करते हैं.
अखाड़ों के आधार पर साधुओं को अलग नाम भी दिए जाते हैं. अब अगर शैव अखाड़ों की बात करें, तो इसने साधुओं के दशनामी या सन्यासी भी कहा जाता है. निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरी के मुताबिक, संन्यासी की शिखा और सूत्र नहीं होते. माने वो चोटी नहीं रखते और जनेऊ नहीं पहनते. उनका अपना पिंड दान हो जाता है. जीते जी वो अपना पिंड दान कर लेते हैं. उनके सारे कर्म हो जाते हैं. इनका अग्नि संस्कार नहीं होता. ये भू समाधि और जल समाधि में जाते हैं. ये सात शैव अखाड़े हैं.
-जूना
-महानिर्वाणी
-निरंजनी
-अटल
-आनंद
-आवाह्न
-अग्नि
वहीं वैष्णव अखाड़े तीन हैं.
-निर्वाणी
-निर्मोही
-दिगंबर
इनके साधुओं को बैरागी की संज्ञा दी जाती है. ये शिखा और सूत्र रखते हैं. इन दस अखाड़ों के अलावा, दो अखाड़े उदासियों के हैं. जो सिख परंपरा से जुड़े रहे हैं. ये हैं बड़ा अखाड़ा उदासीन, नया अखाड़ा उदासीन और एक निर्मल अखाड़ा. इस तरह कुछ तेरह अखाड़े बनते हैं. जो अलग-अलग आराध्यों के उपासक होते हैं.
वीडियो: तारीख: कहानी महाकुंभ में आने वाले अखाड़ों की











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