कल्पना कीजिए एक जादुई दुनिया की. जहां जादूगरों के पास ऐसी शक्तियां हैं जिनसे वे किसी को भी पल भर में मार सकते हैं, पागल बना सकते हैं या अपनी मर्जी का गुलाम बना सकते हैं. लेकिन उस दुनिया में भी कुछ नियम हैं. कुछ जादू ऐसे हैं जिन्हें “वर्जित श्राप” कहा जाता है. अगर कोई जादूगर उनका इस्तेमाल करता है तो सीधे जेल.
हैरी पॉटर के ‘वर्जित श्राप’ जैसे 10 हथियार, जिनसे डरती है दुनिया, कुछ का नाम ईरान की जंग में भी!
ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच मिडिल ईस्ट में चल रही जंग के दौरान दो नामों ने पूरी दुनिया को डरा दिया. पहला ईरान के कथित 'क्लस्टर बम मिसाइल' और दूसरा लेबनान पर इजरायल का कथित 'सफेद फास्फोरस' अटैक. युद्ध के दौरान भी कुछ अंतरराष्ट्रीय नियम होते हैं और कई खतरनाक हथियारों पर दुनिया ने प्रतिबंध लगाया है. इस एक्सप्लेनर में जानिए जैविक हथियार, रासायनिक गैस, क्लस्टर बम, सफेद फास्फोरस और वैक्यूम बम जैसे 10 हथियारों के बारे में. साथ ही समझिए मिडिल ईस्ट के संघर्ष में इन हथियारों को लेकर क्यों बढ़ रही है वैश्विक चिंता और अगर इनका इस्तेमाल होता है तो उसे युद्ध अपराध क्यों माना जाता है.


कुछ याद आया? जी हां, ब्रिटिश लेखिका जे.के. राउलिंग की ‘हैरी पॉटर’ (Harry Potter) सीरिज की किताबों और फिल्मों में इनका ज़िक्र मिलता है. हैरी पॉटर की दुनिया में ‘अक्षम्य श्राप’ (Unforgivable Curses) तीन बड़े भयानक और काले जादू के मंत्र हैं, जिनका इस्तेमाल करने पर अज़काबान (जादूगरों की जेल) में आजीवन कारावास की सज़ा होती है.
‘हैरी पॉटर’ की दुनिया के ये तीन ‘अक्षम्य श्राप’ हैं-
1. अवादा केदावरा (Avada Kedavra - The Killing Curse): यह सबसे घातक अभिश्राप है, जो तुरंत किसी को मार डालता है. इसका कोई प्रति-मंत्र (counter-spell) नहीं है.
2. क्रूसिएटस अभिश्राप (Cruciatus Curse - The Torture Curse): यह पीड़ित को असहनीय शारीरिक दर्द और यातना देता है, जिसका उपयोग अक्सर जानकारी निकालने के लिए किया जाता है.
3. इम्पेरियस अभिश्राप (Imperius Curse - The Control Curse): यह अभिश्राप पीड़ित को जादूगर के पूर्ण नियंत्रण में ले आता है, जिससे वह अपनी मर्जी के खिलाफ काम करने को मजबूर हो जाता है.

जादू की दुनिया काल्पनिक है, लेकिन असली दुनिया में भी युद्ध के लिए ऐसे ही नियम बनाए गए हैं. वजह साफ है. इंसान की तकनीक इतनी खतरनाक हो चुकी है कि अगर कोई सीमा न हो तो युद्ध पूरी सभ्यता को खत्म कर सकता है.
इसी कारण दुनिया के देशों ने मिलकर युद्ध के नियम बनाए. इन नियमों का सबसे बड़ा आधार है . इसके साथ ही कई अन्य अंतरराष्ट्रीय समझौते भी हैं जो बताते हैं कि युद्ध में क्या किया जा सकता है और क्या नहीं.
इन नियमों का मकसद तीन चीजें सुनिश्चित करना है. पहला, नागरिकों की सुरक्षा. दूसरा, अनावश्यक तकलीफ से बचाव. तीसरा, युद्ध को सीमित रखना.
फिर भी अक्सर सवाल उठता है. क्या युद्ध में सच में कोई नियम चलता है. क्या ताकतवर देश इन नियमों को मानते हैं.
‘लल्लनखास’ की इस कड़ी में हम तीन चीजें समझेंगे-
- दुनिया के 10 ऐसे हथियार जो प्रतिबंधित हैं.
- मिडिल ईस्ट के संघर्ष में चर्चा में आए खतरनाक हथियार.
- अगर कोई देश नियम तोड़े तो सजा कैसे मिलती है.
आज दुनिया में युद्ध के नियम अचानक नहीं बने. इसके पीछे लगभग डेढ़ सौ साल का इतिहास है. उस इतिहास से रूबरू होने के लिए अतीत में पीछे चलते हैं.
1859 में एक स्विस व्यापारी ने इटली के एक युद्ध मैदान को देखा. हजारों घायल सैनिक तड़प रहे थे. कोई डॉक्टर नहीं, कोई मदद नहीं. इस घटना ने उन्हें झकझोर दिया. बाद में उन्होंने एक संस्था बनाई. यही संस्था बाद में जिनेवा कन्वेंशन की नींव बनी.
आज जिनेवा कन्वेंशन चार मुख्य समझौतों और कई प्रोटोकॉल का समूह है. लगभग हर देश ने इसे स्वीकार किया है. इसके मुख्य सिद्धांत हैं-
- नागरिकों पर हमला नहीं.
- युद्धबंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार नहीं.
- घायल सैनिकों की मदद जरूरी.
- ऐसे हथियार नहीं जो अनावश्यक पीड़ा दें.
इसी से जन्म हुआ प्रतिबंधित हथियारों की सूची का. बिल्कुल ‘हैरी पॉटर’ की दुनिया वालेे तीन ‘अक्षम्य श्राप’ की तरह. अब बात जब चल ही निकली है तो चलिए समझते हैं उन हथियारों को जिनसे दुनिया डरती है.

जैविक हथियारों को आधुनिक युद्ध का सबसे खतरनाक और डरावना हथियार माना जाता है. इसकी वजह यह है कि ये हथियार गोली या बम की तरह केवल एक जगह तक सीमित नहीं रहते. अगर इनका इस्तेमाल किया जाए तो पूरा युद्ध एक बड़े पैमाने की महामारी में बदल सकता है. एक बार बीमारी फैलने लगे तो यह सैनिकों और नागरिकों के बीच कोई फर्क नहीं करती. यही कारण है कि जैविक हथियारों को मानवता के लिए सबसे गंभीर खतरों में गिना जाता है.
जैविक हथियारों में आमतौर पर वायरस, बैक्टीरिया या फंगस जैसे सूक्ष्म जीवों का इस्तेमाल किया जाता है. इन सूक्ष्म जीवों को प्रयोगशालाओं में तैयार किया जाता है या फिर प्राकृतिक रूप से मौजूद खतरनाक रोगाणुओं को हथियार की तरह इस्तेमाल करने की योजना बनाई जाती है. उदाहरण के तौर पर एंथ्रेक्स, प्लेग, चेचक और बोटुलिनम जैसे रोगों के जीवाणु बेहद खतरनाक माने जाते हैं. अगर इन्हें हवा, पानी या भोजन के जरिए फैलाया जाए तो कुछ ही दिनों में बड़ी आबादी बीमार पड़ सकती है.
जैविक हथियारों का सबसे बड़ा खतरा यह है कि इनका असर तुरंत समझ में नहीं आता. कई बार संक्रमण फैलने के बाद कई दिन या हफ्तों तक लोगों को पता ही नहीं चलता कि बीमारी कहां से आई. जब तक डॉक्टर और वैज्ञानिक कारण का पता लगाते हैं, तब तक बीमारी काफी दूर तक फैल चुकी होती है. यही वजह है कि जैविक हथियारों को "साइलेंट वेपन" यानी चुपचाप हमला करने वाला हथियार भी कहा जाता है.
इतिहास में भी जैविक हथियारों का इस्तेमाल करने की कोशिशें हुई हैं. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान कुछ देशों ने जैविक हथियारों पर गुप्त शोध किए थे. बाद के दशकों में भी कई देशों पर ऐसे प्रयोग करने के आरोप लगे. इन घटनाओं ने दुनिया को यह एहसास कराया कि अगर इन हथियारों पर नियंत्रण नहीं लगाया गया तो भविष्य में यह पूरी मानव सभ्यता के लिए खतरा बन सकते हैं.
इसी खतरे को देखते हुए 1972 में अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने एक बड़ा कदम उठाया. दुनिया के कई देशों ने मिलकर एक समझौता बनाया जिसे Biological Weapons Convention कहा जाता है. यह समझौता जैविक हथियारों के विकास, उत्पादन और भंडारण पर रोक लगाता है. इसके तहत सदस्य देश यह वादा करते हैं कि वे किसी भी हालत में जैविक हथियार नहीं बनाएंगे और न ही उनका इस्तेमाल करेंगे.
इस समझौते का उद्देश्य केवल हथियारों को रोकना ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान को भी नियंत्रित करना है ताकि जैविक विज्ञान का इस्तेमाल केवल चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए हो, युद्ध के लिए नहीं. आज दुनिया के ज्यादातर देश इस समझौते के सदस्य हैं और औपचारिक रूप से जैविक हथियारों को अवैध मानते हैं.

हालांकि समस्या यह है कि जैविक हथियारों को छिपाना अपेक्षाकृत आसान होता है. छोटे से लैब में भी खतरनाक रोगाणुओं पर शोध किया जा सकता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के लिए यह सुनिश्चित करना मुश्किल होता है कि कोई देश गुप्त रूप से ऐसे हथियार विकसित तो नहीं कर रहा. यही वजह है कि विशेषज्ञ आज भी जैविक हथियारों को वैश्विक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चिंताओं में से एक मानते हैं.
अगर भविष्य में कभी जैविक हथियारों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ, तो उसका असर किसी एक देश तक सीमित नहीं रहेगा. महामारी सीमाएं नहीं मानती. इसलिए यह खतरा पूरी दुनिया के लिए साझा खतरा बन सकता है. यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय कानून और वैज्ञानिक समुदाय लगातार इस पर निगरानी रखने और इसे रोकने की कोशिश करते रहते हैं.
2. रासायनिक हथियाररासायनिक हथियारों का खौफ दुनिया ने पहली बार बड़े पैमाने पर प्रथम विश्व युद्ध के दौरान देखा. उस समय युद्ध केवल बंदूक और तोपों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जहरीली गैसों को भी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा. 1915 में जर्मन सेना ने बेल्जियम के यप्रेस इलाके में क्लोरीन गैस का इस्तेमाल किया. जैसे ही गैस का बादल सैनिकों तक पहुंचा, कई सैनिकों की आंखें जलने लगीं, सांस रुकने लगी और कुछ ही मिनटों में वे जमीन पर गिर पड़े. यह आधुनिक इतिहास में रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल की सबसे डरावनी शुरुआत मानी जाती है.
इसके बाद युद्ध के दौरान मस्टर्ड गैस का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ. मस्टर्ड गैस का असर और भी ज्यादा भयानक था. यह केवल सांस के जरिए ही नहीं बल्कि त्वचा के संपर्क से भी नुकसान पहुंचाती थी. जिन सैनिकों के शरीर पर यह गैस पड़ती थी, उनकी त्वचा पर बड़े-बड़े फफोले पड़ जाते थे. आंखों में गंभीर जलन होती थी और कई लोग स्थायी रूप से अंधे हो जाते थे. कई मामलों में गैस फेफड़ों तक पहुंचकर उन्हें बुरी तरह जला देती थी, जिससे दम घुटने से मौत हो जाती थी. अनुमान है कि प्रथम विश्व युद्ध में करीब दस लाख से ज्यादा लोग रासायनिक हथियारों के कारण घायल या प्रभावित हुए.
समय के साथ रासायनिक हथियार और भी खतरनाक होते गए. वैज्ञानिकों ने कई नए जहरीले एजेंट विकसित किए जिन्हें नर्व एजेंट कहा जाता है. इनका असर इंसान के नर्वस सिस्टम पर पड़ता है. उदाहरण के तौर पर सरीन गैस, वीएक्स और अन्य नर्व एजेंट बेहद घातक माने जाते हैं. इनका बहुत छोटा सा हिस्सा भी इंसान के शरीर में पहुंच जाए तो शरीर की नसों और मांसपेशियों के बीच काम करने वाली प्रणाली पूरी तरह गड़बड़ा सकती है. व्यक्ति की सांस रुक सकती है, मांसपेशियां ऐंठ सकती हैं और कुछ ही मिनटों में मौत हो सकती है.
रासायनिक हथियारों का असर बेहद दर्दनाक और अमानवीय माना जाता है. ये हथियार सैनिकों और नागरिकों के बीच फर्क नहीं करते. अगर हवा के जरिए ये गैस किसी शहर या गांव तक पहुंच जाए तो वहां रहने वाले आम लोग भी इसकी चपेट में आ सकते हैं. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने धीरे-धीरे इन हथियारों पर सख्त नियंत्रण लगाने का फैसला किया.
इसी दिशा में एक बड़ा कदम 1993 में उठाया गया, जब दुनिया के कई देशों ने मिलकर Chemical Weapons Convention नाम का अंतरराष्ट्रीय समझौता किया. यह संधि रासायनिक हथियारों के विकास, उत्पादन, भंडारण और इस्तेमाल को पूरी तरह प्रतिबंधित करती है. इसके तहत सदस्य देशों को अपने पास मौजूद रासायनिक हथियारों को नष्ट करना होता है और भविष्य में ऐसे हथियार न बनाने का वादा करना पड़ता है.
इस समझौते की निगरानी करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संस्था भी बनाई गई जिसे Organisation for the Prohibition of Chemical Weapons कहा जाता है. यह संस्था दुनिया भर में निरीक्षण करती है और यह सुनिश्चित करने की कोशिश करती है कि देश इस समझौते का पालन कर रहे हैं. पिछले कई दशकों में इस संधि के तहत हजारों टन रासायनिक हथियारों को नष्ट किया जा चुका है.

फिर भी खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. 21वीं सदी में भी रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल के आरोप सामने आते रहे हैं. 2013 में सीरिया के गृहयुद्ध के दौरान दमिश्क के पास हुए एक हमले में सरीन गैस के इस्तेमाल की खबरों ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया. इस घटना में बड़ी संख्या में आम नागरिकों की मौत हुई और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली.
इन घटनाओं ने यह याद दिलाया कि भले ही अंतरराष्ट्रीय कानून मौजूद हों, लेकिन युद्ध के दौरान नियमों का उल्लंघन होने का खतरा हमेशा बना रहता है. इसलिए रासायनिक हथियारों पर निगरानी और नियंत्रण आज भी वैश्विक सुरक्षा की सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में से एक माना जाता है.
3. लैंडमाइनलैंडमाइन को अक्सर युद्ध का सबसे खतरनाक और निर्दयी हथियार कहा जाता है. इन्हें साइलेंट किलर यानी चुपचाप मारने वाला हथियार भी कहा जाता है, क्योंकि ये बिना किसी चेतावनी के अचानक फटते हैं. आमतौर पर लैंडमाइन जमीन के अंदर दबाकर लगाए जाते हैं और ऊपर से देखने पर बिल्कुल दिखाई नहीं देते. जैसे ही किसी व्यक्ति का पैर इनके ऊपर पड़ता है या कोई वाहन इनके ऊपर से गुजरता है, तुरंत विस्फोट हो जाता है.
लैंडमाइन का इस्तेमाल मुख्य रूप से दुश्मन की सेना की प्रगति रोकने के लिए किया जाता है. युद्ध के दौरान सैनिक इन्हें सीमाओं, सड़कों, खेतों और गांवों के आसपास बिछा देते हैं ताकि दुश्मन उस रास्ते से आगे न बढ़ सके. लेकिन समस्या यह है कि ये हथियार युद्ध खत्म होने के बाद भी वहीं पड़े रहते हैं और लंबे समय तक सक्रिय बने रहते हैं.
यही वजह है कि कई बार युद्ध समाप्त होने के वर्षों बाद भी आम नागरिक इनका शिकार बनते रहते हैं. जब लोग अपने घरों या खेतों में वापस लौटते हैं, तो उन्हें पता भी नहीं होता कि जमीन के नीचे कहीं विस्फोटक छिपे हुए हैं. कई बार किसान खेती करते समय या बच्चे खेलते समय इन लैंडमाइन्स के संपर्क में आ जाते हैं और भयानक हादसे हो जाते हैं.
दुनिया के कई देशों में लैंडमाइन एक बड़ी मानवीय समस्या बन चुके हैं. खासतौर पर लंबे समय तक चले संघर्षों वाले देशों में इनका खतरा आज भी मौजूद है. उदाहरण के तौर पर Afghanistan, Cambodia और Angola उन देशों में शामिल हैं जहां दशकों पुराने युद्धों के बाद भी हजारों लैंडमाइन जमीन के अंदर दबे हुए हैं. इन देशों में कई लोगों ने अपने पैर या हाथ खो दिए और कई लोग अपनी जान गंवा बैठे.
लैंडमाइन से जुड़ी सबसे दुखद घटनाएं बच्चों के साथ हुई हैं. कई बार बच्चे जमीन में दबे इन छोटे विस्फोटकों को खिलौना या धातु का टुकड़ा समझकर उठा लेते हैं. जैसे ही वे उन्हें छूते हैं, विस्फोट हो जाता है और गंभीर दुर्घटनाएं हो जाती हैं. इसी वजह से दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इन हथियारों के खिलाफ लंबे समय तक अभियान चलाया.
इस बढ़ते दबाव के बाद 1997 में एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौता हुआ जिसे Ottawa Treaty या एंटी पर्सनल माइन बैन कन्वेंशन कहा जाता है. इस समझौते का उद्देश्य एंटी पर्सनल लैंडमाइन के इस्तेमाल, उत्पादन, भंडारण और व्यापार को पूरी तरह प्रतिबंधित करना है. इसके साथ ही सदस्य देशों को अपने पास मौजूद लैंडमाइन्स को नष्ट करने और पहले से बिछी माइन्स को हटाने की जिम्मेदारी भी दी गई.

आज दुनिया के 160 से ज्यादा देश इस समझौते से जुड़ चुके हैं और कई जगहों पर जमीन से लाखों लैंडमाइन हटाए भी जा चुके हैं. फिर भी समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. कुछ बड़े देश जैसे United States और Russia इस समझौते का हिस्सा नहीं हैं. इसके अलावा कुछ संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में अभी भी लैंडमाइन का इस्तेमाल होने की खबरें सामने आती रहती हैं.
इसी वजह से लैंडमाइन आज भी वैश्विक मानवीय संकट का हिस्सा बने हुए हैं. युद्ध भले ही खत्म हो जाए, लेकिन जमीन के नीचे छिपे ये विस्फोटक सालों तक लोगों की जिंदगी के लिए खतरा बने रहते हैं. यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय संगठनों और कई देशों की सरकारें आज भी दुनिया को लैंडमाइन मुक्त बनाने के लिए लगातार अभियान चला रही हैं.
4. 'क्लस्टर बम''क्लस्टर बम' आधुनिक युद्ध के सबसे विवादित और खतरनाक हथियारों में गिने जाते हैं. इनका डिजाइन सामान्य बमों से बिल्कुल अलग होता है. आमतौर पर एक 'क्लस्टर बम' एक बड़े कंटेनर या मिसाइल जैसा होता है. जब इसे विमान, रॉकेट या तोप के जरिए छोड़ा जाता है तो यह जमीन तक पहुंचने से पहले ही हवा में फट जाता है. इसके अंदर मौजूद सैकड़ों छोटे विस्फोटक बम चारों तरफ फैल जाते हैं.
इन छोटे बमों को सबम्यूनिशन या बॉम्बलेट कहा जाता है. जैसे ही मुख्य कंटेनर हवा में खुलता है, ये छोटे-छोटे बम बहुत बड़े इलाके में बिखर जाते हैं. एक 'क्लस्टर बम' कई फुटबॉल मैदान जितने क्षेत्र को कवर कर सकता है. युद्ध के दौरान इसका उद्देश्य दुश्मन की सेना, वाहनों या उपकरणों को एक साथ बड़े इलाके में नुकसान पहुंचाना होता है.
लेकिन 'क्लस्टर बमों' की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनमें से बड़ी संख्या में छोटे बम तुरंत नहीं फटते. विशेषज्ञों के मुताबिक कई बार 10 से 40 प्रतिशत तक बॉम्बलेट जमीन पर गिरने के बाद भी सक्रिय रहते हैं. ये छोटे विस्फोटक जमीन पर पड़े रहते हैं और देखने में अक्सर खिलौने या धातु के टुकड़ों जैसे लगते हैं.
युद्ध खत्म होने के बाद यही अनफटे बम सबसे बड़ा खतरा बन जाते हैं. जब आम लोग अपने घरों और खेतों में लौटते हैं तो उन्हें पता भी नहीं होता कि आसपास जमीन पर छोटे विस्फोटक पड़े हुए हैं. कई बार किसान खेती करते समय इनसे टकरा जाते हैं या बच्चे इन्हें खिलौना समझकर उठा लेते हैं. जैसे ही इनसे छेड़छाड़ होती है, विस्फोट हो सकता है और गंभीर हादसे हो जाते हैं.
दुनिया के कई युद्धग्रस्त देशों में 'क्लस्टर बमों' के कारण हजारों नागरिकों की मौत और गंभीर चोटें दर्ज की गई हैं. विशेष रूप से युद्ध के बाद के वर्षों में भी ये हथियार लोगों की जान लेते रहते हैं. इसी कारण मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने लंबे समय तक इनके खिलाफ अभियान चलाया.
आखिरकार 2008 में दुनिया के कई देशों ने मिलकर एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौता किया जिसे Convention on Cluster Munitions कहा जाता है. इस संधि का उद्देश्य 'क्लस्टर बमों' के इस्तेमाल, उत्पादन, भंडारण और व्यापार पर प्रतिबंध लगाना है. इसके तहत सदस्य देशों को अपने पास मौजूद क्लस्टर हथियारों को नष्ट करने और युद्ध क्षेत्रों में बिखरे अनफटे बॉम्बलेट को साफ करने की जिम्मेदारी भी दी गई.

आज 100 से अधिक देश इस संधि का हिस्सा बन चुके हैं और लाखों 'क्लस्टर बमों' को नष्ट भी किया जा चुका है. हालांकि समस्या यह है कि दुनिया के कुछ बड़े सैन्य देश अभी भी इस समझौते से बाहर हैं. इसी वजह से कई संघर्षों में इनके इस्तेमाल के आरोप समय-समय पर सामने आते रहते हैं.
यही कारण है कि 'क्लस्टर बम' आज भी अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बने हुए हैं. समर्थकों का कहना है कि ये सैन्य दृष्टि से प्रभावी हथियार हैं, जबकि आलोचकों का मानना है कि इनका असर युद्ध खत्म होने के बाद भी निर्दोष नागरिकों पर पड़ता है. इसी मानवीय खतरे की वजह से इन्हें दुनिया के सबसे विवादास्पद हथियारों में गिना जाता है.
5. सफेद फास्फोरससफेद फास्फोरस एक ऐसा रासायनिक पदार्थ है जिसका इस्तेमाल लंबे समय से सैन्य अभियानों में किया जाता रहा है. सामान्य परिस्थितियों में इसका उपयोग युद्ध के मैदान में धुआं पैदा करने, सैनिकों की गतिविधियों को छिपाने या रात के समय रोशनी देने के लिए किया जाता है. जब इसे हवा में छोड़ा जाता है तो यह घना सफेद धुआं पैदा करता है, जिससे सैनिकों की स्थिति दुश्मन की नजरों से छिप जाती है. इसी कारण कई सेनाएं इसे तकनीकी रूप से एक सैन्य उपकरण मानती हैं.
लेकिन यही पदार्थ तब बेहद खतरनाक हथियार बन जाता है जब इसे सीधे इंसानों या आबादी वाले इलाकों पर गिराया जाए. सफेद फास्फोरस की सबसे खास और डरावनी विशेषता यह है कि यह हवा यानी ऑक्सीजन के संपर्क में आते ही खुद-ब-खुद जलने लगता है. जैसे ही यह जलता है, यह बेहद तेज गर्मी पैदा करता है और चमकती हुई आग की तरह जलता रहता है.
इसका तापमान 800 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा पहुंच सकता है. इतनी तेज गर्मी किसी भी चीज को कुछ ही सेकंड में जला सकती है. अगर सफेद फास्फोरस के छोटे-छोटे कण किसी व्यक्ति के शरीर पर गिर जाएं तो वे त्वचा को तुरंत जला देते हैं. कई मामलों में यह जलन इतनी गहरी होती है कि त्वचा और मांस को पार करते हुए हड्डियों तक पहुंच जाती है. सबसे खतरनाक बात यह है कि जब तक इसे पूरी तरह ऑक्सीजन से अलग न कर दिया जाए, यह जलता ही रहता है.
सफेद फास्फोरस से होने वाले घाव बेहद दर्दनाक और गंभीर होते हैं. जलने के साथ-साथ इससे जहरीला धुआं भी निकलता है, जो फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है. अगर कोई व्यक्ति इसके धुएं को सांस के जरिए अंदर ले ले तो उसे सांस लेने में गंभीर समस्या हो सकती है. कई बार यह शरीर में रासायनिक जहर की तरह भी असर करता है.
इसी कारण अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून में इसके इस्तेमाल को लेकर सख्त नियम बनाए गए हैं. तकनीकी रूप से सफेद फास्फोरस पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है, क्योंकि इसका इस्तेमाल सैन्य धुआं बनाने या सिग्नल देने के लिए किया जा सकता है. लेकिन अगर इसे सीधे नागरिकों या घनी आबादी वाले इलाकों में इस्तेमाल किया जाए तो यह अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन माना जाता है और इसे युद्ध अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है.

हाल के वर्षों में यह हथियार फिर से अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है. मध्य पूर्व में चल रहे संघर्षों के दौरान मानवाधिकार संगठनों ने कई बार आरोप लगाए कि गाजा और दक्षिणी लेबनान के कुछ इलाकों में सफेद फास्फोरस का इस्तेमाल किया गया. इन आरोपों ने दुनिया भर में चिंता बढ़ा दी, क्योंकि ऐसे हथियारों का इस्तेमाल नागरिक आबादी के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है.
यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं लगातार इस बात पर जोर देती हैं कि अगर सफेद फास्फोरस जैसे पदार्थों का इस्तेमाल किया भी जाए तो उसे सख्त नियमों के तहत और केवल सैन्य उद्देश्यों तक ही सीमित रखा जाना चाहिए. युद्ध के नियमों का मकसद यही है कि संघर्ष के दौरान भी आम नागरिकों को अधिक से अधिक सुरक्षित रखा जा सके.
6. परमाणु हथियारदुनिया के सबसे खतरनाक और विनाशकारी हथियारों की बात होती है तो सबसे पहले नाम परमाणु हथियारों का आता है. एक ही बम पूरे शहर को तबाह कर सकता है. इसकी ताकत इतनी ज्यादा होती है कि विस्फोट के साथ तेज गर्मी, भयंकर झटका और खतरनाक रेडिएशन फैलता है. यही वजह है कि परमाणु हथियारों को मानव इतिहास का सबसे भयावह सैन्य आविष्कार माना जाता है.
दुनिया ने पहली बार परमाणु बम की असली तबाही 1945 में देखी. दूसरे विश्व युद्ध के आखिरी दिनों में अमेरिका ने जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए. इस हमले में तुरंत ही लाखों लोग मारे गए और दोनों शहर लगभग पूरी तरह तबाह हो गए. विस्फोट के बाद भी रेडिएशन का असर सालों तक बना रहा. हजारों लोग कैंसर और दूसरी गंभीर बीमारियों का शिकार हुए. इस घटना ने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि परमाणु हथियार कितने विनाशकारी हो सकते हैं.

आज दुनिया के कुछ ही देशों के पास परमाणु हथियार मौजूद हैं. इनमें United States, Russia, China, France और United Kingdom शामिल हैं. इनके अलावा India, Pakistan और North Korea के पास भी परमाणु हथियार होने की जानकारी सामने आ चुकी है. वहीं Israel को भी परमाणु शक्ति माना जाता है, हालांकि उसने आधिकारिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की है.
हालांकि परमाणु हथियारों को पूरी तरह बैन नहीं किया गया है, लेकिन इन्हें नियंत्रित करने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय समझौते बनाए गए हैं. इनका मकसद यह है कि ज्यादा देश परमाणु हथियार न बना सकें और जिन देशों के पास यह हथियार हैं वे उनका इस्तेमाल न करें.
इसके बावजूद दुनिया में परमाणु हथियारों को लेकर चिंता हमेशा बनी रहती है, क्योंकि अगर कभी बड़े पैमाने पर इनका इस्तेमाल हुआ तो उसका असर केवल एक देश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी मानव सभ्यता पर पड़ सकता है.
7. डर्टी बमडर्टी बम को तकनीकी भाषा में रेडियोलॉजिकल डिस्पर्सल डिवाइस भी कहा जाता है. यह पारंपरिक परमाणु बम जैसा शक्तिशाली विस्फोट नहीं करता, लेकिन इसके खतरे को कम नहीं माना जाता. इसकी खास बात यह है कि इसमें सामान्य विस्फोटक सामग्री के साथ रेडियोधर्मी पदार्थ मिला दिया जाता है. जब बम फटता है तो विस्फोट के साथ यह रेडियोधर्मी धूल और कण आसपास के इलाके में फैल जाते हैं.
डर्टी बम का उद्देश्य किसी शहर को तुरंत पूरी तरह नष्ट करना नहीं होता, बल्कि रेडिएशन फैलाकर लंबे समय तक खतरा पैदा करना होता है. विस्फोट के बाद इलाके की हवा, मिट्टी और इमारतें रेडियोधर्मी कणों से दूषित हो सकती हैं. ऐसे इलाके में रहना लोगों के स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक हो जाता है. रेडिएशन के संपर्क में आने से कैंसर, त्वचा की गंभीर बीमारियां और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.
इस तरह के हमले का एक बड़ा असर मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी पड़ता है. अगर किसी बड़े शहर में डर्टी बम फट जाए तो लाखों लोगों को तुरंत उस इलाके को छोड़ना पड़ सकता है. लंबे समय तक सफाई और डी-कंटैमिनेशन की प्रक्रिया चलती है, जिसमें सालों लग सकते हैं. इस दौरान लोगों के मन में डर और असुरक्षा की भावना पैदा हो जाती है.

इसी वजह से विशेषज्ञ डर्टी बम को कई बार साइकोलॉजिकल वेपन भी कहते हैं. यानी इसका मकसद केवल शारीरिक नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि समाज में डर और अफरा-तफरी फैलाना भी होता है. इसलिए दुनिया के कई देशों में रेडियोधर्मी पदार्थों की सुरक्षा और निगरानी पर विशेष ध्यान दिया जाता है ताकि ऐसे हथियार बनाने की संभावना को रोका जा सके.
8. वैक्यूम बमवैक्यूम बम को थर्मोबेरिक हथियार भी कहा जाता है. इसे दुनिया के सबसे खतरनाक गैर परमाणु हथियारों में से एक माना जाता है. इसकी खासियत यह है कि यह सामान्य बमों की तरह केवल विस्फोट नहीं करता, बल्कि आसपास की हवा का भी इस्तेमाल करके बहुत ज्यादा विनाश पैदा करता है. इसी वजह से इसका असर आम विस्फोटकों की तुलना में कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकता है.
यह हथियार आमतौर पर दो चरणों में काम करता है. पहले चरण में बम हवा में एक ज्वलनशील ईंधन का बादल फैला देता है. यह बादल आसपास की हवा में तेजी से फैल जाता है और बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन के साथ मिल जाता है. दूसरे चरण में इस बादल को आग लगा दी जाती है. जैसे ही यह ईंधन का बादल जलता है, एक बेहद शक्तिशाली विस्फोट होता है जो बहुत ज्यादा ताप और दबाव पैदा करता है.
इस विस्फोट से पैदा होने वाली गर्मी और शॉक वेव आसपास की इमारतों, दीवारों और संरचनाओं को बुरी तरह नुकसान पहुंचा सकती है. इसके साथ ही यह विस्फोट आसपास की हवा में मौजूद ऑक्सीजन को भी तेजी से खत्म कर देता है. इसका मतलब यह है कि जो लोग विस्फोट के सीधे संपर्क में नहीं भी हों, वे भी ऑक्सीजन की कमी और अत्यधिक दबाव के कारण गंभीर रूप से घायल हो सकते हैं.
वैक्यूम बम की सबसे खतरनाक बात यह है कि इसका असर बंद जगहों में छिपे लोगों तक भी पहुंच जाता है. अगर कोई व्यक्ति बंकर, सुरंग या किसी इमारत के अंदर छिपा हो तो भी यह विस्फोट अंदर तक असर कर सकता है. दबाव की लहरें दरवाजों, खिड़कियों और छोटे रास्तों से भीतर पहुंच जाती हैं. इसलिए सैन्य अभियानों में कभी कभी इस तरह के हथियारों का इस्तेमाल उन जगहों को नष्ट करने के लिए किया जाता है जहां दुश्मन सुरंगों या भूमिगत ठिकानों में छिपा होता है.

इसी कारण वैक्यूम बम को बेहद विवादित हथियार माना जाता है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि आबादी वाले इलाकों में इसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर नागरिक नुकसान का कारण बन सकता है. यही वजह है कि युद्ध के दौरान इसके इस्तेमाल को लेकर अक्सर अंतरराष्ट्रीय बहस और आलोचना होती रहती है.
9. अंधा करने वाले लेजर1990 के दशक में तकनीक के तेजी से विकास के साथ युद्ध के मैदान में लेजर तकनीक का इस्तेमाल भी बढ़ने लगा. इसी दौरान दुनिया ने एक नए तरह के खतरे को पहचाना. कुछ देशों ने ऐसे लेजर हथियार विकसित करने शुरू किए थे जो सीधे सैनिकों की आंखों को निशाना बना सकते थे. इन हथियारों का उद्देश्य दुश्मन को मारना नहीं बल्कि उसे स्थायी रूप से अंधा कर देना था.
इन लेजर हथियारों से निकलने वाली तेज किरणें अगर किसी सैनिक की आंखों पर पड़तीं तो उसकी रेटिना को गंभीर नुकसान पहुंच सकता था. कई मामलों में यह नुकसान स्थायी अंधेपन में बदल सकता था. यानी सैनिक अपनी पूरी जिंदगी के लिए दृष्टि खो सकता था. विशेषज्ञों को चिंता थी कि अगर ऐसे हथियार बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने लगे तो युद्ध के मैदान में बड़ी संख्या में सैनिक स्थायी रूप से विकलांग हो सकते हैं.

इसी खतरे को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने जल्दी कदम उठाया. 1995 में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने मिलकर एक विशेष समझौता बनाया जिसे Protocol on Blinding Laser Weapons कहा जाता है. यह समझौता Convention on Certain Conventional Weapons के तहत बनाया गया था. इसका उद्देश्य ऐसे सभी लेजर हथियारों को प्रतिबंधित करना था जिनका मुख्य उद्देश्य किसी व्यक्ति की आंखों को स्थायी रूप से अंधा करना हो.
इस समझौते के बाद सदस्य देशों ने ऐसे हथियारों के विकास, उत्पादन और इस्तेमाल पर रोक लगाने का वादा किया. सैन्य बलों को यह भी निर्देश दिया गया कि वे अपने हथियारों और उपकरणों को इस तरह डिजाइन करें कि उनसे गलती से भी किसी व्यक्ति की आंखों को स्थायी नुकसान न पहुंचे.
अंधा करने वाले लेजर हथियारों का मामला इसलिए भी खास माना जाता है क्योंकि यह इतिहास का पहला ऐसा हथियार था जिसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने से पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित कर दिया गया. इससे यह भी दिखा कि अगर दुनिया समय रहते खतरे को पहचान ले तो युद्ध के नियमों के जरिए कई मानवीय संकटों को रोका जा सकता है.
10. विस्तारवादी गोलियां (Expansion Bullets)विस्तारवादी गोलियां युद्ध के इतिहास में उन हथियारों में गिनी जाती हैं जिन्हें अत्यधिक क्रूर माना गया. इन्हें आमतौर पर डम डम बुलेट कहा जाता है. इस नाम की वजह भारत का कोलकाता के पास स्थित पुराना ब्रिटिश सैन्य कारखाना ‘डम डम’ था. जहां ऐसी गोलियों का शुरुआती विकास किया गया था.
सामान्य गोलियां जब किसी शरीर में प्रवेश करती हैं तो वे अक्सर सीधी रेखा में आगे बढ़ती हैं और एक सीमित आकार का घाव बनाती हैं. लेकिन विस्तारवादी गोलियों की बनावट अलग होती है. इनके अगले हिस्से को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि जैसे ही यह गोली शरीर में प्रवेश करे, उसका सिरा खुलने या फैलने लगे. यही फैलाव गोली को अंदर जाकर और ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाला बना देता है.
जब यह गोली शरीर के अंदर फैलती है तो उसका आकार बड़ा हो जाता है. इसके कारण घाव भी काफी बड़ा और गहरा बन जाता है. मांसपेशियां, हड्डियां और आंतरिक अंग बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो सकते हैं. कई बार शरीर के अंदर ही यह गोली टूटकर छोटे टुकड़ों में बिखर जाती है, जिससे चोट और भी जटिल हो जाती है. ऐसी स्थिति में डॉक्टरों के लिए ऑपरेशन करके सभी टुकड़ों को निकालना बेहद कठिन हो जाता है.
युद्ध के दौरान इस तरह की गोलियों के इस्तेमाल से सैनिकों को सिर्फ मारने का उद्देश्य नहीं होता, बल्कि उन्हें अत्यधिक दर्द और गंभीर चोट देना भी शामिल होता है. घायल सैनिक लंबे समय तक पीड़ा झेलता है और कई बार उसकी जान बचाना भी मुश्किल हो जाता है. इसी वजह से इन्हें अमानवीय और अनावश्यक रूप से पीड़ा देने वाला हथियार माना गया.

इन गोलियों की क्रूरता को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उन्नीसवीं सदी के अंत में ही इस पर रोक लगाने का फैसला किया. 1899 में हुए Hague Declaration concerning Expanding Bullets के तहत विस्तारवादी गोलियों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया. इस समझौते का उद्देश्य युद्ध को पूरी तरह खत्म करना नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि युद्ध के दौरान भी कुछ मानवीय सीमाएं बनी रहें.
आज अधिकांश देश इस समझौते का पालन करते हैं और नियमित सैन्य युद्ध में ऐसी गोलियों का इस्तेमाल नहीं किया जाता. हालांकि कुछ देशों में कानून प्रवर्तन एजेंसियां या पुलिस विशेष परिस्थितियों में ऐसी गोलियों का इस्तेमाल कर सकती हैं, क्योंकि वहां उनका उद्देश्य अलग होता है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय युद्ध के मैदान में इन्हें अब भी एक प्रतिबंधित और अमानवीय हथियार माना जाता है.
मिडिल ईस्ट की जंग और दुनिया की चिंताईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच जारी जंग ने एक बार फिर इन खतरनार हथियारों के इस्तेमाल का डर जिंदा कर दिया है. कभी सफेद फास्फोरस से हमले की खबर आती है तो कभी कलस्टर बम की. हालांकि आधिकारिक पुष्टि किसी की नहीं हुई है. मगर बात निकली तो दूर तलक तो जानी ही थी.
इस जंग को छोड़ भी दें तो भी पिछले कुछ सालों में मिडिल ईस्ट फिर से दुनिया की सबसे संवेदनशील और खतरनाक भू राजनीतिक जगह बन गया है. यहां का संघर्ष केवल दो देशों के बीच की लड़ाई नहीं है, बल्कि कई स्तरों पर फैला हुआ एक जटिल सैन्य और राजनीतिक टकराव है. इस क्षेत्र में क्षेत्रीय शक्तियां, अंतरराष्ट्रीय ताकतें और सशस्त्र संगठन सभी किसी न किसी रूप में शामिल हैं. इसी वजह से यहां होने वाली हर सैन्य कार्रवाई पर पूरी दुनिया की नजर रहती है.
इस संघर्ष के केंद्र में सबसे प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं इजरायल (Israel) और ईरान (Iran). दोनों देशों के बीच लंबे समय से राजनीतिक और सैन्य तनाव बना हुआ है. इजरायल ईरान को अपने अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा मानता है, जबकि ईरान इजरायल की नीतियों का खुलकर विरोध करता रहा है. इस टकराव में अमेरिका (United States) भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो लंबे समय से इजरायल का प्रमुख सहयोगी रहा है और क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखता है.

इस क्षेत्रीय संघर्ष में कुछ बड़े सशस्त्र संगठन भी शामिल हैं. इनमें सबसे प्रमुख हैं ‘हमास’ (Hamas) और ‘हिजबुल्लाह’ (Hezbollah). हमास गाजा पट्टी में सक्रिय एक फिलिस्तीनी संगठन है, जबकि हिजबुल्लाह लेबनान में आधारित एक शक्तिशाली सैन्य और राजनीतिक संगठन माना जाता है. इजरायल का इन दोनों संगठनों के साथ लंबे समय से संघर्ष चलता रहा है, और कई बार यह टकराव बड़े सैन्य अभियान में बदल चुका है.
पिछले कुछ समय में ‘गाजा पट्टी’ (Gaza Strip), दक्षिणी लेबनान (South Lebanon), सीरिया (Syria) की सीमाओं और लाल सागर (Red Sea) के आसपास का इलाका लगातार सैन्य गतिविधियों और हमलों की खबरों में रहा है. मिसाइल हमले, ड्रोन हमले, सीमा पार गोलाबारी और नौसैनिक टकराव जैसी घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया, संयुक्त राष्ट्र और कई मानवाधिकार संगठन इस क्षेत्र की स्थिति पर करीब से नजर बनाए हुए हैं.
लेकिन इस पूरे संघर्ष में दुनिया की सबसे बड़ी चिंता केवल रॉकेट और मिसाइलों की नहीं है. असली डर उन हथियारों को लेकर है जिनका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के अनुसार बेहद विवादित या प्रतिबंधित माना जाता है. विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठनों के अनुसार इस संघर्ष के दौरान चार ऐसे हथियार बार बार चर्चा में आ रहे हैं जिनके इस्तेमाल से आम नागरिकों पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है.
सबसे पहले चर्चा सफेद फास्फोरस की हो रही है. सफेद फास्फोरस एक रासायनिक पदार्थ है जो हवा के संपर्क में आते ही जलने लगता है और बेहद तेज तापमान पैदा करता है. सैन्य दृष्टि से इसका इस्तेमाल धुआं पैदा करने या युद्ध क्षेत्र को रोशन करने के लिए किया जा सकता है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार इसे सीधे आबादी वाले इलाके में इस्तेमाल करना अवैध माना जाता है.
2023 और 2024 के दौरान कई मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में आरोप लगाया गया कि Israel ने Gaza Strip और दक्षिणी Lebanon के कुछ इलाकों में सफेद फास्फोरस का इस्तेमाल किया. Human Rights Watch और Amnesty International जैसी संस्थाओं ने सैटेलाइट तस्वीरों, वीडियो फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के आधार पर ऐसे हमलों की जांच की मांग की. हालांकि इजरायली सेना का कहना रहा है कि उसने इन हथियारों का इस्तेमाल केवल धुआं पैदा करने और सैन्य उद्देश्यों के लिए किया.
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सफेद फास्फोरस के कण सीधे किसी इंसान के शरीर पर गिरते हैं तो वे त्वचा और मांस को बुरी तरह जला सकते हैं. कई मामलों में यह जलन हड्डियों तक पहुंच सकती है. इसके अलावा इससे निकलने वाला जहरीला धुआं फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है. इसलिए घनी आबादी वाले शहरों में इसका इस्तेमाल बेहद खतरनाक माना जाता है.
दूसरा हथियार है 'क्लस्टर बम'. 'क्लस्टर बम' को बमों का गुच्छा कहा जाता है. एक बड़ा बम या मिसाइल हवा में फटता है और उसके अंदर से दर्जनों या सैकड़ों छोटे छोटे बम जमीन पर फैल जाते हैं. इनका उद्देश्य बड़े इलाके को एक साथ निशाना बनाना होता है.
मिडिल ईस्ट के संघर्ष में कई बार ऐसी खबरें सामने आई हैं कि कुछ मिसाइलों में क्लस्टर प्रकार के सबम्यूनिशन इस्तेमाल किए गए. कुछ सुरक्षा विश्लेषकों ने यह दावा भी किया कि ईरान समर्थित समूहों द्वारा दागे गए कुछ रॉकेटों में क्लस्टर प्रकार के विस्फोटक हो सकते हैं. हालांकि इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना अक्सर मुश्किल होता है, क्योंकि युद्ध क्षेत्रों में सही जानकारी जुटाना बेहद कठिन होता है.
‘क्लस्टर बम’ का सबसे बड़ा खतरा यह है कि इनमें से कई छोटे बम तुरंत नहीं फटते. वे जमीन पर पड़े रहते हैं और महीनों या वर्षों बाद भी सक्रिय बने रहते हैं. युद्ध खत्म होने के बाद जब लोग अपने घरों और खेतों में लौटते हैं तो ये अनफटे बम उनके लिए बड़ा खतरा बन जाते हैं. कई बार बच्चे इन्हें खिलौना समझ लेते हैं या किसान खेती करते समय इनके संपर्क में आ जाते हैं.
इसी वजह से दुनिया के कई देशों ने 'क्लस्टर बमों' को प्रतिबंधित करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संधि बनाई जिसे Convention on Cluster Munitions कहा जाता है. हालांकि कुछ बड़े सैन्य देश इस समझौते का हिस्सा नहीं हैं, जिसके कारण इन हथियारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय विवाद बना रहता है.
तीसरा हथियार है थर्मोबेरिक या वैक्यूम बम. इसे दुनिया के सबसे खतरनाक गैर परमाणु हथियारों में से एक माना जाता है. यह बम दो चरणों में काम करता है. पहले विस्फोट में यह हवा में ईंधन का बादल फैलाता है और दूसरे विस्फोट में उस बादल को जला देता है. इससे एक विशाल आग का गोला और बहुत शक्तिशाली दबाव पैदा होता है.
इस विस्फोट का असर पारंपरिक बमों से अलग होता है. इससे आसपास की ऑक्सीजन तेजी से खत्म हो सकती है और दबाव की लहर इतनी तेज होती है कि बंकरों और सुरंगों के अंदर छिपे लोगों तक को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है. मिडिल ईस्ट के संघर्ष में इस हथियार की चर्चा इसलिए भी होती है क्योंकि हमास ने गाजा में बड़ी संख्या में भूमिगत सुरंगों का नेटवर्क बना रखा है.
कई सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि अगर किसी सेना को ऐसी सुरंगों को नष्ट करना हो तो थर्मोबेरिक या बंकर बस्टर प्रकार के हथियार इस्तेमाल किए जा सकते हैं. हालांकि इस तरह के हथियारों के इस्तेमाल की पुष्टि अक्सर स्पष्ट रूप से नहीं होती. लेकिन युद्ध के दौरान इनके इस्तेमाल की संभावना को लेकर चर्चा लगातार होती रहती है.
चौथा और सबसे बड़ा डर परमाणु हथियारों का है. मिडिल ईस्ट में परमाणु संतुलन लंबे समय से वैश्विक राजनीति का एक बड़ा मुद्दा रहा है. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि Israel के पास परमाणु हथियार मौजूद हैं, हालांकि उसने कभी आधिकारिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की है. फिर भी कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह अनुमान लगाया जाता है कि इजरायल के पास सीमित संख्या में परमाणु हथियार हो सकते हैं.
दूसरी तरफ Iran का परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय विवाद का विषय बना हुआ है. पश्चिमी देशों का आरोप है कि ईरान का यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम उसे परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे ले जा सकता है. वहीं ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल ऊर्जा उत्पादन और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए है.

यही वजह है कि जब भी मिडिल ईस्ट में सैन्य तनाव बढ़ता है तो परमाणु हथियारों को लेकर चिंता भी बढ़ जाती है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस क्षेत्र में किसी बड़े पैमाने का सैन्य टकराव हुआ तो उसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा और स्थिरता पर असर पड़ सकता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार कोशिश करता है कि इस क्षेत्र में तनाव को नियंत्रित रखा जाए और युद्ध के नियमों का पालन सुनिश्चित किया जा सके.
अगर नियम टूटे तो सजा कौन देगायुद्ध के नियम केवल नैतिक अपील नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे कानूनी व्यवस्था भी मौजूद है. अगर कोई देश या सैन्य कमांडर युद्ध के दौरान प्रतिबंधित हथियारों का इस्तेमाल करता है या नागरिकों पर हमला करता है, तो उसे युद्ध अपराध माना जा सकता है. ऐसे मामलों की जांच और सुनवाई के लिए दुनिया में एक विशेष अंतरराष्ट्रीय अदालत बनाई गई है जिसे कहा जाता है.
यह अदालत नीदरलैंड के हेग शहर में स्थित है. इसे अक्सर दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत माना जाता है. इस अदालत की स्थापना 2002 में हुई थी ताकि दुनिया में होने वाले सबसे गंभीर अपराधों की सुनवाई की जा सके. इनमें युद्ध अपराध, नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराध जैसे मामले शामिल होते हैं.

इस अदालत की सबसे खास बात यह है कि यह किसी देश पर नहीं बल्कि व्यक्तियों पर मुकदमा चलाती है. यानी अगर किसी देश का राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सैन्य जनरल या कोई कमांडर प्रतिबंधित हथियारों के इस्तेमाल का आदेश देता है या नागरिकों पर हमले की योजना बनाता है, तो उसके खिलाफ व्यक्तिगत रूप से मुकदमा चलाया जा सकता है.
जब किसी युद्ध अपराध की शिकायत सामने आती है तो सबसे पहले अदालत का अभियोजक सबूत इकट्ठा करता है. इसमें युद्ध क्षेत्र से मिले हथियारों के अवशेष, मिट्टी के नमूने, उपग्रह तस्वीरें, डॉक्टरों की रिपोर्ट और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान शामिल होते हैं. अगर जांच में पर्याप्त सबूत मिल जाते हैं तो अदालत आरोपी के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय गिरफ्तारी वारंट जारी कर सकती है.
गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बाद आरोपी व्यक्ति उन सभी देशों में जाने से बचता है जो इस अदालत के सदस्य हैं, क्योंकि वहां उसे गिरफ्तार किया जा सकता है. अगर वह गिरफ्तार हो जाता है तो उसे हेग लाया जाता है और वहां उसका ट्रायल शुरू होता है. अदालत में अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष दोनों अपनी दलीलें पेश करते हैं और कई महीनों या वर्षों तक सुनवाई चल सकती है.
अगर आरोपी दोषी पाया जाता है तो अदालत उसे कड़ी सजा दे सकती है. सबसे गंभीर मामलों में उम्रकैद की सजा दी जा सकती है. इसके अलावा 30 साल तक की जेल, भारी जुर्माना या संपत्ति जब्त करने जैसी सजा भी दी जा सकती है. कई मामलों में अदालत पीड़ितों को मुआवजा दिलाने का आदेश भी देती है.
हालांकि इस व्यवस्था की अपनी सीमाएं भी हैं. दुनिया के कुछ शक्तिशाली देश इस अदालत के सदस्य नहीं हैं या इसके अधिकार क्षेत्र को पूरी तरह स्वीकार नहीं करते. यही कारण है कि कई बार अंतरराष्ट्रीय राजनीति के कारण न्याय की प्रक्रिया जटिल हो जाती है. फिर भी अंतरराष्ट्रीय कानून और अदालतें युद्ध अपराधों के खिलाफ एक महत्वपूर्ण चेतावनी और नियंत्रण का काम करती हैं.
इतिहास में सजा के बड़े उदाहरण1990 के दशक के बोस्निया युद्ध में नरसंहार के लिए जिम्मेदार नेताओं को अंतरराष्ट्रीय अदालत ने सजा दी. इस मामले में राडोवन कराडिच और रत्को म्लादिच को उम्रकैद दी गई.
इराक में कुर्दों पर रासायनिक हथियार इस्तेमाल करने के कारण अली हसन अल माजिद को फांसी दी गई. उन्हें केमिकल अली कहा जाता था. वो सद्दाम हुसैन के रिश्तेदार थे.
इसी तरह, लाइबेरिया के पूर्व राष्ट्रपति चार्ल्स टेलर को भी इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस से सजा मिली. उन्हें सिएरा लियोन गृहयुद्ध में विद्रोहियों की मदद करने के लिए दोषी पाया गया और 50 साल की जेल दी गई.

इसका कारण यह है कि कई शक्तिशाली देश अंतरराष्ट्रीय अदालत को पूरी तरह नहीं मानते. दूसरा कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की राजनीति है. कई बार वीटो के कारण जांच रुक जाती है.
तीसरी और अहम वजह यह है कि आरोपी नेताओं को गिरफ्तार करना आसान नहीं होता. इसी कारण कई युद्ध अपराधियों को सजा मिलने में सालों लग जाते हैं.
युद्ध इंसानी इतिहास का कड़वा सच है. लेकिन दुनिया ने कम से कम यह कोशिश जरूर की है कि युद्ध को पूरी तरह बर्बरता में बदलने से रोका जाए. जैसे जादू की दुनिया में कुछ श्राप वर्जित थे, वैसे ही असली दुनिया में भी कुछ हथियार ऐसे हैं जिन पर मानवता ने मिलकर रोक लगाई है.
ये नियम हमेशा पूरी तरह नहीं माने जाते. फिर भी इनका होना जरूरी है. क्योंकि अगर युद्ध में कोई नियम न हों तो जीत और हार का सवाल ही खत्म हो जाएगा. उसके बाद बचेगा सिर्फ एक शब्द- विनाश…
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