अगर आप किसी स्कूल की किताब खोलें और ऑक्सीजन के बारे में पढ़ें, तो कहानी बहुत सीधी होती है. पेड़-पौधे सूरज की रोशनी में फोटोसिंथेसिस (Photosynthesis) करते हैं. कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं. यही ऑक्सीजन हमारी सांस बनती है. दशकों से यही समझ विज्ञान की सबसे मजबूत दीवार मानी जाती रही.
'डार्क ऑक्सीजन': समंदर के अंधेरे में मिली 'सांस', जिसने विज्ञान की बुनियाद हिला दी है!
Dark Oxygen Discovery: क्या बिना सूरज के ऑक्सीजन बन सकती है? प्रशांत महासागर की गहराई में 'डार्क ऑक्सीजन' की खोज ने वैज्ञानिकों को चौंका दिया है. जानिए कैसे समुद्री पत्थर 'नेचुरल बैटरी' बनकर पानी से ऑक्सीजन बना रहे हैं और इसका एलियन लाइफ से क्या कनेक्शन है.
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लेकिन साल 2024 में एक खोज ने इस पूरी कहानी को अचानक उलट कर रख दिया. वैज्ञानिकों ने समुद्र की ऐसी गहराई में ऑक्सीजन बनते हुए देखी, जहां सूरज की रोशनी का नामोनिशान नहीं है. इतना अंधेरा कि इंसान तो दूर, हाई-टेक कैमरों तक को टॉर्च की जरूरत पड़ती है. वहां ऑक्सीजन कैसे बन रही है? यही वो सवाल है जिसने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों के होश उड़ा दिए हैं.
वैज्ञानिकों ने इसे नाम दिया है- 'डार्क ऑक्सीजन' (Dark Oxygen).
यह खोज जुलाई 2024 में जर्नल Nature Geoscience में प्रकाशित हुई. और यहीं से विज्ञान की दुनिया में बहस शुरू हो गई. क्योंकि अगर बिना सूरज के भी ऑक्सीजन बन सकती है, तो इसका मतलब है कि पृथ्वी पर जीवन की कहानी हम जितनी समझते थे, उससे कहीं ज्यादा जटिल है.
समंदर का वो हिस्सा, जहां सूरज भी हार मान लेता है
यह जादुई खोज प्रशांत महासागर के एक बेहद रहस्यमय इलाके में हुई है. इस जगह का नाम है- क्लेरियन-क्लिपरटन ज़ोन (Clarion-Clipperton Zone). यह इलाका हवाई और मेक्सिको के बीच फैला हुआ है. यहां समंदर की गहराई लगभग 4 से 5 किलोमीटर (करीब 13,000 से 16,000 फीट) तक जाती है.
सोचिए, चार किलोमीटर नीचे! इस गहराई पर पानी का दबाव इतना ज्यादा होता है कि इंसान तो क्या, सामान्य पनडुब्बियां भी पिचक जाएं. तापमान जमा देने वाला और सबसे बड़ी बात-सूरज की एक भी किरण यहां तक नहीं पहुंचती. यानी यह दुनिया का सबसे बड़ा “स्थायी अंधेरा” है.

‘स्कॉटिश एसोसिएशन फॉर मरीन साइंस’ (SAMS) की रिपोर्ट के मुताबिक वैज्ञानिक यहां समुद्री जीवों पर रिसर्च करने गए थे, लेकिन उनके सेंसर्स ने अचानक एक अजीब डेटा रिकॉर्ड किया. पानी में ऑक्सीजन का लेवल घट नहीं रहा था, बल्कि बढ़ रहा था!
वैज्ञानिकों को शक क्यों हुआ? मशीन की खराबी या कुदरत का खेल?आम तौर पर समंदर में ऑक्सीजन दो ही रास्तों से आती है:
फाइटोप्लांकटन (Phytoplankton): पानी की ऊपरी सतह पर रहने वाले सूक्ष्म पौधे जो फोटोसिंथेसिस करते हैं.
मिक्सिंग: हवा की ऑक्सीजन का पानी की ऊपरी सतह में घुलना.
लेकिन 4 किलोमीटर नीचे ये दोनों ही रास्ते बंद हो जाते हैं. जब सेंसर ने ऑक्सीजन बढ़ने का संकेत दिया, तो प्रोफेसर एंड्रयू स्वीटमैन (Andrew Sweetman) और उनकी टीम को लगा कि शायद मशीन खराब हो गई है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने बैकअप मशीनें भेजीं, सेंसर बदले, लेकिन हर बार नतीजा वही था. गहराई में ऑक्सीजन पैदा हो रही थी. यहीं से सामने आई एक चौंकाने वाली चीज- काले पत्थर!
समंदर की तलहटी में बिखरा 'खजाना': पॉलीमेटालिक नोड्यूल्सजांच में वैज्ञानिकों को समंदर की तलहटी में हजारों की संख्या में छोटे-छोटे काले पत्थर दिखाई दिए. इनका नाम है- पॉलीमेटालिक नोड्यूल्स (Polymetallic Nodules). ये देखने में साधारण पत्थरों जैसे लगते हैं लेकिन इनके अंदर धातुओं का खजाना होता है.
इनमें मुख्य रूप से पाए जाते हैं:
- मैंगनीज (Manganese)
- कोबाल्ट (Cobalt)
- निकेल (Nickel)
- कॉपर (Copper)
अंतर्राष्ट्रीय समुद्री तल प्राधिकरण संसाधन रिपोर्ट (International Seabed Authority Resources) के मुताबिक ये वही धातुएं हैं जिनसे आज की दुनिया में इलेक्ट्रिक कार और मोबाइल की बैटरियां बनती हैं. लेकिन असली रहस्य इनकी केमिस्ट्री में छिपा था.
जब पत्थर बन गए “नेचुरल बैटरी”: जियो-बैटरी प्रभावजांच में पता चला कि ये पत्थर एक खास तरीके से 'चार्ज' हो रहे थे. इन पत्थरों की सतह पर 1.5 वोल्ट तक का इलेक्ट्रिक पोटेंशियल (Electric Potential) पाया गया. यानी लगभग उतना ही जितना एक सामान्य AA बैटरी (जो हम घड़ी के सेल में इस्तेमाल करते हैं) में होता है.
वैज्ञानिकों ने इसे नाम दिया है- 'जियो-बैटरी' (Geo-battery). अब सवाल था कि इन पत्थरों से ऑक्सीजन कैसे बन रही है? जवाब मिला स्कूल की साइंस की किताब में- इलेक्ट्रोलेसिस (Electrolysis)!
जब पानी में बिजली का करंट छोड़ा जाता है, तो पानी ($H_2O$) टूट जाता है.
पानी= हाइड्रोजन + ऑक्सीजन
यानी ये पॉलीमेटालिक नोड्यूल्स छोटे-छोटे बैटरी सेल की तरह काम करते हैं और आसपास के पानी को तोड़कर ऑक्सीजन रिलीज करते रहते हैं. बिना धूप, बिना पौधे-सिर्फ शुद्ध केमिकल रिएक्शन! यही है डार्क ऑक्सीजन.

स्रोत: Chemistry World - Royal Society of Chemistry. URL:
फोटोसिंथेसिस बनाम डार्क ऑक्सीजन: अंतर समझना जरूरी हैअब तक ऑक्सीजन बनने की जो सबसे बड़ी प्रक्रिया मानी जाती थी, वह थी फोटोसिंथेसिस. लेकिन डार्क ऑक्सीजन उससे बिल्कुल अलग है.
| फीचर | फोटोसिंथेसिस (आम ऑक्सीजन) | डार्क ऑक्सीजन (Dark Oxygen) |
| क्या चाहिए? | पौधे और CO2 | खनिज पत्थर और बिजली का करंट |
| कहां होता है? | जमीन और पानी की सतह पर | समंदर की अंधी गहराइयों में |
| प्रक्रिया | जैविक (Biological) | भू-रासायनिक (Geochemical) |
स्रोत: National Oceanic and Atmospheric Administration (NOAA)
यानी प्रकृति के पास ऑक्सीजन बनाने का एक दूसरा रास्ता भी है, जो शायद करोड़ों सालों से चुपचाप काम कर रहा है.
‘साइंटिफिक अमेरिकन’ की रिपोर्ट के मुताबिक पृथ्वी के इतिहास में एक बहुत महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है- 'ग्रेट ऑक्सीजनेशन इवेंट' (Great Oxygenation Event). यह लगभग 2.4 अरब साल पहले हुआ था.
तब पहली बार पृथ्वी के वातावरण में ऑक्सीजन तेजी से बढ़ी. माना जाता है कि इसका कारण फोटोसिंथेसिस करने वाले सूक्ष्म जीव थे. लेकिन अब वैज्ञानिक सवाल उठा रहे हैं. अगर समंदर की गहराई में पहले से ऑक्सीजन बन रही थी, तो क्या जीवन की शुरुआत वहीं से हुई होगी?
संभव है कि शुरुआती जीव इन गहरे समुद्री वातावरण में पनपे हों, जहां ऑक्सीजन थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पहले से मौजूद थी. यह विचार जीवन की कहानी पूरी तरह बदल सकता है.
अंतरिक्ष में जीवन की खोज को नई दिशाइस खोज का असर सिर्फ पृथ्वी तक सीमित नहीं है, यह अंतरिक्ष विज्ञान को भी बदल सकती है. अब तक वैज्ञानिक जीवन खोजने के लिए एक शर्त मानते थे-सूरज की रोशनी. लेकिन अगर बिना सूरज के भी ऑक्सीजन बन सकती है, तो जीवन अंधेरे ग्रहों पर भी हो सकता है.
‘नासा एस्ट्रोबायोलॉजी’ (NASA Astrobiology) की ‘प्लानेटरी साइंस न्यूज़’ के मुताबिक वैज्ञानिक अब 3 मुख्य जगहों पर ध्यान दे रहे हैं:
- यूरोपा (Jupiter's Moon Europa): बृहस्पति का चांद. इसके ऊपर मोटी बर्फ की परत है लेकिन उसके नीचे विशाल समंदर है. अगर वहां भी ऐसे खनिज मौजूद हों तो डार्क ऑक्सीजन बन सकती है.
- एनसेलाडस (Saturn's Moon Enceladus): शनि का चांद. यहां से पानी के गीजर अंतरिक्ष में निकलते देखे गए हैं, जो अंदर समंदर होने का संकेत हैं.
- टाइटन (Saturn's Moon Titan): यहां की नदियां मीथेन की हैं, पर गहराई में पानी का महासागर होने का अनुमान है. अगर वहां भी करंट पैदा हुआ, तो वहां जीवन की संभावना बढ़ जाती है.
अब कहानी का दूसरा पक्ष भी है. यही पॉलीमेटालिक नोड्यूल्स कंपनियों के लिए खजाना हैं. इनमें कोबाल्ट, निकेल और लिथियम है. वही चीजें जो आपके फोन और इलेक्ट्रिक कार की बैटरी बनाने में काम आती हैं. कई बड़ी कंपनियां और देश इन पत्थरों को समंदर से निकालने (Mining) की तैयारी में हैं.
लेकिन डार्क ऑक्सीजन की खोज ने खतरे की घंटी बजा दी है. अगर हमने ये पत्थर निकाल लिए, तो समंदर की गहराई में रहने वाले उन जीवों का क्या होगा जो इसी 'डार्क ऑक्सीजन' पर जिंदा हैं? यह एक बड़ा ईकोलॉजिकल संकट बन सकता है.
‘द गार्डियन’ की इनवायरमेंटल रिपोर्ट (The Guardian - Environment Report) के मुताबिक वैज्ञानिकों का कहना है कि “हमें पहले पूरी तरह समझना होगा कि ये सिस्टम कैसे काम करता है.”
'बैटरी पत्थरों' के लिए छिड़ी जंग: कौन-कौन रेस में है?ये काले पत्थर सिर्फ साइंस का करिश्मा नहीं हैं, ये अरबों डॉलर का धंधा भी हैं. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक पूरी दुनिया में इन पत्थरों को लेकर 'कोल्ड वॉर' शुरू हो चुकी है.
इस ‘डीप सी माइनिंग’ के खेल में कई खिलाड़ी शामिल हैं.
- द मेटल्स कंपनी (The Metals Company): यह कनाडा की एक बड़ी माइनिंग कंपनी है जो प्रशांत महासागर के इसी 'क्लेरियन-क्लिपरटन ज़ोन' में खुदाई करने के लिए सबसे आगे खड़ी है.
- चीन (China): चीन इस वक्त डीप सी माइनिंग में सबसे बड़ा प्लेयर बनने की कोशिश कर रहा है. उसके पास सबसे ज्यादा एक्सप्लोरेशन लाइसेंस हैं.
- नॉर्वे (Norway): नॉर्वे ने हाल ही में अपने समुद्री क्षेत्र में व्यावसायिक माइनिंग को मंजूरी दी है, जिसका पूरी दुनिया में विरोध हो रहा है.
ऐसा नहीं है कि सभी देश ‘डीप सी माइनिंग’ के समर्थक है. इसका विरोध करने वाले देशों की तादाद भी कम नहीं. फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों ने इस पर 'पॉज' (रोक) लगाने की मांग की है. उनका कहना है कि “जब तक हम 'डार्क ऑक्सीजन' के असर को नहीं समझ लेते, हमें खुदाई नहीं करनी चाहिए.”

कंपनियां कहती हैं कि हमें 'ग्रीन एनर्जी' (EV) के लिए ये धातुएं चाहिए. लेकिन वैज्ञानिक कह रहे हैं कि 'ग्रीन' होने के चक्कर में हम समंदर की 'सांस' नहीं छीन सकते.
विज्ञान की किताबों में नया अध्याय‘बीबीसी साइंस फोकस मैगजीन’ के मुताबिक डार्क ऑक्सीजन की खोज कई बड़े सवाल खड़े करती है. धरती की सतह का लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा समुद्र से ढका है, लेकिन हमने उसे सिर्फ 20 प्रतिशत ही एक्सप्लोर किया है. यह खोज हमें याद दिलाती है कि प्रकृति के पास अब भी कई छिपे हुए राज हैं.
भविष्य में जब स्कूल की किताबों में ऑक्सीजन का अध्याय पढ़ाया जाएगा, तो उसमें पेड़-पौधों के साथ समंदर के अंधेरे पत्थरों का भी जिक्र होगा. और शायद तब तक हमें यह भी पता चल जाए कि हम ब्रह्मांड में अकेले हैं या नहीं.
वीडियो: फरवरी में गर्मी पड़ने का साइंस क्या है?

















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