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युद्ध के समय ORS ईजाद कर लोगों की जान बचाई, कौन हैं पद्म विभूषण पाने वाले दिलीप महालनाबिस

लड़ाई छिड़ी थी, हैजा फैल गया, दिलीप महालनाबिस न होते तो हजारों की मौत होती

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डॉक्टर दिलीप महालनाबिस(फोटो: आजतक)

डॉक्टर दिलीप महालनाबिस (Dr. Dilip Mahalanabis) को बुधवार, 22 मार्च को मरणोपरांत पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया. दिलीप महालिनाबिस की कहानी शुरू होती है साल 1971 से. इस साल बांग्लादेश युद्ध के दौरान काफी सारे बांग्लादेशी शरणार्थी पश्चिम बंगाल पहुंचे थे. नॉर्थ 24 परगना जिले के बनगांव इलाके में शरणार्थी शिविर बनाए गए थे. इन शिविरों में हैजा(Cholera) बीमारी फैल गई थी. इस दौरान बनगांव के अस्पताल के दो कमरों में सिर्फ हैजा के मरीज भरे पड़े थे. इन मरीजों के इलाज के लिए ना तो आईबी फ्लूइड मौजूद था और ना ही कोई प्रशिक्षित व्यक्ति. उस समय डॉ. दिलीप महालनाबिस ने इन मरीजों को बचाने के लिए ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन यानी ORS का इजाद किया था. उनके ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन से हजारों मरीजों की जान बच पाई थी.

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कौन हैं दिलीप महालनाबिस?

साल 1934 में बांग्लादेश के किशोरगंज में जन्मे दिलीप महालनाबिस ने साल 1958 में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से ग्रेजुएशन किया था. इसके बाद उन्होंने कलकत्ता हास्पिटल के पीडियाट्रिक डिपार्टमेंट में इंटर्नशिप की और फिर इंग्लैंड में मेडिसिन की पढ़ाई भी पूरी की. बाद में चलकर दिलीप लंदन के क्वीन एलिजाबेथ हॉस्पिटल फॉर चिल्ड्रन के रजिस्ट्रार बनने वाले पहले भारतीय भी थे. उन्होंने जॉन्स हॉपकिन्स इंटरनेशनल सेंटर फॉर मेडिकल रिसर्च एंड ट्रेनिंग में हैजा और दूसरी डायरिया वाली बीमारियों की पढ़ाई भी की.

किन हालातों में बनाया ORS

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2009 में दिलीप महालनाबिस ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को दिए एक इंटरव्यू के दौरान बताया था,

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'हैजा से कई मौतें हुई थी. जब मैं पहुंचा, तो बनगांव के अस्पताल में गंभीर रूप से बीमार मरीज फर्श पर पड़े थे. हमारे पास पर्याप्त IV फ्लूइड नहीं था और मेरी टीम के केवल दो मेंबर फ्लूइड चढ़ाने में प्रशिक्षित थे. मेरे पास ORS का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने के अलावा और कोई चारा नहीं था. मुझे विश्वास था कि यह काम कर सकता है, लेकिन जरूरी नहीं था कि उन परिस्थितियों में ये काम करता. मुझे ये भी डर था कि अगर यह (ORS) काम नहीं करता है, तो हमारे पास और कोई विकल्प नहीं होगा. यह बहुत बड़ी राहत थी, जब ये तरीका काम आया.'

डॉ. दिलीप महालनाबिस ने साल 1975 और 1979 के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन की तरफ से अफगानिस्तान, मिस्र और यमन में कॉलरा कंट्रोल यूनिट में काम किया था. और 80 के दशक में उन्होंने बैक्टीरियल बीमारियों के मैनेजमेंट पर WHO कंसल्टेंट के रूप में काम किया था. अपने करियर के दौरान डॉक्टर दिलीप महालनाबिस को मेडिकल फील्ड में कई पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया है. साल 2002 में उन्हें एक इंटरनेशनल पीडियाट्रिक अवॉर्ड, पोलन प्राइज से सम्मानित किया गया था. और साल 2006 में उन्हें थाईलैंड का प्रिंस महिडोल अवॉर्ड भी दिया गया था.  बता दें कि 17 अक्टूबर, 2022 को 87 साल की उम्र में फेफड़ों में इन्फेक्शन के चलते उनकी मौत हो गई थी. कोलकाता के एक प्राइवेट अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली.

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