
प्रीति अपने बयान पर सफाई दे रही हैं, लेकिन इस सफाई देने से ज़रूरी काम ऐक्शन लेना है, अपनी राजनीति बचाना नहीं.
20 जनवरी की शाम को जब आग लगी, तो बीजेपी की नेता और एनडीएमसी की मेयर प्रीति अग्रवाल मौके पर पहुंचीं. उस वक्त तक वो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को घेरने की कोशिश कर रहीं थी. नेता हैं तो जाहिर हैं कि सियासत करेंगी, सो वो कर रहीं थीं. लेकिन जब बात फैक्ट्री पर आई, तो वो घिर गईं. जब पत्रकारों ने उनसे सवाल किए तो वो अपने साथी के कान में फुसफुसा रही थीं. वीडियो में उन्हें कहते हुए सुना गया-
इस फैक्ट्री की लाइसेंसिंग हमारे पास है, इसलिए हम इसपर कुछ नहीं कह सकते. वीडियो देखिए-
हादसे के बाद शोक जताना, जांच के आदेश देना, मुआवजा देना और फिर मामले से पल्ला झाड़ लेना नेताओं की सियासत का उसूल बन गया है. दिल्ली में 17 लोगों की मौत हुई है. वहां से आ रहीं फोटोज ऐसी हैं, जो आपको विचलित कर सकती हैं. सोचिए, जब हम इन फोटोज को देखकर दहशत में आ जा रहे हैं, तो इन फोटो को अपने कैमरे में उतारते वक्त उन फोटोग्राफरों पर क्या बीत रही होगी और मेयर कह रहीं है हम कुछ नहीं कर सकते. मेयर कर सकती हैं, बहुत कुछ कर सकती हैं. अगर उन्हें लगता है कि वो कुछ नहीं कर सकती हैं तो फिर उनकी मदद किए देते हैं.
# कम से कम अभी से जितनी भी फैक्ट्रियां हैं उनकी जांच के आदेश दे दीजिए.
# हादसे का इंतजार मत करिए, तुरंत ऐक्शन लीजिए और फैक्ट्रियों का लाइसेंस कैंसल करिए.
# मरने वाले लोग 200 रुपये की दिहाड़ी पर काम करते थे, उनके परिवारों के लिए कुछ करिए, उनकी मदद करिए.
# सिर्फ बयान देने से काम नहीं चलने वाला, आरोप लगाकर कुछ नहीं मिलेगा, इसलिए काम के जरिए सियासत करिए, आरोपों के जरिए नहीं.
# जो कुछ नहीं कर सकता, उसे जिम्मेदारी छोड़ देनी चाहिए. यानि उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए.
करने के लिए पांच चीजें हैं. या तो आप शुरुआत के चार काम करिए और अगर ये चार काम आपसे नहीं हो पाते तो आपके लिए पांचवा काम करना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा.करने के लिए तो बीजेपी के और भी नेताओं के पास बहुत कुछ है. एमसीडी की मेयर इतना गैरजिम्मेदाराना बयान दे रही हैं और बीजेपी के नेता उन्हें डिफेंड करने की कोशिश कर रहे हैं. इनमें सबसे बड़ा नाम दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी का है.

दिल्ली बीजेपी के अध्य्क्ष मनोज तिवारी प्रीति अग्रवाल के बयान को डिफेंड कर रहे हैं.
मनोज तिवारी यूपी और बिहार के लोगों में लोकप्रिय हैं. नेता से ज्यादा लोकप्रियता उनकी बतौर गायक रही है. उन्हीं यूपी और बिहार वालों की बदौलत आज वो सांसद हैं और सियासत में एक बड़ा नाम हैं. इस हादसे में जिन 17 लोगों की मौत हुई है, वो भी यूपी और बिहार के ही लोग हैं, जो कमाने के लिए अपने घरों को छोड़कर दिल्ली आए थे. अब वो लौटकर कभी अपने घरों को नहीं जा पाएंगे. अगर लाशों पर ऐसी ही राजनीति होती रही, तो मरने वालों के जो अपने लोग हैं, उनका भरोसा टूट जाएगा. भरोसे के टूटने का मतलब क्या होता है, ये शाइनिंग इंडिया या फिर कांग्रेस की हालत को देखकर समझ सकते हैं.
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