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कहानी उस चेन्नई महानगर की, जहां हर साल बारिश अपने साथ मौतें भी लाती है

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चेन्नई. भारत का एक महानगर. समंदर के किनारे बसा एक बेहद खूबसूरत शहर. इसकी खूबसूरती पर दाग लगा रही है लगातार हो रही बारिश. पिछले 8 दिनों की बारिश ने इस शहर पर ऐसा कहर ढाया है कि अब तक 12 लोगों की मौत हो चुकी है. हजारों लोग बेघर हो गए हैं और राहत शिविरों में शरण लिए हुए हैं. अभी अगले कुछ और दिनों तक हालात काबू में नहीं आने वाले हैं. ऐसा हम नहीं, मौसम विभाग कह रहा है. ऐसी स्थिति पहली बार नहीं हुई है. चेन्नई में हर साल बारिश आती है और शहर को तबाह कर चली जाती है. हर साल शहर फिर से खुद को समेटता है और फिर से ढर्रे पर लाने की कोशिश करता हुआ अगले साल होने वाली बारिश का इंतजार करता है.

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चार दिनों की बारिश में हजारों लोग बेघर हो गए हैं.

ऐसा अनायास नहीं हुआ है. 1 दिसंबर 2015. अब भी चेन्नई के लोग उस दिन को याद कर सिहर जाते हैं. चेन्नई में 24 घंटों तक लगातार मूसलाधार बारिश होती रही. बारिश के दौरान 270 के करीब लोगों की मौत हो गई और हजारों लोग बेघर हो गए. मौसम विभाग ने बताया कि 24 घंटों में कुल 272 मिलीमीटर बारिश हुई थी, जो बीते सौ साल की सबसे अधिक बारिश थी. एनडीआरएफ, सेना, तटरक्षक बल सबको लगाना पड़ा था. अगले चार दिनों तक बारिश होती रही. महीनों लग गए थे, लोगों को सामान्य स्थिति तक पहुंचने में.

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2015 में 270 लोगों की मौत बारिश की वजह से हुई थी.

2015 की भयावहता को अगर एक बार के लिए छोड़ भी दें, तो 1969, 1976, 1985, 1996, 1998 और 2005 में भी चेन्नई ने बारिश का कहर झेला है. मौसम विभाग के मुताबिक 2005 में 270 मिलीमीटर,1969 में 280 मिलीमीटर और 1976 में 452 मिलीमीटर बारिश हुई थी. 1976 में तो अडयार नदी ओवरफ्लो हो गई थी और इसका पानी लोगों के घरों की पहली मंजिल तक पहुंच गया था. 2015 की बारिश ने इतना किया कि लोगों को अलर्ट कर दिया. वो संकट इतना बड़ा था कि चेन्नई के हालात का जायजा लेने और बारिश से हुई तबाही की वजह पता करने के लिए एक संसदीय समिति बनाई गई. इस समिति ने जांच के बाद जो रिपोर्ट बनाई, उसमें कहा गया-

झीलों और नदियों पर हुए अवैध अतिक्रमण ने चेन्नई के हालात खराब करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है.

संसदीय समिति की रिपोर्ट को 2016 में राज्यसभा में पेश किया गया. इसमें कहा गया था-

कमेटी को ऐसा लगता है कि राज्य सरकार को उन माफिया की जांच करनी चाहिए, जो अपने बिजनेस के लिए अवैध निर्माण कर रहा है और पानी के स्रोतों पर अतिक्रमण कर उन्हें अपने रियल स्टेट के धंधे में लगा रहा है. नदियों के किनारों और बाढ़ के पानी के स्रोतों को जितना जल्दी संभव हो सके, खाली करवाना चाहिए.

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उत्तरी चेन्नई में बनी इन्नौर झील का दायरा सिमटता जा रहा है.

इस रिपोर्ट को आए हुए दो साल हो गए हैं. हालात पहले से सुधरने की बजाय बिगड़ते ही जा रहे हैं. इसकी वजह भी साफ तौर पर दिख रही है. बीबीसी ने इसी साल सितंबर में एक रिपोर्ट पेश की थी. इस रिपोर्ट के मुताबिक राज्य सरकार के तहत आने वाले कामराज पोर्ट ने प्रस्ताव दिया था कि 1000 एकड़ में इकट्ठा हो रहे पानी को खाली करके उस जमीन को औद्योगिक रियल एस्टेट सेक्टर की कार पार्किंग बना ली जाए, जो ऑटोमोबाइल, कोल यार्ड और वेयर हाउस के काम आ सके. रिपोर्ट में बताया गया है कि अथॉरिटी ने पर्यावरण के नियमों का उल्लंघन किया और इन्नौर खाड़ी के पास अतिक्रमण करने का रास्ता साफ कर दिया. इन्नौर खाड़ी उत्तरी चेन्नई में 8000 एकड़ का वेट लैंड है.चेन्नई की तीन नदियों कोयूम, अडयार और कोशास्थली में से एक नदी कोशास्थली बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले इन्नौर खाड़ी से ही गुजरती है. अतिक्रमण के बाद से वो लोग बारिश के मौसम में प्रभावित हुए, जो इन्नौर के आस-पास के इलाकों में रहने वाले थे.

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बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले कोशास्थली नदी इन्नौर से होकर गुजरती है, जिसपर अवैध अतिक्रमण है.

अतिक्रमण की वजह से इन्नौर के 8000 एकड़ में से 1000 एकड़ जमीन कब्जा हो गई है, जो 1996 से 2015 के बीच हुई है. ये सारा अतिक्रमण विकास के नाम पर किया गया है. संसदीय समिति की रिपोर्ट कहती है कि 2015 में बारिश के दौरान पावर प्लांट, इसके कोयले के रैक और राख के तालाब ने पानी का रास्ता रोक दिया और यही पानी शहर में बाढ़ बनकर सामने आया.

चेन्नई का विकास स्थाई नहीं है. इसका विकास मॉडल ही ऐसा है, जो टिक नहीं सकता है. बतौर महानगर चेन्नई का विकास 1976 में ही शुरू हुआ था. उस वक्त तक चेन्नई को एक बड़े से गांव के तौर पर देखा जाता था. नई-नई पार्टी एआईएडीएमके की स्थापना हुई थी. पार्टी चुनाव जीती थी और एमजी रामचंद्रन मुख्यमंत्री बने थे. उसके बाद से ही चेन्नई के विकास ने जो रफ्तार पकड़ी, उसने चेन्नई का भौगोलिक और सुविधाओं के तौर पर विकास तो किया, लेकिन इसकी वजह से जान-माल का जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई शायद ही हो पाए.

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चेन्नई का एअरपोर्ट, जहां 2015 में पानी भर गया था और कई दिनों तक उड़ाने प्रभावित थीं.

चेन्नई में एक नया एअरपोर्ट बना है, जो अडयार नदी के पानी वाले क्षेत्र में बनाया गया है. एक नया बस अड्डा बना है, जो बाढ़ प्रभावित इलाके कोयम्बडू में बना दिया गया है. बकिंघम कैनाल जो पहले 25 मीटर हुआ करती थी, अब उसकी चौड़ाई मात्र 10 मीटर रह गई है और उसके आस-पास भी मास रैपिड ट्रांजिट सिस्टम विकसित किया गया है. इसके अलावा पल्लीकरनाई की जो दलदली जमीन पहले 50 वर्ग किलोमीटर में फैली हुई थी, उसका दायरा घटकर 4.3 वर्गकिलोमीटर रह गया है, जिसकी वजह से यहां बाढ़ का नहीं अवशोषित नहीं हो पाता है. इतना ही नहीं नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ ओसियन टेक्नॉलजी भी इसके किनारों पर ही बसा दी गई है. ये वो संस्था है, जिसे पानी के स्रोतों के आस-पास हुए विकास के कामों से हो रहे पर्यावरणीय नुकसान का आंकलन करना है. इसके अलावा चेन्नई की एक मदुरावोयल झील जो पहले 120 एकड़ में थी, अब सिमटकर 25 एकड़ में हो गई है. चेन्नई के विकास के लिए 2010 में जो मास्टर प्लान बना था, उसकी हालत को बयान करने केलिए पानी के स्रोतों की ये दुर्गति काफी है. रही सही कमी को कामराजार पोर्ट और उसकी जरूरतों ने पूरा कर दिया है, जो इन्नौर में बना है.

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कामराज पोर्ट के लिए भी वेटलैंड की जमीन पर पार्किंग और अन्य चीजें बनाई जा रहीं हैं.

शहर के एक्सप्रेस वे और बाईपास रोडों को बनाने में भी बारिश के पानी की निकासी का ध्यान नहीं रखा गया है. ऑटोमोबाइल, टेलिकॉम सेज और रहने के लिए कई कॉलोनियां ऐसी जगहों पर विकसित की गईं हैं, जहां या तो जलभराव का विरोध है या फिर जहां से अतिरिक्त पानी की निकासी होती है.

चेन्नई में बारिश पहले भी होती रही है. चेन्नई में पहले से वेटलैंड भी हैं. कृत्रिम तौर पर बनाई गई नालियां, झीलें, कैनाल और पानी निकासी के स्रोत हैं, जो बारिश और तूफान के पानी को सोख लिया करते थे. लेकिन चेन्नई के विकास के नाम पर जो बनाया गया है, उसने इस वेटलैंड को पूरी तरह से खत्म कर दिया है. चेन्नई की एक संस्था केयर ईयर ने अपनी रिसर्च में पाया है कि चेन्नई का विस्तार 47 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 402 वर्ग किलोमीटर पहुंच गया है. इसका प्रभाव ये हुआ है कि जिस चेन्नई में 186 वर्गकिलोमीटर का वेट लैंड था, वो अब 71 वर्ग किलोमीटर तक आ गया है. ये आंकड़े 1980 से 2012 के बीच के हैं, जो एक शहर के विकास को दिखाते हैं.

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10,000 से ज्यादा लोग बेघर हो गए हैं.

इस साल भी चेन्नई पिछले तीन दिनों से बारिश का कहर झेल रहा है. 12 मौतें हो चुकी हैं. पूरा प्रशासनकि अमला अलर्ट है. मौसम विभाग कह रहा है कि और बारिश होगी. इस चेतावनी ने लोगों में दहशत भर दी है. 10, 000 से ज्यादा लोग 105 राहत कैंपों में शरण लिए हुए हैं. स्कूल-कॉलेजों को बंद कर दिया गया है. शहर के कई इलाकों में बिजली की सप्लाई रोक दी गई है.

अगर अब भी होने वाले विकास के नाम पर नदियों की धारा रोकी जाती रहेगी, वेटलैंड को खत्म किया जाता रहेगा, विकास के नाम पर अवैध अतिक्रमण कर अनाप-शनाप निर्माण किया जाता रहेगा, चेन्नई और चेन्नई जैसे शहर ऐसी ही भयावहता से दो-चार होते रहेंगे और पूरे साल हो रहे विकास को चार दिन की बारिश एक ही झटके में बहाती रहेगी.


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