The Lallantop

पाक के एक बड़े मौलवी पर बीवी का इल्जाम, मदरसे की आड़ में करता है रेप

पूरी कहानी पढ़ोगे तो दंग रह जाओगे. एक लंबी तहरीर है जिसे पाकिस्तान के ही एक मुफ़्ती ने लिखा है.

Advertisement
post-main-image
फोटो - thelallantop

पाकिस्तान के एक बड़े मुफ़्ती पर इल्जाम लगा है. ये मौलवी पाकिस्तान में मदरसा चलाते हैं. खासकर लड़कियों के लिए. कई इस्लामी किताबें लिख चुके हैं. शरीयत की बातें ऐसी करते हैं कि जैसे उनसे बड़ा कोई मोमिन ही नहीं. नाम है मौलाना मोहम्मद इलियास घुम्मन. सरगोधा, पाकिस्तान के रहने वाले हैं. लेकिन उनका एक और खौफनाक चेहरा बताया जा रहा है. जो उनकी बीवी ने सबके सामने लाने का दावा किया है. जिसे इस्लाम के बहाने छिपाने और दबाने की कोशिश की गई. IBC Urdu वेबसाइट के लिए इसे मुफ़्ती मोहम्मद रेहान ने मौलवी की बीवी से मिलने के बाद उर्दू में लिखा. हिंदी तर्जुमा पढ़िए...

Advertisement

हम आपको इसे सिर्फ यहां इसलिए पढ़वाना चाहते हैं कि कोई मौलवी खुदा नहीं होता. जो हर बात का यकीन कर लिया जाए. अपने आसपास नजर बनाए रखिए. मौलवी पर लगे इल्जाम कितने सच हैं और कितने झूठ ये तो पता नहीं. लेकिन ऐसा नहीं है कि शैतान मदरसे में एंट्री नहीं कर सकता. कहीं कुछ गलत हो रहा है तो उसे सामने लाने में ही भलाई है.

मगर शौहर एक शजर (पेड़) की तरह साया करने वाला होता है. वो शजर न रहा और जालिम धूप ने मेरे घर के आंगन में हरे-भरे फूल कुम्हला दिए... फूल जैसे बच्चों की यतीमी का दर्द क्या होता है ये एक मां से ज्यादा कौन जान सकता है.
मुझे नहीं मालूम था कि एक खूबसूरत लिबास में लिपटे कितने बड़े फ्रॉड के चंगुल में उलझने जा रही हूं. नहीं मालूम था कि कैसा जालिम दरिंदा मुझे अपने फरेब में फंसाने के लिए जाल बिछा चुका है. मैंने निकाह के लिए हां कर दी. साल 2012 में पांच अप्रैल को मैं एक बहरुपिये की जिंदगी में निकाह करके शामिल हो गई.

Advertisement
बड़े मुफ़्ती साहब के नाम रोजाना ढेर सारे ख़त आते थे. मेरी जिम्मेदारी थी कि उन खतों में से अहम खतों को अलग करूं और जो जरूरी नहीं हैं उनकी छंटनी करूं. वो एक मोटा लिफाफा था. मैंने उसे खोला और उसका मजमून देखकर ठिठक गया, क्योंकि ये एक तफसीली ख़त था, जो एक बहुत ही मशहूर आलिमे दीन मौलाना मोहम्मद इलियास घुम्मन की बीवी और तबलीगी जमात के एक बहुत बड़े बुज़ुर्ग की बेटी ने तहरीर किया था. मैंने उसे पढ़ना शुरू किया तो मेरे माथे पर पसीने के कतरे उभर आए. और मेरी रीढ़ की हड्डी में सनसनाहट सी होने लगी. मेरे हाथों में लर्जिश होने लगी. मुझे अपनी आंखों पर यकीन नहीं आ रहा था. मैं सोचने लगा शायद ये किसी ने बहुत ही गंदा, बेहुदा और जालिमाना मजाक किया है. शायद मैं ऐसा सोचने को मजबूर था, क्योंकि जिस आलिम-ए-दीन के बारे में दो टूक अंदाज में बात कही गई थे. उनके बारे में मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता था. ख़त के आखिर में मोहतरम खातून (औरत) ने अपना फोन नंबर भी दिया हुआ था और ज्यादा तहकीकात के लिए राब्ता कायम करने की दरख्वास्त की थी. मैंने ख़त चुपके से अपनी जेब में रख लिया और मामले की तह तक जाने की ठानी. अगले दिन जुम्मा था. और मैं पूरी तरह से फारिग था. मैं ने वो ख़त निकाला और दोबारा पढ़ा. फिर एक बार पढ़ा. ख़त में इस मामले को लेकर फतवा मांगा गया था. लेकिन मैं उस ख़त को मुफ़्ती साहब के सामने रखने से पहले उस खातून से मिलकर सारा किस्सा सुनना चाहता था. वो खातून जहां रहती थीं, उसके करीब ही मेरे एक दोस्त का मदरसा था. मैंने अपने दोस्त को फोन किया. और उससे दरयाफ्त किया कि मदरसे या घर में परदे का इंतजाम करके उस खातून से मुलाकात का एहतमाम किया जाए. जुम्मे के बाद उस खातून से मिलने का वक्त मुक़र्रर हुआ. मैं अपना मोबाइल पूरी तरह चार्ज करके और अपनी डायरी लेकर दोस्त के घर पहुंचा. मोहतरम खातून पहले ही तशरीफ़ ला चुकी थीं. बीच में एक परदा लटकाकर परदे का इंतजाम किया गया था. मैंने पहुंचते ही खातून को सलाम किया और उनके मरहूम वालिद (मर चुके पिता) के साथ अपनी अकीदत (श्रद्धा) बयान की. और फिर उनसे अपने दिल का हाल बयान करने की गुजारिश की. साथ ही तसल्ली भी दी. कुछ देर तक ख़ामोशी छाई रही. शायद खातून अपना हौसला जुटा रही थीं और बिखरे हुए ख्यालात को कुछ तरतीब देने की कोशिश कर रही थीं. कुछ देर बाद उन्होंने अपना गला खकारा और बोलीं... मैं अपने वालिद की लाडली बेटी थी. मेरे वालिद मुफ़्ती जैनुल आबिदीन अल्लाह के रास्ते की तरफ लोगों को बुलाते रहे. उनकी इस्लामी स्पीच आज भी दुनिया में शौक से सुनी जाती है. मेरी तालीम और तरबियत में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी. जब मैं बालिग हुई तो उन्होंने मेरा निकाह अपने मदरसे के एक मौलाना सैयद अनवर अली शाह के साथ सादगी से पढ़ दिया. वो एक आलिम-ए-दीन थे. जिंदगी के कितने बरस हमने साथ गुजारे थे. और उन्होंने मुझे शिकायत का कभी कोई मौका नहीं दिया था. हमारा घर में कभी कोई झगड़ा नहीं हुआ. न किसी बात पर नाराजगी. उनसे मेरे पांच बच्चे पैदा हुए. दो बेटे और तीन बेटियां 22 साल हमने साथ गुजारे. और फिर मौत का फ़रिश्ता आ पहुंचा. मेरे शौहर का इंतकाल (मौत) हो गया. ऐसा लगा जैसे मेरे गुलिस्तां (बगीचा) को किसी की नजर लग गई. और मेरा गुलशन उजड़ गया. मुझे भाइयों की पूरी सपोर्ट थी. और दुनियावी ऐतबार से मुझे कोई कमी नहीं थी. मैं मां से ज्यादा बाप बनके बच्चों की परवरिश कर रही थी. तंगदस्ती भी कोई नहीं थी. एक दिन सरगोधा के एक मौलवी मोहम्मद इलियास घुम्मन निकाह का पैगाम लेकर मेरे घर पहुंच गए. मेरे भाइयों से मिले और अपने जादूगरी लहजे में बात करके मेरे भाइयों को पटाने की कोशिश की. कहने लगे मुझे निकाह की कोई जरूरत नहीं. मगर मुझे इस्लाम की सुन्नत जिंदा करनी है. वो क्या हैं न कि पंजाब (पाकिस्तान वाला) में आए दिन सुन्नत मरने लगती है और लोग बेवा (विधवा) औरतों से निकाह करने को गलत समझते हैं. ऐसे में अगर मैं एक सुन्नत जिंदा करूंगा तो न सिर्फ मुझे सवाब (पुण्य) मिलेगा, आप लोगों को भी सौ शहीदों का सवाब मिलेगा. मौलवी साहब मशहूर आदमी थे. और अपनी इस्लामी स्पीच से अपने काफी फॉलोवर्स बना चुके थे. जलसों और इस्लामी बहसों में उन्हें शौक से बुलाया जाता था. भाइयों ने जवाब दिया कि पहले वो अपनी बहन से राय लेंगे. मेरे पास आए और निकाह के बारे में पूछा. मेरे भाई उसकी चंदाखोरी करने वाली आदत से मेरा निकाह उससे कराने से पीछे हट रहे थे, लेकिन कुछ रिश्तेदार मौलवी के फेवर में बाते करके मुझे निकाह के लिए मनाने लगे. मैं इंकार करती रही. लेकिन सबके जहन को अल्लाह जानता है. मैंने उसके नाम के साथ आलम-ए-दीन का टाइटल लगा देखा तो सोचा, शायद अल्लाह को मेरे ऊपर तरस आ गया है. और अब मेरी जिंदगी में रूठी बहारें लौट आएंगी. मेरे बच्चों को बाप का साया मिल जाएगा. और उन्हें यतीमी के दर्द से निजात मिल जाएगी. मैंने शर्त रखी थी कि मैं बदस्तूर फैसलाबाद में अपने ही घर में रहूंगी. और अगर सरगोधा गई तो सिर्फ घूमने के लिए. उन्हें कोई एतराज नहीं था. महीने में एक दो बार आते थे जिम्मेदारी उठाने. बीवी के हक़ अदा करने की हामी भरी थी. शुरू में मेरे शौहर मेरे वालिद के नाम का फायदा उठाने की चाहत रखे हुए था. मेरे वालिद की जान पहचान वालों से उन्होंने कांटेक्ट बनाए. क्योंकि वो चाहते थे कि मदरसे के बहाने उनसे मोटा चंदा वसूल किया जाए.और ऐसा मेरे बड़ी बेटी की शादी हो चुकी थी. दो छोटी थीं. एक 14 साल की दूसरी नौ साल की. उसकी नियत का फितूर मुझ पर उस दिन खुला जब वो मुझे सरगोधा अपने घर मदरसा और पहली बीवियों से मिलाने ले जाने लगे. मेरा बेटा 17 साल का था जो गाड़ी चला रहा था. मुझे उन्होंने आगे बैठने को बोल दिया. और कहा मैं तो अपनी बच्चियों के साथ पीछे बैठूंगा... मेरी छोटी बेटी तो सीट पर ही सो गई थी. एक बार जब मैंने पीछे देखा तो वो मेरी बेटी के साथ चिपक-चिपक कर बैठ रहा था. और हाथ पकड़ने की कोशिश कर रहा था. मैंने देखा मेरी बेटी के चेहरे पर नाराजगी के भाव थे. और मौलवी के चेहरे पर शैतानी मुस्कुराहट. मैं खून का घूंट पीकर रह गई... गाड़ी रुकवाई और बहाना करके उन्हें आगे बैठने पर मजबूर किया. इसके बाद तकलीफ का ये न ख़त्म होने वाला सफ़र शुरू हो गया. जब भी घर आता बहाने से बेटियों के कमरे में तांका-झांकी करता. बहाने से उन्हें बाहर ले जाने की कोशिश करता. मैं नाराजगी जताती तो कभी गुस्सा होता तो कभी कसमें खाता कि मैं उन्हें बाप का सच्चा प्यार देने की कोशिश करता हूं. और तुम बेकार में मुझ पर शक करती हो. मगर मुफ़्ती रेहान साहब आपको पता है अल्लाह ने औरत को ऐसी चीज से नवाजा है कि वो मर्द की आंखों में हवस की चमक और शराफत को बहुत अच्छे से महसूस कर लेती है. मैं एक कमजोर औरत थी और वो एक ताकतवर भेड़िया. वो मुझे अपनी बीवी के बजाए रास्ते की दीवार समझने लगा. मेरे लिए लिए उसके हर अंग से नफरत के फव्वारे फूटते. बात-बात पर गालियां. ताने और झिड़कियां उसकी आदत बन गया. मगर मैं भी हार मानने के लिए तैयार नहीं थी. मैंने फैसला कर लिया था चाहे कुछ भी हो जाए, इस दरिंदे को मैं अपनी बच्ची से नहीं खेलने दूंगी. एक कमजोर, बेबस, लाचार मां बेटी और एक भेड़िए के दरमियान ये खेल रोज का किस्सा बन गया. वो बहाने से मेरी बच्चियों से प्यार करता. मैं उसे रोकती तो हदीसों के हवाले देता. रसूल (अल्लाह के दूत) के किस्से सुनाता. मैं कहती ये आपके लिए जायज नहीं कि आप मेरी बच्चियों का माथा चूमो. उन्हें छुओ. ये आपकी बच्चियां नहीं हैं. मगर उसके सिर पर तो एक शैतान सवार रहता था. सिर्फ इस पर ही बस नहीं करता था. मैंने एक गरीब लड़की रखी हुई थी, कोई दस साल की. घर का काम-काज कर लेती थी. ये शैतानी फितरत का इंसान उसे भी माफ़ नहीं करता था. एक दिन मैं बच्चों के साथ भाइयों के घर गई हुई थी. जब वापस आई तो हैरान रह गई, क्योंकि ये दरिंदा उस छोटी सी बच्ची के साथ गलत हरकत कर चुका था.
बच्ची ने मुझे सारा किस्सा सुनाया. मेरे दिल पर आरे (लकड़ी को काटने वाला औजार, जो कंटीला होता है) चलने लगे. मगर मैं बेबस थी. किस से अपना दुःख बयान करती. ये कहकर अपना दर्द सुना रहीं खातून ने अपना मोबाइल परदे के पीछे से मेरी तरफ बढ़ाया और कहा, ' लीजिये मुफ़्ती साहब, आप खुद ही सुन लीजये ये बच्ची क्या कह रही है.
मैंने ये ठीक नहीं समझा कि औरत के सामने ये क्लिप देखूं, इसलिए अपने दोस्त के साथ कमरे से बाहर निकल आया. वो बच्ची कह रही थी- बाबा जी मेरे पास आया. मुझे गले लगाया. मेरा माथा चूमा. उसके बाद मेरा हाथ पकड़कर... (मुफ़्ती साहब ने आगे की बात बयान न करने वाली कहकर नहीं लिखी). मैं ये क्लिप देखकर कांपकर रह गया. एक इतना बड़ा आलिम-ए-दीन और ऐसी शैतानी हरकतें... जमीन क्यों नहीं फटती और आसमान क्यों नहीं गिरता. खातून ने अपनी बात फिर कहनी शुरू की. पहली बार जब मैं सरगोधा में उसके घर पहुंची. तब आहिस्ता आहिस्ता उसके अखलाकी दिवालियापन की हरकतें खुलनी लगीं. उसने कहा तुम बैठो मैं तुम्हारे लिए चाय बनवाकर लाता हूं. मैं बैठी रही. जब काफी वक्त गुजर गया तो मैं उठी और किचन में चली गई. तंग और छोटा सा किचन था. मौलवी साहब बीच में खड़े हैं. उसके मदरसे में पढ़ने वाली एक जवान लड़की साइड में बर्तन धो रही है. दूसरी चाय बना रही है. और तीसरी सब्जी काट रही है. मौलाना कभी एक से मजाक करते हैं, कभी दूसरी की चुटकी भरते हैं. मैंने गला खककारा और वापस कमरे की तरफ मुड़ी. ये मेरे पीछे चले आए. मैंने कहा- क्या आपको खुदा का खौफ नहीं है. मदरसे में लोगों ने क्या अपनी जवान लड़कियां इसलिए भेजी हैं कि आप उनसे घर का काम कराएं. और फिर उनके साथ गपशप लड़ाएं. क्या तुम्हारे लिए शरीयत ने नया कानून निकाला है. क्या तुम्हें उनसे परदा करना वाजिब नहीं है.
वो बेशर्मी से हंसने लगा. नहीं, नहीं मै तो उनके बाप जैसा हूं. मदरसे में क्या कुछ होता रहा. अगर दुनिया को पता चले.. वल्लाह लोग उसका घर और मदरसे दोनों जला दें. रात को उसकी बीवी उठती थी, किसी भी लड़की को आवाज देती. दो तीन घंटे के लिए ये उस लड़की को अपने बिस्तर पर ले जाता. और फिर उसकी बीवी लड़की को वापस मदरसे में छोड़ आती. लड़कियों को ये शैतान अपने उस्ताद की इज्जत करने के फतवे सुनाता. अपनी बात मनवाने की दलीलें सुनाता. और फिर उन्हें इस तरह सबक देता कि वो कुछ नहीं बोल पातीं. लड़कियों की इज्जत का दामन उस जालिम के हाथों तार-तार हो जाता.
उसकी पहले बीवी शरीफ थी. मैं तीसरी बीवी थी. पहली बीवी ने मुझे बताया कि मुफ़्ती ने दूसरी शादी उस औरत से की जो उसकी दलाली करती है और उसके मदरसे की देखभाल करती है. मौलवी मुझे और उस दूसरी बीवी को दो साल तक एक ही कमरे में, एक ही बिस्तर पर सुलाता रहा. जब मुझ से बर्दाश्त नहीं हुआ तो घर अलग कर लिया. मदरसे का घर के सहन में दरवाजा था. दो मदरसे थे. एक लड़कों का दूसरा लड़कियों का. कुछ लड़कियां मुझसे खूब खुल गईं थीं उन्होंने जो बातें मुझे बतायीं उनपर यकीन करना मुश्किल था. एक लड़की ने मुझे बताया कि जब मौलवी साहब घर होते हैं तो उनकी बीवी किसी न किसी लड़की को मदरसे से घर भेज देती है. एक लड़की के साथ तो उसने ऐसा जुल्म किया कि वो लड़की इतना डर गई कि तड़के में ही बुर्का पहन के मदरसे से गायब हो गई जिसका कोई कुछ पता नहीं चला. मदरसे का नाम 'इस्लाह अलनिसा' था. जिसका मतलब होता है लड़कियों के बेहतरी के लिए. मगर यहां तो लड़कियों की जिंदगी बर्बाद की जा रही थी. एक लड़का मदरसे में काम किया करता था. उसकी नई-नई शादी हुई थी. उसने अपनी बीवी को मदरसे में दाखिला दिला दिया. उन दिनों हुआ ये कि मौलवी का छोटा बेटा मर गया. घर में जनाजा रखा हुआ था. सब दूसरे घर में थे. मौलवी दूसरे घर में गया और अपनी बीवी से बोला, उस लड़की को भेज दो जिसकी अभी शादी हुई है. वो लड़की गई, उसने बाद में मुझे किस्सा बताया. लड़की ने बताया, 'जब मैं अंदर गई. चारपाई पर बैठ गई. मौलवी साहब गुसलखाने में थे. वहीं से अपनी बीवी को आवाज दी, तुम जाओ और दरवाजा बंद कर दो. मेरा दिल घबराने लगा. मौलवी साहब गुसलखाने से बाहर आए. जेब से पांच सौ रुपये निकल कर मुझे देने लगे. कहा, रख लो. मैंने कहा नहीं मुझे जरूरत नहीं है. मैंने बुर्का पहना हुआ था. मौलवी साहब पीछे से आए. अचानक मुझे पकड़ा और मेरा नकाब उतार दिया. कहने लगे अपने पीर और उस्ताद से क्या पर्दा. मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा. मैंने कहा बाबा जी आप क्या कर रहे हैं. ऐसा न करें खुदा के लिए. कहने लगे फ़िक्र न करो. थोड़ा उदास हूं. तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मेरे साथ थोड़ा सा टाइम गुजरोगी तो मेरी उदासी ख़त्म हो जाएगी. मैं उसका इरादा समझ गई. मैंने कहा अगर तुम मुझे जाने दोगे तो मैं किसी को नहीं बताउंगी, अगर नहीं जाने दोगे तो मैं अपने शौहर को बताउंगी और अगर मेरे साथ जबरदस्ती की तो चिल्लाउंगी भी और सबको बताउंगी भी. वो थोड़ा सा घबराया और अपनी बीवी को आवाज दी, इसे ले जाओ. मैं मदरसे पहुंची मेरे पास मोबाइल था. मैंने अपने शौहर को फोन करके मदरसे से खुद को ले जाने को कहा.'
सोचिये ये दरिंदगी की इंतेहा नहीं तो और क्या था. घर में बेटे की लाश पड़ी थी. और मौलवी अय्याशी और शैतानी कामों के चक्कर में पड़े हैं. कसम अल्लाह की कोई भी इन बातों का यकीन नहीं कर सकता. मगर जो मैंने देखा वही बयान किया. जब उस लड़की के शौहर ने उसे धमकी दी कि मैं तुम्हे छोडूंगा नहीं, तो मौलवी उसके घर गया और पैरों में टोपी उतार कर रख दी और माफ़ी मांग ली, ताकि बात सब में न फैल जाए,
मैंने सारे हालात की खबर वफाक अल मदारिस चलाने वाले कारी मोहम्मद हनीफ जालंधरी साहब को दी, तो उन्होंने कहा तुम फ़िक्र न करो हम अपनी दो लड़कियों का वहां दाखिला कराएंगे और वो हमें जासूसी करके देंगी, ताकि मुफ़्ती के खिलाफ कार्रवाई कर सकें. अल्लाह जाने उन्होंने कुछ किया या नहीं. मौलवी को तस्वीरें निकालने का बहुत शौक था. उसका मोबाइल लड़कियों कि तस्वीरों से भरा रहता था. बेशर्मी की इंतेहा देखिए. हम मां और बच्चियों के सामने वो गैर लड़कियों के नंबर मिलाकर गपशप लड़ाता था. उसकी सारी करतूतों का राजदार उसका सेक्रेटरी भी था. मदरसे के करीब उसको घर लेकर दिया हुआ था. सेक्रेटरी की शादी मौलवी ने उस लड़की से करा दी थी, जिससे कभी वो खुद शादी करना चाहता था. शादी तो हो गई थी, मगर बेशर्म सेक्रेटरी के सामने ही मुफ़्ती उसकी बीवी से चिपक कर रहता था.
मौलवी के शौक सिर्फ लड़कियों तक ही महदूद नहीं थे. अल्लाह की पनाह, जब भी मौका मिलता खूबसूरत लड़कों को भी नहीं छोड़ता था. मैं बीवी थी उसकी, इसलिए ऐसे किस्से मुझ तक पहुंच ही जाया करते थे. एक किस्सा तो काफी मशहूर भी हो गया था. ये किसी जलसे में गया हुआ था. वहां चार नौजवान कम उम्र के लड़के मिलने के लिए आए. मौलवी उन्हें अपनी बातों से पटाकर अपनी बड़ी गाड़ी पजेरो में बैठा कर निकल गया. शहर में किसी जगह अपनी गाड़ी छोड़ी. किराये की गाड़ी ली. और शहर के बाहर वीराने की तरफ चल पड़ा. दो लड़कों ने काम का बहाना बनके अपना पीछा छुड़ाया. दो उसके साथ चले गए. शाम का वक्त था. रात हो रही थी. जब खूब अंधेरा हुआ, कहने लगा. मुझे किसी के लिए एक अमल (जादू टोना टाइप) करना है. तुम साथ दोगे. रूहों को हाजिर करना है. मैं जो करता जाऊं तुम उसी तरह करना. बस इस बहाने मुफ़्ती ने अंधेरे में उनके कपड़े उतरवाए. और उनसे शैतानी अमल करके वापस लौटा.
हां, मैं तस्वीरों की बात कर रही थी. ये शैतान हर वक्त तस्वीरें लेता रहता था. चाहे मैं किसी भी हाल में होऊं. उसने बच्चियों की भी तस्वीरें ले रखी थीं, जिनको वायरल करने की धमकी देता. जब पानी सिर से उतर गया तो मैंने देवबंद के तमाम बड़े उलेमाओं को ख़त लिखे कि इस मौलवी के हरकतें ऐसी हैं क्या मेरा निकाह उससे टूट गया है. उसको मेरे ख़त का पता चला तो वो सब से मिला. सबको बताया कि मेरी बीवी किसी के बहकावे में आ गयी है. किसी से उसने बड़ी रकम ली है. इतने पर भी बात नहीं बनी तो उसने मुझ पर गंदे इल्जाम लगाने शुरू कर दिए. मैं अपना दुःख किस से बयान करती. जिससे भी कहती थी वो यही कहता सब्र से काम लो, नहीं तो इस्लाम की बदनामी होगी. और ये कहकर मुझे चुप करा दिया जाता.
खुदा की कसम खाकर कहती हूं मुझे किसी ने नहीं कहा था कि मैं ये ख़त लिखकर मौलवी की बदनामी करूं. ये तो मुझे अल्लाह की तरफ से दी गई कुव्वत थी. जो अपनी बच्चियों को उस ज़ालिम से बचाने के लिए आगे आ गई. हर एक मौलवी ने मुझे ये ही कहकर चुप करा दिया कि तुम्हे गलत शक है. वो बड़े दीनदार हैं, आलिम हैं.
मैंने जो कुछ देखा वही बयान किया है अगर आपको सबूत की जरूरत है तो आज ऐलान कर दें कि जिन जिन के खिलाफ मौलवी ने ज्यादती की है, वो इस नंबर पर राब्ता करें. उनकी हिफाज़त की जाएगी और उनके नाम जाहिर नहीं किए जाएंगे. अल्लाह गवाह है बहुत सारे गरीब और बेबस लोग आ जाएंगे, जिनकी बच्चियों की जिंदगी मौलवी ने ख़राब की है. और जो लोग मुझे झूठा मान रहे हैं हैं वो भी बिना किसी तहकीकात के, तो उनसे मैं यही कहूंगी कि वो एक बार उस मौलवी को अपने घर का रास्ता दिखाएं पता चल जाएगा. आप सोचिये अगर आप मेरी जगह होते तो क्या करते. मुझे भी ख्वाहिश थी कि मेरा शौहर हो, जो मुझे मोहब्बत करे. कौन मां होगी जो अपनी बच्चियों के बारे में बुरा सोचेगी, अगर आज मैं नहीं बोलती तो ये दरिंदा मेरी बच्चियों की अस्मत तार-तार कर देता. इतना सबकुछ जो मैंने आप से बयान किया वो तो कुछ भी नहीं है. मेरी जिंदगी की तबाही के बहुत पन्ने हैं. बस मुझे उस दिन का इंतजार है जब इंसाफ मिलेगा... और ये सब कहते कहते खातून की आवाज रुंध गई और मेरी आंख से भी आंसू निकल आए. मैं बोझिल दिल के साथ वहां से निकल आया.

मुफ़्ती का जवाब

मुफ़्ती रेहान साहब ने जब ये तहरीर लिखी तो पाकिस्तान के मौलवियों में हलचल मच गई कुछ खातून को गलत ठहराने लगे तो कुछ मौलवी के कारनामों के किस्से सुनाने लगे. आरोपी मौलवी इलियास घुम्मन ने बाकायदा अपनी टीम बुलाकर कुरान की ऐसी आयतें पढ़कर सुनाईं, जिसके बाद ही कोई शक करे कि मौलवी साहब ने ऐसे कारनामे किए होंगे. सच क्या है ये तो तहकीकात के बाद ही पता चलेगा. अब मौलवी इलियास घुम्मन की बात भी सुन लो. https://www.youtube.com/watch?v=UounrVKntLE
 

ये भी पढ़ें

मदरसे के जालिम मास्टर जी, जंजीरों से बांधकर मारते थे

मदरसे में जंजीर से बांध रखे थे बच्चे

Advertisement
Advertisement