देश के पूर्वोत्तर के राज्यों में से एक असम में 2016 में विधानसभा के चुनाव हुए. इस दौरान केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बने करीब 2 साल हो गए थे. बीजेपी की नजर पूर्वोत्तर के राज्यों में अपना वर्चस्व कायम करने पर थी. असम का चुनाव इसके लिए मुफीद था. असम में पिछले 15 साल से तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार थी. कांग्रेस मुक्त भारत और पूर्वोत्तर में पैर जमाने की कोशिश में लगी बीजेपी ने सर्वानंद सोनोवाल के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का फैसला किया. चुनाव में बीजेपी को जीत भी मिली और असम में पहली बार बीजेपी की सरकार बनी.

केंद्र और राज्य दोनों जगहों पर बीजेपी की सरकार आने के बाद असम में बांग्लादेशी नागरिकों को बाहर करने का मुद्दा और भी जोर पकड़ने लगा.
पाकिस्तान का विभाजन और अवैध शरणार्थी
इस सरकार के बनने के साथ ही असम की दशा और दिशा दोनों ही बदल गई. 1971 में जब पाकिस्तान का विभाजन हुआ और बांग्लादेश नाम का देश अस्तित्व में आया, असम उसके बाद से ज्यादा ही चर्चा में रहने लगा. जिन परिस्थितियों में बांग्लादेश का निर्माण हुआ था, उनकी वजह से बांग्लादेश में रहने वाले हिंदू और मुस्लिम दोनों ही तबकों को खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था. बांग्लादेश बनने की कवायद में वहां इतनी हिंसा हुई कि लड़ाई के दौरान ही वहां की एक बड़ी आबादी ने भारत का रुख किया. इसमें हिंदुओं के अलावा मुस्लिमों की भी बड़ी आबादी थी. इससे पहले भी अंग्रेजों के जमाने में चाय बागानों में काम करने और खाली पड़ी जमीन पर खेती करने के लिए बिहार और बंगाल के लोग असम जाते रहते थे. बांग्लादेश की हिंसा ने अचानक से असम आने वालों की तादाद बढ़ा दी. 16 दिसंबर 1971 को जब बांग्लादेश को एक स्वतंत्र देश घोषित कर दिया गया, उसके कुछ दिन के बाद वहां पर हिंसा में कमी आई. हिंसा कम होने पर बांग्लादेश से भारत आए कुछ लोग तो बांग्लादेश लौट गए, लेकिन कम से कम 10 लाख लोग असम में ही रुक गए.
बांग्लादेश बनने से पहले और उसके बाद भी असम में बाहरी लोगों का आना जारी रहा. (सांकेतिक फोटो)
1971 के बाद भी बड़े पैमाने पर बांग्लादेशियों का असम में आना जारी रहा. ऐसे में असम के रहने वाले मूल लोगों को डर सताने लगा कि उनकी जमीन और जायदाद पर बांग्लादेश से आए लोगों का कब्जा हो जाएगा. बांग्लादेश के लोगों की बढ़ती जनसंख्या की वजह से असम के लोगों में भाषा के तौर पर, सांस्कृतिक तौर पर और राजनैतिक तौर पर असुरक्षा पैदा कर दी. अभी लोग इस बारे में बात कर ही रहे थे कि 1978 में असम के मांगलोडी लोकसभा क्षेत्र के सांसद हीरा लाल पटवारी का निधन हो गया. इसके बाद वहां उपचुनाव होने थे.
चुनाव की तैयारियों में लगे चुनाव आयोग ने पाया कि 1971 में हुए चुनाव की तुलना में इस चुनाव में वोटरों की संख्या में कई गुना इजाफा हुआ है. वहीं 1979 में सरकार ने बांग्लादेश से आए लोगों को राज्य के वोटर लिस्ट में शामिल कर लिया.
वोटर लिस्ट में शामिल हुए बांग्लादेशी और शुरू हो गया आंदोलन
असम के लोगों को भड़काने के लिए ये काफी था. स्थानीय लोग सड़कों पर उतर आए, जिसका नेतृत्व ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) और असम गण संग्राम परिषद किया. ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन छात्र संगठन के तौर पर अंग्रेजी शासन काल से ही सक्रिय था, जिसे उस वक्त अहोम के नाम से जाना जाता था. 1940 में अहोम दो भागों में बंट गया, लेकिन 1967 में दोनों धड़े आपस में मिल गए और संगठन का नाम रखा गया ऑल असम स्टूडेंट्स एसोसिएशन. बाद में इसका नाम बदलकर ऑल असम स्टूडेंट यूनियन या आसू कर दिया गया. वहीं असम गण संग्राम परिषद क्षेत्रीय राजनीतिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संगठनों के लोगों का एक समूह था, जो असम में बाहरी लोगों के खिलाफ मुखर हो रहा था. आसू और असम गण संग्राम परिषद के चलाए आंदोलन को असमिया भाषा बोलने वाले हिंदुओं, मुस्लिमों और बहुत से बंगालियों ने समर्थन किया.
बाहरी लोगों को असम से हटाने के लिए 1980 में असम में बड़ा आंदोलन हुआ. इस दौरान हुई हिंसा में कम से कम 3000 लोग मारे गए थे.
आंदोलन के नेताओं ने दावा किया कि राज्य की जनसंख्या का 31 से 34 प्रतिशत हिस्सा बाहर से आए लोगों का है. उन्होंने केंद्र से मांग की कि वो असम की सीमाओं को सील करे, बाहरी लोगों की पहचान करे और उनका नाम वोटर लिस्ट से हटाया जाए. जब तक ऐसा नहीं होता है, असम में कोई चुनाव न करवाया जाए. इसके अलावा आंदोलन करने वालों ने ये भी मांग रखी कि 1961 के बाद राज्य में जो भी लोग आए हैं, उन्हें उनके मूल राज्य में वापस भेज दिया जाए. ऐसे लोगों में बांग्लादेशियों के अलावा बिहार और बंगाल से आए लोगों की संख्या भी अच्छी-खासी थी. आंदोलन ने इतना जोर पकड़ा कि जब केंद्र सरकार ने 1983 में असम में विधानसभा चुनाव करवाने का फैसला लिया, तो आंदोलन से जुड़े संगठनों ने इसका बहिष्कार किया. हालांकि चुनाव हुए, लेकिन जिन क्षेत्रों में असमिया भाषी लोगों का बहुमत था, वहां तीन फीसदी से भी कम वोट पड़े. वोटिंग के दौरान और उसके बाद भी राज्य में राज्य में आदिवासी, भाषाई और धर्म के नाम पर जबरदस्त हिंसा हुई, जिसमें कम से कम तीन हजार लोग मारे गए. इस हिंसा के बाद आंदोलनकारियों और केंद्र सरकार के बीच बातचीत शुरू हुई, जो किसी नतीजे पर नहीं पहुंची. 1984 में जब लोकसभा के चुनाव होने थे, तो असम के 16 में से 14 लोकसभा सीटों पर चुनाव ही नहीं हो पाया और इसकी वजह असम में चल रही हिंसा थी.

1985 में आंदोलनकारियों और राजीव गांधी सरकार के बीच समझौता हुआ, जिसके बाद राज्य में चुनाव करवाए जा सके.
असम समझौते के बाद शांत हुआ असम
आखिरकार केंद्र सरकार को आंदोलनकारियों के आगे झुकना ही पड़ा. प्रधानमंत्री राजीव गांधी आंदोलनकारियों से बात करने को राजी हो गए. 15 अगस्त 1985 को राजीव गांधी सरकार और आंदोलनकारियों के बीच एक समझौता हुआ, जिसे असम समझौता का नाम दिया गया. इसकी कुछ खास बातें थीं-# 1951 से 1961 के बीच असम में आए सभी लोगों को नारिकता और वोट देने का अधिकार दिया गया.
# 1961 से 1971 के बीच आने वाले लोगों को नागरिकता तो दी गई, लेकिन उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं दिया गया.
# जो लोग 1971 के बाद असम आए थे, उन्हें वापस भेजने का फैसला हुआ.
# असम के आर्थिक विकास के लिए पैकेज की घोषणा की गई.
#असम में ऑयल रिफ़ाइनरी, पेपर मिल और तकनीक संस्थान बनाने का फैसला हुआ.
# असमिया बोलने वाले लोगों के सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान की सुरक्षा के लिए विशेष कानून और प्रशासनिक उपाय करने का फैसला लिया गया.
सत्ता में आई नई बनी पार्टी असम गण परिषद
इस समझौते के बाद केंद्र सरकार ने असम की हितेश्वर सैकिया सरकार को भंग कर दिया और नए सिरे से चुनाव करवाने का फैसला लिया गया. समझौते के आधार पर असम में एक नई वोटर लिस्ट बनी और चुनाव हुए. इस चुनाव में आंदोलन का नेतृत्व करने वाले असम स्टूडेंट यूनियन या आसू और असम गण संग्राम परिषद के नेताओं ने मिलकर एक नई पार्टी बनई असम गण परिषद. इसका अध्यक्ष आसू के अध्यक्ष रहे प्रफुल्ल कुमार महंत को बनाया गया और पार्टी चुनावी मैदान में उतर गई. असम गण परिषद ने चुनाव में विधानसभा की 126 में से 67 सीटें जीत लीं और उन्हें बहुमत मिल गया. इसके बाद प्रफुल्ल कुमार महंत को मुख्यमंत्री बनाया गया.
असम में आंदोलन के बाद असम गण परिषद के अध्यक्ष रहे प्रफुल्ल कुमार महंत राज्य के मुख्यमंत्री बने.
इस सरकार का कार्यकाल 1990 में खत्म होना था, जिसके बाद चुनाव होने थे. लेकिन सरकार का कार्यकाल खत्म होने के एक महीने पहले ही जनता दल के नेतृत्व में बनी विश्वनाथ प्रताप सिंह की केंद्र सरकार ने असम में राष्ट्रपति शासन लगा दिया. विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर के बाद 1991 में जब केंद्र में नरसिम्हा राव की सरकार बनी तो एक बार फिर असम में चुनाव हुए और हितेश्वर सैकिया के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी. 22 अप्रैल 1996 को हितेश्वर सैकिया का निधन हो गया, जिसके बाद भूमिधर बर्मन मुख्यमंत्री बने. हालांकि 1996 के चुनावों में एक बार फिर असम गण परिषद ने बाजी मार ली और प्रफुल्ल कुमार महंत को मुख्यमंत्री बनाया गया. 2001 के चुनाव में बाजी फिर कांग्रेस के हाथ लगी और तरुण गोगोई मुख्यमंत्री बने. लगातार तीन बार मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई के खिलाफ 2016 के चुनाव में बीजेपी ने सर्वानंद सोनोवाल को अपना नेता चुना और उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने का फैसला लिया.

कांग्रेस के लगातार 15 साल के शासन के बाद बीजेपी नेता सर्वानंद सोनोवाल असम के मुख्यमंत्री बने.
नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 से फिर भड़का असम
बीजेपी में शामिल होने से पहले सर्वानंद सोनोवाल असम गण परिषद के स्टूडेंट विंग ऑल असम स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष थे. इसके अलावा सोनोवाल नॉर्थ ईस्ट स्टुडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष भी रह चुके थे. बीजेपी में शामिल होने से पहले वो असम गण परिषद के नेता थे. 2011 में उन्होंने असम गण परिषद का साथ छोड़ दिया था और बीजेपी में शामिल हो गए थे. यहां आते ही उन्हें पहले कार्यकारिणी का सदस्य और फिर असम बीजेपी का प्रवक्ता बना दिया गया. 2012 और 2014 में दो बार बीजेपी का अध्यक्ष रहने के बाद सोनोवाल को 2014 में लखीमपुर लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया गया. केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी तो उन्हें खेल एवं युवा मंत्रालय के तहत खेल और युवा मामलों का राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया.22 फरवरी 2014 को जब बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी असम के सिलचर में चुनावी सभा कर रहे थे, तो उन्होंने कहा था-

‘बांग्लादेश से दो तरह के लोग भारत में आए हैं. एक शरणार्थी हैं जबकि दूसरे घुसपैठिये. अगर हमारी सरकार बनती है तो हम बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने के साथ ही घुसपैठियों को यहां से बाहर खदेड़ने का भी वादा करते हैं.’केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी. इसके बाद 19 जुलाई 2016 को केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में ‘नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016’ पेश किया. यह विधेयक 1955 के उस ‘नागरिकता अधिनियम’ में बदलाव के लिए था, जिसके जरिए किसी भी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता तय होती है. इस विधेयक में प्रावधान था कि अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पकिस्तान से आने वाले हिंदू, सिख, बौध, जैन, पारसी और ईसाई लोगों को ‘अवैध प्रवासी’ नहीं माना जाएगा.’ इसका सीधा सा अर्थ ये था कि इसके जरिए बांग्लादेशी हिंदुओं को भारत की नागरिकता दी जानी थी.
2016 में जब असम में चुनाव थे, तो सर्वानंद सोनोवाल ने चुनावी वादा करते हुए कहा था-
''बांग्लादेशी हिंदुओं को भारत की नागरिकता दी जाएगी.''असम में जब 2016 में लोकसभा चुनाव हुए तो बीजेपी और असम गण परिषद ने मिलकर चुनाव लड़ा था. बांग्लादेश के साथ ही बाहर से आए लोगों को असम से बाहर करने का मुद्दा उठाने वालों में असम गण परिषद सबसे आगे रहा था. बीजेपी ने चुनाव में असमिया लोगों से "जाति, माटी, भेटी" यानि जाति, जमीन और अस्तित्व की रक्षा करने का वादा किया था. एक तरफ असमिया लोगों से किया वादा और दूसरी तरफ बांग्लादेशी हिंदुओं को भारत की नागरिकता देने के वादे का असम गण परिषद ने विरोध कर दिया, क्योंकि असम गण परिषद ने ही आंदोलन खड़ा करके असम के मूल लोगों के हितों की बात की थी.

असम में बाहरी लोगों के मुद्दे पर कई बार छोटे-बड़े आंदोलन हुए, जिनमें हिंसा हुई.
विरोध के बाद ठंडे बस्ते में गया विधेयक
असम में बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार सर्वानंद सोनोवाल भी असम गण परिषद के स्टूडेंट विंग ऑल असम स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष रहे थे, तो उन्हें भी उस पार्टी का स्टैंड पता था, लेकिन उन्होंने चुनावी वादा किया था, तो वो पीछे भी नहीं हट सकते थे. हालांकि विरोध के बाद इस विधेयक को स्टैंडिग कमेटी के पास भेज दिया गया, जिसके बाद ये मुद्दा फिलहाल ठंडे बस्ते में चला गया था. सरकार ने बीजेपी सांसद सत्यपाल सिंह के नेतृत्व में संयुक्त संसदीय समिति बना दी, जो कानून में बदलाव को लेकर अलग-अलग संगठनों से बात कर रही है.असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल असम के कछारी जनजातीय समुदाय से आते हैं. उन्हें राज्य के सबसे पुराने छात्र संगठन आसू ने 'जातीय नायक' कहा था. भारत-बांग्लादेश की सीमा 4096 किलोमीटर लंबी है. इसमें 263 किलोमीटर सीमा असम से जुड़ी है और 224 किलोमीटर की बाड़बंदी की जा चुकी है. पहले छात्र संगठन और फिर बीजेपी से जुड़े सर्वानंद सोनोवाल ने 2014 में ही बांग्लादेश के घुसपैठ के मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में उठाया था. इसमें कहा गया था कि 25 मार्च 1971 तक बांग्लादेश से भारत आए लोगों की नागरिकता तय की जाए. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रंजन गोगोई की अगुआई वाली बेंच ने मामले को लार्जर बेंच को रेफर करते हुए इसे चीफ जस्टिस के सामने भेज दिया और कहा कि नैशनल रजिस्ट्रेशन ऑफ सिटिजनन्स (NRC) का काम मार्च , 2018 तक पूरा कर लिया जाए.
क्या है नैशनल रजिस्ट्रेशन ऑफ सिटिजन्स (NRC)

भारत में आजादी के बाद जो पहली जनगणना हुई थी, वो 1951 में हुई थी. इस जनगणना के आंकड़ों को एक साथ इकट्ठा करके आगे की योजनाओं के लिए इस्तेमाल किया जाना था. इसके लिए नैशनल रजिस्ट्रेशन ऑफ सिटिजन्स (NRC) बनाया गया, जिसमें सारे आंकड़े दर्ज किए गए. योजना पूरे देश के लिए थी, लेकिन असम इकलौता ऐसा राज्य था, जिसने NRC को मान्यता दी और अपने प्रदेश में लागू किया. छात्र संगठन आसू ने असम आंदोलन के दौरान ही 18 जनवरी 1980 को केंद्र सरकार को एक मेमोरेंडम सौंपा और कहा कि एनआरसी को फिर से अपडेट किए जाने की ज़रूरत है. हालांकि आंदोलन हिंसक हुआ, जिसके बाद केंद्र सरकार ने असम में किसी तरह से हिंसा शांत करने की कोशिश शुरू की. 1985 में असम में राजीव गांधी के साथ जो समझौता लागू हुआ था, 1999 में केंद्र की वाजपेयी सरकार ने उसका रिव्यू शुरू किया. बांग्लादेशियों को भारत से बाहर करने का मुद्दा हमेशा से बीजेपी के एजेंडे में था, लिहाजा 17 नवंबर 1999 को तय किया गया कि असम समझौते के तहत NRC को अपडेट करना चाहिए. इसके लिए केंद्र सरकार की ओर से 20 लाख रुपये का फंड रखा गया और पांच लाख रुपये जारी भी कर दिए गए. आखिर में 2004 में एनडीए की सरकार चली गई और यूपीए की सरकार आई.

पूर्व प्रधानमंंत्री मनमोहन सिंह और उनसे पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने भी NRC को अपडेट करने की पहल की थी, लेकिन वो ठंडे बस्ते में चली गई.
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, 3 साल में 40 सुनवाइयां हुईं
5 मई 2005 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने फैसला लिया कि एनआरसी को अपडेट किया जाना चाहिए. इसके लिए असम के बारपेटा और चायगांव में पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया. असम के कुछ संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया और वहां हिंसा हो गई. इसके बाद राज्य की गोगोई सरकार ने मंत्रियों के एक समूह का गठन किया. उसके जिम्मे था कि वो असम के कई संगठनों से बातचीत करके NRC को अपडेट करने में मदद करें. हालांकि इसका कोई फायदा नहीं हुआ और प्रक्रिया ठंडे बस्ते में चली गई. तब बीजेपी नेता सर्वानंद सोनोवाल ने 2013 में बांग्लादेश के घुसपैठ के मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में उठाया. इसके बाद कोर्ट ने एनआरसी, 1951 को अपडेट करने का आदेश दिया था. इसके तहत 25 मार्च, 1971 से पहले बांग्लादेश से भारत में आने वाले लोगों को स्थानीय नागरिक माना जाना है. उसके बाद असम में पहुंचने वालों को बांग्लादेश वापस भेजने का प्रावधान है.
NRC को अपडेट करने का काम मई 2015 से शुरू हुआ था.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एनआरसी के अपडेशन का काम शुरू हुआ. प्रक्रिया की शुरुआत मई 2015 में हुई. इस अपडेशन के लिए साल 1951 की जनगणना में शामिल अल्पसंख्यकों को तो राज्य का नागरिक मान लिया गया, 1951 से 25 मार्च, 1971 के बीच असम में आने वाले बांग्लादेशी शरणार्थियों के पास वैध कागजात नहीं थे. एनआरसी को अपडेट करने के दौरान पंचायतों की ओर से जारी नागरिकता प्रमाणपत्र को मान्यता नहीं दी जा रही थी. इसके बाद मामला असम हाईकोर्ट में पहुंच गया. हाई कोर्ट ने लगभग 26 लाख लोगों के पहचान के दस्तावेज अवैध करार दे दिए, जिनकी जांच पंचायत अधिकारियों और राज्य सरकार के सर्किल अफसरों ने की थी. इसके बाद मामला एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया. सुप्रीम कोर्ट ने सारे मामलों को एक साथ जोड़ दिया और अपनी निगरानी में एनआरसी की लिस्ट अपडेट करने का आदेश दिया. 2013 से 2017 तक के चार साल के दौरान असम के नागरिकों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में कुल 40 सुनवाइयां हुईं, जिसके बाद नवंबर 2017 में असम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि 31 दिसंबर 2017 तक वो एनआरसी को अपडेट कर देंगे.

31 दिसंबर की रात को NRC की तरफ से पहला ड्राफ्ट जारी किया गया था.
साल के आखिरी दिन आया पहला ड्राफ्ट
राज्य सरकार ने ऐसा ही किया और 31 दिसंबर 2017 को नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) का पहला ड्राफ्ट जारी कर दिया. इस ड्राफ्ट में असम के कुल 3.29 करोड़ लोगों में से 1.9 करोड़ लोगों को जगह दी गई और उन्हें कानूनी तौर पर भारत का नागरिक माना लिया गया. रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया शैलेष ने ड्राफ्ट को जारी करते हुए कहा-'यह पहला ड्राफ्ट है. इसमें 1.9 करोड़ लोगों के नाम हैं, जिनका वेरिफिकेशन हो गया है. अब भी 1.39 करोड़ लोगों के वेरिफिकेशन होने बाकी हैं. जैसे ही उनका भी वेरिफिकेशन हो जाएगा, हम दूसरा और फिर तीसरा ड्राफ्ट भी लाएंगे. नामों का वेरिफिकेशन एक लंबी प्रक्रिया है. ऐसे में हो सकता है कि कई नाम छूट गए हों. ऐसे लोगों को परेशान होने की जरूरत नहीं है.'सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइंस के हिसाब से चल रही अपडेशन प्रक्रिया को 2018 के अंत तक पूरा कर लेना है. एनआरसी के स्टेट कोऑर्डिनेटर हजेला ने कहा था कि फाइनल ड्राफ्ट आने के बाद शिकायतों को भी जगह दी जाएगी. ऐसा इसलिए है कि बचे हुए नाम आखिरी ड्राफ्ट में लाए जा सकते हैं. लेकिन इस ड्राफ्ट के जारी होने के साथ ही असम एक बार फिर से अशांत हो रहा है. इस लिस्ट के जारी होने की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आती जा रही थी, असम में हिंसा की संभावना बढ़ती जा रही थी. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसे देखते हुए सेना और अर्धसैनिक बलों के 45 हजार जवानों को तैनात कर दिया था. वहीं लिस्ट जारी होने के बाद असम सरकार के वित्त मंत्री और नागरिकता रजिस्टर के इंचार्ज हेमंत विश्व शर्मा ने कहा कि जिन लोगों का नाम एनआरसी रजिस्टर में नहीं है, उन्हें हर हाल में देश छोड़ना होगा. इसके बाद तो असम में और भी तनाव फैल गया.
जैसे-जैसे एनआरसी का ड्राफ्ट जारी करने का दिन नजदीक आ रहा था, असम में तनाव बढ़ता जा रहा था. इसे देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य में अर्धसैनिक बल और सेना के जवानों की तैनाती कर दी थी.हालांकि एनआरसी और रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया ने आंकड़े जारी करते वक्त कहा था कि अभी ये पहला ड्राफ्ट है, लेकिन सिलचर में एनआरसी में नाम न होने की वजह से 40 साल के एक शख्स हनीफ खान ने खुदकुशी कर ली. हनीफ की तरह असम में फिलहाल लाखों लोग हैं, जो इस एनआरसी रजिस्टर में अपना नाम देखने के लिए परेशान हैं. हालात तब और खराब हो सकते हैं, जब एनआरसी अपना अंतिम ड्राफ्ट जारी कर देगा. ऐसा इसलिए है कि जिनका नाम इस लिस्ट में नहीं होगा, उन्हें असम छोड़कर जाना होगा और ऐसे लोगों की संख्या 50 लाख से भी ज्यादा होगी.
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