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बंद होने वाला है वर्ल्ड बुक फेयर! घट रहे प्रकाशक, किताबों की बिक्री भी कम हुई

विश्व पुस्तक मेला (World Book Fair) में लगातार घटती प्रकाशकों (Publishers) की संख्या चिंता पैदा करने वाली है. नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT) की नीतियों पर भी सवाल उठ रहे हैं. मेले में स्टॉल लगाना भी लगातार महंगा होता जा रहा है.

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2026 विश्व पुस्तक मेला के दौरान दिल्ली के भारत मंडपम में विजिटर्स. (PTI)

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  • दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में 2014 से 2026 के बीच प्रकाशकों की संख्या 1098 से घटकर 549 रह गई है, जिससे मेले की मौजूदा पहचान और स्वरूप प्रभावित होने की संभावना है।
  • प्रकाशकों की संख्या में कमी का मुख्य कारण नेशनल बुक ट्रस्ट की महंगी होती नीतियां और छोटे प्रकाशकों के लिए शुल्क में वृद्धि मानी गई है, जो मेले में उनकी भागीदारी को कम कर रही हैं।
  • यदि नेशनल बुक ट्रस्ट अपनी नीतियों में बदलाव नहीं करता है तो आने वाले वर्षों में भारतीय भाषाओं के प्रकाशकों की भागीदारी और भी घट सकती है, जिससे मेले की पुस्तक विविधता पर असर पड़ सकता है।

दिल्ली में हर साल लगने वाले विश्व पुस्तक मेला (World Book Fair) में प्रकाशकों (Publishers) की संख्या लगातार कम हो रही है. इससे मेले की पुरानी पहचान पर भी असर पड़ सकता है. बीते 12 सालों का ट्रेंड देखने से लगता है कि अगले कुछ सालों में यह मेला दिल्ली के प्रगति मैदान में बने भारत मंडपम के किसी कोने में सिमट सकता है. अनुमान तो यहां तक है कि आगामी 25 सालों में पुस्तक मेला ही बंद हो सकता है.

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प्रकाशकों की संख्या आधी हुई

मीडिया स्टडीज ग्रुप के सर्वे के अनुसार, 2014 में वर्ल्ड बुक फेयर में 1,098 प्रकाशक शामिल हुए थे. 2026 में यह संख्या घटकर 549 रह गई. यानी 12 साल में प्रकाशकों की संख्या आधी हो गई. रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर यही हालात आगे भी बने रहे तो आने वाले सालों में विश्व पुस्तक मेला में छोटे और मध्यम प्रकाशकों की मौजूदगी और कम हो सकती है.

भारतीय भाषाओं के प्रकाशकों की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है. 2026 के मेले में केवल 8 भारतीय भाषाओं की मौजूदगी दिखाई दी. इनमें हिंदी के अलावा बाकी सात भाषाओं की भागीदारी बहुत कम रही. केवल सांकेतिक ही मानिए.

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6 भाषाएं ऐसी भी हैं, जो पहले मेले में दिखाई देती थीं, लेकिन अब उनकी मौजूदगी खत्म हो गई है. हिंदी के स्टॉल भी कम हुए हैं. 2014 में हिंदी के 323 स्टॉल थे. 2026 में इनकी संख्या घटकर 156 रह गई.

NBT की नीतियों पर सवाल

मीडिया स्टडीज ग्रुप के सर्वे में नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT) की नीतियों पर भी सवाल उठाए गए हैं. इसमें कहा गया है कि छोटे और मध्यम प्रकाशकों के लिए मेले में जगह लेना लगातार महंगा होता जा रहा है. इसका असर लेखक-प्रकाशकों और छोटे प्रकाशन संस्थानों पर पड़ रहा है.

महंगा हो रहा मेला

2027 के विश्व पुस्तक मेला के लिए भी शुल्क बढ़ाया गया है. 2026 में छोटे प्रकाशकों और लेखक-प्रकाशकों को 2×2 मीटर के स्टॉल के लिए 17,641 रुपये देने होते थे. 2027 में स्टॉल का आकार 2×3 मीटर कर दिया गया है और इसके लिए 38,940 रुपये शुल्क मांगा गया है.

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रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ी हुई कीमत छोटे प्रकाशकों के लिए बड़ी परेशानी बन सकती है. ऐसे प्रकाशक अक्सर नई और अलग तरह की किताबें प्रकाशित करते हैं. इनके मेले से बाहर होने पर किताबों की विविधता भी कम हो सकती है.

पुस्तक मेला कैसे बचेगा?

मीडिया स्टडीज ग्रुप ने NBT से अपनी नीतियों पर दोबारा विचार करने की मांग की है. रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ल्ड बुक फेयर की संस्कृति पर NBT लगातार चोट कर रहा है. 2027 के मेले में प्रकाशनों की मौजूदगी बेहद कम दिखाई दे, तो इस पर हैरानी नहीं हो सकती है.

ट्रस्ट को तुरंत अपनी नीतियां इस रूप में बनानी चाहिए कि बड़ी संख्या में भारतीय भाषाओं के लेखक और प्रकाशक हिस्सा ले सकें. ताकि स्मॉल और मीडियम लेवल के प्रकाशकों अपनी किताबें प्रोमोट कर सकें, विकास और विस्तार कर सकें, और उनकी भूमिका बनी रहे. यह प्रकाशन में विविधता के लिए सबसे जरुरी माना जाता है.

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मीडिया स्टडीज ग्रुप के मुताबिक, भारतीय भाषा ग्रुप के लेखक और पब्लिशर्स ऐसी पॉलिसी का विरोध करते हैं जो पब्लिशिंग में मोनोपॉली बनाती हैं. ट्रस्ट को अपनी पॉलिसी को रद्द करने और अलग-अलग तरीकों से पठन-पाठन संस्कृति को बढ़ाने पर विचार करना चाहिए.

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