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चुनाव आयोग की 'गड़बड़ियों' को लेकर चर्चा में आई सीमा खन्ना कौन हैं?

चुनाव आयोग ने जनवरी 2026 में ECINet लॉन्च किया था. यह आयोग के कई ऐप्स और डेटाबेस को एक साथ जोड़ता है. कहा गया कि इस डिजिटल सिस्टम का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को 'पारदर्शी और सुरक्षित' बनाना है. लेकिन विवाद तब शुरू हुआ जब आरोप लगा कि इस सॉफ्टवेयर के जरिए डेटाबेस का पूरा एक्सेस दिल्ली स्थित आईटी विभाग पर केंद्रित हो गया है. सीमा खन्ना इसी विभाग की प्रमुख हैं.

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विवाद की जड़ ECINet और ERONet सॉफ्टवेयर पर कथित नियंत्रण है. सीमा खन्ना इसकी प्रमुख हैं. (Photo Courtesy: ECI/PTI)

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  • चुनाव आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी महानिदेशक डॉ. सीमा खन्ना ने 2025 में डेप्युटेशन पर आयोग में आकर ECINet नामक डिजिटल सिस्टम लॉन्च किया, जो चुनावी डेटा और ऐप्स को जोड़ता है।
  • ECINet सॉफ्टवेयर के कारण स्थानीय Electoral Registration Officers (ERO) की मतदाता सूची में नाम जोड़ने और सुधारने की स्वतंत्रता सीमित हो गई, जिससे विवाद उत्पन्न हुआ।
  • दो चुनाव आयुक्तों ने DG-IT सीमा खन्ना के अधिकारों पर सवाल उठाए हैं और EROs को उनका डिजिटल एक्सेस वापस देने की मांग की है, जिससे आयोग में आंतरिक मतभेद बढ़े हैं।
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संजय शर्मा

निर्वाचन आयोग में महानिदेशकों की चर्चा आम तौर पर जनता या मीडिया में बहुत कम होती है. लेकिन इन दिनों मीडिया, राजनीति और सामाजिक गलियारों में आयोग की सूचना प्रौद्योगिकी महानिदेशक डॉ. सीमा खन्ना बहुत चर्चा में हैं. वे चुनाव आयोग के पूरे डिजिटल और आईटी सिस्टम की देखरेख करती हैं. साल 2025 में वे नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) से डेप्युटेशन (प्रतिनियुक्ति) पर चुनाव आयोग में आई थीं. उनसे जुड़ा ERO विवाद मुख्य रूप से मतदाता सूची पर कंट्रोल और सॉफ्टवेयर के केंद्रीकरण से संबंधित है.

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विवाद की जड़ ECINet और ERONet सॉफ्टवेयर पर कथित नियंत्रण है. चुनाव आयोग ने जनवरी 2026 में ECINet लॉन्च किया था. यह आयोग के कई ऐप्स और डेटाबेस को एक साथ जोड़ता है. कहा गया कि इस डिजिटल सिस्टम का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को 'पारदर्शी और सुरक्षित' बनाना है. लेकिन विवाद तब शुरू हुआ जब आरोप लगा कि इस सॉफ्टवेयर के जरिए डेटाबेस का पूरा एक्सेस दिल्ली स्थित आईटी विभाग पर केंद्रित हो गया है. सीमा खन्ना इसी विभाग की प्रमुख  हैं.

'जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950' और 'मतदाता पंजीकरण नियम 1960' के अनुसार, जमीन पर मतदाता सूची में नाम जोड़ने, सुधारने या हटाने का पूरा कानूनी अधिकार स्थानीय Electoral Registration Officer (ERO) का होता है. कहा जा रहा है कि नया सॉफ्टवेयर आने के बाद लोकल लेवल के अधिकारियों  यानी EROs के एक्सेस और स्वतंत्रता को सीमित कर दिया गया. अब सॉफ्टवेयर तय करता है कि अधिकारी क्या कर सकते हैं और क्या नहीं. 

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उदाहरण के लिए, गोवा में EROs ने 97 मतदाताओं के नाम जोड़ने की मंजूरी दी थी, लेकिन डेटाबेस का एक्सेस न होने के कारण अंतिम समय तक उनके नाम वोटर लिस्ट में नहीं चढ़ पाए.

ये भी पढ़ें: टीएन शेषन से लेकर ज्ञानेश कुमार तक, कब-कब चुनाव आयोग में बुलंद हुई असहमति?

तीनों चुनाव आयुक्तों में मतभेद के चलते चुनाव आयोग के अंदर ही दो फाड़ की स्थिति बन गई है. दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन को पत्र लिखकर इस पर गंभीर आपत्ति जताई है. उन्होंने आरोप लगाया है कि DG-IT सीमा खन्ना के पास कानूनी रूप से ऐसा कोई अधिकार नहीं है कि वे कानूनन स्वतंत्र EROs की शक्तियों और एक्सेस को नियंत्रित या सीमित करें. उन्होंने मांग की है कि फील्ड अधिकारियों को उनका पूरा डिजिटल एक्सेस तुरंत वापस दिया जाए.

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कांग्रेस, AAP, सपा और टीएमसी सहित पूरे विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सीमा खन्ना और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को घेरा है. विपक्षी नेताओं का आरोप है कि इस सॉफ्टवेयर के बैकएंड कंट्रोल और एआई (AI) का इस्तेमाल करके लाखों मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से गलत तरीके से प्रभावित या डिलीट किए गए हैं, जिसके बाद राजनीतिक विवाद और ज्यादा गहरा गया है.

वीडियो: गोवा में 97 वैध मतदाताओं के नाम हटाने का आरोप, मुख्य चुनाव आयुक्त पर उठे सवाल

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