Old Monk. नाम सुनते ही दिमाग में एक खास रंग की बोतल और उस पर बैठे एक बूढ़े साधु की तस्वीर आती है. भारत में कई पीढ़ियों से Old Monk को Rum के तौर पर जाना जाता रहा है. लेकिन सितंबर 2026 में एक ऐसी खबर आई, जिसने इस पूरी पहचान पर सवाल खड़ा कर दिया.
'ओल्ड मॉन्क' नहीं है असली रम? FSSAI ने बॉम्बे हाई कोर्ट में किया बड़ा दावा, डिटेल में समझें पूरा मामला
Old Monk Rum विवाद में FSSAI ने Bombay High Court में कुछ आपत्तियां दर्ज की हैं. Neutral spirit, External rum flavouring और “7 years old blended” लेबल पर सवाल उठाए हैं. क्या Old Monk सच में Rum नहीं है?

‘भारतीय फूड सेफ्टी और मानक प्राधिकरण’ (Food Safety and Standards Authority of India) यानी FSSAI ने बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) में कहा कि ‘ओल्ड मॉन्क’ को सिर्फ "Rum" के नाम से बेचा ही नहीं जा सकता. वजह बताई गई, इसमें नैचुरल स्प्रिट (neutral spirit) और रम फ्लेवरिंग (rum flavouring) का इस्तेमाल होता है. FSSAI का तर्क है कि अगर किसी नैचुरल स्प्रिट में बाहर से रम फ्लेवर डालकर उसे रम जैसा स्वाद और महक दी गई है, तो उसे सिर्फ रम कहना नियमों के हिसाब से सही नहीं है.
लेकिन, यहां सबसे पहले एक जरूरी बात समझ लीजिए. बॉम्बे हाई कोर्ट ने ये फैसला नहीं दिया है कि ओल्ड मॉन्क रम नहीं है. ये FSSAI की दलील है, जो कोर्ट के सामने रखी गई है. मामला अभी कानूनी तौर पर जारी है.
तो आखिर विवाद शुरू कहां से हुआ? ओल्ड मॉन्क की बोतल में ऐसा क्या मिला कि मामला कोर्ट तक पहुंच गया?
कहानी शुरू हुई FSSAI की जांच से
मामला महाराष्ट्र के खोपोली स्थित उस मैन्युफैक्रिंग प्लांट से जुड़ा है, जहां ओल्ड मॉन्क के कुछ वैरिएंट तैयार होते हैं. FSSAI की जांच और लैब टेस्टिंग के बाद रेगुलेटर ने तीन उत्पादों (प्रोडक्ट्स) पर कार्रवाई की. इनमें ‘ओल्ड मॉन्क द लेजेंड’ (Old Monk The Legend), ‘ओल्ड मॉन्क गोल्ड रिजर्व’ (Old Monk Gold Reserve) और ‘ओल्ड मॉन्क ट्रिपल एक्स मैच्योर्ड रम’ (Old Monk XXX Matured Rum) शामिल हैं.
FSSAI की आपत्ति सिर्फ इतनी नहीं थी कि प्रोडक्ट में फ्लेवर डाला गया. सवाल ये था कि जिस ड्रिंक को रम के तौर पर बेचा जा रहा है, उसमें रम का मूल स्वाद और अरोमा आखिर आया कहां से.
भारतीय नियमों में रम की परिभाषा मौजूद है. FSSAI के नियमों के मुताबिक ‘रम गन्ने जूस’ (Rum sugarcane juice), ‘गन्ने का शीरा’ (sugarcane molasses) या गन्ने से बने किसी दूसरे प्रोडक्ट को खमीर उठने (ferment) और अर्क खींचने (distil) करके बनाया जा सकता है. नियमों में न्यूट्रल (neutral), रेक्टिफाइड (rectified) या ‘कृषि आधारित शुद्ध अल्कोहल’ (distilled spirit of agricultural origin) से रम तैयार करने की गुंजाइश भी दी गई है. लेकिन साथ ही रम में उस प्रोडक्ट से जुड़ा खास स्वाद (characteristic taste) और महक होना जरूरी है.
यहीं से पूरा विवाद पैदा होता है.
नैचुरल स्प्रिट आखिर होती क्या है?
इसे बहुत आसान भाषा में समझिए. नैचुरल स्प्रिट ऐसा अल्कोहल होता है जिसे हाई लेवल प्योरिटी तक साफ किया जाता है. प्योरिटी लेवल वहां तक होती है कि उसमें मूल सामग्री की खास गंध और टेस्ट बहुत कम या लगभग खत्म हो जाती है. इसे एक तरह का ‘अल्कोहल का मूल आधार’ (blank alcoholic base) समझ सकते हैं.
अब इसमें अलग-अलग चीजें मिलाकर अलग रूप दिया जा सकता है.
FSSAI का आरोप है कि जिन प्रोडक्ट की जांच हुई, उनमें नैचुरल स्प्रिट के साथ बाहर से आर्टिफिशियल या ‘कुदरती लगने वाले फ्लेवर’ (nature-identical flavouring substances) का इस्तेमाल किया गया. यानी रेगुलेटर के मुताबिक वो फ्लेवर प्रोडक्ट को रम जैसा टेस्ट और गंध देने में मदद कर रहा था.
FSSAI ने इसी आधार पर सवाल उठाया कि अगर किसी ड्रिंक का रम जैसा स्वाद बाहर से डाले गए फ्लेवर से बनाया जा रहा है, तो उसे सीधे रम क्यों कहा जाए?
फिर आया "7 years old blended" वाला ट्विस्ट
अब कहानी का दूसरा और शायद ज्यादा चौंकाने वाला हिस्सा. ‘ओल्ड मॉन्क ट्रिपल एक्स मैच्योर्ड रम’ (Old Monk XXX Matured Rum) के लेबल पर लंबे समय से "7 साल पुराना ब्लेंडेड" (7 years old blended) लिखा जाता रहा है. आम ग्राहक इस लाइन को पढ़कर क्या समझेगा? यही कि बोतल में मौजूद रम को सात साल तक मैच्योर किया गया है.
लेकिन FSSAI की जांच के मुताबिक इस ब्लैंड में 95 फीसदी से ज्यादा हिस्सा ‘बिना पुराना किया हुआ न्यूट्रल एक्स्ट्रा न्यूट्रल अल्कोहल’ (unaged neutral extra neutral alcohol) यानी ENA का था, जबकि ‘मैच्योर्ड रम स्प्रिट’ (matured rum spirit) की हिस्सेदारी 5 फीसदी से कम थी.
यानी विवाद ये नहीं है कि bottle में बिल्कुल भी matured spirit नहीं थी. विवाद ये है कि अगर blend का बहुत बड़ा हिस्सा नया और unmatured neutral spirit है, तो पूरे product को "7 years old" बताना consumer को क्या impression देता है.
FSSAI का कहना है कि ब्लैंडेड स्प्रिट की ‘आयु की घोषणा’ (age declaration) में सबसे कम उम्र वाले ‘स्प्रिंट के हिस्से’ (spirit component) को ध्यान में रखना चाहिए. इसी वजह से रेगुलेटर ने "7 years old blended" दावे पर आपत्ति जताई.
31 अगस्त को बॉम्बे हाई कोर्ट में क्या हुआ?
अब मामला कोर्ट में पहुंचा. 31 अगस्त 2026 को बॉम्बे हाई कोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस रविंद्र वी गुगे (Acting Chief Justice Ravindra V Ghuge) और जस्टिस गौतम ए अंखड (Justice Gautam A Ankhad) की बेंच के सामने सुनवाई हुई.
अदालत ने ओल्ड मॉन्क के लेबल को लेकर गंभीर सवाल पूछे. खास तौर पर "7 years old blended" जैसी शब्दावली पर सवाल उठा कि क्या कोई सामान्य उपभोक्ता इसे देखकर ये नहीं समझेगा कि पूरी ड्रिंक सात साल पुरानी है.
इस सुनवाई के बाद ओल्ड मॉन्क बनाने वाली कंपनी ‘मोहन रॉकी स्प्रिंगवॉटर’ (Mohan Rocky Springwater) ने लेबल बदलने पर सहमति जताई. कंपनी ने "7 years old blended" शब्द हटाने और एडेड फ्लेवर (added flavour) को ज्यादा स्पष्ट तरीके से लेबल पर बताने की बात कही.
लेकिन अदालत ने उस समय FSSAI के रोक लगाने आदेश (prohibition order) पर तुरंत स्टे नहीं दिया.
और यहीं एक बहुत जरूरी अंतर है. कोर्ट ने ये नहीं कहा कि "Old Monk नकली है" या "Old Monk Rum नहीं है". कोर्ट उस समय मुख्य रूप से अंतरिम राहत और लेबलिंग से जुड़े विवाद को देख रहा था.
फिर 3 सितंबर को आया असली धमाका
3 सितंबर की सुनवाई में FSSAI की तरफ से तर्क और साफ हो गया. रेगुलेटर के वकील ने कहा कि नैचुरल स्प्रिट में रम फ्लेवर डाल देने से उसे रम नहीं कहा जा सकता. उनका तर्क था कि ऐसा प्रोडक्ट रम जैसा होने का आभास देता है. उसे "रम" के बजाय किसी फ्लेवर्ड शराब (appropriate flavoured spirit description) के साथ बेचा जाना चाहिए. जैसे कि वोदका या जिन.
यही वो बयान था जिसके बाद हेडलाइन चलने लगीं कि "Old Monk रम नहीं है".
लेकिन हेडलाइन और कानूनी पहलू में फर्क है.
FSSAI कह रहा है कि ओल्ड मॉन्क की मौजूदा फॉर्मूलेशन को रम के तौर पर बेचना नियमों के मुताबिक सही नहीं है. बॉम्बे हाई कोर्ट ने अभी इस दावे को अंतिम रूप से स्वीकार नहीं किया है.
3 सितंबर के कोर्ट ऑर्डर में भी अंतरिम राहत के सवाल पर सुनवाई हुई. अदालत ने तत्काल ऐसी राहत देने से इनकार किया, क्योंकि ऐसा करना लगभग अंतिम राहत देने जैसा हो सकता था, जबकि मामले में दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें अभी बाकी थीं.
क्या सिर्फ Old Monk पर सवाल है?
नहीं. यही इस कहानी का सबसे बड़ा हिस्सा है. FSSAI की कार्रवाई सिर्फ Old Monk तक सीमित नहीं रही. दूसरे ‘अल्कोहल से बने पेय’ (alcoholic beverages) को लेकर भी फ्लेवरिंग, नैचुरल स्प्रिट, एजिंग (ageing) और लेबलिंग से जुड़े सवाल उठे हैं. रिपोर्ट्स में गोल्ड रिजर्व और मैक्डॉन्डल्स (McDowell's No.1) जैसे प्रोडक्स का भी जिक्र आया है.
इसका मतलब ये मामला सिर्फ एक लोकप्रिय ब्रांड के लेबल का विवाद नहीं है. ये भारतीय IMFL यानी ‘भारत में अंग्रेजी शराब बनाने वाली इंडस्ट्री’ (Indian Made Foreign Liquor industry) में इस्तेमाल होने वाले मैन्युफैक्चरिंग प्रोक्टिस और कंज्यूमर इनफॉर्मेशन का बड़ा सवाल बन सकता है.
तो क्या भारत में व्हिस्की भी व्हिस्की नहीं और रम भी रम नहीं?
यही सवाल इस पूरे विवाद को और दिलचस्प बनाता है. भारत में शराब उत्पादन (alcohol manufacturing) का रेगुलेटरी फ्रेमवर्क ऐसा है जिसमें नैचुरल स्प्रिट के इस्तेमाल की गुंजाइश मौजूद है. इसलिए सिर्फ नैचुरल स्प्रिट का इस्तेमाल होना अपने आप में ये साबित नहीं करता कि कोई प्रोडक्ट गैर कानूनी है.
असल सवाल है कि उस नैचुरल स्प्रिट को किस तरह प्रॉसेस किया गया, उसमें क्या फ्लेवर या दूसरी सामग्रियां (ingredients) डाली गईं हैं. साथ ही प्रोडक्ट की खास पहचान (characteristic identity) कैसे बनी और लेबल पर कंज्यूमर को क्या बताया गया.
अंतरराष्ट्रीय मानकों और भारत में बनने वाली अंग्रेजी शराब के बीच भी फर्क की चर्चा इस विवाद के बाद तेज हुई है. यानी मामला "बोतल में शराब है या नहीं" का नहीं है.
मामला ये है कि बोतल में मौजूद शराब को कानूनी तौर पर किस category में रखा जाए और consumer को उसके बारे में क्या बताया जाए.
Old Monk की कंपनी क्या कर रही है?
कंपनी ने फिलहाल revised labels का रास्ता अपनाया है. "7 years old blended" claim हटाने और एडेड फ्लेवर को ज्यादा साफ-साफ तरीके से लेबल पर छापने की बात कही है. लेकिन कंपनी ने FSSAI की हर आपत्ति को स्वीकार कर लिया है, ऐसा मान लेना सही नहीं होगा.
कंपनी का पक्ष ये रहा है कि उसकी लेबलिंग नियमों के मुताबिक है और ‘स्वाद बढ़ाने वाले पदार्थ’ (flavouring substances) के इस्तेमाल को लेकर रेगुलेटरी नियमों को अलग तरीके से पढ़ा जाना चाहिए. उसने FSSAI की कार्रवाई को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया है.
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अब असली सवाल क्या है?
दिल्ली हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता नवीन चंद्र दुबे कहते हैं कि भईया जब कोई बोले, "भाई, Old Monk तो Rum है ही नहीं", तो तुरंत नतीजा निकालने की जरूरत नहीं है. एडवोकेट दुबे के मुताबिक आज की तारीख में ज्यादा सटीक बात ये है,
FSSAI ने बॉम्बे हाई कोर्ट में कहा है कि जिन Old Monk प्रोडक्ट की जांच हुई, उनकी फॉर्मूलेशन में नैचुरल स्प्रिट और बाहरी रम फ्लेवरिंग का इस्तेमाल होने के कारण उन्हें सिर्फ "Rum" के नाम से बेचना नियमों के मुताबिक सही नहीं है. साथ ही "7 years old blended" दावे पर भी रेगुलेटर ने सवाल उठाया है. लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट ने अभी ये अंतिम फैसला नहीं दिया है कि Old Monk Rum नहीं है.
और शायद इस कहानी की सबसे दिलचस्प बात यही है.
जिस सवाल को सोशल मीडिया ने एक लाइन में बदल दिया, "Old Monk Rum नहीं है", उसके पीछे असल में भारतीय शराब उद्योग की पूरी मैन्युफैक्चिरंग और लेबलिंग व्यवस्था का सवाल छिपा है.
आखिर Rum सिर्फ उसका नाम है, उसका रंग है, उसका taste है, या उसे बनाने का तरीका भी उसकी पहचान तय करता है? अब फैसला इसी सवाल पर होना है.
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