केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए इक्विटी नियमों पर फिर से विचार कर रही है. इन नियमों का मकसद हायर एजुकेशन संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को दूर करना है. केंद्र और UGC की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच को बताया कि सरकार इन नियमों की जांच कर रही है. सरकार ने अभी तक यह तय नहीं किया है कि वह आगे क्या कदम उठाएगी. सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कोर्ट से कहा कि ‘मैं यह नहीं कह रहा कि फैसला किस तरफ जाएगा, लेकिन हम इस पर फिर से विचार कर रहे हैं.’
जाति-आधारित भेदभाव को दूर करने के UGC के नए नियमों पर फिर विचार हो रहा: केंद्र
UGC के नए इक्विटी नियमों पर केंद्र सरकार फिर से विचार कर रही है. सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार नियमों की समीक्षा कर रही है और अभी ये तय नहीं है कि आगे क्या कदम उठाया जाएगा. वहीं कोर्ट ने UGC को सभी याचिकाओं पर 4 हफ्ते में विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है.

इस बीच कोर्ट में नए नियमों को चुनौती भी दी गई है. कोर्ट ने नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर जवाब देने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है. कोर्ट ने निर्देश दिया कि सरकार सभी याचिकाकर्ताओं के मुद्दों पर एक डिटेल्ड जवाबी हलफनामा (counter-affidavit) दाखिल करे. इससे पहले कोर्ट ने कहा था कि जब तक नियमों को अंतिम रूप नहीं दिया जाता, तब तक नए नियमों पर रोक लगी रहे.
UGC को साझा जवाब दाखिल करने का आदेशइंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि UGC के हलफनामे की कॉपी सभी याचिकाकर्ताओं को दी जाए. इसके बाद याचिकाकर्ताओं को अपने जवाब (rejoinders) दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय मिलेगा. यह निर्देश ऐसे समय आया है, जब याचिकाकर्ताओं ने कार्यवाही के दौरान केंद्र और UGC द्वारा दाखिल जवाबों की कॉपी न मिलने पर चिंता जताई. अब इस मामले पर सुनवाई चार हफ्ते बाद होगी.
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UGC के रेगुलेशन 3(C) को चुनौतीनए नियमों में सबसे अधिक चर्चा यूजीसी के एक रेगुलेशन 3(C) के खिलाफ है. इसे याचिकाकर्ताओं ने मनमाना और भेदभावपूर्ण बताया है. याचिकाओं के अनुसार, इस प्रावधान की वजह से छात्रों के कुछ वर्गों को रेगुलेशन के तहत मिलने वाली सुरक्षा से बाहर रखा जा सकता है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह प्रावधान संवैधानिक गारंटियों का उल्लंघन करता है. गारंटियां जिनमें समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता शामिल है. यह भी कहा गया है कि ये रेगुलेशन यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन एक्ट, 1956 के अनुरूप नहीं हैं. ये उच्च शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करने के उद्देश्य को कमजोर कर सकते हैं.
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