उत्तराखंड के खटीमा गांव के एक स्कूल में बच्चों से मोबाइल की लत छुड़वाने के लिए ‘एंटी मोबाइल एक्टिविटी’ कराई गई. दरअसल, बच्चों के पेरेंट्स से लगातार ये शिकायत मिल रही थी कि वे घर जाकर पूरा-पूरा टाइम फोन देखने में बिता देते हैं. इस कंप्लेन के आधार और बच्चों के पेरेंट्स की मांग पर स्कूल में ऐसी एंटी मोबाइल एक्टिविटी कराई गई कि बच्चों की चीखें निकल गईं. इसके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए तो मामला प्रशासन तक पहुंच गया. अब जांच के आदेश दिए गए हैं.
'फोन चलाते थे, डॉक्टर ने आंखें निकाल दीं', इस नाटक ने बच्चों की चीखें निकाल दीं
Uttarakhand के एक स्कूल में Anti Mobile Activity कराई गई. इस दौरान कई छोटे बच्चे रोते हुए और डरे-सहमे हुए नजर आए. एक्टिविटी ks कुछ वीडियो सामने आए हैं, जिसके बाद SDM ने जांच के आदेश जारी कर दिए हैं.

वीडियो में छोटे बच्चे डरे-सहमे नजर आ रहे हैं. इलाके के SDM ने मामले की जांच के आदेश जारी कर दिए हैं.
मामला बिरिया गांव के माउटेंसरी इंडियन पब्लिक स्कूल का है. इंडिया टुडे से जुड़े राजेश छाबरा की रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चों के मोबाइल देखने की लत को छुड़वाने के लिए स्कूल में नाटक कराया गया. इसमें मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल से आंखों और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को दिखाया गया. नाटक में किसी बच्चे ने डॉक्टर का किरदार निभाया तो किसी ने आंखों के मरीज का.
एक छात्रा की आंख पर लाल रंग लगाकर पट्टी बांध दी गई. फिर उसने बाकी छात्रों से कहा कि ज्यादा फोन चलाने की वजह से डॉक्टर ने उसकी आंखें निकाल ली हैं. इसके बाद वो हुआ जिसने इस नाटक को 'कलेश' बना दिया. पट्टी लगाकर आई छात्रा की बात सुनकर बाकी मासूम बच्चे बुरी तरह डर गए. रोने लगे और हाथ जोड़कर कहने लगे कि वे अब कभी मोबाइल नहीं छुएंगे.
बच्चों को फोन से दूर रखने के लिए इस तरह का नाटक कर उनके बीच ऐसा डर का माहौल बनाना अब सवालों के घेरे में है. उधम सिंह नगर जिला शिक्षा अधिकारी हरेंद्र कुमार मिश्रा ने बेसिक शिक्षा अधिकारी को पूरे मामले में जांच कर कार्यवाही के आदेश दिए हैं. वही खटीमा के एसडीएम तुषार सैनी ने कहा कि बच्चों में डरावनी एक्टिविटी कराई गई है. इससे बच्चों में भय का माहौल बना है. एसडीएम ने आगे कहा कि बच्चों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए एक्टिविटी कराई जानी चाहिए. लेकिन ऐसे कार्यक्रम ना हों जिनसे बच्चे डर जाए.
वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर भी अलग-अलग रिएक्शन आ रहे है. लोग कह रहे हैं कि बच्चों में जागरूकता लाने का उद्देश्य सही हो सकता है. लेकिन डर पैदा करने वाला ये तरीका सही नहीं है. इस तरह डराने से बच्चों के दिमाग पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है.
मोबाइल की नीली रोशनी और घंटों एकटक स्क्रीन देखना काफी नुकसानदेह है. इससे बच्चों की आंखों की रोशनी पर सीधा असर पड़ता है. कम उम्र में ही बच्चों को चश्मा चढ़ना, ड्राई आईज की शिकायत बढ़ रही है. बच्चे लगातार स्क्रीन देखते हैं तो पलकें झपकाना भूल जाते हैं, जिससे आंखों की पुतलियों पर बुरा असर पड़ता है. घंटों तक झुककर मोबाइल चलाने से गर्दन और रीढ़ की हड्डी में दर्द रहने लगता है, जिसे 'टेक्स्ट नेक' कहा जाता है.
इसके अलावा स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट दिमाग में मेलाटोनिन हार्मोन को बनने से रोकती है. यही हार्मोन हमें सुकून की नींद देता है. जब नींद पूरी नहीं होती तो बच्चे दिन भर सुस्त और चिड़चिड़े रहते हैं.
यह भी पढ़ें: एयर होस्टेस की जॉब छोड़ी, बन गईं हिमाचल की पहली महिला ट्रक ड्राइवर, नेहा ठाकुर कौन हैं?
अब सवाल उठता है कि जब पूरी दुनिया फोन में सिमट रही है तो बच्चों को इससे दूर कैसे रखें? तो आप अपने बच्चे को डांटने या मारने के बजाय इन प्रैक्टिकल और आसान तरीके को अपनाएं. जैसे घर में कुछ वक्त 'नो फोन जोन' बनाएं, जहां कोई भी मोबाइल न छुए. खाना खाते समय टीवी या फोन देखने की आदत सबसे पहले बंद करें. इसके बजाय परिवार के साथ बैठकर बातें करते हुए खाना खाने की आदत डालें. बच्चे की स्क्रीन टाइम की लिमिट सेट करें.
कुल मिलाकर शुरुआत तो घर से ही करनी पड़ेगी. बच्चों को प्यार से समझाएं क्योंकि थोड़ी भी अजीबो-गरीब टाइप की एक्टिविटी बच्चों के दिमाग पर बुरा असर डाल सकती है.
वीडियो: साहिल वाकोड़े मामले में प्रोफेसर सूर्यनारायण दूल्ला के समर्थन में आए 5 आईआईटी














