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'उमर-शरजील की रिहाई' के नारे लगाए, कोर्ट ने TISS के 2 छात्रों को छोड़ बाकी 7 को बेल दे दी

जज ने कहा कि जांच के दौरान मिली सामग्री से संकेत मिलता है कि आरोपी माओवादी विचारधारा से प्रभावित हो सकते हैं. यह जमावड़ा संस्थान के अन्य छात्रों को प्रभावित करने की कोशिश का हिस्सा हो सकता है.

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TISS में शरजील-उमर की रिहाई के लिए नारे लगने का आरोप है (PHOTO-AajTak)

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  • मुंबई सेशंस कोर्ट ने टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस के दो छात्रों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी, जबकि अन्य सात छात्रों को जमानत दी गई है।
  • यह मामला अक्टूबर 2024 में जीएन साईबाबा को श्रद्धांजलि देते हुए आयोजित एक सभा में उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई के समर्थन में नारे लगाने के कारण उत्पन्न हुआ।
  • अदालत ने आरोपियों के माओवादी विचारधारा से प्रभावित होने के सुराग मिलने के बाद जांच जारी रखने और जमानत न देने का फैसला किया है, जबकि मामले की आगे की जांच चल रही है।

शरजील इमाम और उमर खालिद की रिहाई के लिए नारे लगाना टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस (TISS) दो स्टूडेंट्स के लिए भारी पड़ गया है. उनके खिलाफ दर्ज केस में अग्रिम जमानत देने की याचिका खारिज हो गई है. दोनों के साथ 7 और आरोपी छात्रों ने जमानत के लिए मुंबई सेशंस कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. कोर्ट ने दो स्टूडेंट्स को छोड़कर बाकी 7 को बेल दे दी. सभी छात्रों पर आरोप है कि उन्होंने पिछले साल इंस्टिट्यूट में हुई एक सभा के दौरान उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई की मांग करते हुए नारे लगाए थे. 

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जिन दो स्टूडेंट्स की याचिकाएं खारिज की गईं, उनमें से एक 32 साल का है. वो गोवंडी का रहने वाला है. दूसरा 23 साल का छात्र देवनार का रहने वाला है. जमानत याचिका खारिज करने का यह आदेश जस्टिस वीबी बोहरा ने दिया. उन्होंने कहा कि छात्र होने के नाते आरोपियों से यह उम्मीद की जाती है कि वो देश के कानून का सम्मान करें.

क्या है पूरा मामला?

यह पूरा मामला 12 अक्टूबर 2025 का है. इस दिन TISS में एक सभा आयोजित हुई थी. ये सभा अक्टूबर 2024 में गुजर चुके GN साईबाबा को श्रद्धांजलि देने के लिए रखी गई थी. जीएन साईबाबा दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर, लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता थे. 12 अक्टूबर 2024 को उनका निधन हो गया था. माओवादी संगठनों से कथित संबंधों के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया था. यूएपीए के तहत उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी. बाद में कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया और मार्च 2024 में वह नागपुर सेंट्रल जेल से रिहा हो गए.

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इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपी छात्रों पर दर्ज FIR में लिखा है कि लगभग 10 से 12 छात्र शाम 7.30 बजे से 8.30 बजे के बीच TISS के हॉस्टल के पास जमा हुए थे. इसके लिए उन्होंने संस्थान प्रशासन से पहले से कोई इजाजत नहीं ली थी. सभा के दौरान ‘उमर खालिद को रिहा करो’ और ‘शरजील इमाम को रिहा करो’ जैसे नारे लगाए गए. FIR की शुरूआत में 9 लोगों के नाम शामिल थे. बाद में जांच ट्रॉम्बे पुलिस से लेकर क्राइम इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) को सौंप दी गई.

स्टूडेंट्स पर क्या आरोप हैं?

प्रॉसीक्यूशन ने स्टूडेंट्स पर कई आरोप लगाए हैं. उनके अनुसार, स्टूडेंट्स ने जीएन साईबाबा की तस्वीरें लगाईं. उन्हें एक पेड़ पर रखा. मोमबत्तियां जलाईं. उनकी लिखी कविताएं पढ़ीं और ऐसे प्लेकार्ड दिखाए जिन पर लिखा था ‘रेस्ट इन पावर’. (1967 से हमेशा के लिए).

लेकिन प्रॉसीक्यूशन के मुताबिक यह जमावड़ा सिर्फ़ साईबाबा को श्रद्धांजलि देने तक सीमित नहीं था. छात्रों ने वहां उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई की मांग करते हुए नारे भी लगाए. फिलहाल, दोनों पर 'गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम' (UAPA) के तहत कार्रवाई चल रही है. अदालत ने कहा कि साईबाबा को श्रद्धांजलि देना गैर-कानूनी नहीं कहा जा सकता. खासकर इसलिए क्योंकि बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2024 में उन्हें बरी कर दिया था. 

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हालांकि, जज ने कहा कि ऐसा लगता है कि उस जमावड़े में हुई गतिविधियां उन्हें श्रद्धांजलि देने से कहीं आगे निकल गई थीं. अदालत ने कहा कि ऐसे नारे लगाने के लिए यह मंच नहीं था. ये कथित नारे किसी सार्वजनिक आंदोलन या जुलूस के बजाय कैंपस में हुए एक जमावड़े के दौरान लगाए गए थे.

माओवादी विचारधारा का आरोप

जांच के दौरान पुलिस ने आरोपियों से लैपटॉप और मोबाइल फोन जैसे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस भी जब्त किए. जांचकर्ताओं को उन डिवाइस में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के सदस्यों द्वारा प्रकाशित किताबें और अन्य सामग्री मिलीं. ये चीजें उन छात्रों में से एक और एक अन्य सह-आरोपी के पास थीं, जिनकी जमानत अर्जी खारिज की गई है. यह भी आरोप लगाया गया कि डिवाइस से कुछ जानकारी डिलीट कर दी गई थी.

जज ने कहा कि जांच के दौरान मिली सामग्री से संकेत मिलता है कि आरोपी माओवादी विचारधारा से प्रभावित हो सकते हैं. यह जमावड़ा संस्थान के अन्य छात्रों को प्रभावित करने की कोशिश का हिस्सा हो सकता है. हालांकि, जज ने एक महत्वपूर्ण बात भी कही कि केवल माओवादी प्रकाशनों को डाउनलोड करना अपने आप में कोई अपराध नहीं हो सकता है. अदालत ने कहा कि फिर भी छात्रों के खिलाफ दूसरे आरोपों के संदर्भ में इस सामग्री की जांच की जानी चाहिए.

कार्रवाई में देरी पर सवाल

जज ने आरोपी की उन दलीलों पर भी बात की जिनमें आपराधिक कार्रवाई में देरी पर सवाल उठाए गए थे. कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मुकदमों में तय प्रक्रियाओं का पालन करना होता है. कोर्ट ने बताया कि कई वजहों से देरी हो सकती है. जैसे कि बहुत सारे केस पेंडिंग होना और जजों की संख्या और केसों की संख्या के बीच असंतुलन. जज ने बताया कि वे खुद छात्रों की अग्रिम जमानत (anticipatory bail) की अर्जियों पर उनके दाखिल होने के 9 महीने से ज्यादा समय बाद आदेश दे रहे थे.

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हालांकि कोर्ट ने कहा कि कैंपस में बिना इजाजत ‘रेस्ट इन पावर’ (Rest in Power) वाक्यांश का इस्तेमाल करना कोई अपराध नहीं है. लेकिन जमावड़े के हालात, कथित नारे और जांच के दौरान मिली चीजों से आरोपियों के इरादों पर सवाल उठते हैं. इसलिए, इन दो छात्रों को अग्रिम जमानत का संरक्षण नहीं मिलेगा. जबकि 7 अन्य आरोपी छात्रों को यह राहत दे दी गई है. मामले की आगे की जांच चल रही है.

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