भारत सरकार ने टेलीग्राम को 22 जून तक बैन कर दिया है. सरकार का कहना है कि इस ऐप के जरिए NEET-UG की फिर से होने वाली परीक्षा का पेपर फिर से लीक हो सकता है. इससे एग्जाम से जुड़ी गोपनीय जानकारी बिजली की रफ्तार से लाखों लोगों तक पहुंच सकती है. ऐसे में एहतियातन कुछ दिन के लिए ऐप पर बैन लगाया जा रहा है. इस आदेश के बाद दिल्ली हाईकोर्ट में फैसले के खिलाफ अपील हुई. अब आज यानी 19 जून को कोर्ट ने भी कह दिया है कि सरकार का फैसला सही है. कोर्ट ने ये भी माना कि IT ऐक्ट के तहत केंद्र सरकार जरूरत पड़ने पर किसी ऐप या डिजिटल प्लेटफॉर्म तक लोगों की पहुंच रोक सकती है.
Telegram पर बैन कितना सही? सरकार-कोर्ट के तर्कों पर एक्सपर्ट ने क्या कहा?
Telegram पर 22 जून तक लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को दिल्ली हाई कोर्ट ने सही ठहराया है. सरकार का कहना है कि NEET-UG री-एग्जाम से जुड़ी गोपनीय जानकारी लीक होने से रोकने के लिए यह कदम जरूरी था.


कोर्ट ने तो सरकार के फैसले को अप्रूव कर दिया. लेकिन, डिजिटल अधिकारों से जुड़े लोगों को ये फैसला रास नहीं आया. उनका कहना है कि ये फैसला आने वाले दिनों में सोशल मीडिया को कंट्रोल करने का मोटिवेशन या उदाहरण बन सकता है. कुल मिलाकर बैन को लेकर देशभर में कानूनी बहस शुरू हो गई है.
सोशल मीडिया पर किसी भी तरह का कंट्रोल लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पर कुतरने के बराबर माना जाता है. इसलिए टेलीग्राम पर बैन को लेकर सवाल ये उठ रहा है कि क्या चीन की तरह भारत भी ऐप्स और इंटरनेट प्लेटफॉर्म्स पर बड़े पैमाने पर बैन लगाने की राह पर बढ़ रहा है?
इंडिया टुडे से जुड़ीं अनीशा माथुर की रिपोर्ट में इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) के निदेशक अपार गुप्ता ने कहा कि भारत का कानून यूजर की गलतियों पर सोशल मीडिया या मैसेजिंग ऐप को जिम्मेदार नहीं ठहराता. IT Act की धारा 79 के तहत प्लेटफॉर्म्स को ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा मिलती है. यानी अगर कोई यूजर कोई आपत्तिजनक, विवादित या आपराधिक पोस्ट करता है तो उसका जिम्मेदार वो खुद होता है. मैसेजिंग ऐप को इसके लिए दोषी नहीं माना जाता. न उस पर कार्रवाई की जाती है.
उन्होंने कहा कि ये ऐप्स केवल तब जिम्मेदार ठहराए जा सकते हैं जब वो भारतीय कोर्ट या सरकारी निर्देशों को न मानें. या फिर कानून के मुताबिक काम न करें. ऐसे में सरकार उन पर आंशिक या पूरी तरह प्रतिबंध लगा सकती है. अपार गुप्ता ने बताया कि श्रेया सिंघल vs यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का काम नहीं है कि उस पर पोस्ट किया गया कौन सा कॉन्टेंट कानूनी है, कौन सा नहीं? ये सरकार की जिम्मेदारी है. प्लेटफॉर्म्स का काम है कि वो किसी भी वैध सरकारी या कोर्ट के आदेश को नजरअंदाज न करें.
अपार ने आगे कहा, “इसे NEET के मामले से समझें, तो मान लीजिए अगर कोई व्यक्ति टेलीग्राम का इस्तेमाल करके पेपर लीक करता है तो ये अपराध उसी व्यक्ति का है. उस पर भारत के संबंधित कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है लेकिन सिर्फ इसलिए कि पेपर लीक का कॉन्टेंट टेलीग्राम पर शेयर किया गया था, ऐप खुद इस अपराध का दोषी नहीं हो जाता. ऐप तब दोषी होता जब वो सरकार के किसी आदेश के खिलाफ जाता. या कोर्ट की कही बात न मानता.”
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कानूनी फर्म Trilegal से जुड़े निखिल नरेंद्रन भी टेलीग्राम ऐप पर बैन लगाने को असरदार तरीका नहीं मानते. वो कहते हैं कि पूरे प्लेटफॉर्म को बैन करने का कोई फायदा नहीं है. अपराधी अपना काम निकालने के लिए वीपीएन यूज कर लेते हैं या दूसरे ऐप पर चले जाते हैं. लेकिन बैन से आम यूजर जरूर परेशान हो जाते हैं.
कोर्ट ने बैन पर क्या कहा?इन सबके बीच ये जानना भी जरूरी है कि कोर्ट ने सरकार के बैन का फैसला सही ठहराते हुए क्या कहा है? कोर्ट के फैसले सोशल मीडिया के खिलाफ कार्रवाई में सरकारी कंट्रोल और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच कानून की रेखा खींचते हैं.
चिह्नित चैनलों की बजाय पूरे टेलीग्राम ऐप बैन लगाने के सरकार के फैसले को ठीक बताते हुए कोर्ट ने कहा कि यहां कोई गलत कॉन्टेंट अगर शेयर किया जाता है तो वह पलक झपकते ही लाखों लोगों तक पहुंच सकता है. इससे पब्लिक ऑर्डर पर भी असर पड़ता है. ऐसी गतिविधियों में लिप्त टेलीग्राम चैनल को बंद किया जा सकता है, लेकिन अगर प्रशासन ऐसा करता है तो चैनल का ऑपरेटर दूसरा नया चैनल बना लेगा. इससे गैर कानूनी गतिविधियां फिर से शुरू हो जाती हैं.
कोर्ट ने आगे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 69A का हवाला दिया और कहा कि ये कानून केंद्र सरकार को आम लोगों के लिए किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का एक्सेस रोकने का अधिकार देती है. कोर्ट ने ये भी कहा कि जरूरत पड़ने पर सरकार टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स को ब्लॉक करने का निर्देश भी दे सकती है.
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