क्या चीन में जाति व्यवस्था है? कैसे काम करता है 'हुकौ' सिस्टम?
सोशल मीडिया पर भारतीय यूजर्स एक बेहद मजेदार बहस में जुटे हैं. बहस का सब्जेक्ट है, चीन में जातिवाद. भारतीय यूजर्स चीन के हाउसहोल्ड रजिस्ट्रेशन सिस्टम 'हुकौ' को जातिवाद से जोड़ रहे हैं. हुकौ चीनी नागरिकों को दो हिस्सों में बांटता है. लेकिन मामला एकदम ब्लैक एंड वॉइट नहीं है. इसको जातिवाद कहना कितना सही है? समझ लेते हैं.

सोशल मीडिया पर भारतीय यूजर्स एक मजेदार बहस में मुब्तिला है. बहस जाति पर है. जाति तो अपने देश में चौपाल से लेकर संसद तक जेर-ए-बहस का मुद्दा है. लेकिन बहस दिलचस्प इसलिए है कि चर्चा चीन को लेकर है. जी हां, कम्युनिस्ट चीन! जहां सबके लिए बराबर अवसर के दावे किए जाते हैं.
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, कई भारतीय यूजर्स चीन के सामाजिक ताने बाने की तुलना भारत की जाति व्यवस्था से करने लगे. उनका तर्क है कि चीन में एक ऐसा सिस्टम है, जो तय करता है कि आप किस घर में पैदा हुए हैं उसी हिसाब से अवसर मिलेंगे.
यूजर्स चीन के ‘हुकौ’ सिस्टम (Hukou System) को जाति व्यवस्था से जोड़ रहे हैं. हुकौ चीन की हाउसहोल्ड रजिस्ट्रेशन सिस्टम है. यूजर्स का दावा है कि ये एक तरह का 'जातिवाद' है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, वेल्फेयर स्कीम और दूसरे आर्थिक गतिविधियों तक लोगों की पहुंच को प्रभावित करता है.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दर्जनों भारतीयों की टाइमलाइन ऐसे पोस्ट और वीडियो से अटे हैं, जिसमें हुकौ को एक जाति व्यवस्था बताया गया है. इनका आरोप है कि इस सिस्टम में ऊपर के लोग नीचे के लोगों का शोषण करते हैं.
हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस बहस से नाइत्तेफाकी रखते हैं. उनका मानना है कि ये एक तरह का जनरलाइजेशन है. उनकी मानें तो चीनी मॉडल एक एडमिनिस्ट्रेटिव और इकोनॉमिक क्लासिफिकेशन है. ये जाति की तरह कोई सामाजिक संस्था नहीं है. अब माजरा इतना बड़ा हो गया है तो समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर सच क्या है.
चीन की पुरानी पेशा आधारित व्यवस्था
भारतीय सोशल मीडिया पर ‘चीनी जाति व्यवस्था’ की बात करते हैं तो दो बिलकुल अलग-अलग चीजों को मिक्स कर देते हैं. एक है चीन की पुरानी सामाजिक व्यवस्था. 'शि-नोंग-गोंग-शांग'. दूसरी मॉडर्न हाउसहोल्ड रजिस्ट्रेशन सिस्टम, 'हुकौ'. 'शि-नोंग-गोंग-शांग' के तार जहां शाही अतीत से जुड़ते हैं, वहीं हुकौ आज भी करोड़ों चीनी लोगों के जीवन पर असर डालता है. कम्युनिस्ट पार्टी के उदय से पहले चीनी समाज एक सामाजिक ढांचे में बंटा था. जिसका नाम है,'शि-नोंग-गोंग-शांग' इसमें लोगों को चार ग्रुप में बांटा जाता था.
शि (Shi) : पढ़े लिखे विद्वान और सरकारी अफसरों को इस कैटेगरी में रखा जाता था. इनको सबसे ऊपर माना जाता था.
नोंग (Nong) : इस कैटेगरी में किसानों को रखा जाता था. इनको दूसरे स्थान पर रखा गया, क्योंकि ये देश का पेट भरते थे.
गोंग (Gong) : कारीगर और मजदूर. अपने स्किल से सामान और हथियार बनाने वाले कारीगरों को तीसरे स्थान पर रखा गया था.
शांग (Shang) : व्यापारी और दुकानदार. इनको सबसे नीचे रखा गया क्योंकि चीनी विचारक कंफ्यूशियस मुनाफा कमाने को अच्छी नजर से नहीं देखते थे.
ये व्यवस्था झोऊ राजवंश के अंतिम दिनों में अस्तित्व में आई. बाद में 111 ईसवी में हान राजवंश के समय इसे औपचारिक रूप दे दिया गया. हालांकि ये भारत की जाति व्यवस्था की तरह नहीं था. इसमें कोई बंदिश नहीं थी. एक व्यापारी (शांग) का बेटा पढ़ाई-लिखाई करके सरकारी अफसर (शि) बन सकता था. यानी मेहनत करके आगे बढ़ने के रास्ते खुले थे.
‘हुकौ’ सिस्टम को लेकर असली बहस
असल बहस पुराने इतिहास पर नहीं, बल्कि कम्युनिस्ट क्रांति के बाद शुरू हुई एक सिस्टम पर है, जिसे हुकौ कहा जाता है. यह चीन का हाउसहोल्ड रजिस्ट्रेशन सिस्टम है. इसे 1950 के दशक में शुरू किया गया था. इस सिस्टम के तहत चीनी सरकार हर नागरिक को उनके रजिस्टर्ड एड्रेस के आधार पर दो कैटेगरी में बांट देती है.
शहरी हुकौ : शहर में रहने वाले लोग
ग्रामीण हुकौ : गांव में रहने वाले लोग
यह एक तरह का 'इंटरनल पासपोर्ट' है. अगर आप गांव के हुकौ में पैदा हुए हैं तो आप अपनी मर्जी से शहर जाकर वहां के स्थायी निवासी नहीं हो सकते.
अर्बन कास्ट सिस्टम क्यों कहा जा रहा?
चीन का हुकौ सिस्टम कई मामलों में जातिवाद के जैसे ही काम करता है. हांगकांग के चीनी विश्वविद्यालय में प्रेसिडेंशियल चेयर प्रोफेसर और डीन शेनझेन ने एक रिसर्च पेपर में 'हुकौ' के लिए 'अर्बन कास्ट सिस्टम' टर्म यूज किया है. कई और जानकार बताते हैं कि यह सिस्टम कई मामलों में जाति व्यवस्था की तरह ही काम करता है.
जन्म से तय होता है : आप किस हुकौ में रहेंगे, यह आपके माता-पिता से तय होता है, यानी आप जिस हुकौ में जन्म लेते हैं, उसी में रहना होगा.
सुविधाओं में अंतर : शहर वाले हुकौ के लोगों को बेहतरीन स्कूल, शानदार अस्पताल, अच्छी नौकरियां और सरकारी पेंशन मिलती है. वहीं गांव वाले हुकौ को इन सुविधाओं से दूर रखा जाता है.
ग्रामीण हुकौ वालों को नहीं मिलते बराबरी के मौके : चीन के शहरों में करीब 35 करोड़ से ज्यादा ऐसे प्रवासी मजदूर हैं, जो गांव से आए हैं. ये लोग शहरों में सबसे जोखिम वाला काम करते हैं और कम पैसों में मजदूरी करते हैं. लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मामले में इनको बराबरी के मौके नहीं मिलते. प्रोफेसर शेनझेन का मानना है कि चीन में दो अलग-अलग देश बसते हैं. एक जिसने तेज आर्थिक विकास से तरक्की की, दूसरा जो अब भी हाशिए पर है.
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चीन के लोग क्या कह रहे?
चीन के लोग और वहां के सरकारी एक्सपर्ट्स इस तुलना से काफी उखड़े हुए हैं. बीजिंग यूनिवर्सिटी के प्रोफेससर झांग यिवु का कहना है,
भारतीयों को चीन के इतिहास और संस्कृति की समझ नहीं है, इसलिए वे चीन के प्रशासनिक (Administrative) नियमों को जबरदस्ती 'जातिवाद' का नाम दे रहे हैं. उनका कहना है कि हुकौ सिर्फ जनसंख्या और शहरों को संभालने का एक तरीका है. ये कोई सामाजिक बुराई नहीं है.
आखिर सच क्या है?
सच को ब्लैक एंड वॉइट की कसौटी पर नहीं रखा जा सकता. हुकौ में जातिवाद से मिलते जुलते कई गुण हैं, वहीं कई चीजें बिल्कुल अलग. अगर आप जातिवाद का मतलब शादी ब्याह के नियम या छुआछूत से जोड़कर देखते हैं तो चीन में ऐसा कोई जातिवाद नहीं है. लेकिन अगर जातिवाद का मतलब पैदा होते ही एक ठप्पा लग जाना है, जिससे ये तय हो कि आपको जिंदगी में कितनी कामयाबी और सुविधाएं मिलेंगी, तो चीन का हुकौ सिस्टम काफी हद तक जातिवाद से मिलता जुलता है.
हालांकि चीन अब इस सिस्टम में धीरे-धीरे सुधार भी कर रहा है. छोटे शहरों में इस नियम में थोड़ी ढील दी जा रही है, लेकिन आज भी करोड़ों ग्रामीण चीनी नागरिक इस भेदभाव का शिकार हैं.
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