अगर किसी महिला की पहली डिलीवरी में जुड़वां बच्चे पैदा हों, तो क्या दूसरी प्रेग्नेंसी पर उसे मैटरनिटी लीव नहीं मिलेगी? इस सवाल पर तेलंगाना हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला दिया है. कोर्ट ने कहा कि पहली प्रेग्नेंसी में जुड़वा बच्चे होना महिला के कंट्रोल में नहीं होता. इसलिए सिर्फ़ इस आधार पर दूसरी डिलीवरी के लिए मैटरनिटी लीव से इनकार नहीं किया जा सकता. अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीवन के अधिकार के ख़िलाफ़ माना है.
पहली डिलीवरी में जुड़वां बच्चे तो दूसरी में नहीं दी मैटरनिटी लीव... अब कोर्ट ने मां को दिया न्याय
महिला ने जब दूसरी डिलीवरी के बाद मैटरनिटी लीव के लिए अप्लाई किया तो अधिकारियों ने ये कहते हुए उनका आवेदन ख़ारिज कर दिया कि पहली डिलीवरी में ही उनके जुड़वां बच्चे हो चुके हैं. इसलिए वो मैटरनिटी लीव की हक़दार नहीं हैं.


इंडियन एक्सप्रेस में पब्लिश हुई रिपोर्ट के मुताबिक़, जस्टिस के शरत तेलंगाना की एक सरकारी लेक्चरर जाडी स्वरूपा रानी की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे. उन्होंने 180 दिनों की मैटरनिटी लीव की मांग की थी. लेकिन अधिकारियों ने ये कहते हुए उनका आवेदन ख़ारिज कर दिया कि पहली डिलीवरी में ही उनके दो बच्चे (जुड़वां) हो चुके हैं. इसलिए वो नियमों के तहत दूसरी बार मैटरनिटी लीव लेने की हक़दार नहीं हैं. लेकिन इस रुख के खिलाफ़ 15 जुलाई को दिए अपने फैसले में हाई कोर्ट ने कहा,
“एक बच्चा हो या जुड़वां बच्चे, ये पूरी तरह बायोलॉजिकल घटना है, जो याचिकाकर्ता के काबू में नहीं है. इसलिए पहली प्रेग्नेंसी में जुड़वां बच्चे होने के आधार पर दूसरी डिलीवरी के लिए मैटरनिटी लीव से इनकार नहीं किया जा सकता. ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा.”
याचिकाकर्ता जाडी स्वरूपा रानी ने नवंबर 2023 में 180 दिनों की मैटरनिटी लीव ली थी. तब उन्होंने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया. बाद में जब वो फ़रवरी 2026 में दोबारा प्रेग्नेंट हुईं, तो उन्होंने दूसरी डिलीवरी के लिए भी मैटरनिटी लीव मांगी. लेकिन तेलंगाना फंडामेंटल रूल्स के नियम 101(a) और 17 मई 2014 के सरकारी आदेश Ms. No. 50 का हवाला देते हुए उनका आवेदन ख़ारिज कर दिया गया. इन नियमों में सिर्फ़ उन विवाहित महिला सरकारी कर्मचारियों को मैटरनिटी लीव देने का प्रावधान है, जिनके जीवित बच्चे दो या उससे कम हों. मगर स्वरूपा रानी ने 2026 में अपने तीसरे बच्चे को भी जन्म दे दिया. पिटिशनर्स की ओर से दलील दी गई कि अधिकारियों ने पहली प्रेग्नेंसी में दो जीवित जुड़वां बच्चों के जन्म को एक बायोलॉजिकल घटना नहीं माना. जबकि पहली प्रेग्नेंसी सिर्फ़ एक डिलीवरी थी और उसी आधार पर मैटरनिटी लीव का अधिकार तय होना चाहिए.
तेलंगाना सरकार का जवाबदूसरी तरफ़, तेलंगाना सरकार ने कहा कि महिला के पहले से दो जीवित बच्चे हैं, इसलिए नियमों के मुताबिक़ उन्हें मैटरनिटी लीव नहीं दी जा सकती. उनका ये भी कहना था कि नियमों के ख़िलाफ़ छुट्टी मंज़ूर करने पर ऑडिट में आपत्ति आ सकती है. सैलरी और अलाउंसेज़ का भुगतान भी अनियमित माना जाएगा. लेकिन हाई कोर्ट ने इस दलील से सहमति नहीं जताई. कोर्ट ने कहा कि नियमों को शब्दशः पढ़ने से मैटरनिटी लीव का असल मक़सद ही ख़त्म हो जाएगा. ये लीव देने का मक़सद महिला के स्वास्थ्य की रक्षा करना और बच्चे के जन्म के बाद भी उसे नौकरी जारी रखने में मदद करना है.
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आख़िर में हाईकोर्ट ने याचिका मंज़ूर की. साथ ही अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिककर्ता को 14 अप्रैल 2026 से 11 अक्टूबर 2026 तक, 180 दिनों की मैटरनिटी लीव दी जाए. ये छुट्टी उन्हें पूरी सैलरी और सभी अलाउंसेज़ के साथ मिले. अदालत का मानना है कि पहली प्रेग्नेंसी में जुड़वां होना किसी महिला के ख़िलाफ़ नहीं गिना जा सकता. यही वजह है कि इस फैसले को दूसरी महिला सरकारी कर्मचारियों के लिए भी एक अहम मिसाल माना जा रहा है.
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