‘गांधी परिवार से बेहतर तो संघ परिवार है.’ ये बात सुष्मिता देब ने कही है, जो पिछले पांच सालों से तृणमूल कांग्रेस में थीं. उससे पहले दशक भर कांग्रेस में रहीं और अभी जून 2026 में तृणमूल कांग्रेस की ‘भगदड़’ में शामिल होकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की हो गईं.
‘गांधी परिवार से बेहतर संघ परिवार’, पार्टी बदलने से पहले सुष्मिता देव को 'भगवा से एलर्जी' थी
कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में लंबा समय बिताने के बाद बीजेपी में शामिल हुईं सुष्मिता देव ने कहा कि गांधी परिवार की तुलना में संघ परिवार ज्यादा लोकतांत्रिक है. उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस में शीर्ष नेतृत्व की नाराजगी राजनीतिक करियर खत्म कर सकती है, जबकि बीजेपी योग्य लोगों को अवसर देती है.

सुष्मिता देब ने छात्र राजनीति से अपना करियर शुरू किया था. तब वो NSUI से जुड़ी थीं, जो कांग्रेस का ही छात्र संगठन है. छात्र राजनीति में सुष्मिता देब ने एबीवीपी का खूब विरोध किया. इंडियन एक्सप्रेस के साथ बातचीत में वो ये तक कहती हैं कि उस समय उन्हें ‘भगवा रंग से भी एक तरह की एलर्जी’ थी.
'कांग्रेस में गांधी परिवार नाराज हो जाए तो…'कांग्रेस आधारित राजनीति में लंबा समय बिताने के बाद अब वही सुष्मिता देब कह रही हैं कि गांधी परिवार से संघ परिवार ज्यादा अच्छा है. सुष्मिता ने दावा किया कि कांग्रेस में अगर शीर्ष पर बैठा कोई व्यक्ति आपसे नाराज हो जाता है तो आपका करियर खत्म हो जाता है. आप (गांधी) परिवार से पंगा लेकर कांग्रेस में टिक नहीं सकते. लेकिन अगर आप बीजेपी में एक योग्य व्यक्ति हैं, तो पार्टी हमेशा आपके लिए एक मंच उपलब्ध रखेगी.
उन्होंने आगे कहा,
'गांधी परिवार बनाम संघ परिवार'कांग्रेस भी एक 'परिवार' के हिसाब से चलती है. फर्क सिर्फ इतना है कि कांग्रेस गांधी परिवार के नेतृत्व में चलती है. जबकि बीजेपी की विचारधारा संघ परिवार (RSS) से आती है. मेरे हिसाब से एक ही (गांधी) परिवार के बजाय RSS जैसे बड़े संगठन का होना बेहतर है, क्योंकि उसमें अलग-अलग लोगों की अलग-अलग राय होती है. वहां सिर्फ एक व्यक्ति का फैसला नहीं चलता.
देब ने आगे कहा कि परिवार दोनों तरफ हैं. उधर गांधी परिवार है और इधर संघ परिवार, लेकिन संघ परिवार एक बड़े संगठन के रूप में काम करता है, इसलिए वह एक परिवार की तुलना में ‘ज्यादा लोकतांत्रिक’ है.
ये भी पढ़ेंः कांग्रेस नेता नाना पटोले ने दूध से पैर धुलवाए, फिर बोले- 'ये तो सम्मान है'
उन्होंने कहा, ‘जब मैंने छात्र राजनीति शुरू की थी, तब हमारी राजनीति ABVP के विरोध से शुरू होती थी. इसलिए उस समय भगवा रंग से भी एक तरह की एलर्जी थी. अब पाठ्यक्रम (सिलेबस) में बदलाव को लेकर बहस चल रही है. मेरा मानना है कि बीजेपी के सत्ता में आने से पहले भी इतिहास और सिलेबस में इस तरह बदलाव किए गए थे कि आजादी की लड़ाई में सिर्फ कांग्रेस नेताओं की भूमिका पर ज्यादा जोर दिया जाता था.’
'स्कूल के सिलेबस में गांधी-नेहरू'सुष्मिता के मुताबिक, पहले स्कूल के सिलेबस में गांधी परिवार और पंडित जवाहरलाल नेहरू के योगदान को ही ज्यादा प्रमुखता दी जाती थी. लेकिन असल में अच्छा सिलेबस वह है, जिसमें देश की सभी विचारधाराओं और उनके योगदान का जिक्र हो. उन्होंने कहा कि इतिहास में यह भी दर्ज है कि कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता कभी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की शाखा में गए थे, लेकिन कांग्रेस इस बात का कभी जिक्र नहीं करती.
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने ही साल 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी.
वीडियो: सुप्रीम कोर्ट में क्या नया होने वाला है?











