‘बंद कमरे में महिला का जबरन ब्रेस्ट दबाना और सलवार उतारना, रेप की कोशिश नहीं है’. 9 जुलाई 2026 को पटना हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति की रेप के प्रयास में हुई सज़ा को रद्द करते हुए ये बयान दिया था. उस वक्त इस फैसले को लेकर काफी सवाल उठे थे. अब इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है. सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले की आलोचना की है. इस मामले की सुनवाई CJI जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच कर रही थी. लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, CJI की बेंच ने कहा कि हाई कोर्ट के फैसले की कुछ बातें आपत्तिजनक हैं. सुनवाई के दौरान CJI ने कहा, "हम आरोपी को सुने बिना हाई कोर्ट के फैसले को रद्द नहीं कर सकते."
'सलवार उतारना, ब्रेस्ट दबाना रेप नहीं', पटना HC के फैसले पर SC ने लिया स्वतः संज्ञान
पटना हाई कोर्ट का ये बयान बिहार के बांका जिले के एक मामलेे में 9 जुलाई को आया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर स्वतः संज्ञान लिया है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर पटना हाई कोर्ट की आलोचना की है.

उन्होंने सुनवाई में मौजूद बिहार के एडवोकेट जनरल एस डी संजय से कहा कि वो आरोपी तक नोटिस पहुंचाना सुनिश्चित करें. इसके लिए स्थानीय पुलिस की मदद ली जाए. कोर्ट ने ये भी संकेत दिया कि वो आगे सेक्सुअल ऑफेन्स के मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण को लेकर अलग से विस्तृत आदेश दे सकता है.
वैसे ये पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट में पटना हाई कोर्ट के उस फैसले की बात उठी थी. सुप्रीम कोर्ट को जुलाई में पटना हाई कोर्ट के आदेश की जानकारी दी गई. तब सुप्रीम कोर्ट, इलाहाबाद हाई कोर्ट के ऐसे ही आदेश पर सुनवाई कर रहा था.
14 जुलाई 2026. सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाई कोर्ट के विवादित फैसले की सुनवाई चल रही थी. उस सुनवाई के दौरान ही CJI सूर्यकांत ने पटना हाई कोर्ट की इस टिप्पणी पर नाराजगी जताई थी. CJI ने इस मामले पर हैरानी जताते हुए कहा कि ‘जजों को फैसला सुनाने से पहले पूरी रिसर्च करनी चाहिए.’
अब सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के 9 जुलाई वाले फैसले पर संज्ञान लिया है.
किस केस में आया था फैसला?पटना हाई कोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने एक व्यक्ति की अपील मंजूर करते हुए उसे रेप की कोशिश के आरोप से बरी कर दिया था. मामला 20 जनवरी 2008 का था. बिहार के बांका जिले में एक फोटो स्टूडियो था. एक नाबालिग लड़की अपने पिता के साथ वहां फोटो खिंचवाने गई थी. स्टूडियो मालिक हिमांशु फोटो खींचने के बहाने उसे अंदर लेकर गया और पिता को बाहर ही इंतज़ार करने के लिए कहा.
लड़की ने आरोप लगाया कि अंदर जाते ही हिमांशु ने स्टूडियो का दरवाजा बंद कर लिया. अपने कपड़े उतारे और उसकी सलवार उतारने की कोशिश करने लगा. पीड़िता ने आरोप लगाया कि हिमांशु ने उसका ब्रेस्ट दबाया और उसके साथ बदसलूकी की. फिर मामला कोर्ट पहुंचा. 2013 में बांका कोर्ट ने हिमांशु को रेप की कोशिश और बंधक बनाने का दोषी करार दिया था. 3 साल जेल की सजा सुनाई थी. फिर इस फैसले को हाई कोर्ट में चैलेंज किया गया.
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पटना HC ने क्या कहा था?सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी ने बल का प्रयोग किया, दरवाजा बंद किया, सलवार उतारने की कोशिश की और उसकी छाती दबाकर शारीरिक उत्पीड़न किया. हालांकि, ये घटना रेप के प्रयास की बजाय मर्यादा को ठेस पहुंचाने वाली है. इसमें रेप के प्रयास की पुष्टि के लिए कोई मेडिकल सबूत नहीं हैं.
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पीड़िता के माता-पिता ही मुख्य गवाह हैं, जिनका इस मामले के नतीजे से सीधा संबंध है. अदालतें मानती आई हैं कि कई बार ऐसे गवाह अपने पक्ष में तथ्यों को बढ़ा-चढ़कर पेश कर सकते हैं.
इसी से मिलती-जुलती टिप्पणी इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मार्च 2025 में की थी. आदेश दिया कि नाड़ा तोड़ना, निजी अंग पकड़ना रेप की कोशिश नहीं सिर्फ क्राइम की तैयारी थी. इसी केस पर सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 को आदेश दिया था और कहा था कि यह रेप की कोशिश ही है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी को यौन अपराध मामलों की सुनवाई के लिए गाइडलाइन तैयार करने का निर्देश दिया था.
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