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'SIR संविधान में जान डालती है', SC ने पूरी प्रोसेस को सही ठहराया, EC की बड़ी जीत

SIR Supreme Court Verdict: सुप्रीम कोर्ट को SIR की प्रक्रिया में कोई खामी नहीं मिली है. इस फैसले से उन विपक्षी पार्टियों और संगठनों को बड़ा झटका लगा है, जिन्होंने SIR की टाइमिंग पर सवाल उठाए और भारतीय मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से गलत तरीके से हटाए जाने की आशंका जताई थी.

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सुप्रीम कोर्ट ने SIR मामले में चुनाव आयोग के पक्ष में फैसला सुनाया. (PTI)

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  • सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को कानूनी रूप से सही ठहराते हुए चुनाव आयोग को इस प्रक्रिया को लागू करने का अधिकार दिया है, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को बढ़ावा देती है।
  • SIR प्रक्रिया पर विपक्षी पार्टियों और संगठनों द्वारा आपत्तियां उठाई गईं और कई याचिकाएं जून 2025 में बिहार में SIR कराने के नोटिफिकेशन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गईं, जिन्हें कोर्ट ने खारिज कर दिया।
  • सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया जारी रखने का निर्णय लिया है और 30 मई से 16 राज्यों व 3 केंद्र शासित प्रदेशों में इसका तीसरा चरण शुरू होगा।
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अनीषा माथुर

सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया (ECI) द्वारा वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को कानूनी तौर पर सही ठहराया है. सर्वोच्च अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग के पास SIR करने का पूरा हक है, और यह प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को बढ़ावा देती है. SIR पर काफी विवाद उठा था. विपक्षी पार्टियों समेत कई संगठनों ने SIR प्रोसेस को रोकने की मांग की थी. सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया. बुधवार, 27 मई को देश की सबसे बड़ी अदालत ने SIR मामले में चुनाव आयोग को बड़ी राहत देते हुए उसके पक्ष में फैसला सुना दिया.

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चुनाव आयोग की जीत

SIR के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गई थीं. इनमें जून 2025 में चुनाव आयोग के बिहार में SIR कराने के नोटिफिकेशन को चुनौती दी गई थी. भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने इन पर फैसला सुना दिया है. कोर्ट ने माना कि SIR प्रक्रिया का संबंध स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लक्ष्य से था.

इंडिया टुडे से जुड़ीं सृष्टि ओझा और अनीषा माथुर की रिपोर्ट के मुताबिक, 27 मई को फैसला पढ़ते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा,

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“जब कानून खुद किसी भी समय, कारणों को दर्ज करके और चुनाव आयोग को सही तरीके से स्पेशल रिवीजन की इजाजत देता है, तो जिस काम पर सवाल उठाया गया है, उसे सिर्फ इसलिए अमान्य नहीं किया जा सकता क्योंकि यह हर तरह से रूटीन रिवीजन के लिए सोचे गए आम तरीकों से मेल नहीं खाता है.”

CJI सूर्यकांत ने आगे कहा,

"हमारी सोची-समझी राय में जिस SIR पर सवाल उठाया गया है, वह रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट और नियमों की जगह नहीं लेती है. बल्कि, यह सेक्शन 21(3) में दिए गए सटीक कानूनी दायरे में आर्टिकल 324 के तहत संवैधानिक अधिकार में जान डालती है. इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि आयोग ने अपनी कानूनी शक्तियों से पार जाकर काम किया है."

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कोर्ट यह देख रहा था कि क्या चुनाव आयोग के पास संविधान के आर्टिकल 324, रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1950 और उसके तहत बनाए गए नियमों के तहत SIR को मौजूदा रूप में करने की पावर है. लंबी सुनवाई चली और अब कोर्ट ने माना कि चुनाव आयोग के पास ऐसा करने की पावर है.

विपक्ष को झटका

सुप्रीम कोर्ट को SIR की प्रक्रिया में कोई खामी नहीं मिली है. इस फैसले से उन विपक्षी पार्टियों और संगठनों को बड़ा झटका लगा है, जिन्होंने SIR की टाइमिंग पर सवाल उठाए और SIR से भारतीय मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से गलत तरीके से हटाए जाने की आशंका जताई थी. दूसरी तरफ, केंद्र सरकार को राहत मिली है, क्योंकि उसने SIR के मुद्दे पर चुनाव आयोग का समर्थन किया था.

SIR को सबसे पहले जून 2025 में बिहार में लॉन्च किया गया था. केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में भी SIR के बाद हालिया विधानसभा चुनाव हुए. उत्तर प्रदेश, गुजरात और राजस्थान में भी SIR प्रक्रिया को पूरा किया गया.

SIR का तीसरा फेज

चुनाव आयोग SIR के तीसरे फेज का भी ऐलान कर चुका है. 30 मई से 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में यह कवायद चलेगी. इनमें आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, दिल्ली, ओडिशा, पंजाब, सिक्किम, त्रिपुरा, तेलंगाना और उत्तराखंड शामिल हैं.

नागरिकता जांचने का पैमाना? 

SIR पर एक बड़ा आरोप ये लगा था कि ये लोगों की नागरिकता जांचने और तय करने का पैमाना बन सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि व्यक्ति को वोटर लिस्ट में शामिल करने या ना करने का हक चुनाव आयोग के पास है. यह किसी की नागरिकता के दावों को छीनने का काम नहीं करता.

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