सुप्रीम कोर्ट ने पति-पत्नी के अलग होने पर बच्चे के मेंटनेंस को लेकर एक बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने कहा कि डीएनए टेस्ट में अगर साफ हो जाए कि कोई आदमी किसी बच्चे का जैविक पिता नहीं है तो उसे बच्चे के लिए मेंटेनेंस नहीं देना पड़ेगा, भले ही बच्चे का जन्म वैवाहिक संबंध के दौरान हुआ हो.
'बच्चे का DNA पिता से मैच नहीं हुआ तो मेंटनेंस नहीं मिलेगा', सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अगर डीएनए रिपोर्ट में साफ हो जाए कि कोई आदमी किसी बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे बच्चे के लिए मेंटेनेंस नहीं देना पड़ेगा. कोर्ट ने कहा कि पारंपरिक कानून और साइंटिफिक सबूत के बीच टकराव हो तो साइंटिफिक सबूत को प्राथमिकता मिलनी चाहिए.


लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापाम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने मामले में फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि वैज्ञानिक सबूत कानूनी धारणाओं से ऊपर हैं. अगर डीएनए रिपोर्ट में साबित हो गया कि पिता बच्चे का जैविक पिता नहीं है तो अदालतें इसे अनदेखा नहीं कर सकतीं. बेंच ने कहा,
सामान्य तौर पर कानून के तहत विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को वैध माना जाता है. लेकिन डीएनए टेस्ट जैसे साइंटिफिक एविडेंस से इसका टकराव हो, तो वैज्ञानिक सबूत को प्राथमिकता मिलनी चाहिए.
बेंच ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि इंडियन एविडेंस एक्ट 1872 की धारा 112 उस समय बनी थी, जब डीएनए टेस्ट जैसी आधुनिक तकनीक नहीं थी. यह एक्ट बच्चे को सामाजिक कलंक से बचाता है. लेकिन जब डीएनए रिपोर्ट सामने है और उस रिपोर्ट को चुनौती भी नहीं दी गई हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
इस मामले से जुड़े दोनों पक्षों (पति-पत्नी) ने साल 2016 में शादी की थी. उसी साल उनका एक बच्चा हुआ. कुछ समय बाद दोनों के बीच रिश्ते खराब हो गए. महिला ने प्रोटेक्शन ऑफ वीमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005 के तहत केस किया. उसने खुद और बच्चे के लिए हर महीने 25 हजार रुपये के मेंटनेंस की मांग की.
वहीं पति ने घरेलू हिंसा के आरोपों से इनकार किया और दावा किया कि वह बच्चा उनका नहीं है. सच्चाई सामने लाने के लिए पति ने डीएनए टेस्ट की मांग की. ट्रायल कोर्ट ने टेस्ट की इजाजत दे दी. 8 मई 2017 को डीएनए रिपोर्ट आई. रिपोर्ट से पता चला कि पति बच्चे का जैविक पिता नहीं है. इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने बच्चे के लिए मेंटनेंस की मांग को खारिज कर दिया.
इसके बाद महिला ने अपीलेट कोर्ट में अपील की. उसने ट्रायल कोर्ट के फैसले पर मुहर लगाई. इसके बाद महिला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंची. हाई कोर्ट ने इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 112 के तहत मामले पर विचार किया. इस धारा के तहत विवाह के दौरान या विवाह टूटने के 280 दिनों के भीतर पैदा हुए बच्चे को पति की वैध संतान माना जाता है.
लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने ये कहा,
शादी के दौरान हुए बच्चे को वैध माना जाता है, लेकिन जब कन्क्लूसिव एविडेंस या कोई साइंटिफिक सबूत (डीएनए रिपोर्ट) हो तो फिर उस पर विचार किया जाना चाहिए. इस केस में डीएनए रिपोर्ट से पता चलता है कि बच्चे का जैविक पिता कोई और है. इसलिए बच्चे के लिए मेंटेनेंस नहीं मिलेगा.
हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को महिला के खुद के मेंटनेंस पर फिर से विचार करने को कहा था. इस फैसले से असंतुष्ट महिला सुप्रीम कोर्ट पहुंची. शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. कोर्ट ने कहा,
जब दोनों पक्ष डीएनए टेस्ट को स्वीकार कर चुके हों तो अदालतें इसको अनदेखा नहीं कर सकतीं. पहले कई मामलों में डीएनए टेस्ट कराने से बचा जाता था, क्योंकि इससे बच्चे पर, मां पर सामाजिक तौर पर गलत प्रभाव पड़ने की संभावना होती थी. लेकिन इस मामले में टेस्ट हो चुका है. और उसको लेकर कोई विवाद नहीं है.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे को लेकर चिंता जताई. फैसले में कहा गया कि पति से मेंटनेंस नहीं मिलने के बावजूद बच्चे को उसके हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता. कोर्ट ने दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग को निर्देश दिया कि एक सीनियर अधिकारी बच्चे के घर जाकर उसकी स्थिति देखे. उसकी पढ़ाई, पोषण, स्वास्थ्य और रहने की न्यूनतम सुविधाओं का जायजा ले. अगर कोई कमी मिले तो उसको ठीक करने का उपाय करे.
कोर्ट ने महिला के खुद के मेंटेनेंस वाले मामले में हाई कोर्ट के आदेश में दखल नहीं दिया. अब ट्रायल कोर्ट नए सिरे से इस मामले पर विचार करेगा.
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