डिफेंस सेक्टर में भारत की आत्मनिर्भरता की कहानी अब सिर्फ फाइटर जेट, टैंक, मिसाइल या युद्धपोत बनाने तक सीमित नहीं है. असली चुनौती उन हजारों छोटे-बड़े पुर्जों और सिस्टम को देश में बनाने की है, जिनके बिना कोई आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म लंबे समय तक ऑपरेशनल नहीं रह सकता.
Su-30MKI से T-90 तक बदल जाएगी डिफेंस सप्लाई चेन? 405 रक्षा सामान पर भारत का बड़ा फैसला
Defence News: भारत ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए पॉजिटिव इंडिजिनाइजेशन लिस्ट की छठी सूची जारी की है. इसमें Su-30MKI, T-90, MRSAM और दूसरी महत्वपूर्ण रक्षा प्रणालियों से जुड़े 405 आइटम शामिल हैं. सरकार के मुताबिक इनके स्वदेशीकरण से भारतीय उद्योग के लिए करीब 3,070 करोड़ रुपये का कारोबारी मौका पैदा होगा.

इसी दिशा में रक्षा मंत्रालय ने पॉजिटिव इंडिजिनाइजेशन लिस्ट यानी स्वदेशीकरण की छठी सूची जारी की है. इस नई सूची में 405 रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रक्षा वस्तुओं को शामिल किया गया है. सरकार के मुताबिक इनके देश में निर्माण से भारतीय उद्योग के लिए करीब 3,070 करोड़ रुपये का अनुमानित कारोबारी मौका पैदा होगा.
नई सूची में इंडियन कोस्ट गार्ड की 16 और डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स यानी डीपीएसयू की 389 वस्तुएं शामिल हैं. इनमें लाइन रिप्लेसेबल यूनिट्स यानी एलआरयू, सब-सिस्टम, सब-असेंबली, स्पेयर, कंपोनेंट और कच्चे माल जैसी चीजें शामिल हैं.
यानी बात सिर्फ किसी बड़े हथियार को भारत में बनाने की नहीं है. सरकार अब उस हथियार के अंदर लगने वाली महत्वपूर्ण चीजों की सप्लाई चेन को भी धीरे-धीरे देश के भीतर लाने की कोशिश कर रही है.
Su-30MKI से T-90 तक, दायरा काफी बड़ा
छठी पॉजिटिव इंडिजिनाइजेशन लिस्ट की खास बात इसका व्यापक दायरा है. इसमें एयर सिस्टम से लेकर बख्तरबंद वाहनों, मिसाइलों, रडार, सोनार और संचार प्रणालियों तक से जुड़े महत्वपूर्ण आइटम शामिल हैं.
हवाई क्षेत्र में एडवांस्ड लाइट हेलिकॉप्टर यानी एएलएच, लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर यानी एलयूएच, Su-30MKI, लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट और AL-31FP इंजन से जुड़े कंपोनेंट शामिल किए गए हैं.
थलसेना के लिहाज से T-72, T-90 और BMP-II जैसे महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म से जुड़े सामान भी सूची में हैं. इन प्लेटफॉर्मों के लिए जरूरी स्पेयर और दूसरे रिप्लेसमेंट पार्ट्स अगर देश में बनने लगते हैं तो इससे उनकी मेंटेनेंस और ऑपरेशनल उपलब्धता को फायदा मिल सकता है.
मिसाइल और हथियार प्रणालियों की बात करें तो Konkurs-M, Invar और MRSAM से जुड़े आइटम भी सूची का हिस्सा हैं. इसके अलावा रडार, सोनार, फायर कंट्रोल सिस्टम, सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम और हाई एक्सप्लोसिव एंटी टैंक यानी एचईएटी गोला-बारूद से संबंधित सामान भी शामिल हैं.
आखिर इस लिस्ट की जरूरत क्यों पड़ती है?
आधुनिक युद्ध में किसी लड़ाकू विमान, टैंक या मिसाइल की ताकत सिर्फ उसके मुख्य हथियार से तय नहीं होती. उसकी असली क्षमता इस बात से भी तय होती है कि उसके जरूरी कंपोनेंट, स्पेयर और मेंटेनेंस से जुड़ी चीजें कितनी आसानी से उपलब्ध हो सकती हैं.
मान लीजिए कोई लड़ाकू विमान भारत में ही तैयार हो रहा है, लेकिन उसके किसी महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक मॉड्यूल, सेंसर, इंजन कंपोनेंट या विशेष धातु के लिए विदेशी सप्लायर पर निर्भरता बनी हुई है. ऐसे में प्लेटफॉर्म का निर्माण देश में होने के बावजूद पूरी सप्लाई चेन आत्मनिर्भर नहीं मानी जा सकती.
यही वजह है कि पॉजिटिव इंडिजिनाइजेशन लिस्ट को सिर्फ आयात कम करने की कवायद के रूप में देखना अधूरा होगा. इसका बड़ा मकसद रक्षा उत्पादन की पूरी सप्लाई चेन को मजबूत करना है.
पांच लिस्ट के बाद छठे चरण में पहुंची मुहिम
भारत में रक्षा वस्तुओं के स्वदेशीकरण की ये प्रक्रिया पिछले कुछ वर्षों में लगातार आगे बढ़ी है. रक्षा मंत्रालय ने डीपीएसयू के लिए पॉजिटिव इंडिजिनाइजेशन लिस्ट जारी करने की शुरुआत की थी, ताकि ऐसी वस्तुओं की पहचान की जा सके जिन्हें देश के भीतर बनाया जा सकता है.
पहली पांच सूचियों में कुल 5,012 वस्तुओं को शामिल किया गया था. इनमें एलआरयू, सिस्टम, सब-सिस्टम, असेंबली, स्पेयर, कंपोनेंट और कच्चे माल जैसी श्रेणियां थीं.
पांचवीं सूची में 346 रणनीतिक वस्तुएं शामिल थीं. सरकार ने उस समय बताया था कि इससे पहले की चार सूचियों में शामिल 4,666 वस्तुओं में से 2,972 का स्वदेशीकरण किया जा चुका था और इनके जरिए करीब 3,400 करोड़ रुपये के आयात का विकल्प तैयार हुआ था.
अब 405 और वस्तुओं को जोड़ने के बाद तस्वीर और बड़ी हो गई है.
छठी सूची इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ये बताती है कि सरकार का ध्यान अब सिर्फ बड़े प्लेटफॉर्म पर नहीं, बल्कि उनके पीछे खड़ी पूरी औद्योगिक व्यवस्था पर है.
3,070 करोड़ रुपये का मौका, लेकिन कहानी इससे बड़ी
सरकार ने छठी सूची से भारतीय उद्योग के लिए करीब 3,070 करोड़ रुपये के अनुमानित कारोबारी अवसर की बात कही है. पहली नजर में ये सिर्फ एक बड़ा बिजनेस आंकड़ा लग सकता है, लेकिन रक्षा उद्योग में इसका असर कई स्तरों पर हो सकता है.
किसी एक रक्षा कंपोनेंट को बनाने के लिए सिर्फ एक कंपनी की जरूरत नहीं होती. उसके लिए कच्चा माल देने वाली कंपनी, मशीनिंग करने वाली कंपनी, इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माता, परीक्षण करने वाली एजेंसी और कई दूसरे छोटे सप्लायर भी जरूरी हो सकते हैं.
इस तरह एक बड़े रक्षा प्लेटफॉर्म से जुड़े छोटे-छोटे कंपोनेंट का स्वदेशीकरण टियर-2 और टियर-3 स्तर की कंपनियों के लिए भी बाजार तैयार कर सकता है.
यहीं से एमएसएमई और डिफेंस स्टार्टअप के लिए बड़ा मौका निकलता है. बड़ी कंपनियां जहां मुख्य प्लेटफॉर्म या सिस्टम पर काम करती हैं, वहीं छोटी और विशेषज्ञ कंपनियां किसी खास कंपोनेंट, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक यूनिट, मैकेनिकल पार्ट या सॉफ्टवेयर पर अपनी विशेषज्ञता विकसित कर सकती हैं.
SRIJAN पोर्टल बना उद्योग और सेना के बीच पुल
रक्षा क्षेत्र में आयात होने वाली वस्तुओं को भारतीय कंपनियों तक पहुंचाने के लिए सरकार ने SRIJAN डिफेंस पोर्टल भी बनाया है.
अगस्त 2020 में शुरू किए गए इस पोर्टल का उद्देश्य डीपीएसयू और सेना के मुख्यालयों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली आयातित रक्षा वस्तुओं को भारतीय उद्योग के सामने रखना है, ताकि घरेलू कंपनियां उन्हें देश में बनाने की क्षमता विकसित कर सकें.
सरकार के मुताबिक जून 2026 तक SRIJAN के जरिए डीपीएसयू और सर्विस हेडक्वार्टर ने 33,000 से ज्यादा रक्षा वस्तुओं को स्वदेशीकरण के लिए उद्योग के सामने रखा था. इनमें पहली पांच पॉजिटिव इंडिजिनाइजेशन लिस्ट की 5,012 वस्तुएं भी शामिल थीं.
इसके अलावा SRIJAN DEEP के जरिए रक्षा क्षेत्र में काम करने वाले निर्माताओं, एमएसएमई, सेवा प्रदाताओं और तकनीकी कंपनियों का बड़ा डिजिटल डेटाबेस तैयार किया जा रहा है. इसका मकसद रक्षा खरीद और उत्पादन की पूरी सप्लाई चेन को ज्यादा व्यवस्थित बनाना है.
युद्ध लंबा चले तो स्पेयर पार्ट्स सबसे ज्यादा मायने रखते हैं
हाल के युद्धों ने दुनिया को एक बात साफ दिखाई है. आधुनिक युद्ध सिर्फ मिसाइल और गोला-बारूद का खेल नहीं है. लंबे समय तक चलने वाले युद्ध में स्पेयर पार्ट्स, मेंटेनेंस किट, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट और रिप्लेसमेंट यूनिट की लगातार जरूरत पड़ती है.
किसी देश के पास बड़ी संख्या में टैंक या लड़ाकू विमान होना एक बात है और उन्हें महीनों तक लगातार ऑपरेशनल बनाए रखना दूसरी बात.
अगर किसी महत्वपूर्ण कंपोनेंट के लिए विदेशी सप्लायर पर निर्भरता है और युद्ध या अंतरराष्ट्रीय तनाव की वजह से उसकी सप्लाई रुक जाती है तो पूरा प्लेटफॉर्म प्रभावित हो सकता है.
इसीलिए Su-30MKI, AL-31FP इंजन, T-90, BMP-II और मिसाइल प्रणालियों से जुड़े महत्वपूर्ण कंपोनेंट का देश में निर्माण सिर्फ कारोबारी फैसला नहीं है. इसका सीधा संबंध सप्लाई चेन की मजबूती और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी है.

भारत का रक्षा उत्पादन भी तेजी से बढ़ा
पॉजिटिव इंडिजिनाइजेशन लिस्ट को भारत में तेजी से बढ़ते रक्षा उत्पादन के बड़े परिदृश्य से जोड़कर देखना जरूरी है.
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक भारत का स्वदेशी रक्षा उत्पादन 2014-15 में 46,429 करोड़ रुपये था, जो 2025-26 में बढ़कर रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया.
इसी तरह रक्षा निर्यात में भी बड़ा उछाल आया है. 2014-15 में भारत का रक्षा निर्यात 686 करोड़ रुपये था, जो 2025-26 में बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये हो गया. भारतीय रक्षा उत्पाद अब 80 से ज्यादा देशों तक पहुंच रहे हैं.
इसका मतलब ये है कि भारत की रक्षा नीति अब सिर्फ विदेश से सामान खरीदने और उसका विकल्प देश में बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहती. लक्ष्य धीरे-धीरे ऐसा औद्योगिक आधार तैयार करना है जो भारत की अपनी सेनाओं की जरूरत पूरी करने के साथ दुनिया के बाजार में भी मुकाबला कर सके.
सबसे बड़ी चुनौती अब गुणवत्ता और भरोसे की
हालांकि 405 वस्तुओं की सूची जारी होना अपने आप में उपलब्धि है, लेकिन असली परीक्षा इसके बाद शुरू होगी.
रक्षा क्षेत्र में किसी कंपोनेंट का भारत में बन जाना ही पर्याप्त नहीं है. उसे बेहद कठिन परिस्थितियों में भी भरोसेमंद साबित होना पड़ता है.
किसी विमान या मिसाइल में लगने वाला कंपोनेंट अत्यधिक तापमान, कंपन, झटके, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक दखल और लंबे समय तक चलने वाले ऑपरेशनल चक्रों का सामना कर सकता है. इसलिए इसके लिए सामान्य औद्योगिक गुणवत्ता से कहीं ज्यादा कड़े मानकों की जरूरत होती है.
कई मामलों में सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग क्षमता भी काफी नहीं होती. डिजाइन की जानकारी, धातु विज्ञान, सटीक इंजीनियरिंग, परीक्षण सुविधा, प्रमाणन और तकनीकी विशेषज्ञता भी जरूरी होती है.
यानी छठी लिस्ट भारतीय कंपनियों के लिए अवसर के साथ एक बड़ी परीक्षा भी है.
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आत्मनिर्भरता का अगला मोर्चा पूरी सप्लाई चेन
भारत ने पिछले एक दशक में रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में काफी लंबी दूरी तय की है. लड़ाकू विमान, हेलिकॉप्टर, मिसाइल, रडार, युद्धपोत और दूसरे बड़े प्लेटफॉर्म देश में बनाए जा रहे हैं.
अब अगला बड़ा कदम उन चीजों को स्वदेशी बनाना है जो इन प्लेटफॉर्मों को लंबे समय तक ऑपरेशनल बनाए रखने के लिए जरूरी हैं.
छठी पॉजिटिव इंडिजिनाइजेशन लिस्ट इसी बदलाव की तरफ इशारा करती है. Su-30MKI से T-90 तक और ALH से MRSAM तक, सरकार अब सिर्फ प्लेटफॉर्म नहीं बल्कि उसके अंदर की सप्लाई चेन को भी भारत में मजबूत करने की कोशिश कर रही है.
3,070 करोड़ रुपये का अनुमानित कारोबारी मौका इसका सीधा आर्थिक फायदा है. लेकिन अगर इन 405 वस्तुओं के लिए भारतीय कंपनियां भरोसेमंद और प्रतिस्पर्धी उत्पादन क्षमता विकसित कर लेती हैं तो असली फायदा इससे कहीं बड़ा हो सकता है.
क्योंकि रक्षा आत्मनिर्भरता का मतलब सिर्फ विदेशी हथियार खरीदना कम करना नहीं है. असली आत्मनिर्भरता तब होगी जब भारत की सेनाओं के पास मौजूद किसी महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म को ऑपरेशनल बनाए रखने के लिए जरूरी कंपोनेंट के लिए देश को बार-बार विदेशी सप्लायर की तरफ न देखना पड़े.
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