20 दिन की की भूख हड़ताल के बाद दिल्ली पुलिस ने एक्टिविस्ट और इनोवेटर सोनम वंगचुक को हिरासत में ले लिया है. पुलिस उन्हें जंतर-मंतर से सफदरगंज अस्पताल ले गई है. कुल मिलाकर कोशिश ये है कि उनकी भूख हड़ताल खत्म कराई जाए. दिल्ली पुलिस ने वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाने के पीछे हाईकोर्ट की टिप्पणी का हवाला दिया है. इसमें कोर्ट ने कहा था कि 'किसी भी नागरिक की जान कीमती है और सरकारी अधिकारियों को इसे बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए.' दिल्ली हाईकोर्ट के इस कॉमेंट ने देश के सामने एक संवैधानिक सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भूख हड़ताल कर रहे सोनम वांगचुक को जबरदस्ती खाना खिलाया जा सकता है? अपने तरीके से विरोध प्रदर्शन करना देश के हर नागरिक का अधिकार है. ऐसे अधिकार में सरकारी दखल को लेकर भी सवाल पूछे जा रहे हैं.
सोनम वांगचुक को जबरदस्ती खाना खिला सकती है सरकार, कानून क्या कहता है?
एक PIL में Sonam Wangchuk को जबरदस्ती खाना खिलाने सहित तुरंत मेडिकल मदद की मांग की गई थी. हालांकि, हाई कोर्ट ने उनको जबरदस्ती खाना खिलाने का आदेश नहीं दिया था. कोर्ट ने सरकार को वांगचुक की जान बचाने को कहा है. लेकिन ये स्पष्ट नहीं किया है कि भूख हड़ताल करने वाले को जबरदस्ती खाना खिलाया जा सकता है या नहीं.


हाल ही में एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) में सोनम वांगचुक को जबरदस्ती खाना खिलाने सहित तुरंत मेडिकल मदद की मांग की गई थी. हालांकि, हाईकोर्ट ने उनको जबरदस्ती खाना खिलाने का आदेश नहीं दिया था. इसके बजाय, कोर्ट ने रोजाना उनके मेडिकल मॉनिटरिंग करने के लिए कहा. हालांकि, कोर्ट ने ये स्पष्ट नहीं किया कि सोनम की जान बचाने के लिए क्या उन्हें जबरदस्ती खाना खिलाया जा सकता है या नहीं? इस पर कोई पक्का नियम बताए बिना कोर्ट ने वांगचुक की देखभाल को कहा है.
अब सवाल है कि मानसिक रूप से स्वस्थ्य कोई व्यक्ति अगर भूख हड़ताल करता है तो क्या उसे जबरन खाना खिलाया जा सकता है? इस पर हमारे देश का कानून क्या कहता है? आज हम यही जानने की कोशिश करेंगे.
भारत में ऐसा कोई स्पष्ट केंद्रीय कानून नहीं है जो राजनीतिक भूख हड़ताल कर रहे मानसिक रूप से सक्षम बालिग व्यक्ति को जबरन खाना खिलाने के सवाल पर साफ नियम तय करता हो. ऐसे मामलों में अदालतें और डॉक्टर हालात के आधार पर फैसला लेते हैं. इसके बजाए, अदालतों ने आमतौर पर एक-दूसरे के विरोधाभासी संवैधानिक सिद्धांतों के बीच बैलेंस बनाने की कोशिश की है.
संविधान के आर्टिकल 21 के तहत व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है. इसकी व्याख्या सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में शारीरिक अखंडता और व्यक्तिगत आजादी को शामिल करने के लिए की है.
दूसरा, जब अधिकारियों को पता चलता है कि किसी व्यक्ति की सेहत को गंभीर खतरा है तो जीवन को बचाने और पब्लिक ऑर्डर बनाए रखने के क्रम में उनकी ड्यूटी के तहत वो भूख हड़ताल तोड़वाने की मांग करते हैं.
लेकिन ये दोनों कानूनी सिद्धांत एक-दूसरे के विरोधाभासी हैं. इसलिए कभी अगर ऐसी सिचुएशन आए कि ये दोनों कानून आमने-सामने हों तो कोई कानूनी नियम नहीं बन जाता. इसके बजाए अदालतें व्यक्ति की मेडिकल कंडीशन, क्या उनमें सोच-समझकर फैसले लेने की क्षमता है और विरोध के हालात जैसे फैक्टर्स पर विचार कर सकती हैं. इसीलिए दिल्ली हाईकोर्ट ने वांगचुक को जबरदस्ती खाना खिलाने का आदेश देने वाला कोई सीधा निर्देश जारी नहीं किया. उसने इलाज का कोई भी फैसला डॉक्टरों पर छोड़ दिया. साथ ही यह भी पक्का किया कि उसकी हालत पर करीब से नजर रखी जाएगी.
नागरिकों को क्या अधिकार मिले हुए हैं?क्रॉनिकल इंडिया की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत का कानून अपने नागरिकों को कई तरह के अधिकार देता है. इन अधिकारों के तहत किसी भी शांतिपूर्ण विरोध को संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई है. इन कानूनों के मुताबिक,
– विरोध करने का अधिकारः भारतीय अदालतों ने कई मामलों में शांतिपूर्ण विरोध को संविधान के अनुच्छेद-19 के तहत संरक्षित माना है. हालांकि, अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल और उसके दौरान राज्य की भूमिका हर मामले के तथ्यों के आधार पर तय की जाती है.
– राज्य की देखभाल की जिम्मेदारी: कोर्ट ने कहा है कि सरकार को अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे व्यक्ति के लिए समय पर मेडिकल देखभाल सुनिश्चित करनी चाहिए. अदालतों ने कई मामलों में कहा है कि सरकार की जिम्मेदारी प्रदर्शनकारी की जान और स्वास्थ्य की रक्षा करना भी है. इसलिए गंभीर मेडिकल कंडीशन की स्थिति में मेडिकल हस्तक्षेप की जरूरत पड़ सकती है.
– जगजीत सिंह डल्लेवाल केस: 2024 में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और पंजाब सरकार को निर्देश दिया कि वे भूख हड़ताल कर रहे किसान नेता को जरूरी मेडिकल मदद दें और साथ ही विरोध जारी रखने के उनके फैसले का सम्मान भी करें.
– उचित प्रतिबंध: कोर्ट ने कहा है कि शांतिपूर्ण विरोध पर तभी रोक लगाई जा सकती है जब उनसे पब्लिक ऑर्डर या सांप्रदायिक सद्भाव को वास्तविक खतरा हो.
– संवैधानिक सिद्धांत: न्यायपालिका ने हमेशा जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) और बोलने और शांतिपूर्ण विरोध की आजादी के अधिकार (अनुच्छेद 19) के बीच संतुलन बनाए रखा है.
जबरदस्ती खिलाने को लेकर क्या कहते हैं डॉक्टर?लंबे समय तक चलने वाली भूख हड़ताल में जबरदस्ती खाना खिलाना (force-feeding) सबसे ज्यादा बहस वाले विषयों में से एक है, क्योंकि इसमें मेडिकल और नैतिक, दोनों तरह की बातें शामिल होती हैं. इस चीज पर इंडिया टुडे ने एक विस्तृत रिपोर्ट छापी है. इंडिया टुडे से बात करते हुए डॉ अमित प्रकाश सिंह बताते हैं कि मानसिक रूप से सक्षम वयस्क को खाना न खाने का कानूनी और नैतिक अधिकार है, भले ही ऐसा करने से उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ सकता हो.
मेडिकल दखल की जरूरत आमतौर पर तभी पड़ती है जब कोई व्यक्ति उलझन, बेहोशी या गंभीर बीमारी की वजह से सही फैसला लेने की हालत में न हो. ऐसी स्थितियों में, डॉक्टर जीवन बचाने वाला इलाज शुरू करने से पहले स्थानीय कानूनों और मरीज की पहले बताई गई इच्छाओं का पालन करते हैं. बहुत से लोग मानते हैं कि ट्यूब के जरिए खाना देना एक सुरक्षित तरीका है. हालांकि, डॉक्टरों का कहना है कि जबरदस्ती खाना खिलाने में भी कई बड़े जोखिम होते हैं, जैसे-
- खाने का पेट के बजाय फेफड़ों में चला जाना (एस्पिरेशन)
- फीडिंग ट्यूब डालते समय नाक या भोजन नली (ओसोफेगस) में चोट लगना
- उल्टी होना
- एस्पिरेशन निमोनिया
- इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन
- मानसिक आघात (साइकोलॉजिकल ट्रॉमा)
- इन जोखिमों का मतलब है कि जबरदस्ती खाना खिलाने को कभी भी एक साधारण मेडिकल प्रक्रिया नहीं माना जाता और इसके लिए सावधानीपूर्वक फैसला लेने की जरूरत होती है.
World Medical Association के Malta Declaration में भी मानसिक रूप से सक्षम भूख हड़ताली को उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरन खाना खिलाने को नैतिक रूप से अनुचित माना गया है. हालांकि यह कानूनी रूप से बाध्यकारी दस्तावेज नहीं है, लेकिन दुनिया भर में मेडिकल एथिक्स का महत्वपूर्ण मानक माना जाता है.
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16 साल तक सरकार ने इरोम शर्मिला को खिलाया?
मणिपुर की आयरन लेडी के नाम से विख्यात इरोम शर्मिला ने मालोम में हुई हत्याओं के बाद, आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट (AFSPA) कानून को हटाने की मांग करते हुए नवंबर 2000 में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी. कुछ ही दिनों में, उन्हें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 309 के तहत गिरफ्तार कर लिया गया. क्योंकि उस समय आत्महत्या की कोशिश करना एक अपराध माना जाता था.
बार-बार गिरफ्तारी के बाद भी जब वह सरकारी हिरासत में रहीं, तो अधिकारियों ने उन्हें 'नेसोगैस्ट्रिक फीडिंग ट्यूब' (नाक के जरिए) के जरिए जिंदा रखा था. हर बार हिरासत की अवधि खत्म होने पर उन्हें रिहा किया जाता, वह फिर से अपना अनशन शुरू करतीं और फिर गिरफ्तार कर ली जातीं. यह सिलसिला लगभग 16 साल तक चलता रहा, जब तक कि उन्होंने 2016 में अपना अनशन खत्म नहीं किया. हालांकि, शर्मिला के मामले को आज के मामले से कंपेयर करना सहीं नहीं होगा. क्योंकि तब आत्महत्या से जुड़े उस समय के कानून के तहत बार-बार उनकी गिरफ्तारी होती थी.
यानी फिलहाल भारत में ऐसा कोई स्पष्ट कानून नहीं है जो कहे कि मानसिक रूप से सक्षम भूख हड़ताल कर रहे व्यक्ति को हर हाल में जबरन खाना खिलाया जाए या बिल्कुल न खिलाया जाए. ऐसे मामलों में अदालतें व्यक्ति की इच्छा, उसकी मानसिक क्षमता, मेडिकल स्थिति और राज्य की जीवन बचाने की जिम्मेदारी; इन सभी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं. इसलिए सोनम वांगचुक के मामले में भी अंतिम फैसला डॉक्टरों की मेडिकल राय और अदालत के आगे के निर्देशों पर निर्भर करेगा.
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