राघव चड्ढा आम आदमी पार्टी से बीजेपी में गए. इसको लेकर उनकी आलोचना हुई और उन पर मीम्स भी बनें. राघव इससे आहत होकर दिल्ली हाई कोर्ट गए. कोर्ट से अपनी पर्सनैलिटी राइट्स की रक्षा करने की मांग की. लेकिन कोर्ट में सलाह मिली कि अटैक और क्रिटिक के बीच का अंतर समझिए. मरहूम मशहूर कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण के पॉलिटिकल व्यंग्य का उदाहरण दिया गया.
कौन थे आरके लक्ष्मण जिनका नाम लेकर दिल्ली HC ने राघव चड्ढा को वापस लौटा दिया?
आरके लक्ष्मण का नाम लेते ही एक ऐसे आम इंसान की इमेज उभरती है जो आस-पास कहीं न कहीं मौजूद है. अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने पर उनके कार्टून लगभग पांच दशक तक चर्चा का केंद्र बने रहे. भारत में जब-जब पॉलिटिकल कार्टून का जिक्र आएगा, आरके लक्ष्मण के किरदार कॉमन मैन के जिक्र के बिना कोई बात मुकम्मल नहीं होगी.


कौन थे आरके लक्ष्मण?
आरके लक्ष्मण का नाम लेते ही एक ऐसे आम इंसान की इमेज उभरती है जो आस-पास कहीं न कहीं मौजूद है. अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने पर उनके कार्टून लगभग पांच दशक तक चर्चा का केंद्र बने रहे. भारत में जब-जब पॉलिटिकल कार्टून का जिक्र आएगा, आर के लक्ष्मण के किरदार कॉमन मैन के जिक्र के बिना कोई बात मुकम्मल नहीं होगी.
24 अक्टूबर, 1921 को मैसूर के तमिल अय्यर परिवार में लक्ष्मण का जन्म हुआ. पिता स्थानीय स्कूल में हेडमास्टर थे. उनके बड़े भाई आरके नारायण जाने माने उपन्यासकार थे. आठ भाई बहनों में सबसे छोटे लक्ष्मण की दिलचस्पी बचपन से ही स्केचिंग में थी.
कार्टून की ताकत पहली बार उन्हें तब समझ आई जब क्लास में लक्ष्मण टीचर की बात सुनने के बजाय स्केचिंग कर रहे थे. अपनी ऑटोबायोग्राफी द टनल ऑफ टाइम में आरके लक्ष्मण ने लिखा है, “मेरा ध्यान टीचर के पढ़ाने पर नहीं था, मैं स्केचिंग कर रहा था. वे पास आए और मेरा कान पकड़कर ऐंठने लगे कि तुम मेरा मजाक बना रहे हो. मुझे तभी पहली बार कार्टून की ताकत का अंदाजा हुआ.”
भाई के लिए किया काम की शुरुआत
इसके बाद उन्होंने अपने भाई की शॉर्ट स्टोरीज और उपन्यास के लिए स्केचिंग का काम किया. टाइम्स ऑफ इंडिया पहुंचने से पहले हिंदू अखबार के लिए स्केचिंग की. फ्री प्रेस जर्नल में बाल ठाकरे के साथ काम किया. फिर टाइम्स पहुंचकर करियर के आखिर तक वहीं के होकर रह गए.
पूरी दुनिया में मशहूर ‘कॉमन मैन’
‘कॉमन मैन’ के कार्टून ने आरके लक्ष्मण को दुनिया भर में मकबूलियत दिलाई. साल 1951 में टाइम्स ऑफ इंडिया में इसकी शुरुआत हुई थी. टेढ़ा चश्मा, मुड़ी-तुड़ी धोती, चारखाना कोट, सिर पर बचे चंद बाल वाले इस आदमी को देश के आम आदमी के तौर पर देखा जाने लगा. इस कार्टून का शीर्षक यू सेड इट तब से लेकर अगले 50 सालों तक भारत के समसामयिक मुद्दों को पूरी बेबाकी से उकेरता रहा.
कॉमन मैन के जरिए लक्ष्मण ने आम आदमी की कल्पना को साकार किया और यह पूरे देश में इतनी तेजी से मशहूर हुआ कि एक राष्ट्रीय प्रतीक का दर्जा पा गया. बीबीसी हिंदी से बातचीत में कॉमन मैन के बारे में आरके लक्ष्मण की पुत्रवधू उषा लक्ष्मण बताती हैं,
उन्होंने केवल ये किरदार नहीं रचा था. बल्कि वे जिंदगी भर चाहते थे कि कॉमन मैन की मुश्किलों को हल निकले, जिंदगी थोड़ी आसान हो और व्यवस्था का फायदा मिले.
लगभग 50 साल तक लगातार साल के 365 दिन आम आदमी से जुड़े मुद्दों को तलाशना और उसको स्केच करना कोई आसान काम नहीं था. वो भी गूगल के दौर से पहले. उषा लक्ष्मण बताती हैं,
वे काफी पढ़ते थे. सूचनाएं एकत्र करते थे. साढ़े आठ बजे ऑफिस पहुंचने के बाद उनका पहला काम अखबार पढ़ने का होता था. वे देश दुनिया के 22 अखबार पलटते थे. आम आदमी के बीच उठते-बैठते थे और वहीं से मुद्दे पकड़ते थे.
आम आदमी के सुख-दुख, मायूसी, सपने और इच्छाओं को स्वर दिया आरके लक्ष्मण के कॉमन मैन ने. इस कैरेक्टर की लोकप्रियता इतनी रही कि कॉमन मैन की आठ फीट की एक प्रतिमा साल 2011 में पुणे में लगाई गई.

दो असफलताओं ने बनाया महान कार्टूनिस्ट
इंडियन एक्सप्रेस के पॉलिटिकल कार्टूनिस्ट ईपी उनी अपनी किताब आरके लक्ष्मण : बैक विद अ पंच में लिखते हैं कि एक असफलता सफल बनाती है. लेकिन सितारा बनने के लिए दो असफलताओं की जरूरत होती है. आरके लक्ष्मण जीवन में आगे बढ़ने के अपने प्रयास में दो बार असफल रहे. लेकिन अगर वे सफल हो जाते तो उनकी असाधारण कला से हम अपरिचित रह जाते.
आरके लक्ष्मण मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में चीफ गेस्ट के तौर पर गए थे. यहां उनको वार्षिक चित्रकला प्रतियोगिता की अध्यक्षता करने के लिए बुलाया गया था. लक्ष्मण पुरस्कार बांटने के बाद मंच से उतर रहे थे. लेकिन आयोजकों ने उनसे स्पीच देने का अनुरोध किया. जिसके बाद मुख्य अतिथि ने संस्थान को उन्हें कार्टूनिस्ट बनाने के लिए धन्यवाद दिया. उन्होंने कहा कि अगर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स उनका एप्लिकेशन स्वीकार कर लेता, तो वे किसी विज्ञापन कंपनी में मच्छर भगाने वाले प्रोडक्ट का प्रचार करने वाले एक सिद्धहस्त विजुअलाइजर बन जाते.
आरके लक्ष्मण को आर्ट कॉलेज में दाखिला नहीं मिला और देश को एक महान कार्टूनिस्ट मिला. लेकिन इससे पहले उनको एक और बड़ा झटका लगा. किसी कार्टूनिस्ट के लिए सबसे अच्छी जगह ने भी उनको ठुकरा दिया. लोकतंत्र की राजधानी दिल्ली में उनको पहचान नहीं मिली. इसके चलते उन्होंने देश के सबसे जीवंत शहरों में से एक मुंबई का रुख किया. मुंबई ने उन्हें वो मुकाम दिया जिस पर दुनिया के किसी भी कार्टूनिस्ट को रश्क होगा.
कार्टून देख नाराज हो गई थीं इंदिरा गांधी
आरके लक्ष्मण ने इमरजेंसी के दौरान कांग्रेस के अध्यक्ष डीके बरुआ के इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा पर कार्टून बनाया. इस कार्टून को लेकर इंदिरा गांधी बेहद नाराज हुईं. उन्होंने कहा कि यह कार्टून बेहद अपमानजनक है. आपको ऐसे कार्टून नहीं बनाना चाहिए. इस घटना के बाद आरके लक्ष्मण मॉरिशस चले गए और इमरजेंसी के बाद भारत लौटे.
पद्म विभूषण और रेमन मैग्सेसे अवार्ड मिला
आरके लक्ष्मण को साल 2005 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. इससे पहले साल 1984 में उनको पत्रकारिता के लिए रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड मिला था. लक्ष्मण एकलौते ऐसे कार्टूनिस्ट होंगे, जिनके कैरेक्टर कॉमन मैन की मूर्ति मुंबई और पुणे में लगी है.
साल 2011 के बाद से आरके लक्ष्मण बीमार रहने लगे थे. 26 जनवरी 2015 को 93 साल की उम्र में वे इस दुनिया से फानी हो गए. लेकिन उनके राजनीतिक कार्टूनों ने भारत के विरोधाभाषों की जो टेढ़ी मेढ़ी स्केच बनाई है वो हमारे साथ हमेशा बनी रहेगी.
वीडियो: प्रधानमंत्री मोदी का विवादित कार्टून किसने बना दिया?






















