महंगाई की मार झेल रहे करोड़ों भारतीय हर महीने सैलरी आने का इंतजार करते हैं और फिर उसी सैलरी से घर का बजट, बच्चों की पढ़ाई, ईएमआई, बिजली का बिल और रोजमर्रा के बढ़ते खर्चों का हिसाब बैठाते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिन सांसदों को आप अपना प्रतिनिधि चुनकर संसद भेजते हैं, उनकी सुविधाओं पर हर साल कितना पैसा खर्च होता है? एक ताजा RTI (आरटीआई) से सामने आए आंकड़े चौंकाने वाले हैं.
सांसदों पर सरकारी खर्च में 66 फीसदी उछाल, आपकी सैलरी की रफ्तार कितनी रही?
Rajya Sabha MPs Salaries: एक RTI में सामने आए आंकड़ों ने सांसदों की सैलरी, भत्तों, यात्रा, मेडिकल खर्च और दूसरी सुविधाओं पर होने वाले सरकारी खर्च को लेकर नई बहस छेड़ दी है. जानिए 2021 से 2026 के बीच कितना बढ़ा खर्च और आम कर्मचारियों की सैलरी से इसकी तुलना क्या कहती है.


‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक इस RTI के जरिए सांसदों के वेतन, भत्ते, मुफ्त सुविधाओं और सरकारी खर्च का ऐसा ब्योरा सामने आया है, जिसे जानने के बाद आपके मन में भी सवाल उठ सकता है कि आखिर टैक्सपेयर्स के पैसे का कितना हिस्सा जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं पर खर्च हो रहा है. आइए जानते हैं कि इस RTI खुलासे में क्या सामने आया है और सांसदों को मिलने वाली सुविधाएं आखिर कितनी बड़ी हैं.
सांसदों पर 2 साल में करोड़ों का खर्च, आखिर पैसा गया कहां?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सरकारी खजाने से निकले ये करोड़ों रुपये किन मदों में खर्च हुए? क्या सिर्फ सांसदों की सैलरी बढ़ने से इतना बड़ा आंकड़ा बन गया? जवाब है, नहीं. असली तस्वीर इससे कहीं बड़ी है. राज्यसभा सांसदों पर होने वाला खर्च सिर्फ वेतन तक सीमित नहीं है. इसके लिए 21 अलग-अलग खर्च मद तय हैं, जिनमें सैलरी, भत्ते, घरेलू और विदेशी यात्राएं, मेडिकल रीइम्बर्समेंट, कार्यालय संचालन और दूसरी कई सुविधाएं शामिल हैं. यही वजह है कि कुल खर्च का आंकड़ा तेजी से बढ़ता दिखाई देता है.
‘बिजनेस टुडे’ के मुताबिक RTI से सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में सिर्फ मूल वेतन पर 25.71 करोड़ रुपये खर्च हुए. मेडिकल रीइम्बर्समेंट का बिल 8.2 करोड़ रुपये रहा, जबकि सांसदों की यात्रा पर 24.99 करोड़ रुपये खर्च किए गए. भत्तों पर अकेले 33.33 करोड़ रुपये खर्च हुए. इसके बाद 2025-26 में लगभग हर प्रमुख मद में खर्च बढ़ गया. मूल वेतन बढ़कर 44.6 करोड़ रुपये पहुंच गया, मेडिकल खर्च 9.6 करोड़ रुपये हो गया, यात्रा पर 36 करोड़ रुपये खर्च हुए और विभिन्न भत्तों का आंकड़ा 58.78 करोड़ रुपये तक जा पहुंचा. यानी सांसदों पर होने वाला खर्च सिर्फ सैलरी नहीं, बल्कि कई तरह की सरकारी सुविधाओं का कुल जोड़ है.
सांसदों को सिर्फ वेतन नहीं मिलता, सुविधाओं की सूची कहीं लंबी है
अक्सर लोगों को लगता है कि सांसदों को हर महीने केवल तनख्वाह ही मिलती है, लेकिन हकीकत इससे कहीं अलग है. वेतन तो कुल पैकेज का सिर्फ एक हिस्सा है. जनप्रतिनिधियों को ऐसी कई सुविधाएं मिलती हैं, जिनका खर्च सीधे सरकारी खजाने से उठाया जाता है. यही कारण है कि सांसदों पर होने वाला कुल खर्च आम लोगों की कल्पना से कहीं ज्यादा दिखाई देता है.
इन सुविधाओं में सरकारी आवास, बिजली और पानी की सुविधा, टेलीफोन, घरेलू और हवाई यात्रा, कार्यालय चलाने के लिए अलग बजट, निर्वाचन क्षेत्र के कामकाज के लिए भत्ता, स्टेशनरी और अन्य प्रशासनिक खर्च शामिल हैं. इसके अलावा सांसद और उनके पात्र परिवार के सदस्यों को सरकारी नियमों के तहत मेडिकल सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं, जिनका खर्च भी सार्वजनिक धन से वहन किया जाता है. यही तमाम मद मिलकर हर साल सांसदों पर होने वाले कुल सरकारी खर्च को कई सौ करोड़ रुपये तक पहुंचा देते हैं और इसी वजह से RTI में सामने आए आंकड़े अब चर्चा का विषय बने हुए हैं.
पांच साल में किसकी कमाई और किस पर खर्च कितनी तेजी से बढ़ा?
आंकड़े तब सबसे ज्यादा असर छोड़ते हैं, जब उनकी तुलना एक ही पैमाने पर की जाए. इसलिए ये समझना जरूरी है कि 2021 से 2026 के बीच सांसदों पर होने वाले औसत सरकारी खर्च में कितनी बढ़ोतरी हुई और इसी दौरान सरकारी तथा प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों की आय किस रफ्तार से बढ़ी. ये तुलना किसी एक वर्ग को सही या गलत ठहराने के लिए नहीं, बल्कि बदलाव की गति को समझने के लिए है.
नीचे दिया गया इन्फोग्राफिक इसी अंतर की तस्वीर पेश करता है. एक तरफ राज्यसभा के एक सांसद पर होने वाला औसत वार्षिक सरकारी खर्च है, जबकि दूसरी ओर केंद्र सरकार के कर्मचारियों की औसत वेतन वृद्धि और प्राइवेट सेक्टर के मिड लेवल कर्मचारियों की सामान्य सैलरी ग्रोथ दिखाई गई है. आंकड़े बताते हैं कि जहां सांसदों पर होने वाले औसत खर्च में करीब 65 से 70 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई, वहीं केंद्र सरकार के कर्मचारियों की आय मुख्य रूप से महंगाई भत्ते (DA) और नियमित संशोधनों के जरिए लगभग 15 से 20 प्रतिशत बढ़ी. दूसरी ओर प्राइवेट सेक्टर में वेतन वृद्धि ज्यादातर प्रदर्शन और कंपनी की आर्थिक स्थिति पर निर्भर रही, जहां औसत सालाना बढ़ोतरी 8 से 12 प्रतिशत के बीच रही.
इसी अंतर को आसान भाषा में समझने के लिए नीचे दी गई तालिका पर एक नजर डालिए. येे साफ दिखाती है कि बीते पांच वर्षों में अलग-अलग वर्गों के आर्थिक ग्राफ की रफ्तार एक जैसी नहीं रही.

एक सांसद पर होने वाला खर्च और आम आदमी की प्राथमिकताएं
RTI में सामने आए आंकड़ों को अगर आम आदमी की जिंदगी से जोड़कर देखें, तो बहस का एक बड़ा सवाल सामने आता है. आखिर पब्लिक फंड की प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए? जब एक राज्यसभा सांसद पर सालाना औसतन दो करोड़ रुपये से ज्यादा का सरकारी खर्च आता है, तो स्वाभाविक है कि लोग इसकी तुलना शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी सार्वजनिक सेवाओं से करने लगते हैं.
यही वजह है कि सांसदों की सैलरी और सुविधाओं पर होने वाला खर्च अक्सर चर्चा का विषय बन जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक धन का हर रुपया आखिरकार टैक्सपेयर्स की जेब से आता है, इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि शिक्षा, सरकारी अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, ग्रामीण सड़कों और दूसरी बुनियादी सुविधाओं पर कितना निवेश हो रहा है और जनप्रतिनिधियों पर कितना खर्च किया जा रहा है. ऐसे सवाल लोकतंत्र में जवाबदेही और सरकारी खर्च की पारदर्शिता से सीधे जुड़े हैं.
यही कारण है कि सांसदों की सैलरी, भत्ते और सुविधाओं से जुड़े आंकड़े सामने आते ही बहस केवल रकम की नहीं रहती, बल्कि इस बात की भी होने लगती है कि सीमित सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल किस प्राथमिकता के साथ किया जाना चाहिए. यही बहस इस RTI के बाद भी तेज हो गई है.
टैक्सपेयर्स का पैसा, सांसदों की सुविधाएं और जवाबदेही का सवाल
इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू सिर्फ करोड़ों रुपये का खर्च नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही है. आखिर जनता के टैक्स से होने वाले इस खर्च की निगरानी कैसे होती है? क्या सांसदों को मिलने वाले वेतन, भत्तों, यात्रा, मेडिकल रीइम्बर्समेंट और दूसरी सुविधाओं का ब्योरा आम नागरिक के लिए उतनी ही आसानी से उपलब्ध है, जितना होना चाहिए? RTI के जरिए सामने आए आंकड़ों ने एक बार फिर यही बहस छेड़ दी है कि सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को लेकर जवाबदेही का दायरा और मजबूत होना चाहिए.
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को सुविधाएं मिलना व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि उन सुविधाओं पर होने वाला हर खर्च पारदर्शी हो और उसकी समय-समय पर सार्वजनिक समीक्षा होती रहे. आखिरकार यह पैसा सरकारी खजाने का नहीं, बल्कि करोड़ों टैक्सपेयर्स की मेहनत की कमाई का है. इसलिए सवाल सिर्फ सांसदों की सैलरी या भत्तों का नहीं, बल्कि उस भरोसे का भी है, जिसके आधार पर जनता अपना पैसा सरकार को सौंपती है. शायद यही वजह है कि जब भी ऐसे आंकड़े सामने आते हैं, बहस केवल खर्च पर नहीं, बल्कि सुशासन, पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही पर भी शुरू हो जाती है.
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