दिल्ली में 100 साल से ज्यादा पुरानी कदीमी मस्जिद पर संकट मंडरा रहा है. केंद्र सरकार इस मस्जिद को हटाना चाहती है. सरकार का कहना है कि सरकारी दफ्तरों के परिसर में किसी परमानेंट धार्मिक ढांचे की मौजूदगी सरकार के सेक्युलर केरेक्टर के मुताबिक नहीं है. लेकिन, सवाल ये है कि जिस मस्जिद को आजादी से पहले अंग्रेजों के शासन में भी जगह मिली हुई थी, उसे अब हटाने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
पहले कोर्ट में मना किया, अब 100 साल पुरानी कदीमी मस्जिद तोड़ना चाहती है सरकार
8 नवंबर 1940 को तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन और जामा मस्जिद की मैनेजिंग कमेटी के बीच एक समझौता हुआ था. इसके तहत, कदीमी मस्जिद की जमीन कमेटी को इस शर्त पर दी गई थी कि इसका इस्तेमाल केवल मस्जिद के लिए ही किया जाएगा. जबकि, जमीन का मालिकाना हक सरकार के पास ही रहा.

उससे भी बड़ी बात ये है कि साल 2021 में सरकार ने खुद कहा था कि इस मस्जिद को नहीं हटाया जाएगा. उस समय दिल्ली वक्फ बोर्ड ने ऐसी छह मस्जिदों को बचाने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने अदालत में भरोसा दिया था कि इन मस्जिदों को कुछ नहीं होगा. मगर, अब सरकार का रुख बदल गया है.
केंद्र सरकार ने कोर्ट में क्या कहा?केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल स्टेटस रिपोर्ट में कहा कि कृषि भवन परिसर में मौजूद कदीमी मस्जिद को हटाना जरूरी है. यहां सेंट्रल विस्टा रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट के तहत कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट (CCS) की नई इमारतें 4 और 5 बनाई जानी हैं.
सरकार ने दलील दी कि कृषि भवन और सेंट्रल सेक्रेटेरिएट पूरी तरह सरकारी और प्रशासनिक कामकाज के लिए हैं. ऐसे परिसर में किसी स्थायी धार्मिक ढांचे को बनाए रखना मंजूर नहीं किया जा सकता. सरकारी परिसर में मस्जिद का होना सरकार के सेक्युलर केरेक्टर से मेल नहीं खाता. सरकार के मुताबिक, कदीमी मस्जिद की जमीन का मालिकाना हक भारत सरकार के पास है.
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, 1940 के एक एग्रीमेंट में प्रशासन ने जामा मस्जिद की मैनेजिंग कमेटी को मस्जिद का कब्जा इस शर्त के साथ सौंपा था कि “इसका इस्तेमाल केवल मस्जिद के तौर पर ही किया जाएगा.” केंद्र ने ये भी कहा कि मस्जिद को बचाने के लिए परिसर में अलग से जमीन देने के लिए सरकार को मजबूर नहीं किया जा सकता. सरकार ने कहा,
"(उसे) कृषि भवन कंपाउंड या सेंट्रल सेक्रेटेरिएट कॉम्प्लेक्स के अंदर मस्जिद के लिए जगह अलॉट करने या कोई सेपरेट स्पेस देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता."
उसने इंडिया गेट के पास मौजूद शाही मस्जिद जब्ता गंज का हवाला देते हुए कहा कि ये मस्जिद कृषि भवन से दो किलोमीटर के दायरे में है और नमाज के लिए इस्तेमाल की जा सकती है.
पहले कोर्ट में सरकार ने दिया था भरोसाइस मामले में सरकार के पुराने रुख पर भी सवाल उठ रहे हैं. दिसंबर 2021 में दिल्ली वक्फ बोर्ड ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट से प्रभावित होने वाली छह मस्जिदों को सुरक्षा देने की मांग की थी. इनमें कदीमी मस्जिद भी शामिल थी.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाई कोर्ट में कहा था,
"इन संपत्तियों को कुछ नहीं हो रहा है. माई लॉर्ड हम आपके सामने हैं. ये बहुत लंबी योजना है और हम अभी इसके आसपास भी नहीं पहुंचे हैं."
लेकिन अब केंद्र सरकार खुद अदालत में मस्जिद हटाने की जरूरत बता रही है.
आजाद भारत से भी पुरानी मस्जिदकदीमी मस्जिद का इतिहास मौजूदा सरकारी इमारतों से भी पुराना है. मस्जिद की देखरेख करने वाली कमेटी के मुताबिक, इसका अस्तित्व 1945 के ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है. कमेटी का दावा है कि मस्जिद 100 साल से ज्यादा पुरानी है. 'कदीमी' उर्दू के 'कदीम' शब्द से बना है, जिसका मतलब प्राचीन या पुराना होता है.
8 नवंबर 1940 को तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन और जामा मस्जिद की मैनेजिंग कमेटी के बीच एक समझौता हुआ था. इसके तहत, मस्जिद की जमीन कमेटी को इस शर्त पर दी गई थी कि इसका इस्तेमाल केवल मस्जिद के लिए ही किया जाएगा. जबकि, जमीन का मालिकाना हक सरकार के पास ही रहा.
इसके करीब 17 साल बाद 1957 में कृषि भवन का निर्माण पूरा हुआ. यानी मस्जिद सरकारी इमारत बनने से पहले से वहां मौजूद थी. 1970 में दिल्ली वक्फ बोर्ड ने भी कदीमी मस्जिद को वक्फ संपत्ति के तौर पर नोटिफाई किया.
कदीमी मस्जिद इस इलाके की अकेली मस्जिद नहीं, जो इन सरकारी दफ्तरों से पहले बनी. इंडिया गेट के पास जब्ता गंज मस्जिद और उद्योग भवन के पास सुनहरी बाग मस्जिद भी अपने आस-पास की सरकारी इमारतों से पुरानी हैं. 16 अप्रैल 1970 के दिल्ली गजट में दोनों मस्जिदों को 100 साल से ज्यादा पुराना बताया गया था.
हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा सवालसोमवार, 2 नवंबर को दिल्ली हाई कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस अनीश दयाल ने केंद्र सरकार के रुख पर कुछ सवाल पूछे. उन्होंने पूछा कि क्या ऐसे कोई नियम हैं, जो सरकारी परिसरों में किसी समुदाय के लिए प्रार्थना स्थल की व्यवस्था करने से रोकते हैं? अदालत ने मस्जिद कमेटी को सरकार की दलीलों पर जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया है. मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी.
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मस्जिद की कमेटी ने अदालत से मांग की है कि इसे मौजूदा जगह पर सुरक्षित रखा जाए. अगर ऐसा मुमकिन नहीं है तो पास में ही नमाज के लिए उचित वैकल्पिक जगह उपलब्ध कराई जाए. कमेटी का कहना है कि दशकों से कृषि भवन और आसपास के सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारी यहां नमाज पढ़ते आए हैं.
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