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'सांप-सपेरे वाली नस्लीय सोच,' PM मोदी का विवादित कार्टून छापने वाले नॉर्वे के अखबार पर भड़के लोग

PM Narendra Modi पर विवादित कार्टून छापकर Norway का अखबार Aftenposten यूजर्स के निशाने पर आ गया है. कई यूजर्स ने लिखा कि यह भारत की गलत और पुरानी छवि दिखाने की कोशिश है. इस कार्टून को लेकर लोग सोशल मीडिया पर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे की यात्रा पर गए थे. (PTI)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नॉर्वे दौरा भले खत्म हो गया, लेकिन इस दौरे पर हो रही चर्चा बढ़ती जा रही है. पहले नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग के सवाल वाले वायरल वीडियो पर संग्राम हुआ था. अब एक कार्टून पर विवाद छिड़ गया है. 16 मई को ये कार्टून नॉर्वे के सबसे बड़े अखबार और 'पेपर ऑफ रिकॉर्ड' माने जाने वाले 'आफ्टेनपोस्टेन' (Aftenposten) में छपा. इसमें पीएम मोदी को सपेरे की तरह दिखाया गया है, जिसमें पीएम मोदी बीन बजाते नजर आ रहे हैं. सामने सांप जैसा दिखने वाला पेट्रोल पंप का नोजल फ्यूल डिस्पेंसर है, जिससे गाड़ियों में तेल भरा जाता है.

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पीएम नरेंद्र मोदी के विवादित कार्टून को "En lur og litt irriterende mann" यानी "एक चालाक और थोड़ा परेशान करने वाला आदमी" की हेडिंग के साथ छापा गया है. सोशल मीडिया पर लोग इसे एक नस्लभेदी कार्टून कह रहे है. लोगों का कहना है कि पश्चिमी मीडिया अब भी भारत को 'सपेरों का देश' वाली पुरानी सोच से देखता है.

नॉर्वे के अखबार पर नाराजगी

कई यूजर्स ने लिखा कि यह भारत की गलत और पुरानी छवि दिखाने की कोशिश है. इस कार्टून को लेकर सोशल मीडिया पर लोग काफी कुछ लिख रहे हैं.

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'आफ्टेनपोस्टेन' ने छापा PM नरेंद्र मोदी का विवादित कार्टून. (aftenposten.no)

भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने इस कॉर्टून को लेकर नॉर्वे पर गुस्सा जताया. उन्होंने लिखा,

"56 लाख लोगों के एक अपने आप में संतुष्ट देश का एक बहुत परेशान करने वाला कार्टून, जिसे ना तो ऐतिहासिक या सिविलाइजेशनल गहराई का पता है, ना ही कॉम्प्लेक्स और डायवर्स सोसाइटीज को संभालने का एक्सपीरियंस है, ना ही 1.4 अरब लोगों के देश के सामने आने वाली चुनौतियों का अंदाजा है.

इसमें भारत के बारे में 'सांप-सपेरे' वाली एक अपमानजनक रूढ़िवादी छवि का सहारा लिया गया है, जिसमें नस्लवादी झलक भी दिखाई देती है."

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कंवल सिब्बल का पोस्ट. (X @KanwalSibal)

उन्होंने आगे लिखा,

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"भारत को नॉर्वे के तेल की जरूरत नहीं है. उसके पड़ोस में ही तेल से समृद्ध कई बड़े देश मौजूद हैं. भारत को उन्हें लुभाने की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि भारत खुद एक बहुत बड़ा बाजार है और तेल का दूसरा सबसे बड़ा इंपोर्टर देश है. यह कार्टून नॉर्वे की पत्रकारिता की सतही सोच को दिखाता है, क्योंकि यह उस देश का सबसे बड़ा अखबार है."

'औपनिवेशिक दौर का नस्लवाद'

कार्टून पर एक अमेरिकन नागरिक कार्ल वेल्स ने लिखा,

"नॉर्वे के सबसे बड़े अखबार ने अभी-अभी पीएम मोदी का एक कार्टून छापा है, जिसमें उन्हें एक सपेरे के रूप में दिखाया गया है और उन्हें 'एक चालाक और परेशान करने वाला आदमी' कहा गया है. यह पत्रकारिता नहीं है. यह तो औपनिवेशिक दौर का नस्लवाद है. वे भारत के बढ़ते कद को पचा नहीं पा रहे हैं, इसलिए वे उन्हीं घिसी-पिटी रूढ़ियों का सहारा ले रहे हैं, जिनका इस्तेमाल उनके दादा-दादी किया करते थे. हर बार उनका असली चेहरा सामने आ ही जाता है."

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कार्ल वेल्स का पोस्ट. (X @carlwheless)

लोग कार्टून को नस्लवादी बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस भाषण का भी जिक्र कर रहे है, जो उन्होंने 2014 में अमेरिका के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में दिया था. इस भाषण में पीएम मोदी ने कहा था कि पहले भारत को सपेरों का देश माना जाता था, अब यह तकनीक का देश बन गया है.

SamSays नाम के अकाउंट से एक यूजर ने लिखा,

"यह कार्टून साफ तौर पर नस्लभेदी है. इसमें एक और बात है, वह है अजीब बात. पीएम मोदी पहले कहते थे कि पहले दुनिया भारत को 'सपेरों की धरती' समझती थी. और अब, ओस्लो की उनकी यात्रा के दौरान एक बड़े यूरोपियन अखबार ने उन्हें ठीक उसी तरह दिखाया है."

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SamSays का पोस्ट. (X @samjawed65)

इस यूजर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े एक अकाउंट से 2014 में की गई एक पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए यह लिखा. यूजर ने पोस्ट का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया. तब पीएम नरेंद्र मोदी गुजरात के चीफ मिनिस्टर थे. पोस्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा था कि 1990 के दशक के बीच में ताइवान में मुझसे पूछा गया था- क्या भारत अभी भी सपेरों की भूमि है. दुनिया यही सोचती थी.

नॉर्वे का सबसे पुराना अखबार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विवादित कार्टून छापने वाला Aftenposten अखबार नार्वे का सबसे प्रतिष्ठित और पुराना न्यूजपेपर माना जाता है. यह नॉर्वे की राजधानी ओस्लो से प्रकाशित होता है. 14 मई 1860 को क्रिश्चियन शिबस्टेड (Christian Schibsted) ने इसे क्रिश्चियानिया एड्रेसब्लाड (Christiania Adresseblad) नाम से शुरू किया था. बाद में 1 जनवरी 1861 को इसका नाम आफ्टेनपोस्टेन हो गया. अभी इस न्यूजपेपर के करीब 12 लाख रीडर्स हैं.

वीडियो: पीएम मोदी पर सवालों से बचने का आरोप लगाने वाली पत्रकार हेले लिंग को MEA ने क्या जवाब द‍िया?

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