‘सलवार उतारना और सीना दबाना रेप की कोशिश सबित करने के लिए काफी नहीं हैं.’ यह बयान पटना हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान दिया. हाई कोर्ट में एक रेप अटेम्प्ट के दोषी की याचिका पर सुनवाई हो रही थी. ट्रायल कोर्ट ने उसे एक महिला का रेप करने की कोशिश का दोषी करार दिया था. उसने निचली अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में चैलेंज किया. हाई कोर्ट ने यह बयान देते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बदल दिया और उसे रिहा कर दिया.
'सलवार उतारना, सीना दबाना रेप की कोशिश साबित करने के लिए काफी नहीं', पटना HC ने दोषी को बरी किया
Patna High Court ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि ‘सलवार उतारना और सीना दबाना रेप की कोशिश सबित करने के लिए काफी नहीं हैं.' इसके साथ ही कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए याचिकाकर्ता को बरी कर दिया.

मामला साल 2008 में एक महिला को साथ हुए यौन उत्पीड़न का है. पटना हाई कोर्ट में केस की सुनवाई जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की बेंच कर रही थी. इंडिया टुडे से जुड़े रोहित सिंह की रिपोर्ट के मुताबिक, हाई कोर्ट ने माना कि इंडियन पीनल कोड (IPC) की धारा 376/511 तहत सिर्फ ‘महिला का सलवार उतारना और उसका सीना दबाने ‘रेप’ की कोशिश को साबित करने के लिए के काफी नहीं है.
मामला 2008 का हैदरअसल, साल 2008 में बिहार के बांका जिले में एक महिला ने स्टूडियो के फोटोग्राफर के खिलाफ रेप का आरोप लगाया था. पीड़िता के वकील के मुताबिक, महिला अपने पिता के साथ अमरपुर इलाके के एक फोटोग्राफी स्टूडियो में फोटो खिंचवाने गई थी. फोटो खिंचवाने के बाद कथित तौर पर फोटोग्राफर ने पीड़िता के पिता को बाहर इंतजार करने के लिए कहा.
इसके बाद दोषी ने स्टूडियो का दरवाजा बंद कर दिया और महिला के सलवार को उतारने की कोशिश कि और उसके छाती को दबाया. कथित तौर पर पीड़िता ने शोर मचाया और पिता स्टूडियो के कमरे में गए, लेकिन दोषी मौके से भाग गया .
मामला ट्रायल कोर्ट पहुंचामहिला ने इसकी शिकायत पुलिस स्टेशन में की और मामला एक ट्रायल कोर्ट में पहुंच गया. कोर्ट ने आरोपी को रेप की कोशिश करने और बंधक बनाने का दोषी ठहराया. इसके बाद दोषी ने कोर्ट के इस फैसले को पटना हाई कोर्ट में चैलेंज कर दिया. हाई कोर्ट में केस की सुनवाई जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने की बेंच ने की. जस्टिस सिंह ने दोषी को बरी करते हुए कहा,
‘अपीलकर्ता ने पीड़िता को स्टूडियो के भीतर बंद किया, दरवाजा बंद किया, उसके सलवार को उतारने की कोशिश की और उसकी छाती दबाकर शारीरिक शोषण करके उसके खिलाफ आपराधिक बल का प्रयोग किया. ऐसा करना स्पष्ट तौर पर महिला के साथ आपराधिक बल को साबित करता है, जिसमें महिला की लज्जा भंग होने की पूरी संभावना थी. यह मामला IPC की धारा 354 के तहत आता है.’

Bar And Bench की रिपोर्ट के मुताबिक, हाई कोर्ट ने यह भी पाया कि रेप की कोशिश के आरोपों को साबित करने के लिए कोई मेडिकल सबूत नहीं था. कोर्ट ने यह भी पाया कि ट्रायल के समय भी जांच अधिकारी से पूछताछ नहीं की गई. अभियोजन पक्ष का मामला मुख्य तौर पर पीड़िता और उसके माता-पिता के बयानों पर आधारित था.
अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में फेलकेस में सबूतों के आधार पर कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष रेप की कोशिश का अपराध साबित करने में नाकाम रहा. कोर्ट ने आरोपों का हवाला देते हुए कहा कि इससे पता चलता है कि अपीलकर्ता ने कथित तौर पर महिला को स्टूडियो में अंदर बंधक बनाया, उसकी सलवार उतारने की कोशिश की और उसकी छाती दबाई, लेकिन पेनिट्रेशन या ऐसे किसी भी एक्ट का साफ सबूत नहीं था, जो स्पष्ट रूप से रेप की कोशिश को साबित कर सके.
कोर्ट ने यह भी माना कि अगर अभियोजन पक्ष की बात को पूरी तरह से मान भी लिया जाए, तो भी अपीलकर्ता पर लगाए गए आरोप IPC की धारा 354 के तहत महिला के ‘मर्यादा भंग’ करने का ही अपराध साबित होता है. इस बात तक पहुंचने के बाद भी कोर्ट ने दोषी को रिहा कर दिया. क्योंकि, शख्स पर केवल रेप की कोशिश और गलत तरीके से बंधक बनाने का केस चला और इसमें ही दोषी ठहराया गया न की IPC की धारा 354 के तहत.
हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के सजा को रद्द कर दिया और दोषी को सभी आरोपों से बरी कर दिया. साथ ही आदेश दिया कि दोषी की ओर से जमा किया गया कोई भी जुर्माना उसे वापस किया जाए.
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