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'उमर अब्दुल्ला और निधि राजदान की शादी नाजायज', मौलाना ने इस्लाम-शरिया के 'खिलाफ' बताया

मौलाना का यह बयान इस्लाम के धार्मिक नियमों को लेकर उनकी अपनी व्याख्या है. भारत में किसी शादी की कानूनी वैधता का फैसला देश में लागू कानूनों के तहत होता है. सिर्फ किसी धार्मिक फतवे के आधार पर शादी को गैरकानूनी नहीं ठहराया जा सकता.

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31 अक्टूबर को जम्मू सीएम ने शादी की तस्वीरें शेयर की थीं.

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  • जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पत्रकार निधि राजदान ने 31 अक्टूबर को अपनी शादी की तस्वीरें साझा कीं और इस नए जीवन शुरुआत का उल्लेख किया।
  • मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रज़वी बरेलवी ने इस शादी को इस्लामी नियमों के खिलाफ बताया क्योंकि निधि राजदान मुस्लिम धर्म की अनुयायी नहीं हैं।
  • धार्मिक विवाद के बावजूद भारत में शादी की वैधता कानूनी नियमों पर निर्भर करती है और संविधान नागरिकों को धर्म के बिना शादी का अधिकार देता है।

जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पत्रकार निधि राजदान ने 31 अक्टूबर को अपनी शादी की तस्वीरें शेयर कीं. लिखा- ‘नया सफर शुरू हुआ.’ पोस्ट पर लोगों ने बधाई दी. अब इसको लेकर धार्मिक विवाद शुरू हो गया है. ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रज़वी बरेलवी ने इस शादी को ‘इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ’ बताते हुए इसे 'नाजायज' करार दिया.

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रज़वी ने कहा कि इस्लामी नियमों के मुताबिक इस शादी को वैध नहीं माना जा सकता, क्योंकि शरिया के तहत शादी को जायज मानने के लिए दोनों का मुस्लिम होना जरूरी है. उन्होंने कहा कि अब्दुल्ला मुस्लिम हैं, जबकि राजदान मुस्लिम नहीं हैं. इसलिए इस्लाम के नजरिए से यह शादी जायज नहीं है. मौलाना ने कहा कि निकाह से पहले अब्दुल्ला को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि राजदान इस्लाम कबूल कर लें. उन्होंने कहा कि अगर राजदान इस्लाम कबूल करने के बाद इस्लामी रीति-रिवाजों और परंपराओं के मुताबिक अब्दुल्ला से निकाह करतीं, तो शरिया के तहत इस शादी को जायज माना जा सकता था.

मौलाना का तर्क

रजवी ने कहा कि इस्लाम में शादी को लेकर कुछ खास नियम और शर्तें हैं. इनके मुताबिक, शादी करने वाले पुरुष और महिला दोनों का मुस्लिम होना जरूरी है. उन्होंने कहा, ‘अगर दोनों में से कोई एक मुस्लिम नहीं है, तो इस शादी को जायज नहीं माना जा सकता.’ उनके बयान के बाद इस मामले में धार्मिक मान्यताओं और व्यक्तिगत आजादी को लेकर चर्चा शुरू हो गई है.

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हालांकि, मौलाना का यह बयान इस्लाम के धार्मिक नियमों को लेकर उनकी अपनी व्याख्या है. भारत में किसी शादी की कानूनी वैधता का फैसला देश में लागू कानूनों के तहत होता है. सिर्फ किसी धार्मिक फतवे के आधार पर शादी को गैरकानूनी नहीं ठहराया जा सकता. भारत का संविधान बालिग उम्र के नागरिकों को अपनी मर्जी से शादी करने का हक देता है. इस अधिकार में धर्म, जाति, समुदाय कोई अपवाद नहीं हैं.

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