साल 2015 में बाल्टासर कोर्माकुर के निर्देशन वाली एक फिल्म आई थी- एवरेस्ट. दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर फतह हासिल करने का मंसूबा लेकर चढ़ाई करने वाली टीम की इस कहानी में बेक वेदर्स नाम का एक किरदार था. वह चोटी के एकदम पास ‘डेथ जोन’ में फंसकर तकरीबन मरा हुआ मान लिया गया. उसके हाथ-पैर जमकर पत्थर हो गए थे. आंखें अंधी हो गई थीं और सांसें ऐसी मद्धम कि उसके साथियों ने बंद ही मान लीं. लेकिन अपनी ‘घोषित मौत’ के कई दिन बाद अचानक वह रेंगते हुए बेस कैंप पहुंचता है और लोग उसे जिंदा देखकर चौंक जाते हैं.
अंतिम संस्कार की रस्मों के बीच माउंट एवरेस्ट से रेंगता हुआ जिंदा लौटा शेरपा
मौत के मुंह से लौटना किसे कहते हैं, ये कोई नेपाली शेरपा हिलेरी दावा से पूछे. माउंट एवरेस्ट के डेथ जोन में 6 दिन बिताने के बाद जो जिंदा वापस आ गए. उनके घर वाले अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे थे. तभी शेरपा ने जिंदा लौटकर सबको चौंका दिया.


मौत के मुंह से वापस आने की ये कहानी फिल्मी नहीं है. असल कहानी है जिस पर ये फिल्म बनी. इसी से मिलती-जुलती नेपाल के शेरपा हिलेरी दावा की कहानी भी है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, हिलेरी माउंट एवरेस्ट से उतर रहे थे. साथियों ने 29 मई 2026 को आखिरी बार उन्हें एवरेस्ट के ‘डेथ जोन’ में देखा था. समुद्र तल से 8 हजार से ज्यादा मीटर की ऊंचाई पर बर्फ की एक ऐसी दुनिया है, जहां जिंदगी पूरी तरह से कुदरत की मेहरबानी पर टिकी होती है. यहां चारों ओर सिर्फ बर्फ होती है. बर्फ का तूफान होता है. अंतहीन खामोशी और जरा-सी लापरवाही भर की दूरी पर मौत का दरवाजा भी होता है. इसी को ‘डेथ जोन’ कहते हैं.
डेथ जोन के खतरे‘डेथ जोन’ में ऑक्सीजन इतनी कम होती है कि दिमाग सुन्न पड़ जाता है. शरीर जवाब देने लगता है. सांस बंद होने की कगार पर ही होती है. शरीर के टिशूज भी जमकर पत्थर हो जाते हैं. मौसम के जरा से इशारे पर मौत तत्काल दस्तक देती है और इंसानी शरीर हमेशा के लिए बर्फ की तहों में दबकर लापता हो जाता है.
नेपाल के शेरपा हिलेरी दावा इसी डेथ जोन में अकेले फंस गए थे. अपनी टीम से बिछड़े और पस्त होकर गिर पड़े थे. एक नहीं, दो नहीं, 6 दिन तक वो बर्फ की जानलेवा गोद में सोते रहे. बेस कैंप पर नहीं लौटे तो चिंता बढ़ी. दिन पर दिन बीते और जब लोगों को भरोसा हो गया कि इंसानी जिंदगी के डेथ जोन को सहने की क्षमता की आखिरी डेट भी खत्म हो गई, तब हिलेरी के घर वालों को बता दिया गया.
शोक में डूबे घर वालों ने शेरपा के अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू कर दी. कई दिनों तक चलने वाली इस प्रक्रिया के दो ही दिन बीते थे कि चमत्कार हो गया.
8K एक्सपेडिशन्स काठमांडू की एक एडवेंचर कंपनी है जो लोगों को एवरेस्ट की चढ़ाई पर ले जाती है. इस कंपनी की रेस्क्यू टीम ने देखा कि हिलेरी बेस कैंप के ठीक ऊपर खुंबू आइसफॉल के पास बर्फीली ढलानों पर रेंगते हुए आगे बढ़ रहे थे. ये देखकर रेस्क्यू टीम को अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हुआ. लेकिन ये सच था कि हिलेरी के शरीर में जीवन की हलचल थी. रेस्क्यू टीम जल्द से जल्द हिलेरी के पास पहुंची. उनके हाथों में फ्रॉस्टबाइट हो गया था. ये ऐसी कंडीशन है जब जीरो से भी कम तापमान पर शरीर के स्किन के नीचे के टिश्यूज जम जाते हैं.
टीम को हिलेरी स्वस्थ लगे, जिसके बाद वो उन्हें बेस सुरक्षित स्थान पर लेकर गए. तत्काल उनका ट्रीटमेंट शुरू किया गया. खाना और पानी दिया गया. हिलेरी को एक हेलिकॉप्टर में बैठाकर काठमांडू के अस्पताल में भेजा गया.
इधर परिवार हिलेरी के अंतिम संस्कार की रस्मों के दूसरे दिन में था. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, हिलेरी की पत्नी दामू शेरपा ने ‘द गार्जियन’ को बताया कि इसी बीच उन्हें एक लोकल अखबार से खबर मिली कि हिलेरी जिंदा हैं. उनकी बेटी ल्हामू शेरपा ने कहा कि उन्हें पहले तो यकीन नहीं हुआ कि जिसकी बात हो रही वो उनके पिता ही थे या नहीं. इसलिए उन्होंने रेस्क्यू टीम से उनकी फोटोज मांगीं. फोटो देखकर परिवार को यकीन हो गया कि हिलेरी जिंदा हैं.
रास्ते में क्या हुआ था?डेथ जोन में फंसने और मौत के जबड़े से बाहर आने की हिलेरी की कहानी क्या थी ये तो बाद में पता चलेगा. लेकिन उनके एक साथी पर्वतारोही क्रिस थ्रॉल ने बीते दिनों एक वीडियो शेयर कर बताया कि रास्ते में हिलेरी के साथ क्या हुआ था? क्रिस थ्रॉल ने ही ये दावा किया कि हिलेरी की मौत हो गई. उन्होंने ये वीडियो उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए ही बनाया था.
द गार्जियन से बात करते हुए थ्रॉल ने बताया कि वो और हिलेरी साथ ही एवरेस्ट से उतर रहे थे. उन्होंने कहा,
हिलेरी थककर आराम करने के लिए बैठ गए थे. मैं मुड़ा और उनसे पूछा, हिलेरी! क्या तुम ठीक हो, भाई? उसने जवाब दिया, हां-हां ठीक हूं क्रिस. प्लीज आगे बढ़ो. जाओ.
हिलेरी के पास एक सैटेलाइट फोन और रेडियो था, लेकिन पता नहीं वो चालू था या नहीं. थ्रॉल ने बताया कि हिलेरी के कहने के बाद वो नीचे उतरने लगे. वह एक और पर्वतारोही की मदद करने लगे, जिसका ऑक्सीजन खत्म हो गया था और जो फ्रॉस्टबाइट का शिकार हो गया था.
थ्रॉल ने कहा कि उन्हें लगा था कि उनका अनुभवी नेपाली गाइड अपना रास्ता बना लेगा और वापस लौट आएगा. लेकिन मौसम काफी खराब था. फिर ये दुखद घटना हो गई. पहाड़ ऐसे ही होते हैं.
वीडियो: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने Forensic Lab की रिपोर्ट्स पर क्या कहा?




















