BRICS समिट के बहाने करीब 7 साल बाद भारत में पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बात-मुलाकात होगी. इससे पहले अक्टूबर 2019 में चीन के राष्ट्रपति ने भारत का दौरा किया था. इसके कुछ महीनों बाद जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीनी सैनिकों में घातक झड़प हो गई थी. इसने दोनों देशों के संबंधों में जबरदस्त तनाव पैदा कर दिया था.
7 साल बाद दिल्ली में आमने-सामने होंगे मोदी और जिनपिंग, जानें क्या-क्या बात होगी
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए दिल्ली आ रहे चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पीएम नरेंद्र मोदी से द्विपक्षीय बैठक भी होगी. इस मीटिंग में लद्दाख-अरुणाचल सीमा विवाद, वीजा, ब्रह्मपुत्र जल डेटा समझौते आदि पर बात हो सकती है.

इससे राजनीतिक-आर्थिक संबंध प्रभावित हुए और दोनों देशों के रिश्तों में सुधार की कवायद खटाई में पड़ गई. हालांकि, इतने सालों के बीच मोदी और जिनपिंग अलग-अलग जगहों पर एक दूसरे से मिलते रहे. पीएम मोदी भी 2025 में चीन गए, लेकिन गलवान घाटी झड़प के बाद जिनपिंग पहली बार भारत आ रहे हैं. वो दिल्ली में ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेेंगे.
सम्मेलन से इतर जिनपिंग की प्रधानमंत्री मोदी से द्विपक्षीय मुलाकात भी होगी. शनिवार, 12 सितंबर की शाम को 6 बजे इसकी संभावना है. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का ये दौरा इसलिए भी अहम है क्योंकि तीन साल पहले जब दोनों देशों के बीच रिश्ते ठीक नहीं चल रहे थे, तब वह दिल्ली में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन में नहीं आए थे. लेकिन 2026 में वक्त बदल गया है. दुनिया के जज्बात भी बदल गए हैं. ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य तनाव ने ग्लोबल समीकरण को भी प्रभावित किया है. ग्लोबल डिप्लोमैसी में देशों के दोस्त बदले हैं. नए गठजोड़ पैदा हुए हैं. इन सबके बीच दक्षिण एशिया के दो शक्तिशाली देशों के इन नेताओं की मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर है.
अब सवाल है कि शनिवार, 12 सितंबर को ये दोनों नेता जब दिल्ली में मिलेंगे तो उनके बीच किन मुद्दों पर बात हो सकती है.
चीन से सीमा विवादभारत और चीन के लिए कभी भी किसी भी मुद्दे से ज्यादा जरूरी सीमा विवाद की पहेली को सुलझाना होता है. इसलिए दिल्ली में जब शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी आमने-सामने बैठेंगे तो अरुणाचल प्रदेश से लेकर लद्दाख में सीमा को लेकर जारी अनिश्चितता पर चर्चा हो सकती है. हाल में अरुणाचल प्रदेश को लेकर एक बार फिर से दोनों देशों में वाक् युद्ध देखने को मिला था. चीन ने इस इलाके में कई जगहों के नाम बदल दिए और ऐसे नक्शे जारी किए जिनमें अरुणाचल प्रदेश को अपना क्षेत्र बताया गया है. इन कदमों का भारत ने कड़ा विरोध किया.
इसके बाद भारत ने अगस्त 2026 में अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों और ज्योग्राफिकल लोकेशंस को ‘Survey of India’ के आधिकारिक नक्शों में ऑफिशियली दर्ज किया. इसे अरुणाचल के इलाकों को लेकर ‘चीनी कुप्रचार’ का जवाब माना गया.
चीन में भारत के पूर्व राजदूत गौतम बंबावाले इंडियन एक्सप्रेस से कहते हैं कि पूर्वी लद्दाख में पीएलए (चीनी सेना) की कार्रवाइयों ने दोनों देशों के संबंधों को लगभग 10 कदम पीछे धकेल दिया है. 2024 से जब से हमने संबंधों को सुधारना शुरू किया है तब से शायद सिर्फ तीन कदम आगे बढ़े हैं. कुल मिलाकर हालात अभी भी नकारात्मक हैं. इसलिए बहुत काम करना बाकी है.
सीमा विवाद के अलावा भारत ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन के पाकिस्तान के साथ खड़े होने का मुद्दा भी उठा सकता है.
वीजा मुश्किलों पर बातभारतीय कारोबारियों के लिए वीजा की मुश्किलों को लेकर भी पीएम मोदी जिनपिंग के सामने अपनी चिंता जता सकते हैं. हाल ही में इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में बताया गया था कि ऐसी कंपनियां जो चीन से व्यापारिक रिश्तेदारी रखती हैं, उन्हें चीनी वीजा मिलने में दिक्कत आई है. कई भारतीय कंपनियों के चीनी व्यापार वीजा आवेदनों में से केवल 20 फीसदी से 40 फीसदी तक ही अप्रूव हो पा रहे हैं. पहले तकरीबन सारे आवेदनों को आसानी से मंजूरी मिल जाती थी. कुछ कंपनियों के अधिकारियों का कहना है कि वीजा रिक्वेस्ट रिजेक्ट करने की दर बढ़कर 95 फीसदी तक पहुंच गई है.
सीमा पार की नदियों में पानी के डेटा को लेकर भी चीन और भारत में कोई साफ संवाद नहीं है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन भारत के साथ नदियों के पानी का डेटा शेयर तो करता है, लेकिन यह पूरी तरह से उसकी मर्जी पर है. इसका कोई कानूनी समझौता दोनों देशों के बीच नहीं है. चीन ऐसी किसी समझौते की संभावना से इनकार ही करता आया है. इसलिए भारत के पास चीन से नदियों से जुड़ी किसी खास जानकारी की मांग का कोई कानूनी अधिकार नहीं है.
इसका मतलब ये है कि दोनों देशों के बीच रिश्ते खराब होने पर चीन डेटा देने से इनकार कर भी सकता है. 2017 में ये हुआ भी था. डोकलाम विवाद के बाद चीन ने ब्रह्मपुत्र नदी से जुड़ा डेटा भारत को देना बंद कर दिया. उसने बहाना बनाया कि डेटा जुटाने वाले केंद्र खराब हो गए हैं. इसी गर्मी में असम में बाढ़ से कई लोग मारे गए. बाद में जब दोनों देशों के रिश्ते सुधरे तो चीन ने फिर डेटा देना शुरू किया.
रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 के गलवान संघर्ष के बाद एक बार फिर से चीन से डेटा मिलना बंद हो गया है. ब्रह्मपुत्र नदी के डेटा से जुड़ा जो समझौता भारत और चीन के बीच था, वो जून 2025 में ही एक्सपायर हो गया है. उसे रिन्यू भी नहीं किया गया. ऐसे में दिल्ली में जब मोदी-जिनपिंग की मुलाकात होगी तब उम्मीद रहेगी कि इस जरूरी मुद्दे पर कुछ समाधान का रास्ता खुले.
इन सबके अलावा मोदी और जिनपिंग की मीटिंग में व्यापार और निवेश में बढ़ाना देने के उपायों पर भी चर्चा हो सकती है.
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चीन की क्या उम्मीदें?ऐसा नहीं है कि उम्मीदें सिर्फ भारत की ओर से ही होंगी. चीन भी इस बातचीत से कुछ समाधान की आशा कर रहा है. साल 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत और चीनी सैनिकों के बीच झड़प हुई थी, जिसमें कई भारतीय और चार चीनी सैनिक शहीद हो गए थे. इसके बाद लंबे समय तक दोनों देशों के बीच सैन्य गतिरोध बना रहा. राजनीतिक और आर्थिक संबंध भी प्रभावित हुए.
कार्रवाई की कड़ी में भारत ने देश में चीनी निवेशों की निगरानी बढ़ा दी. साथ ही चीनी मोबाइल एप्लिकेशनों (App) पर प्रतिबंध लगा दिया. ऐसी नीतियां बनानी शुरू कीं कि चीनी कंपनियों और टेक्नॉलजी पर निर्भरता कम हो. जब पीएम मोदी और शी जिनपिंग आमने-सामने होंगे तो चीन इन सारे मुद्दों को भारत के सामने उठा सकता है.
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