मुकेश अंबानी और गौतम अडानी की कंपनियों समेत 21 न्यूज पब्लिशर्स ने मोदी सरकार के प्राइवेसी कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. उन्होंने कहा है कि इस कानून से मीडिया की आजादी पर असर पड़ेगा. केंद्र सरकार पत्रकारों के सूत्रों की जानकारी मांग सकती है, जिससे सूचना पहुंचाने वालों की पहचान उजागर होने का रिस्क होगा. इससे खोजी पत्रकारिता खत्म हो जाएगी. कानून में किसी भी डेटा के लिए इजाजत लेने के प्रावधान पर आपत्ति जताते हुए न्यूज पब्लिशर्स ने कहा कि ऐसा करने से जिसके खिलाफ जांच की जाएगी वो सतर्क होकर सबूत मिटा सकता है.
अंबानी-अडानी की कंपनियों ने भी मोदी सरकार को SC में घसीट लिया, वजह पत्रकार और 'मीडिया की आजादी' है
डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर डेटा प्रोटेक्शन कानून को चुनौती दी है. न्यूज पब्लिशर्स का कहना है कि जब कानून बन रहा था, तब एक मीटिंग में सरकार ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि वो इस कानून से प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करेगी. लेकिन कानून में मीडिया को छूट नहीं दी गई है. यह मीडिया की आजादी में दखल देने जैसा है.

न्यूज पब्लिशर्स का कहना है कि जब कानून बन रहा था, तब एक मीटिंग में सरकार ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि वो इस कानून से प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करेगी. लेकिन कानून में मीडिया को छूट नहीं दी गई है. यह मीडिया की आजादी में दखल देने जैसा है.
कब दाखिल हुई याचिका?न्यूज पब्लिशर्स की एसोसिएशन DNPA की ओर से 6 अक्टूबर को ये याचिका दाखिल की गई थी, जिस पर मंगलवार 27 अक्टूबर को सुनवाई होनी है. रॉयटर्स में छपी एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, ये जानकारी पहली बार सामने आई है. न्यूज पब्लिशर्स की याचिका मोदी सरकार के प्राइवेसी कानून के रास्ते की अब तक की सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकती है. क्योंकि अभी तक सिर्फ छोटे पब्लिशर्स और छोटे न्यूज संस्थानों के लोग इस कानून को चुनौती दे रहे थे. अब इस लिस्ट में अंबानी और अडानी जैसे बड़े नामों की कंपनियां भी जुड़ गई हैं.
मोदी सरकार ने 2025 में लोगों के डिजिटल प्राइवेट डेटा की सेफ्टी के लिए प्राइवेसी कानून लागू करने का ऐलान किया था. बताया गया कि यह भारत का पहला डेटा प्रोटेक्शन कानून है. किसी भी कंपनी या संगठन को अगर आपका डेटा चाहिए तो इसके लिए आपकी सहमति लेनी होगी. ये भी साफ-साफ बताना होगा कि डेटा क्यों चाहिए.
‘पत्रकारों को अलग रखने का प्रावधान नहीं’भारत की ‘डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन’ (DNPA) का कहना है कि पत्रकारों को इस कानून से अलग रखने के लिए कोई प्रावधान नहीं है, जो चिंता की बात है. एसोसिएशन का कहना है कि अगर कोई पत्रकार किसी व्यक्ति के खिलाफ जांच करता है तो इस कानून के तहत उसे पहले संबंधित व्यक्ति की इजाजत लेनी पड़ेगी. इससे वो सतर्क हो सकता है. जांच और गवाहों को प्रभावित कर सकता है. सबूत मिटा सकता है. इसके अलावा इस कानून की वजह से कई बार पत्रकारों को अपनी छपी खबरें हटाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है.
न्यूज पब्लिशर्स की एक चिंता ये भी है कि कानून में सरकार को जानकारी मांगने की जो शक्तियां मिली हैं, उससे पत्रकारों के सूत्रों की पहचान उजागर हो सकती है. सुप्रीम कोर्ट में इन सब आपत्तियों को लेकर 698 पन्नों की याचिका डाली गई है. कहा गया है कि ये कानून इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म को कमजोर कर देगा. पत्रकारों का काम सिर्फ घटनाओं को दर्ज करने तक रह जाएगा. इस कानूनों के प्रावधानों की वजह से खबरों को छपने से पहले ही रोकने का काम कर सकते हैं, जो लोकतंत्र के लिए मंजूर नहीं होना चाहिए.
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DNPA में कौन-कौन?DNPA का कहना है कि यूरोपीय यूनियन, सिंगापुर, ब्रिटेन में भी इस तरह के कानून लागू हैं, लेकिन वहां पर इससे पत्रकारों को कानून से बाहर रखा गया है. बता दें कि DNPA न्यूज पब्लिशर्स का एसोसिएशन है, जिसमें मुकेश अंबानी का मीडिया समूह नेटवर्क-18 भी शामिल है. इसके अलावा गौतम अडानी का NDTV भी इसका सदस्य है. इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स इंटरनेट जैसे संस्थान भी इस एसोसिएशन का हिस्सा हैं.
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